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गर्मी में बच्चे को Asthma Trigger - Pollen, Dust, AC का असर

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

गर्मियों की छुट्टियाँ बच्चों के लिए खेल-कूद और मस्ती का समय होती हैं, लेकिन जिन बच्चों की सांसों की नली नाज़ुक होती है, उनके लिए यह मौसम किसी खौफनाक बुरे सपने से कम नहीं होता। ज़्यादातर माता-पिता यह मानते हैं कि अस्थमा केवल सर्दियों की ठंडी हवाओं की बीमारी है, लेकिन चिलचिलाती धूप, धूल भरी आंधियाँ और एयर कंडीशनर (AC) की कृत्रिम ठंडी हवा का घातक कॉम्बिनेशन गर्मियों में बच्चों के फेफड़ों को बुरी तरह जकड़ लेता है।

हम अक्सर बच्चे की खाँसी या सांस फूलने को केवल थकान या धूल का असर मानकर उसे इनहेलर (Inhaler) थमा देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब एक बच्चा खेल के मैदान से सीधे 18 डिग्री के एसी वाले कमरे में जाता है, तो उसके नाज़ुक फेफड़ों के अंदर क्या गुज़र रही होती है? जब तक आप इस मौसम के छिपे हुए ट्रिगर्स (Triggers) और शरीर के अंदरूनी 'कफ' के विज्ञान को नहीं समझेंगे, तब तक केवल बाहरी दवाइयाँ आपके बच्चे के फेफड़ों को स्थायी ताकत नहीं दे सकतीं।

गर्मी में बच्चों का अस्थमा अचानक क्यों भड़क उठता है?

गर्मियों के मौसम में वातावरण में कई ऐसे बदलाव होते हैं जो एक स्वस्थ इंसान को तो शायद परेशान न करें, लेकिन अस्थमा से पीड़ित बच्चे की श्वास नली (Airways) के लिए ये ट्रिगर बन जाते हैं। इसके पीछे ये मुख्य पर्यावरणीय और शारीरिक गतिविधियाँ ज़िम्मेदार होती हैं:

  • एसी का थर्मल शॉक (Thermal Shock): बाहर 40-45 डिग्री की गर्मी से जब बच्चा अचानक एसी (AC) की ठंडी और सूखी हवा में जाता है, तो तापमान के इस बदलाव से फेफड़ों की नलियाँ अचानक सिकुड़ (Bronchospasm) जाती हैं, जिससे सांस लेना तुरंत मुश्किल हो जाता है।
  • पॉलेन (Pollen) और धूल भरी आंधियाँ: गर्मियों में कई पेड़-पौधों से परागकण (Pollen) निकलते हैं। जब गर्म, सूखी और धूल भरी हवाएं चलती हैं, तो ये परागकण और धूल के कण हवा में उड़कर बच्चे के फेफड़ों में घुस जाते हैं, जिससे एलर्जी और सूजन पैदा होती है।
  • डिहाइड्रेशन (Dehydration) और कफ का सूखना: गर्मियों में पसीने के कारण शरीर में पानी की कमी हो जाती है। पानी की कमी से फेफड़ों के अंदर मौजूद बलगम (Mucus) बहुत ज़्यादा गाढ़ा और चिपचिपा हो जाता है, जो सांस की नलियों को बुरी तरह ब्लॉक कर देता है।

गर्मी में होने वाले अस्थमा अटैक किन-किन प्रकारों के हो सकते हैं?

बच्चों में अस्थमा का ट्रिगर एक जैसा नहीं होता। गर्मियों के माहौल और बच्चे की इम्यूनिटी के आधार पर, यह बीमारी इन अलग-अलग रूपों में आपके बच्चे को अपना शिकार बना सकती है:

  • एलर्जिक अस्थमा (Allergic Asthma): यह सबसे आम प्रकार है। जब बच्चा बाहर खेलने जाता है और धूल (Dust mites) या पॉलेन के संपर्क में आता है, तो उसका इम्यून सिस्टम भड़क जाता है, जिससे तुरंत खाँसी और सांस फूलने लगती है।
  • टेंपरेचर-इंड्यूस्ड अस्थमा (Temperature-induced Asthma): इस प्रकार में बच्चे को धूल से एलर्जी नहीं होती, बल्कि तापमान के अचानक बदलने (जैसे तेज़ धूप से एसी में जाना या ठंडी कोल्ड ड्रिंक पीना) के कारण श्वास नली में अचानक सिकुड़न आ जाती है।
  • एक्सरसाइज़-इंड्यूस्ड अस्थमा (Exercise-induced Asthma): गर्मियों की शाम को जब बच्चा बहुत ज़्यादा दौड़-भाग करता है, तो फेफड़ों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। सूखी हवा तेज़ी से अंदर जाने के कारण नलियाँ सूख जाती हैं और अस्थमा का अटैक आता है।

किन खामोश संकेतों से पहचानें कि बच्चे का अस्थमा ट्रिगर हो रहा है?

अस्थमा का अटैक अचानक नहीं आता; बच्चे का शरीर बहुत पहले से कई खामोश अलार्म बजाने लगता है। यदि आप इन शुरुआती संकेतों को पहचान लें, तो एक बड़े अटैक को रोका जा सकता है:

  • रात के समय लगातार खाँसी: बच्चा दिन में ठीक रहता है, लेकिन रात को एसी में सोते समय उसे ऐसी सूखी खाँसी उठती है कि उसकी नींद टूट जाती है और सीने में दर्द होने लगता है।
  • सांस छोड़ते समय सीटी की आवाज़ (Wheezing): जब बच्चा सांस बाहर छोड़ता है, तो उसके सीने से एक हल्की सीटी जैसी (Wheezing) आवाज़ आती है। यह बताता है कि फेफड़ों की नलियाँ बहुत संकरी हो चुकी हैं।
  • सीने में जकड़न और भारीपन: बच्चा शिकायत करता है कि उसे ऐसा लग रहा है मानो किसी ने उसके सीने पर कोई भारी पत्थर रख दिया हो और वह गहरी सांस नहीं ले पा रहा है, जिससे वह क्रोनिक फटीग का शिकार महसूस करता है।
  • जल्दी थक जाना और चिड़चिड़ापन: थोड़ा सा भी खेलने पर बच्चे का बहुत जल्दी थक जाना, होंठों का रंग हल्का पड़ना और लगातार चिड़चिड़ापन रहना, जो नर्वस सिस्टम में ऑक्सीजन की कमी को दर्शाता है।

अस्थमा को कंट्रोल करने के चक्कर में माता-पिता क्या भयंकर गलतियाँ करते हैं?

बच्चे को सांस के लिए तड़पता देख माता-पिता अक्सर घबराहट में ऐसे शॉर्टकट्स अपना लेते हैं, जो बच्चे के फेफड़ों को जीवन भर के लिए अपाहिज कर सकते हैं:

  • इनहेलर्स (Inhalers) की लत डाल देना: थोड़ा सा भी खाँसने पर तुरंत स्टेरॉयड इनहेलर (Steroid inhaler) दे देना। ये नलियों को तुरंत खोल ज़रूर देते हैं, लेकिन लंबे समय में ये फेफड़ों की प्राकृतिक इम्यूनिटी को पूरी तरह खत्म कर देते हैं।
  • बच्चे को एसी (AC) कमरे में कैद कर देना: धूल और गर्मी के डर से बच्चे को पूरा दिन लगातार कुर्सी पर बैठे रहने और ठंडे कमरे में बंद रखने की आदत। यह खराब जीवनशैली बच्चे की जठराग्नि को सुस्त कर देती है और कफ बढ़ाती है।
  • बर्फ का पानी और कोल्ड ड्रिंक्स देना: गर्मी से राहत दिलाने के लिए बच्चे को फ्रिज का ठंडा पानी या आइसक्रीम देना। ये ठंडी चीज़ें श्वास नली की नसों को तुरंत सिकोड़ देती हैं और बलगम (Mucus) को पत्थर की तरह जमा देती हैं।

आयुर्वेद बच्चों के 'अस्थमा' और कमज़ोर फेफड़ों को कैसे समझता है?

आधुनिक विज्ञान जिसे केवल ब्रोंकोस्पाज़म (Bronchospasm) और एलर्जी मानता है, आयुर्वेद उसे शरीर में 'प्राणवह स्रोत' के अवरोध, दूषित 'कफ' और भड़के हुए वात के असंतुलन के रूप में गहराई से समझता है:

  • प्राणवह स्रोत की विकृति: आयुर्वेद में फेफड़ों और श्वास नली को 'प्राणवह स्रोत' कहा जाता है। जब बच्चे का पाचन तंत्र कमज़ोर होता है, तो पेट में 'आम' (Toxins) बनता है। यह 'आम' कफ दोष के साथ मिलकर इन नाज़ुक नलियों में चिपक जाता है।
  • वात का आवरण (Vata pushing Kapha): गर्मियों में एसी की सूखी हवा और धूल के कारण वात दोष भड़क जाता है। यह बढ़ा हुआ वात फेफड़ों में जमे हुए कफ को सुखा देता है, जिससे सांस का रास्ता पूरी तरह ब्लॉक हो जाता है (इसे 'तमक श्वास' कहते हैं)।
  • कमज़ोर जठराग्नि: अगर बच्चे की 'अग्नि' (पाचन) कमज़ोर है, तो शरीर एलर्जी (Pollen/Dust) से लड़ नहीं पाता। यह कमज़ोर 'ओजस' (Immunity) ही अस्थमा के बार-बार लौटकर आने का मुख्य कारण है।

फेफड़ों को ताकत देने वाली और कफ शांत करने वाली आयुर्वेदिक डाइट

अपने बच्चे को अस्थमा के अटैक से बचाने के लिए आपको उसकी डाइट से कफ और 'आम' बढ़ाने वाले पदार्थों को तुरंत हटाना होगा। यह आयुर्वेदिक डाइट उसके फेफड़ों के लिए संजीवनी का काम करेगी:

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - कफ को पिघलाने वाले) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - नलियों को सिकोड़ने वाले)
अनाज (Grains) पुराना चावल, मूंग दाल, जौ, ओट्स (गर्म पानी या सूप के साथ)। मैदा, वाइट ब्रेड, बासी रोटियाँ, पैकेटबंद चिप्स।
पेय पदार्थ (Beverages) गुनगुना पानी, तुलसी-अदरक का पानी, हल्दी वाला हल्का दूध (बिना चीनी)। बर्फ का ठंडा पानी, कोल्ड ड्रिंक्स, बाज़ार के डिब्बाबंद फ्रूट जूस।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी (छाती की नसों को ताकत देता है), सरसों का तेल। रिफाइंड ऑयल, बहुत ज़्यादा डीप-फ्राइड और बाज़ार के ट्रांस फैट्स।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, परवल, कद्दू, पालक (हल्के मसालों में अच्छी तरह पकी हुई)। कच्चा सलाद (विशेषकर रात में), भारी कटहल, भिंडी, अरबी।
फल (Fruits) पपीता, उबला हुआ सेब (Stewed Apple), मीठे अनार, मुनक्का। खट्टे फल (नींबू, संतरा), केले (कफ बढ़ाते हैं), ठंडे तरबूज़।

सांस की नली खोलने के लिए जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें ऐसे कई दिव्य रसायन दिए हैं, जो बिना किसी स्टेरॉयड (Steroid) के बच्चे के फेफड़ों को ताकत देते हैं और ब्रोंकोस्पाज़म (Bronchospasm) को रोकते हैं:

  • गिलोय (Giloy): यह बच्चों की इम्यूनिटी के लिए एक जादुई रसायन है। गिलोय शरीर से भारी टॉक्सिन्स (आम) को बाहर निकालती है और धूल या पॉलेन से होने वाले ऑटोइम्यून या एलर्जिक रिएक्शन को तुरंत शांत करती है।
  • तुलसी (Tulsi): यह श्वास नली के लिए सबसे बेहतरीन प्राकृतिक 'ब्रोंकोडायलेटर' (Bronchodilator) है। तुलसी कफ को पिघलाकर बाहर निकालती है और फेफड़ों के अंदरूनी इन्फेक्शन को खत्म करती है।
  • वासा (Adhatoda vasica): आयुर्वेद में वासा को अस्थमा (तमक श्वास) का सबसे बड़ा दुश्मन माना गया है। यह फेफड़ों की नलियों की सूजन (Inflammation) को खत्म करती है और बच्चे को तुरंत सांस लेने में सहूलियत देती है।
  • पुष्करमूल (Pushkarmool): जब एसी (AC) की ठंडी हवा से गर्दन और कंधों में जकड़न आ जाए और सीने में भारीपन हो, तो यह जड़ी-बूटी वात और कफ दोनों को शांत करके फेफड़ों का रास्ता पूरी तरह खोल देती है।

कफ को पिघलाने और फेफड़ों को साफ़ करने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब कफ सीने में बहुत गहराई तक जम चुका हो और केवल सीरप से साँस की घरघराहट बंद न हो रही हो, तो पंचकर्म की ये क्लासिकल बाहरी थेरेपीज़ फेफड़ों को तुरंत डिकंप्रेस कर देती हैं:

  • अभ्यंग मालिश (Chest Abhyanga): सीने पर जमे हुए पत्थर जैसे कफ को पिघलाने के लिए छाती और पीठ पर सेंधा नमक मिले हुए गुनगुने तिल के तेल से अभ्यंग मालिश की जाती है। यह वात को शांत करती है और नलियों को खोलती है।
  • स्वेदन थेरेपी (Herbal Steam): मालिश के बाद बच्चे को हल्की जड़ी-बूटियों (जैसे नीलगिरी) वाली भाप (स्वेदन थेरेपी) दी जाती है। यह भाप सीधे फेफड़ों में जाकर चिपचिपे बलगम को पिघला देती है, जिसे बच्चा आसानी से थूक देता है।
  • नस्य थेरेपी (Nasya): आयुर्वेद में नासिका को सिर और फेफड़ों का द्वार माना गया है। नाक में अणु तेल की बूंदें डालने से (नस्य थेरेपी) यह सीधे एलर्जी वाले रास्तों को पोषण देता है और प्राण वात को तुरंत शांत करता है।
  • विरेचन थेरेपी (Virechana): (बड़े बच्चों के लिए) शरीर से दूषित पित्त और कफ को मल के रास्ते बाहर निकालने के लिए लिवर की यह डीप-क्लीनिंग की जाती है (विरेचन थेरेपी), जो अस्थमा की जड़ को खत्म करती है।

फेफड़ों के प्राकृतिक रूप से रिपेयर होने में कितना समय लगता है?

सालों से इनहेलर्स पर निर्भर और एलर्जी से डैमेज हुए फेफड़ों को दोबारा प्राकृतिक अवस्था में लाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: औषधियों और डाइट से बच्चे का भड़का हुआ कफ पिघलेगा। रात को होने वाली सीटी जैसी आवाज़ (Wheezing) कम होगी और सीने की जकड़न में गज़ब की राहत मिलेगी।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म (नस्य/स्वेदन) और रसायनों के प्रभाव से फेफड़ों की नलियों की सूजन पूरी तरह खत्म हो जाएगी। बच्चा बिना इनहेलर के भी खुलकर दौड़ने-भागने लगेगा।
  • 5-6 महीने: बच्चे का प्राणवह स्रोत और इम्यूनिटी पूरी तरह फौलादी हो जाएगी। आप बिना किसी स्टेरॉयड के बच्चे में एक प्राकृतिक, ऊर्जावान और सुरक्षित बचपन का अनुभव करेंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

बच्चों के अस्थमा के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य नलियों को तुरंत खोलने के लिए ब्रोंकोडायलेटर्स (Inhalers) और सूजन कम करने के लिए स्टेरॉयड्स देना। वात और कफ को शांत करना, 'आम' को पचाना और 'रसायन' द्वारा प्राकृतिक रूप से फेफड़ों की इम्युनिटी बढ़ाना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल एक क्रोनिक एलर्जिक रिएक्शन (Allergic Reaction) और श्वसन तंत्र की स्थानीय समस्या मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए प्राण वात और दूषित 'प्राणवह स्रोत' का एक संपूर्ण सिंड्रोम (Syndrome) मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल डाइट पर कोई खास ज़ोर नहीं दिया जाता, केवल धूल से बचने और ठंडी चीज़ें न खाने की आम सलाह दी जाती है। डाइट में 'कफ-नाशक' भोजन, गुनगुना पानी, और जठराग्नि को सुधारने पर विशेष ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर इनहेलर का असर खत्म होते ही सांस फिर से भयंकर रूप में उखड़ने लगती है और डोज़ बढ़ती जाती है। शरीर का मेटाबॉलिज़्म और फेफड़े अंदर से इतने मज़बूत हो जाते हैं कि वे प्राकृतिक रूप से एलर्जी से लड़ना सीख जाते हैं।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालाँकि आयुर्वेद बच्चे की इम्यूनिटी को सुधारकर अस्थमा को पूरी तरह रिवर्स कर सकता है, लेकिन अगर आपको बच्चे के शरीर में ये बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल इमरजेंसी में जाना ज़रूरी हो जाता है:

  • होंठों और नाखूनों का नीला पड़ना (Cyanosis): अगर सांस न आने के कारण बच्चे के होंठ, उंगलियों के पोर या चेहरा नीला पड़ने लगे (यह ऑक्सीजन की कमी का संकेत है)।
  • बोलने में असमर्थता: अगर बच्चा इतना हांफ रहा हो कि वह एक पूरा वाक्य भी न बोल पाए और हर शब्द के बाद उसे सांस लेनी पड़े।
  • सीने का अंदर की तरफ धंसना (Retractions): सांस खींचते समय अगर बच्चे की पसलियों के नीचे का हिस्सा या गले का गड्ढा बुरी तरह अंदर की ओर धंसने लगे।
  • बुखार और बेसुध होना: अगर तेज़ बुख़ार के साथ बच्चा बहुत सुस्त हो जाए और ब्रेन फॉग के कारण आसपास की चीज़ों पर रिएक्ट न करे।

निष्कर्ष

अपने बच्चे के फेफड़ों को एक नाज़ुक स्पंज (Sponge) की तरह समझें, जिसे सही नमी और ताज़ी हवा की ज़रूरत होती है। जब गर्मियों में आप उसे धूल भरी आंधी से बचाकर एसी (AC) के ठंडे और सूखे कमरे में बंद कर देते हैं और प्यास लगने पर बर्फ का पानी पिलाते हैं, तो यह स्पंज अंदर ही अंदर सूखने और कड़क होने लगता है। फेफड़ों में जमा यह जमा हुआ कफ (बलगम) जब सांस की नलियों को ब्लॉक करता है, तो बच्चे का शरीर ऑक्सीजन के लिए तड़प उठता है। रात भर खाँसना, सीने से सीटी की आवाज़ आना और खेल-कूद से दूर हो जाना, ये कोई मौसम की आम एलर्जी नहीं है; यह एक अलार्म है कि बच्चे का 'प्राणवह स्रोत' चोक (Choke) हो चुका है और उसका नर्वस सिस्टम भारी दबाव में है। केवल स्टेरॉयड इनहेलर सुंघाकर इस डैमेज को कुछ घंटों के लिए टालने की कोशिश न करें, क्योंकि यह उसके फेफड़ों को हमेशा के लिए कमज़ोर बना रहा है।

इन इनहेलर्स और नेबुलाइज़र के ज़हरीले चक्रव्यूह से बच्चे को बाहर निकालें। बाहर के ठंडे कोल्ड ड्रिंक्स और आइसक्रीम को छोड़कर हमेशा गुनगुना, सुपाच्य और कफ-नाशक भोजन दें। उसकी डाइट में तुलसी का पानी, पुराना चावल और मुनक्का शामिल करें। वासा, गिलोय और पुष्करमूल जैसी जादुई जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और पंचकर्म की स्वेदन व नस्य थेरेपी से उसके सिकुड़े हुए फेफड़ों को प्राकृतिक गर्मी देकर नया जीवन दें। अस्थमा की इस सज़ा को उसके बचपन की नियति न बनने दें, आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

स्विमिंग वैसे तो फेफड़ों की कैपेसिटी बढ़ाने के लिए एक अच्छी एक्सरसाइज़ है, लेकिन सार्वजनिक पूल के पानी में मौजूद भारी क्लोरीन (Chlorine) अस्थमा को ट्रिगर कर सकता है। इसके अलावा, स्विमिंग पूल से निकलकर गीले शरीर के साथ एसी में जाने से थर्मल शॉक लगता है जो कफ को जमा देता है। इसे बहुत सावधानी से करना चाहिए।

नेबुलाइज़र लिक्विड दवा को भाप (Mist) में बदल देता है जिसे बच्चा आसानी से मास्क के ज़रिए खींच लेता है (अक्सर छोटे बच्चों के लिए उपयोगी)। इनहेलर (पंप) से दवा का एक फिक्स डोज़ स्प्रे होता है जिसे बच्चे को खुद खींचना पड़ता है। दोनों ही तरीके इमरजेंसी के लिए हैं और फेफड़ों की जड़ से रिपेयरिंग नहीं करते।

शत-प्रतिशत। एसी हवा को ठंडा करने के साथ-साथ उसकी सारी नमी (Moisture) सोख लेता है। यह सूखी और बर्फीली हवा जब बच्चे की नाज़ुक सांस की नली में जाती है, तो नलियाँ बचाव के लिए तुरंत सिकुड़ जाती हैं (Bronchospasm) और कफ सूख कर पत्थर जैसा हो जाता है।

ह्यूमिडिफायर एसी के कारण कम हुई नमी को वापस लाता है, जिससे नलियाँ नहीं सूखतीं। लेकिन अगर कमरे में नमी (Humidity) बहुत ज़्यादा (50% से अधिक) हो जाए, तो वहां डस्ट माइट्स (Dust mites) और फंगस बहुत तेज़ी से पनपने लगते हैं, जो अस्थमा को और भड़का सकते हैं। इसे बैलेंस में रखना ज़रूरी है।

आयुर्वेद के अनुसार, अस्थमा के मरीज़ की जठराग्नि (पाचन) पहले ही कमज़ोर होती है। बर्फ जैसी ठंडी चीज़ें अग्नि को तुरंत बुझा देती हैं और वात-कफ को भड़का देती हैं। इससे गले और फेफड़ों की नसें सिकुड़ जाती हैं। ठंडी चीज़ों से हमेशा परहेज़ करना चाहिए।

नहीं। बच्चे को 24 घंटे घर में कैद (Indoor) रखने से उसकी इम्युनिटी और कमज़ोर हो जाती है और उसे विटामिन डी नहीं मिल पाता। सुबह-शाम की ताज़ी हवा ज़रूरी है। केवल उन दिनों बाहर जाने से बचाएँ जब हवा में धूल या परागकण (Pollen count) बहुत ज़्यादा हों।

बिल्कुल। अनुलोम-विलोम और भ्रामरी जैसे प्राणायाम बच्चे के प्राणवह स्रोत को ताकत देते हैं और नलियों को रिलैक्स करते हैं। ये मानसिक तनाव और अकारण एंग्जायटी को कम करते हैं, जो अस्थमा का एक बड़ा ट्रिगर है।

हाँ। गर्मियों में पालतू जानवर (कुत्ते/बिल्ली) अक्सर ज़्यादा बाल (Dander) गिराते हैं। यह पेट डैंडर हवा में तैरता रहता है और जब यह बच्चे के फेफड़ों में जाता है, तो भयंकर एलर्जिक रिएक्शन (Allergic reaction) पैदा करता है। बच्चे के सोने के कमरे में पालतू जानवरों को नहीं जाने देना चाहिए।

हल्दी एक बेहतरीन एंटी-इन्फ्लेमेटरी और एंटी-एलर्जिक है। लेकिन दूध स्वभाव से कफ बढ़ाने वाला होता है। इसलिए दूध में हल्दी के साथ एक चुटकी सोंठ (Dry ginger) या पिप्पली मिला दें और उसे अच्छी तरह उबाल कर (घी के साथ) गुनगुना ही दें, ताकि वह कफ न बनाए।

लंबे समय तक स्टेरॉयड इनहेलर्स या ओरल स्टेरॉयड्स (Oral steroids) का सेवन करने से बच्चे के एंडोक्राइन सिस्टम पर बुरा असर पड़ सकता है, जिससे वज़न का बढ़ना और हॉर्मोनल समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। आयुर्वेद इन दुष्प्रभावों के बिना प्राकृतिक इलाज प्रदान करता है।

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