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नसों में झुनझुनी से शुरू हुआ, अब चलने में दिक्कत — क्या यह Permanent है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

शुरुआत में यह महज़ पैरों के तलवों में एक अजीब सी झुनझुनी थी। कभी-कभी लगता था जैसे पैरों में हज़ारों चींटियाँ रेंग रही हों, या फिर ज़्यादा देर एक ही पोज़िशन में बैठने पर पैर सुन्न हो जाते थे। आपने इसे थकावट, बढ़ती उम्र या कमज़ोरी मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया और पैर झटक कर अपने काम में लग गए। लेकिन फिर धीरे-धीरे तस्वीर बदलने लगी। सुन्नपन घुटनों तक पहुँचने लगा, पैरों से चप्पल कब निकल जाती है पता ही नहीं चलता, और अब तो कुछ कदम चलने पर भी लड़खड़ाहट होने लगी है। शरीर का संतुलन बिगड़ रहा है और मन में एक खौफनाक सवाल उठने लगा है  "क्या मेरे पैर हमेशा के लिए काम करना बंद कर देंगे? क्या यह डैमेज परमानेंट है"

यह कोई साधारण थकावट या सिर्फ मांसपेशियों का दर्द नहीं है पैरों में झुनझुनी से लेकर चलने में असमर्थ होने तक का यह सफर आपके शरीर के नर्वस सिस्टम के धीरे-धीरे खत्म होने की कहानी है। जब नसों की यह झुनझुनी आपके कदमों की ताक़त छीनने लगे, तो समझ लीजिए कि आप पेरिफेरल न्यूरोपैथी या गंभीर नर्व कंप्रेशन के खतरनाक जाल में फँस चुके हैं। अगर इसे अभी भी सिर्फ पेनकिलर्स से दबाने की कोशिश की गई, तो यह स्थिति आपको हमेशा के लिए व्हीलचेयर तक पहुँचा सकती है।

पैरों और नसों की यह झुनझुनी और कमजोरी शरीर में क्या संकेत देती है?

हमारे पैरों को ताक़त और संतुलन हमारी रीढ़ की हड्डी Spine से निकलने वाली नसों से मिलता है। जब इन नसों पर भारी दबाव पड़ता है या ये अंदर से सूखने लगती हैं, तो दिमाग और पैरों के बीच का संपर्क टूटने लगता है।

  • पेरिफेरल न्यूरोपैथी Peripheral Neuropathy: क्रोनिक बीमारियाँ जैसे अनियंत्रित डायबिटीज Diabetes खून में शुगर का स्तर बढ़ाकर पैरों की सबसे निचली नसों Peripheral nerves को डैमेज कर देती हैं। इसे डायबिटिक न्यूरोपैथी भी कहते हैं, जहाँ पैरों के तलवों से महसूस करने की क्षमता पूरी तरह खत्म होने लगती है।
  • सायटिका Sciatica और नर्व कंप्रेशन: जब रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से Lumbar region में गैप कम हो जाता है या स्लिप्ड डिस्क Slipped Disc के कारण सबसे मोटी नस Sciatic nerve दब जाती है, तो कूल्हे से लेकर एड़ी तक एक भयंकर करंट जैसा दर्द और सुन्नपन दौड़ता है।
  • नसों की कोटिंग Myelin Sheath का नष्ट होना: नसों के ऊपर एक प्राकृतिक सुरक्षा परत होती है। गलत खान-पान, विटामिन B12 की भारी कमी और खराब लाइफस्टाइल के कारण जब यह परत छिलने लगती है, तो नसें शॉर्ट-सर्किट की तरह काम करती हैं, जिससे झुनझुनी और कमज़ोरी आती है।
  • ब्लड सर्कुलेशन का रुकना: नसों को ज़िंदा रहने के लिए ऑक्सीजन और खून चाहिए। जब खून गाढ़ा हो जाता है या नसें सिकुड़ जाती हैं, तो पैरों तक पोषण नहीं पहुँचता और वे बेजान होने लगते हैं।

नसों का डैमेज और चलने में दिक्कत किन प्रकारों में सामने आती है?

हर व्यक्ति का शरीर और उसकी प्रकृति अलग होती है। आयुर्वेद के अनुसार, नसों के डैमेज को दोषों के आधार पर तीन मुख्य प्रकारों में देखा जा सकता है:

  • वात-प्रधान नर्व डैमेज: इसमें पैरों में भयंकर रूखापन और सुन्नपन आ जाता है। ऐसा लगता है जैसे पैरों में सुइयां चुभ रही हों। दर्द इतना तेज़ होता है कि रात को नींद नहीं आती। पैर ठंडे पड़ जाते हैं और चलने पर मांसपेशियों में ऐंठन Cramps होती है।
  • पित्त-प्रधान नर्व डैमेज: इसमें नसों के डैमेज होने के साथ-साथ पैरों के तलवों में भयंकर आग लगने जैसी जलन Burning feet syndrome होती है। ऐसा लगता है जैसे पैर गर्म कोयले पर रखे हों। तलवे लाल हो जाते हैं और ठंडे फर्श पर पैर रखने से ही थोड़ा आराम मिलता है।
  • कफ-प्रधान नर्व डैमेज: इसमें पैरों में भारी सूजन आ जाती है। इंसान को लगता है जैसे वह रुई के ढेर पर चल रहा हो Cotton-wool sensation या उसने भारी मोज़े पहन रखे हों। पैरों में एक अजीब सा भारीपन रहता है और कदम उठाने में बहुत ज़ोर लगाना पड़ता है।

क्या आपके पैरों में भी नसों के डैमेज के ये शुरुआती लक्षण दिख रहे हैं?

चलने में असमर्थता अचानक नहीं आती। शरीर बहुत पहले से नसों के मरने के संकेत देने लगता है। अगर आपको रोज़ाना ये लक्षण दिख रहे हैं, तो तुरंत सतर्क हो जाएँ:

  • चप्पल का पैरों से निकल जाना: चलते समय चप्पल या जूते पैरों से निकल जाते हैं और आपको इसका अहसास तक नहीं होता। यह सेंसेशन Sensation के पूरी तरह खत्म होने का सीधा संकेत है।
  • फुट ड्रॉप Foot Drop: चलते समय पैर का पंजा ज़मीन से ऊपर उठाने में दिक्कत होना, जिसके कारण पैर ज़मीन पर घिसट कर चलता है और ठोकर लगने का डर रहता है।
  • बैलेंस बिगड़ना: अंधेरे में या आँखें बंद करके खड़े होने पर लड़खड़ा जाना और गिरने जैसा महसूस होना।
  • रात को असहनीय दर्द और ऐंठन: दिन भर ठीक रहने के बाद, रात को बिस्तर पर लेटते ही पैरों की पिंडलियों में भयंकर ऐंठन Cramps होना और सुन्नपन बढ़ जाना।

इस झुनझुनी को नज़रअंदाज़ करने में लोग क्या गलतियाँ करते हैं और उनकी जटिलताएँ?

इस डर से कि कहीं कोई बड़ी बीमारी न निकल आए, या तुरंत राहत पाने की जल्दबाज़ी में लोग ऐसे शॉर्टकट्स अपना लेते हैं जो नसों को हमेशा के लिए मृत Dead कर देते हैं:

  • पेनकिलर्स और नर्व-नमिंग पिल्स का अंधाधुंध इस्तेमाल: दर्द को दबाने के लिए Pregabalin या Gabapentin जैसी दवाइयाँ खाना जो सिर्फ आपके दिमाग को सुन्न करती हैं कि वह दर्द महसूस न करे। लेकिन अंदर ही अंदर नस सूखकर डैमेज होती रहती है।
  • मूल कारण Root Cause का इलाज न करना: अगर झुनझुनी का कारण रीढ़ की हड्डी में दबी हुई नस है, तो सिर्फ पैरों की मालिश करने से कोई फायदा नहीं होगा। जब तक रीढ़ का संरेखण Alignment ठीक नहीं होगा, समस्या बढ़ती जाएगी।
  • डायबिटीज को हल्के में लेना: शुगर लेवल को कंट्रोल न करना और मीठा खाते रहना डायबिटिक न्यूरोपैथी का सबसे बड़ा कारण है। यह आगे चलकर पैरों में घाव Gangrene का रूप ले सकता है जहाँ पैर काटने तक की नौबत आ जाती है।
  • भविष्य की गंभीर जटिलताएँ: अगर इसे परमानेंट डैमेज से पहले नहीं रोका गया, तो इंसान पूरी तरह से लकवाग्रस्त Paralyzed हो सकता है या हमेशा के लिए बिस्तर या व्हीलचेयर तक सीमित हो सकता है।

आयुर्वेद नसों के डैमेज और पैरों की कमज़ोरी को कैसे समझता है?

आधुनिक विज्ञान जिसे पेरिफेरल न्यूरोपैथी या लम्बार स्पोंडिलोसिस कहता है, आयुर्वेद उसे वात दोष के गंभीर प्रकोप, 'मज्जा धातु क्षय' Depletion of nervous tissue और 'स्रोतोरोध' Blockage of channels से समझता है।

  • मज्जा धातु Nervous Tissue का सूखना: आयुर्वेद के अनुसार हमारा नर्वस सिस्टम 'मज्जा धातु' से बना है। जब शरीर में वात रूखापन अत्यधिक बढ़ जाता है, तो यह मज्जा धातु को सुखा देता है। नसों की चिकनाई खत्म हो जाती है और वे भंगुर Fragile हो जाती हैं।
  • आम Toxins और स्रोतस में रुकावट: खराब पाचन और कब्ज़ के कारण आंतों में बना 'आम' Toxins जब रक्त के साथ पैरों की बारीक नसों में जाकर जमा हो जाता है, तो वह नसों के चैनल Srotas को ब्लॉक कर देता है। इस ब्लॉकेज के कारण पैरों तक 'प्राण' Energy नहीं पहुँच पाता, जिससे सुन्नपन और कमज़ोरी आती है।
  • प्रमेह डायबिटीज का प्रभाव: आयुर्वेद में मधुमेह Diabetes को प्रमेह कहा गया है। लंबे समय तक प्रमेह रहने से शरीर का ओज Vitality खत्म हो जाता है और पैरों की नसें सिकुड़ कर अपना काम करना बंद कर देती हैं।

नसों की खुश्की मिटाने और वात शांत करने वाली आयुर्वेदिक डाइट

आपका खाना ही आपकी नसों को सुखा भी सकता है और उन्हें दोबारा हरा-भरा भी कर सकता है। नसों को रिपेयर करने और वात को शांत करने के लिए इस आयुर्वेदिक डाइट को अपनी रूटीन में अनिवार्य रूप से शामिल करें।

आहार की श्रेणी क्या खाएं फायदेमंद - नसों को चिकनाई देने वाले और वात शामक क्या न खाएं ट्रिगर फूड्स - रूखापन और गैस बढ़ाने वाले
अनाज Grains पुराना चावल, दलिया, ओट्स, मूंग दाल की खिचड़ी, रागी। वाइट ब्रेड, मैदा, पैकेटबंद नूडल्स, पिज़्ज़ा, रूखे बिस्कुट।
वसा Fats देसी गाय का शुद्ध घी नसों के लिए अमृत, तिल का तेल, ऑलिव ऑयल। किसी भी प्रकार का रिफाइंड तेल, बहुत अधिक मक्खन, डालडा।
सब्ज़ियाँ Vegetables लौकी, तरोई, कद्दू, पालक, शकरकंद सभी अच्छी तरह पकी हुई। कच्चा सलाद, अत्यधिक गोभी, भारी कटहल, बैंगन।
फल और मेवे Fruits & Nuts रात भर भीगे हुए बादाम, अखरोट, चिया सीड्स, पपीता, सेब। डिब्बाबंद और बिना मौसम के फल, बाज़ार के रोस्टेड नमकीन नट्स।
पेय पदार्थ Beverages हल्दी और अश्वगंधा वाला दूध रात में, ताज़ा मट्ठा, जीरा पानी। बहुत ज़्यादा कैफीन कॉफी नसों को सुखाती है, शराब, कोल्ड ड्रिंक्स।

नसों को फौलादी ताक़त देने वाली चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में प्रकृति ने हमें ऐसे दिव्य रसायन दिए हैं, जो बिना किसी साइड-इफेक्ट के नसों के दर्द को खींच लेते हैं और डैमेज हो चुकी नसों को दोबारा ज़िंदा कर देते हैं:

  • अश्वगंधा Ashwagandha: नर्वस सिस्टम की कमज़ोरी दूर करने और पैरों में वापस ताक़त भरने के लिए अश्वगंधा एक अद्भुत रसायन है। यह सूखी हुई मज्जा धातु में भारी ऊर्जा भर देता है।
  • शिलाजीत Shilajit: नसों की कमज़ोरी और डायबिटिक न्यूरोपैथी में शिलाजीत संजीवनी का काम करता है। यह माइक्रो-सर्कुलेशन को बढ़ाता है और नसों के डैमेज को रिवर्स करने में मदद करता है।
  • गिलोय Giloy: शरीर के अंदरूनी 'आम' और सूजन Inflammation को जड़ से खत्म करने के लिए गिलोय बेहतरीन ब्लड प्यूरीफायर का काम करती है।
  • महायोगराज गुग्गुल Mahayograj Guggulu: यह सायटिका और दबी हुई नसों को खोलने के लिए आयुर्वेद की सबसे शक्तिशाली औषधियों में से एक है। यह गहराई में जमे हुए वात को निकालकर दर्द में तुरंत आराम देता है।
  • बला Bala: जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह जड़ी-बूटी मांसपेशियों और नसों को भारी 'बल' ताक़त प्रदान करती है, जिससे लड़खड़ाहट खत्म होती है।

नसों को खोलने और सुन्नपन मिटाने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब वात और जकड़न बहुत गहराई तक रीढ़ की हड्डी और पैरों की नसों में जम चुकी हो, तो केवल मौखिक दवाइयाँ काफी नहीं होतीं। पंचकर्म की ये बाहरी थेरेपीज़ डैमेज नसों को तुरंत रीबूट कर देती हैं:

  • कटि बस्ती Kati Basti: कमर के निचले हिस्से Lumbar region पर गर्म औषधीय तेल रोककर की जाने वाली यह कटि बस्ती सूखी हुई डिस्क और दबी हुई सायटिक नसों को भारी चिकनाई देती है, जिससे पैरों में जाने वाला करंट जैसा दर्द तुरंत रुक जाता है।
  • पत्र पोटली स्वेदन Patra Pinda Sweda: ताज़ा औषधीय पत्तों को तेल में गर्म करके उनकी पोटली से पैरों और कमर की सिकाई की जाती है। यह पैरों के सुन्नपन और मांसपेशियों की ऐंठन को खत्म करने में जादुई असर दिखाती है।
  • अभ्यंग Abhyanga: गुनगुने वात-शामक तेलों जैसे महानारायण या क्षीरबला तेल से की जाने वाली यह संपूर्ण शारीरिक मालिश पैरों का ब्लड सर्कुलेशन तेज़ी से बढ़ाती है।
  • बस्ती कर्म Basti Karma: इसे आयुर्वेद में 'अर्ध-चिकित्सा' आधी बीमारी का इलाज कहा गया है। यह औषधीय तेलों और काढ़ों का एक खास एनिमा है, जो शरीर के मुख्य वात स्थान पक्वाशय/Colon से वात को जड़ से उखाड़ फेंकता है।

नसों के पूरी तरह रिपेयर होने और झुनझुनी खत्म होने में कितना समय लगता है?

बरसों से दबी और सूखी हुई नसों को दोबारा प्राकृतिक अवस्था में लाने और चलने की क्षमता वापस पाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: औषधियों और पेट साफ होने से आपकी जठराग्नि सुधरेगी। पैरों का भारी दर्द, जलन और रात की ऐंठन में भारी कमी आएगी। रात की नींद बेहतर होगी।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म और रसायनों के प्रभाव से नसों का रूखापन और सुन्नपन खत्म होने लगेगा। पैरों में महसूस होने की क्षमता Sensation वापस आने लगेगी और आपका बैलेंस सुधरेगा।
  • 5-6 महीने: मज्जा धातु पूरी तरह पोषित हो जाएगी। आप बिना किसी लड़खड़ाहट और पेनकिलर के एक सामान्य, ऊर्जावान जीवन जी सकेंगे और अपने कदमों पर फिर से पूरा भरोसा कर पाएंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

पैरों की झुनझुनी और नसों के डैमेज के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा Symptomatic care आयुर्वेद Holistic care
इलाज का मुख्य लक्ष्य दर्द के सिग्नल्स को ब्लॉक करने के लिए पेनकिलर्स और नसों को सुन्न करने वाली गोलियाँ जैसे Pregabalin/Gabapentin देना। वात को शांत करना, ब्लॉकेज हटाना और दिमाग व नसों को प्राकृतिक रूप से पोषण देकर रिपेयर करना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल पैरों या कमर के एक स्थानीय Local नर्व डैमेज की समस्या मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए वात और मज्जा धातु के सूखने का एक संपूर्ण सिंड्रोम मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल पेनकिलर के साथ फिजियोथेरेपी की सलाह, लेकिन जठराग्नि या वात-शामक भोजन पर कोई खास ज़ोर नहीं। वात-शामक डाइट, सही पोश्चर, कब्ज़ दूर करना और औषधीय तेलों की पंचकर्म मालिश को इलाज का आधार मानना।
लंबा असर दवाइयाँ छोड़ने पर सुन्नपन और दर्द तुरंत वापस आ जाता है और स्पाइन सर्जरी Spine Surgery का रिस्क रहता है। शरीर अंदर से मज़बूत होता है और नर्वस सिस्टम खुद को हील कर लेता है, जिससे इंसान स्थायी रूप से अपने पैरों पर खड़ा रहता है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद नसों की इस खुश्की को काफी हद तक रिवर्स कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर और अचानक होने वाले बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल हस्तक्षेप ज़रूरी हो जाता है:

  • पैरों का पूरी तरह सुन्न हो जाना Total Loss of Sensation: अगर सुई चुभाने या गर्म पानी डालने पर भी पैरों में बिल्कुल कुछ महसूस न हो।
  • मांसपेशियों का पूरी तरह सूखना Severe Muscle Atrophy: अगर एक पैर दूसरे पैर के मुकाबले एकदम पतला होने लगे और सूख जाए।
  • मल-मूत्र पर नियंत्रण खोना Bowel/Bladder Incontinence: अगर रीढ़ की नसें इतनी दब जाएं कि आपको टॉयलेट जाने का पता ही न चले Cauda Equina Syndrome।
  • अचानक किसी हिस्से का लकवाग्रस्त Paralyzed होना: अगर पैर का कोई हिस्सा बिल्कुल ही काम करना बंद कर दे।

निष्कर्ष

पैरों में शुरू हुई वह हल्की सी झुनझुनी कोई आम थकावट नहीं थी, बल्कि यह आपके शरीर का वह चीखता हुआ अलार्म था जो बता रहा था कि आपका नर्वस सिस्टम खतरे में है। जब आप इस अलार्म को रोज़ाना पेनकिलर्स और नसों को सुन्न करने वाली कृत्रिम गोलियों से दबाते हैं, तो आप अपनी नसों को हील करने के बजाय उन्हें स्थायी रूप से अपाहिज कर रहे होते हैं, जिससे अंततः चलने-फिरने की ताक़त छिन जाती है। क्या यह डैमेज परमानेंट है? आधुनिक विज्ञान के लिए शायद हाँ, लेकिन आयुर्वेद के पास नसों को दोबारा ज़िंदा करने की अद्भुत क्षमता है बशर्ते सही समय पर इलाज शुरू हो। इस दर्दनाक चक्र से बाहर निकलें। अपने लाइफस्टाइल को सुधारें, शुगर लेवल कंट्रोल करें और अपनी डाइट में शुद्ध गाय का घी शामिल करें। अश्वगंधा, शिलाजीत और गुग्गुल जैसी जादुई जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और कटि बस्ती व अभ्यंग मालिश से अपनी सूखी हुई नसों को प्राकृतिक रूप से नया जीवन दें। अपने कदमों की ताक़त को छिनने न दें, और एक स्थायी, दर्द-मुक्त जीवन के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

जब पैरों की नसें लंबे समय तक दबी रहती हैं या शुगर के कारण डैमेज हो जाती हैं (Neuropathy), तो वे दिमाग से पैरों की मांसपेशियों तक सिग्नल पहुँचाना बंद कर देती हैं। सिग्नल न मिलने के कारण मांसपेशियाँ कमज़ोर हो जाती हैं, जिससे लड़खड़ाहट और चलने में दिक्कत शुरू हो जाती है

नहीं, हमेशा नहीं। अगर नसों का डैमेज शुरुआती या मध्यम स्तर का है, तो आयुर्वेद में मज्जा धातु को पोषण देने वाली औषधियों और पंचकर्म थेरेपी से नसों को दोबारा रिपेयर (Regenerate) किया जा सकता है। लेकिन अगर डैमेज 100% हो चुका है और नस पूरी तरह मर चुकी है, तो उसे वापस लाना मुश्किल होता है। इसलिए समय पर इलाज ज़रूरी है।

बिल्कुल। लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड शुगर नसों की दीवारों को नुकसान पहुँचाता है और नसों तक खून ले जाने वाली छोटी रक्त वाहिकाओं को नष्ट कर देता है। इसे डायबिटिक न्यूरोपैथी कहते हैं, जो पैरों के सुन्न होने का सबसे बड़ा कारण है।

सायटिका में रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में नस दबने के कारण कमर से लेकर पैरों के नीचे तक एक तेज़ करंट जैसा दर्द दौड़ता है। जबकि न्यूरोपैथी में अक्सर दोनों पैरों के तलवों से सुन्नपन, झुनझुनी और जलन शुरू होती है जो धीरे-धीरे ऊपर की तरफ बढ़ती है।

नहीं। पेनकिलर्स या नर्व-ब्लॉकिंग दवाइयाँ सिर्फ आपके दिमाग को दर्द महसूस करने से रोकती हैं। वे उस जगह का इलाज नहीं करतीं जहाँ नस दबी है या डैमेज हो रही है। लंबे समय तक इनके सेवन से किडनी और लिवर पर भारी नुकसान होता है।

रात के समय वात दोष प्राकृतिक रूप से बढ़ जाता है। इसके अलावा, दिन भर की शारीरिक गतिविधि बंद होने से ध्यान सीधे दर्द पर जाता है। रात में शरीर का तापमान भी थोड़ा गिरता है, जिससे डैमेज नसों में दर्द (Neuropathic pain) ज़्यादा महसूस होता है।

पैरों की मुख्य नसें कमर (Lumbar spine) से ही निकलती हैं। कटि बस्ती में कमर पर गर्म औषधीय तेल रोका जाता है। यह सूखी हुई डिस्क को चिकनाई देता है, वात शांत करता है और दबी हुई नस को खोलता है, जिससे पैरों में खून और सिग्नल दोबारा दौड़ने लगते हैं।

सुन्न पैरों के लिए हमेशा मुलायम, गद्देदार (Cushioned) और आगे से चौड़े जूते पहनने चाहिए ताकि उँगलियों पर दबाव न पड़े। सख्त और चुभने वाले जूते कभी न पहनें, क्योंकि पैरों में सेंसेशन न होने के कारण छाले या घाव (Ulcers) बन सकते हैं जिनका आपको पता भी नहीं चलेगा।

हाँ, लेकिन सही तेल से। सरसों या नारियल तेल के बजाय शुद्ध वात-शामक तेल (जैसे क्षीरबला तेल या महानारायण तेल) से पैरों की हल्के हाथों से ऊपर से नीचे की तरफ मालिश करें। मालिश के बाद पैरों को ठंडी हवा से बचाएं।

हाँ, ये दोनों आयुर्वेद के बेहतरीन रसायन हैं। अश्वगंधा नर्वस सिस्टम को शांति और बल देता है, जबकि शिलाजीत माइक्रो-सर्कुलेशन को सुधार कर नसों को दोबारा ज़िंदा करने के लिए ज़रूरी पोषण (Nutrition) प्रदान करता है, जिससे नर्व रीजनरेशन (Nerve regeneration) में मदद मिलती है।

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