Diseases Search
Close Button
 
 

गर्भधारण के बाद भी थायरॉइड क्यों बढ़ता है? Postpartum Thyroiditis समझें

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 15 May, 2026
  • category-iconUpdated on 17 Jun, 2026
  • category-iconWomen's Health
  • blog-view-icon5056

बच्चे के जन्म के बाद एक नई माँ का शरीर अंदर और बाहर से बहुत सारी चीज़ो से गुज़रता है। कई बार बहुत ज़्यादा थकावट महसूस होना, बात-बात पर मूड बदलना या वज़न का टस से मस न होना सिर्फ 'नींद पूरी न होने' का नतीजा नहीं होता। इसके पीछे 'पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस' (Postpartum Thyroiditis) नाम की दिक्कत हो सकती है।

इसमें डिलीवरी के पहले एक साल के अंदर ही गले की थायरॉइड ग्रंथि में सूजन आ जाती है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ज़्यादातर महिलाएं इसे नई माँ बनने की थकान या स्ट्रेस मानकर टाल देती हैं। अगर इसे यूं ही इग्नोर कर दिया जाए, तो यह आगे चलकर हमेशा के लिए थायरॉइड की बीमारी (हाइपोथायरायडिज्म) बन सकती है।

डिलीवरी के बाद का समय (Postpartum Phase) क्या है और शरीर में क्या बदलता है?

बच्चे के जन्म के बाद का जो समय होता है (जिसे हम सूतक काल या रिकवरी का समय भी कहते हैं), वह किसी भी महिला के लिए सबसे नाज़ुक दौर होता है। यह सिर्फ आराम करने का वक्त नहीं है, बल्कि इस दौरान शरीर अंदर से खुद की मरम्मत कर रहा होता है:

  • अंदरूनी बदलाव: यह वह समय है जब शरीर और दिमाग दोनों खुद को वापस पहले जैसी स्थिति में लाने और समेटने की कोशिश कर रहे होते हैं।
  • हार्मोन का अचानक गिरना: बच्चा होने के तुरंत बाद शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे ज़रूरी हार्मोन का लेवल एकदम से नीचे गिर जाता है, जिससे शरीर में उथल-पुथल मच जाती है।
  • एनर्जी वापस पाना: प्रेगनेंसी और डिलीवरी में शरीर की जो ताक़त खर्च हुई है, शरीर उसे दोबारा जुटाने और अपना बैलेंस बनाने में लगा रहता है।
  • इम्यून सिस्टम का भड़कना: पूरे 9 महीने तक शरीर का जो इम्यून सिस्टम एकदम शांत बैठा था, वह डिलीवरी के बाद अचानक से बहुत ज़्यादा एक्टिव हो जाता है। कई बार यही भड़का हुआ इम्यून सिस्टम थायरॉइड ग्रंथि पर उल्टा असर डाल देता है।
  • ज़्यादा नाज़ुक होना: इस वक्त शरीर इतना नाज़ुक होता है कि अगर खाने-पीने या रातों की नींद में ज़रा सी भी कमी हो जाए, तो शरीर का पूरा सिस्टम बिगड़ सकता है।

'पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस' असल में क्या है?

डिलीवरी के बाद जब महिला की थायरॉइड ग्रंथि में अचानक से सूजन आ जाए और वह ठीक से काम करना बंद कर दे, तो उसे पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस कहते हैं। यह अक्सर बच्चा होने के 1 से 6 महीने के बीच कभी भी शुरू हो सकता है।

इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि डिलीवरी के बाद शरीर का इम्यून सिस्टम अचानक से एक्टिव हो जाता है और गलती से अपनी ही थायरॉइड ग्रंथि पर हमला कर बैठता है। राहत की बात यह है कि कई महिलाओं में यह दिक्कत कुछ महीनों बाद अपने आप ठीक हो जाती है। लेकिन कुछ मामलों में यह परेशानी लंबी खिंच जाती है और आगे चलकर ज़िंदगी भर की थायरॉइड की बीमारी का रूप ले लेती है।

गर्भावस्था के बाद थायरॉइड बढ़ने के मुख्य कारण

गर्भावस्था के बाद थायरॉइड बढ़ने या उसमें सूजन आने के मुख्य कारणों को आप इन बिंदुओं से आसानी से समझ सकते हैं:

थायरॉइड असंतुलन के मुख्य कारण

  • इम्यून सिस्टम का बदलाव: प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर का इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) दबा रहता है ताकि भ्रूण सुरक्षित रहे।
  • रिबाउंड इफेक्ट (Rebound Effect): डिलीवरी के बाद इम्यून सिस्टम अचानक बहुत सक्रिय हो जाता है, जिससे यह गलती से थायरॉइड ग्रंथि पर हमला कर सकता है।
  • हार्मोनल उतार-चढ़ाव: प्रसव के बाद एस्ट्रोजन (Estrogen) और अन्य हार्मोन्स का स्तर तेजी से गिरता है, जो थायरॉइड के संतुलन को बिगाड़ देता है।
  • अस्थायी सूजन: इन कारणों से थायरॉइड ग्रंथि में सूजन आ जाती है, जिसे 'Postpartum Thyroiditis' कहा जाता है।
  • समय सीमा: यह समस्या आमतौर पर डिलीवरी के 1 से 6 महीने के भीतर दिखाई देने लगती है।

Postpartum Thyroiditis के लक्षण कैसे पहचानें?

बच्चे के जन्म के बाद शरीर में होने वाले बदलावों के बीच Postpartum Thyroiditis के लक्षणों को पहचानना थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि ये लक्षण कभी बहुत सूक्ष्म (Subtle) होते हैं, तो कभी बहुत स्पष्ट।

इसे पहचानने के मुख्य तरीके और लक्षण नीचे दिए गए हैं:

  • शारीरिक थकान: इसे अक्सर सामान्य प्रसव के बाद की थकान समझ लिया जाता है, लेकिन यह थकान आराम करने के बाद भी कम नहीं होती।
  • हृदय गति में बदलाव: अचानक दिल की धड़कन तेज होना या घबराहट महसूस होना इसका एक प्रमुख संकेत हो सकता है।
  • वजन में उतार-चढ़ाव: बिना किसी विशेष कारण के वजन का अचानक बढ़ना (हाइपोथायरायडिज्म) या तेजी से घटना (हाइपरथायरायडिज्म)।
  • मूड स्विंग्स (Mood Swings): अत्यधिक चिड़चिड़ापन, चिंता या डिप्रेशन जैसा महसूस होना।
  • बालों का झड़ना और त्वचा का सूखापन: प्रसव के बाद बालों का बहुत ज्यादा झड़ना भी थायराइड असंतुलन का संकेत हो सकता है।

हाइपरथायरॉइड और हाइपोथायरॉइड फेज़ (Phase) में क्या फर्क है?

डिलीवरी के बाद होने वाली इस थायरॉइड की दिक्कत को आप दो हिस्सों में समझ सकते हैं। इसमें होता क्या है कि शरीर की मशीनरी पहले तो एकदम से बहुत तेज़ दौड़ने लगती है और फिर बाद में बिल्कुल सुस्त पड़ जाती है:

हाइपरथायरॉइड फेज़ (शुरुआती दौर)

इस दौर में होता यह है कि थायरॉइड ग्रंथि में सूजन आने की वजह से, वहां इकट्ठा हुआ सारा हार्मोन अचानक से खून में घुलने लगता है। इसकी वजह से आपका थायरॉइड ज़रूरत से ज़्यादा काम करने लगता है (यानी ओवरएक्टिव हो जाता है)।

  • लक्षण: इसमें आपको बिना बात की घबराहट होना, अचानक से तेज़ी से वज़न गिरना और बैठे-बैठे दिल की धड़कन का तेज़ हो जाना ये सब दिक्कतें महसूस होती हैं।
  • समय: यह आमतौर पर बच्चा होने के पहले 1 से 4 महीने के अंदर देखने को मिलता है।

हाइपोथायरॉइड फेज़ (बाद का दौर)

पहले फेज़ में शरीर के पास हार्मोन का जो स्टॉक था वो खत्म हो चुका है और ग्रंथि भी अंदर से कमज़ोर पड़ गई है, तो वह अपना काम करना एकदम कम कर देती है (यानी अंडरएक्टिव हो जाती है)।

  • लक्षण: इस फेज़ में आपको बहुत थकावट महसूस होती है, वज़न तेज़ी से बढ़ने लगता है और शरीर में हर वक्त एक भारीपन या सुस्ती छाई रहती है।
  • समय: यह फेज़ आमतौर पर डिलीवरी के 4 से 8 महीने के बीच शुरू होता है।

आयुर्वेद के अनुसार जड़ कारण क्या है? 

आयुर्वेद में डिलीवरी के बाद होने वाली थायरॉइड की इस दिक्कत (या किसी भी हार्मोन की गड़बड़ी) को सिर्फ एक बीमारी नहीं माना जाता। इसे शरीर के अंदरूनी सिस्टम के पूरी तरह से बिगड़ जाने का नतीजा माना जाता है। इसे एकदम सीधे शब्दों में ऐसे समझिए:

आयुर्वेद इस परेशानी को सीधे तौर पर आपके ठंडे पड़े हाज़मे ('अग्नि') और शरीर में बन रहे ज़हरीले टॉक्सिन्स ('आम') से जोड़ता है। बच्चा होने के बाद, एक नई माँ का हाज़मा बहुत ही नाज़ुक और सुस्त हो जाता है। जब खाया-पीया सही से पचता नहीं है, तो वह पेट में सड़ने लगता है और शरीर में एक चिपचिपा कचरा (टॉक्सिन) जमा होने लगता है। यही टॉक्सिन्स शरीर की उन बारीक नसों और रास्तों को पूरी तरह ब्लॉक कर देता है जहाँ से हार्मोन गुज़रते हैं। अब जब हार्मोन सही जगह पहुँच ही नहीं पाएंगे, तो पूरे शरीर का बैलेंस हिल जाएगा और थायरॉइड जैसी ग्रंथियां अपना काम करना बंद कर देंगी।

डिलीवरी के बाद वाले थायरॉइड (Postpartum Thyroiditis) का आयुर्वेदिक इलाज

आयुर्वेद में इसका इलाज सिर्फ ऊपर-ऊपर से हार्मोन को कंट्रोल करने के लिए नहीं किया जाता। इसका असली मकसद शरीर की उसी पुरानी मशीनरी को वापस पहले जैसा चालू करना है:

  • पाचन ठीक करना: इलाज की शुरुआत सबसे पहले आपके सुस्त पड़े पाचन को तेज़ करने से होती है। अगर आपका पाचन ठीक हो गया, तो शरीर में नया टॉक्सिन बनना अपने आप बंद हो जाएगा।
  • ब्लॉक नसों की सफाई: शरीर के अंदर जो बारीक रास्ते टॉक्सिन जमने से ब्लॉक हो गए हैं, उन्हें साफ करके खोला जाता है ताकि हार्मोन बिना किसी रुकावट के आसानी से बह सकें।
  • भड़के हुए वात और पित्त को शांत करना: डिलीवरी के बाद शरीर में वात बहुत भड़क जाता है (जिससे थकावट और टेंशन बढ़ती है)। सबसे पहले उसे शांत किया जाता है। इसके साथ ही, थायरॉइड की सूजन उतारने के लिए पित्त को बैलेंस किया जाता है।
  • शरीर को नई ताक़त देना: इलाज में कुछ ऐसी कमाल की देसी औषधियाँ दी जाती हैं, जो थायरॉइड ग्रंथि को अंदर तक पोषण देती हैं और शरीर की बीमारियों से लड़ने की ताक़त (इम्युनिटी) को एकदम मज़बूत कर देती हैं।

Postpartum Thyroiditis के लिए प्रमुख आयुर्वेदिक औषधियाँ 

शरीर को अंदर से साफ करने और थायरॉइड ग्रंथि में नई जान फूंकने के लिए आयुर्वेद में कुछ बहुत ही कमाल की देसी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है:

  • पुनर्नवा: यह शरीर की अंदरूनी सूजन को खींच लेती है और सारे ज़हरीले टॉक्सिन्स को बाहर फेंक देती है, जिससे थायरॉइड का काम बहुत आसान हो जाता है।
  • शतावरी: डिलीवरी के बाद शरीर अंदर से एकदम टूट जाता है। शतावरी उस भारी कमज़ोरी को दूर करती है और आपके बिगड़े हुए हार्मोन को तेज़ी से वापस बैलेंस में लाती है।
  • अश्वगंधा: नई माँ बनने के बाद जो थकावट और दिमागी टेंशन होती है, अश्वगंधा उसे एकदम सोख लेती है। इससे थायरॉइड पर पड़ा दबाव खत्म होता है और शरीर में ज़बरदस्त ताक़त आती है।
  • त्रिकटु: सोंठ, काली मिर्च और पिप्पली से बना यह देसी नुस्खा पेट की ठंडी पड़ी आग को तेज़ करता है। इससे शरीर का सारा चिपचिपा कचरा जल जाता है और हार्मोन के गुज़रने वाले ब्लॉक रास्ते एकदम खुल जाते हैं।

Postpartum Thyroiditis के लिए प्रमुख आयुर्वेदिक थेरेपी 

सिर्फ दवाइयां ही नहीं, शरीर की पूरी 'डीप-क्लीनिंग' करने और थायरॉइड को रिलैक्स करने के लिए ये पुराने और आज़माए हुए तरीके भी इस्तेमाल किए जाते हैं:

  • विरेचन: इसे आप पेट और लिवर की पूरी साफ-सफाई कह सकते हैं। इसमें खास दवा देकर शरीर की सारी गंदगी मल के रास्ते बाहर निकाल दी जाती है, जिससे डिलीवरी के बाद बिगड़े हुए हार्मोन बड़ी तेज़ी से सुधरने लगते हैं।
  • बस्ती: डिलीवरी के बाद शरीर में 'वात' (गैस/हवा) बहुत भड़क जाता है, जो बदन दर्द और थायरॉइड बिगड़ने की सबसे बड़ी वजह होता है। इस थेरेपी में खास जड़ी-बूटियों वाले तेल का इस्तेमाल करके उसी वात को जड़ से शांत किया जाता है।
  • नस्य कर्म: इसमें नाक के रास्ते कुछ खास औषधीय तेल की बूंदें डाली जाती हैं। यह सीधा दिमाग के उस हिस्से को जाकर जगाता है, जो आपके थायरॉइड ग्रंथि को सही से काम करने का सिग्नल देता है।
  • अभ्यंग (तेल मालिश): जब हल्के गुनगुने और खास तेलों से पूरे बदन की अच्छी तरह मालिश होती है, तो खून का दौरा एकदम तेज़ हो जाता है। इससे शरीर की सारी थकान उतर जाती है और आपका मेटाबॉलिज़्म भी बढ़िया काम करने लगता है।

Postpartum Thyroiditis लिए आहार: क्या खाएं/क्या न खाएं 

क्या खाएं?

  • ताजा और हल्का भोजन
  • मौसमी फल जैसे तरबूज, खरबूजा और खीरा
  • पर्याप्त पानी और प्राकृतिक तरल पदार्थ
  • नारियल पानी और हल्के पेय
  • मूंग दाल और खिचड़ी
  • सीमित मात्रा में घी

क्या न खाएं?

  • बहुत ज्यादा मसालेदार भोजन
  • तला हुआ और भारी भोजन
  • बहुत ज्यादा चाय और कॉफी
  • पैकेट बंद और प्रोसेस्ड फूड
  • बहुत ज्यादा मीठे और कृत्रिम पेय
  • लंबे समय तक खाली पेट रहना

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम सुनील सिंह है और मैं फरीदाबाद का रहने वाला हूँ। कुछ समय पहले मेरा वजन अचानक बढ़ने लगा, जिसके बाद जांच कराने पर पता चला कि मुझे थायरॉइड की समस्या है। मैंने एलोपैथिक दवाइयाँ लीं, लेकिन मेरे वजन में कोई खास सुधार नहीं हुआ। बाद में दोबारा जांच कराने पर पता चला कि मुझे फैटी लिवर (ग्रेड 3) और किडनी से जुड़ी कुछ समस्याएँ भी हैं। इस दौरान मैं बहुत परेशान रहने लगा और कई रातें नींद नहीं आती थी। फिर मैंने आयुर्वेद का सहारा लेने का फैसला किया और जीवा क्लिनिक से संपर्क किया। यहाँ डॉक्टरों ने मेरी पूरी जांच करके मेरी समस्या के मूल कारण को समझा और उसी के अनुसार उपचार शुरू किया। मुझे थायरॉइड के लिए पर्सनलाइज्ड डाइट के साथ आयुर्वेदिक दवाइयाँ दी गईं। धीरे-धीरे मेरी सेहत में सुधार हुआ और मेरा फैटी लिवर ग्रेड 3 से घटकर ग्रेड 1 हो गया। आज मैं पहले से काफी बेहतर महसूस करता हूँ और आयुर्वेदिक जीवनशैली की सभी को सलाह देता हूँ।

कब डॉक्टर से सलाह लें?

पोस्टपार्टम थायराइडिटिस के लक्षणों को केवल "बच्चे की वजह से थकान" समझकर नजरअंदाज करना जोखिम भरा हो सकता है। निम्नलिखित स्थितियाँ होने पर विशेषज्ञ से मिलना अनिवार्य है:

  • अत्यधिक घबराहट और धड़कन: यदि आपको बिना किसी कारण के पसीना आए, हाथ कांपें या दिल की धड़कन बहुत तेज महसूस हो।
  • गंभीर अवसाद (Postpartum Depression): यदि आप लगातार उदास महसूस कर रही हैं, नींद नहीं आ रही है या बच्चे की देखभाल में असमर्थ महसूस कर रही हैं।
  • तेजी से वजन बदलना: बिना किसी डाइटिंग के वजन का बहुत कम हो जाना या बहुत तेजी से वजन बढ़ना और शरीर में भारी सूजन आना।
  • अत्यधिक बालों का झड़ना और रूखापन: यदि प्रसव के 6 महीने बाद भी बाल बहुत ज्यादा झड़ रहे हों और त्वचा असामान्य रूप से शुष्क हो गई हो।
  • गर्दन में सूजन: यदि आपको अपनी थायराइड ग्रंथि (गर्दन के निचले हिस्से) में दर्द या भारीपन महसूस हो।

निष्कर्ष

पोस्टपार्टम थायराइडिटिस केवल एक हार्मोनल रिपोर्ट की समस्या नहीं है, बल्कि यह प्रसव के बाद एक माँ के शरीर के भीतर आई अग्नि की कमी और ऊर्जा के असंतुलन का प्रतिबिंब है। जहाँ आधुनिक चिकित्सा तत्काल लक्षणों और हार्मोनल स्तर को संभालने में प्रभावी है, वहीं आयुर्वेद शरीर की उस 'जड़' पर काम करता है जहाँ से यह असंतुलन शुरू हुआ है।

असली उपचार केवल दवा लेना नहीं है, बल्कि शरीर की 'पाचन अग्नि' को सुधारना, 'वात' को शांत करना और 'ओज' (शक्ति) का पुनर्निर्माण करना है। जब आप सही आयुर्वेदिक उपचार के साथ अनुशासित आहार और जीवनशैली अपनाती हैं, तो न केवल थायराइड संतुलित होता है, बल्कि आपका मातृत्व का अनुभव भी ऊर्जावान और आनंदमय बनता है। याद रखें, एक माँ का स्वास्थ्य ही उसके बच्चे के स्वस्थ भविष्य की नींव है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

यह समस्या हर महिला में नहीं होती, लेकिन कुछ महिलाओं में इसका जोखिम अधिक होता है। जिनका पहले से थायरॉइड असंतुलन रहा हो या परिवार में इसका इतिहास हो, उनमें संभावना बढ़ सकती है। इसके अलावा इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया भी हर व्यक्ति में अलग होती है। इसलिए यह स्थिति चयनात्मक रूप से कुछ महिलाओं को प्रभावित करती है। जागरूक रहना और शरीर के संकेतों को समझना जरूरी है।

 हाँ, यह स्थिति हार्मोनल संतुलन को प्रभावित करती है, जिससे मासिक चक्र अनियमित हो सकता है। कभी पीरियड्स देर से आ सकते हैं, तो कभी बहुत ज्यादा या कम हो सकते हैं। यह बदलाव शरीर के अंदर चल रहे हार्मोनल उतार चढ़ाव का संकेत होता है। समय के साथ संतुलन बनने पर चक्र सामान्य हो सकता है।

कुछ मामलों में थायरॉइड असंतुलन दूध बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। अत्यधिक थकान और हार्मोनल बदलाव से दूध की मात्रा कम हो सकती है। हालांकि हर महिला में ऐसा जरूरी नहीं है। सही पोषण और आराम से इस प्रभाव को कम किया जा सकता है।

हाँ, इस स्थिति में भूख का पैटर्न बदल सकता है। कुछ महिलाओं को बहुत ज्यादा भूख लगती है, जबकि कुछ में भूख कम हो जाती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि शरीर किस चरण में है। यह बदलाव पाचन और हार्मोन दोनों से जुड़ा होता है।

प्रसव के बाद बाल झड़ना सामान्य माना जाता है, लेकिन यदि यह अत्यधिक हो तो यह थायरॉइड असंतुलन का संकेत हो सकता है। जब हार्मोन संतुलित नहीं रहते, तो बालों की जड़ें कमजोर हो जाती हैं। यह स्थिति धीरे धीरे सुधर सकती है जब शरीर संतुलन में आता है।

हाँ, खासकर जब थायरॉइड धीमा हो जाता है, तो शरीर में सूजन और भारीपन महसूस हो सकता है। यह चेहरे, हाथों या पैरों में दिखाई दे सकता है। यह शरीर के द्रव संतुलन में बदलाव का परिणाम होता है। सही देखभाल से यह धीरे धीरे कम हो सकता है।

 इस स्थिति में नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। कुछ महिलाओं को नींद नहीं आती, जबकि कुछ को बहुत ज्यादा नींद आती है। यह शरीर के ऊर्जा स्तर और हार्मोनल बदलाव से जुड़ा होता है। नींद का संतुलन ठीक होना recovery के लिए जरूरी है।

यदि यह समस्या पूरी तरह संतुलित न हो, तो भविष्य में गर्भधारण पर असर पड़ सकता है। हार्मोनल असंतुलन प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए अगली गर्भावस्था की योजना से पहले शरीर को संतुलित करना जरूरी होता है।

हाँ, कई महिलाओं को ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और मानसिक सुस्ती महसूस होती है। इसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह स्थिति हार्मोनल असंतुलन और थकान का परिणाम होती है। समय पर ध्यान देने से यह सुधर सकती है।

 इस स्थिति में शरीर का तापमान संतुलन प्रभावित हो सकता है। कुछ महिलाओं को ज्यादा गर्मी लगती है, जबकि कुछ को ठंड अधिक महसूस होती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि थायरॉइड किस अवस्था में है। यह एक सामान्य संकेत है जिसे समझना जरूरी है।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us