छोटे बच्चों को बुखार आना बहुत ही आम बात है। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, वे नई-नई चीज़ों, मौसम और कीटाणुओं के संपर्क में आते हैं। ऐसे में एक या दो बार बुखार आना इस बात को बताता है कि बच्चे का शरीर बाहरी बीमारियों से लड़ना सीख रहा है।
लेकिन, अगर आपके बच्चे को हर 15-20 दिन या हर महीने बुखार आ रहा है, तो यह चिंता का विषय हो सकता है। इसे सिर्फ मौसम का बदलाव मानकर टालना सही नहीं है। आयुर्वेद कहता है कि बार-बार बुखार आना सिर्फ शरीर का तापमान बढ़ना नहीं है, बल्कि यह इस बात का अलार्म है कि बच्चे के शरीर के अंदर कोई सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा है।

बार-बार बुखार आने का असल मतलब क्या है?
अगर बच्चा बुखार से ठीक होता है, कुछ दिन खेलता-कूदता है, और फिर अचानक से उसे दोबारा बुखार आ जाता है, तो इसे 'रिकरिंग फीवर' (बार-बार लौटने वाला बुखार) कहते हैं।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि या तो शरीर के अंदर का इन्फेक्शन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, या फिर बच्चे की इम्यूनिटी (बीमारियों से लड़ने की ताकत) इतनी कमज़ोर है कि बाहर का ज़रा सा भी इन्फेक्शन उसे तुरंत बीमार कर देता है। हर बार बुखार की वजह एक नहीं होती, इसलिए सिर्फ पेरासिटामोल देकर बुखार उतार देना काफी नहीं है, हमें बीमारी की जड़ तक जाना होगा।
आयुर्वेद बच्चों के इस बुखार को कैसे समझता है?
आयुर्वेद में बुखार को 'ज्वर' कहा जाता है। आयुर्वेद इसे सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि पूरे शरीर की गड़बड़ी मानता है। आयुर्वेद के हिसाब से बार-बार बुखार आने के 3 बड़े कारण होते हैं:
- पाचन अग्नि का कमज़ोर होना: आयुर्वेद कहता है कि अच्छे स्वास्थ्य की चाबी हमारे पेट में है। अगर बच्चे की पाचन शक्ति सुस्त या कमज़ोर है, तो वह जो भी खाएगा, शरीर को लगेगा नहीं। जब शरीर को सही पोषण नहीं मिलेगा, तो उसकी बीमारियों से लड़ने की ताकत अपने आप कम हो जाएगी और बच्चा बार-बार बीमार पड़ेगा।
- शरीर में गंदगी (आम) का जमा होना: जब बच्चे की पाचन शक्ति कमज़ोर होता है, तो खाना पेट में पचने के बजाय सड़ने लगता है। आयुर्वेद में इस बिना पचे हुए खाने को 'आम' (एक तरह का चिपचिपा टॉक्सिन) कहा जाता है। यह गंदगी जब शरीर में जमा होती है, तो इन्फेक्शन को बुलावा देती है और बार-बार बुखार का कारण बनती है।
- वात, पित्त और कफ का बिगड़ना: हमारे शरीर को तीन चीज़ें चलाती हैं, वात (हवा), पित्त (गर्मी) और कफ (बलगम)। बच्चों में अक्सर कफ जल्दी बिगड़ता है, जिससे उन्हें बार-बार सर्दी-खांसी और गले का इन्फेक्शन होता है। अगर पित्त बिगड़े, तो बुखार बहुत तेज़ आता है और बच्चा चिड़चिड़ा हो जाता है। वहीं वात बिगड़ने पर बच्चा बहुत थका हुआ और कमज़ोर महसूस करता है।

बार-बार बुखार आने के आम कारण क्या हैं?
अगर आपके बच्चे को बार-बार बुखार आता है तो इसके पीछे ये नीचे दिए गए हुए कारण हो सकते है:
- बार-बार होने वाला वायरल या बैक्टीरियल इन्फेक्शन।
- गले में टॉन्सिल्स या कान में इन्फेक्शन होना।
- पेशाब में इन्फेक्शन।
- खून में आयरन या ज़रूरी विटामिन्स की भारी कमी।
- बहुत ज़्यादा कमज़ोर इम्यूनिटी।
- धूल-मिट्टी या मौसम से होने वाली एलर्जी।
एक्सपर्ट डॉक्टर की विशेष सलाह
बच्चों में कभी-कभार बुखार आना उनकी इम्युनिटी को मजबूत करता है, लेकिन अगर बुखार हर 15-20 दिन में लौट रहा है, तो सिर्फ सिरप देकर उसे न दबाएं। यह किसी छिपे हुए यूरिन इन्फेक्शन (UTI) या पोषण की भारी कमी का संकेत हो सकता है। इसके अलावा, अगर तेज़ बुखार के साथ बच्चा बिल्कुल सुस्त पड़ जाए, सांस लेने में तकलीफ हो, गर्दन में अकड़न हो या दौरे (fits) आएं, तो यह एक मेडिकल इमरजेंसी है। ऐसे में खुद से कोई एंटीबायोटिक न दें और तुरंत बाल रोग विशेषज्ञ से जांच कराएं।
किन लक्षणों के दिखने पर तुरंत अलर्ट हो जाएं?
बुखार के साथ अगर बच्चे में ये बातें दिखाई दें, तो घर पर इलाज न करें, तुरंत डॉक्टर के पास जाएं:
- लगातार तेज़ बुखार जो दवा से भी न उतर रहा हो।
- सांस लेने में बहुत दिक्कत होना या पसलियां चलना।
- बच्चा एकदम सुस्त पड़ जाए या लगातार सोता रहे।
- बार-बार उल्टियां होना और कुछ भी न खा पाना।
- बुखार के साथ दौरे (Fits) पड़ना।
- गर्दन एकदम कड़क हो जाना।
- शरीर पर अचानक लाल-लाल दाने या चकत्ते निकल आना।
क्या बार-बार एंटीबायोटिक्स (Antibiotics) देना सही है?
बिल्कुल नहीं! हर बुखार में एंटीबायोटिक की ज़रूरत नहीं होती। ज़्यादातर बुखार वायरल होते हैं, जिन पर एंटीबायोटिक का कोई असर नहीं होता। बिना ज़रूरत के बार-बार एंटीबायोटिक देने से बच्चे की अपनी नेचुरल इम्यूनिटी बिल्कुल खत्म हो जाती है और शरीर के अच्छे बैक्टीरिया भी मर जाते हैं। एंटीबायोटिक हमेशा सिर्फ डॉक्टर के कहने पर ही दें।

आयुर्वेद के तरीके से बच्चे का बचाव और देखभाल कैसे करें?
आयुर्वेद बुखार को दबाने से ज़्यादा शरीर को अंदर से मज़बूत करने पर ज़ोर देता है ताकि बुखार आए ही न:
सही और हल्का खानपान (आहार): बुखार के समय बच्चे का हाज़मा सबसे कमज़ोर होता है। इसलिए उसे भारी खाना बिल्कुल न दें।
- मूंग की पतली दाल, सादी खिचड़ी या सब्ज़ियों का हल्का सूप दें।
- शरीर में पानी की कमी न होने दें। हल्का गुनगुना पानी, नारियल पानी या ताज़े फलों का रस दें।
- पैकेट वाले चिप्स, बिस्कुट, चॉकलेट और बाहर का तला-भुना खाना पूरी तरह बंद कर दें।
- अगर बच्चा खाना नहीं चाह रहा है, तो उसके साथ ज़बरदस्ती न करें।
सही रूटीन (दिनचर्या)
- बच्चे को पूरी और गहरी नींद सोने दें। नींद में शरीर सबसे तेज़ी से रिकवर करता है।
- घर में और बच्चे के आस-पास साफ-सफाई रखें।
- बच्चे को बाहर मिट्टी में खेलने की आज़ादी दें, इससे उनकी नेचुरल इम्यूनिटी मज़बूत होती है।
घरेलू और आयुर्वेदिक मदद: तुलसी, अदरक, गिलोय और शहद जैसी चीज़ें बच्चों की इम्यूनिटी बढ़ाने में बहुत काम आती हैं। लेकिन ध्यान रहे, किसी भी आयुर्वेदिक दवा या जड़ी-बूटी का इस्तेमाल बच्चों पर करने से पहले किसी अच्छे वैद्य या आयुर्वेदिक डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें। हर बच्चे की तासीर अलग होती है।
बार-बार बीमार पड़ने से कैसे बचाएं?
बच्चों को बार-बार होने वाले इंफेक्शन और मौसमी बीमारियों से दूर रखने के लिए, आप रोज़मर्रा की इन छोटी लेकिन बेहद असरदार आदतों को अपना सकते हैं:
- हाथ धोने की आदत: बच्चे को बाहर से आने के बाद और खाना खाने से पहले अच्छे से हाथ धोना सिखाएं।
- ताज़ा खाना: बच्चों को हमेशा घर का बना ताज़ा और गर्म खाना ही दें।
- सीज़नल कपड़े: मौसम के हिसाब से कपड़े पहनाएं। हल्की ठंड में भी छाती और कान ढककर रखें।
- टीकाकरण: बच्चे के सारे ज़रूरी टीके समय पर लगवाएं।
निष्कर्ष
बच्चों को बार-बार बुखार आना इस बात का इशारा है कि उनके शरीर की सुरक्षा दीवार (इम्यूनिटी) कमज़ोर पड़ रही है। इसे सिर्फ एक गोली देकर इग्नोर न करें। बच्चे के पाचन को सुधारें, उसे पौष्टिक खाना दें और एक अच्छी रूटीन फॉलो करवाएं। अगर फिर भी दिक्कत बनी हुई है, तो बिना देर किए एक अच्छे बाल रोग विशेषज्ञ से पूरी जांच करवाएं। सही समय पर की गई देखभाल आपके बच्चे को हमेशा स्वस्थ और हंसता-खेलता रखेगी।
References
Approach to recurrent fever in childhood - PMC
Recurrent fever: diagnostic procedure - PMC





























