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क्या आपका खान-पान या हाइजीन की ये 3 गलतियाँ UTI को बार-बार न्यौता दे रही हैं?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

एंटीबायोटिक और तुरंत राहत देने वाली दवाओं का इस्तेमाल यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) या पेशाब के संक्रमण जैसी बीमारियों में काफी आम है। ये दवाएँ और सिरप शरीर के अंदर जलन और दर्द के दर्दनाक संकेतों को कुछ समय के लिए दबा देते हैं, जिससे मरीज़ को लगता है कि वह पूरी तरह ठीक हो गया है और उसकी परेशानी खत्म हो गई है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि मरीज़ को दवा छोड़ने के तुरंत बाद फिर से पेशाब में भयंकर जलन होने लगती है और इन्फेक्शन पहले से भी बड़े रूप में वापस आ जाता है। इसके कारण कई हो सकते हैं जैसे लगातार दवाएँ खाने से इम्युनिटी का कमज़ोर होना, बीमारी कितनी गंभीर है, दवाओं पर शरीर की निर्भरता, या सबसे महत्वपूर्ण शरीर में मौजूद अशुद्धियाँ और खान-पान व हाइजीन की गलतियाँ। इस बात को समझना ज़रूरी है, ताकि वक्त रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सके और मूत्र मार्ग की सेहत बनी रहे।

यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) क्या है?

यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) एक ऐसी स्थिति है, जहाँ बाहरी बैक्टीरिया हमारे मूत्र मार्ग (किडनी, ब्लैडर या मूत्र नली) में प्रवेश कर जाते हैं और तेज़ी से पनपने लगते हैं। आमतौर पर लोग इसका शिकार पानी कम पीने, गलत खानपान, साफ-सफाई न रखने या पेशाब रोक कर रखने के कारण होते हैं। जब बैक्टीरिया अपनी जगह बना लेते हैं, तो पेशाब में तेज़ जलन, दर्द, बार-बार पेशाब आना और पेट के निचले हिस्से में भारीपन जैसी दिक्कतें होने लगती हैं। एंटीबायोटिक खाने पर कुछ समय के लिए आराम मिल जाता है, लेकिन ये दवाएँ सिर्फ ऊपरी इन्फेक्शन को साफ करती हैं, शरीर के अंदर मौजूद उस अनुकूल माहौल (बढ़ी हुई गर्मी या पित्त) को ठीक नहीं करतीं जिसमें बैक्टीरिया बार-बार पनपता है। दवा को बिना डॉक्टर की सलाह के लगातार इस्तेमाल करना शरीर के अच्छे बैक्टीरिया को भी खत्म कर देता है।

UTI की बीमारियाँ कितने प्रकार की होती हैं?

मूत्र रोग से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से इन्फेक्शन की ये स्थितियाँ देखी जाती हैं

  • सिस्टाइटिस (Cystitis) यह मूत्राशय (Bladder) का इन्फेक्शन है। यह सबसे आम है और इसमें बार-बार पेशाब जाने की इच्छा होती है।
  • यूरेथ्राइटिस (Urethritis) यह मूत्र नली (Urethra) का इन्फेक्शन है, जिसमें पेशाब करते समय भयंकर जलन और दर्द होता है।
  • पायलोनेफ्राइटिस (Pyelonephritis) यह गुर्दे का इन्फेक्शन है। यह स्थिति गंभीर होती है और इसमें कमर दर्द के साथ तेज़ बुखार और उल्टी आती है।

UTI के लक्षण और संकेत

बार-बार पेशाब में जलन होना कई स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं

  • तेज़ जलन और दर्द पेशाब करते समय असहनीय जलन मचना या चुभन महसूस होना।
  • बार-बार पेशाब आना ऐसा लगना कि पेशाब आ रहा है लेकिन वॉशरूम जाने पर बहुत कम मात्रा में आना।
  • पेशाब का रंग बदलना पेशाब का गहरा पीला, धुंधला या लाल (खून आना) हो जाना और उसमें से तेज़ बदबू आना।
  • पेट के निचले हिस्से में दर्द मूत्राशय के ऊपर और पेडू के हिस्से में भारीपन व ऐंठन रहना।
  • दवा का असर खत्म होते ही वापसी एंटीबायोटिक का कोर्स खत्म करते ही कुछ ही दिनों के भीतर जलन का फिर से उभर आना।

 ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

बार-बार UTI होने के मुख्य कारण क्या हैं?

मूत्र मार्ग में बार-बार इन्फेक्शन होने के पीछे सिर्फ बाहरी बैक्टीरिया नहीं, बल्कि हमारी रोज़ाना की ये 3 बड़ी गलतियाँ ज़िम्मेदार होती हैं

  • गलत खान-पान और पानी की कमी (गलती 1) पूरे दिन में पर्याप्त पानी न पीना और बहुत ज़्यादा चाय, कॉफी, मिर्च-मसाले या गर्म तासीर वाला भोजन खाना। इससे मूत्र गाढ़ा हो जाता है और शरीर में पित्त (गर्मी) बढ़ जाता है, जो बैक्टीरिया को पनपने की जगह देता है।
  • हाइजीन और साफ-सफाई की कमी (गलती 2) सार्वजनिक टॉयलेट का इस्तेमाल करते समय सावधानी न बरतना, पसीने से भीगे या टाइट सिंथेटिक अंडरगारमेंट्स लंबे समय तक पहने रहना और मल त्याग के बाद सही दिशा में साफ-सफाई न करना (पीछे से आगे की ओर पोंछना)।
  • पेशाब रोक कर रखना (गलती 3) काम के चक्कर में लंबे समय तक पेशाब को रोक कर रखना। पेशाब रोकने से ब्लैडर में बैक्टीरिया को अपनी संख्या बढ़ाने का पूरा समय मिल जाता है।
  • कमज़ोर इम्युनिटी जब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होती है, तो वह बैक्टीरिया से लड़ नहीं पाती।

UTI के जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

UTI को अगर अनदेखा किया जाए या सही समय पर इलाज न मिले, तो यह कई जटिलताओं का कारण बन सकता है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं

  • किडनी को स्थायी नुकसान अगर इन्फेक्शन ब्लैडर से होते हुए गुर्दे तक पहुँच जाए, तो यह किडनी को हमेशा के लिए खराब कर सकता है।
  • खून में इन्फेक्शन (सेप्सिस) गंभीर मामलों में बैक्टीरिया खून में मिल सकते हैं, जो एक जानलेवा स्थिति बन सकती है।
  • गर्भावस्था में जटिलताएँ गर्भवती महिलाओं में बार-बार UTI होने से समय से पहले डिलीवरी का खतरा बढ़ जाता है।
  • लगातार एंटीबायोटिक का साइड इफेक्ट बार-बार दवाइयाँ खाने से बैक्टीरिया उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी (Resistance) हो जाते हैं।

समय पर डॉक्टर से परामर्श और उचित इलाज लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से बार-बार होने वाला UTI सिर्फ बाहरी कीटाणुओं की दिक्कत नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'मूत्रकृच्छ्र' कहा जाता है और यह माना जाता है कि जब शरीर में पित्त दोष बिगड़ जाता है और अपान वात असंतुलित हो जाता है, तब ऐसी परेशानी आती है। डॉक्टर नाड़ी और जीभ देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। वे ढूँढते हैं कि कहीं शरीर में बहुत ज़्यादा गर्मी और टॉक्सिन्स (आम) तो नहीं जमा हो गए हैं, जिसने मूत्र प्रणाली को पूरी तरह दूषित कर दिया है। जब तक यह दूषित पित्त शरीर में रहेगा, जलन और इन्फेक्शन की जगह हमेशा मिलती रहेगी। आयुर्वेद में बस लक्षण मिटाना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, मूत्र मार्ग की अंदरूनी शुद्धि हो और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्राकृतिक रूप से मज़बूत बने।

UTI के लिए महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में मूत्र रोगों को दूर करने और मूत्र मार्ग को स्वस्थ रखने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं

  • गोक्षुर (गोखरू) यह पेशाब की जलन और इन्फेक्शन को दूर करने की सबसे बेहतरीन औषधि है। यह मूत्र मार्ग की सूजन को कम करता है।
  • पुनर्नवा यह सूजन और दर्द के लिए बहुत ताकतवर है। यह गुर्दे की कार्यक्षमता को बढ़ाता है और अशुद्धियों को साफ करता है।
  • वरुण यह मूत्र मार्ग की रुकावटों को खोलता है और पेशाब को खुलकर लाने में मदद करता है।
  • चंदन और गिलोय चंदन शरीर की बढ़ी हुई गर्मी (पित्त) को शांत करता है और गिलोय इन्फेक्शन से लड़ने की ताकत बढ़ाती है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म शरीर की अंदरूनी सफाई

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, दूषित दोषों को बाहर निकालकर संपूर्ण स्वास्थ्य और स्वस्थ मूत्र मार्ग पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया

  • गहरी सफाई और शरीर शोधन जब इन्फेक्शन बार-बार बन रहा हो और किसी दवा से स्थायी आराम न मिल रहा हो, तो जीवा आयुर्वेद में शरीर के दोषों को संतुलित करने के लिए विशेष पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय यह 7 से 15 दिनों तक चलने वाली शरीर के अंदरूनी अंगों की गहरी सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • उत्तर बस्ती महिलाओं में बार-बार होने वाले गंभीर UTI के लिए 'उत्तर बस्ती' का प्रयोग किया जाता है, जिसमें औषधीय तेलों या काढ़े को मूत्र मार्ग से अंदर डाला जाता है, जो अंदरूनी घाव और इन्फेक्शन को जड़ से खत्म करता है।
  • स्थायी राहत के लिए औषधियाँ अंदरूनी सफाई के साथ पित्त शामक जड़ी-बूटियों का सेवन कराया जाता है। इससे सालों पुरानी भयंकर तकलीफ में राहत मिलती है।

UTI के रोगी के लिए शुद्ध आहार

जीवा आयुर्वेद और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार, UTI को दूर करने के लिए तरल पदार्थों से भरपूर, ठंडा (शीतल तासीर) और शरीर के पित्त दोष को संतुलित करने वाला आहार चुनना महत्वपूर्ण है

क्या खाएँ?

  • पानी और ताज़े तरल पदार्थ नारियल पानी, जौ का पानी और धनिये का पानी रोज़ाना पिएँ, यह मूत्र मार्ग को साफ करते हैं।
  • पानी वाली सब्ज़ियाँ लौकी, खीरा, ककड़ी और परवल खाएँ, यह पेट और शरीर की गर्मी को शांत रखते हैं।
  • आंवला और मुनक्का विटामिन सी से भरपूर ताज़ा आंवला इन्फेक्शन से बचाता है और भीगा हुआ मुनक्का पित्त कम करता है।

क्या न खाएँ?

  • मिर्च-मसाले और खट्टी चीज़ें अचार, इमली, सिरका और भारी मसाले खाना बिल्कुल बंद कर दें, ये जलन को तेज़ी से बढ़ाते हैं।
  • चाय, कॉफी और शराब कैफीन और अल्कोहल शरीर में गर्मी बढ़ाते हैं और मूत्र गाढ़ा करते हैं, जिससे तकलीफ बढ़ती है।
  • पैकेटबंद और जंक फूड मैदे से बनी चीज़ों का सेवन बिल्कुल बंद कर दें, क्योंकि यह शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ाते हैं और इन्फेक्शन को लंबा खींचते हैं।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में रोगों का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करता है

  • बीमारी और शरीर की स्थिति ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे इन्फेक्शन कितना गहरा है और मरीज़ का खान-पान कैसा है।
  • हल्की समस्या में सुधार अगर UTI नया है, तो आमतौर पर 2 से 4 हफ्तों में ही पेशाब की जलन खत्म हो जाती है।
  • पुरानी बीमारी का समय अगर इन्फेक्शन सालों पुराना है और बार-बार लौटता है, तो शरीर को पूरी तरह शुद्ध होने में 2 से 6 महीने भी लग सकते हैं।
  • उपचार का तरीका इस प्राकृतिक इलाज में मुख्य रूप से पित्त शामक जड़ी-बूटियाँ, सही खानपान और पानी पीने का ध्यान रखना शामिल होता है।
  • स्थायी परिणाम मरीज़ अगर अपनी डाइट का कड़ाई से पालन करता है, तो दोष संतुलित हो जाते हैं और भविष्य में इन्फेक्शन के दोबारा पनपने की संभावना खत्म हो जाती है।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

तीन महीनों तक, मैं अपने यूरिनरी ट्रैक्ट (मूत्र मार्ग) के इन्फेक्शन के लिए एलोपैथिक दवाएँ ले रहा था। जब उन दवाओं से कोई फ़ायदा नहीं हुआ, तो मेरे एलोपैथी डॉक्टर ने मुझे किसी आयुर्वेदिक डॉक्टर से सलाह लेने को कहा; इसलिए मैं 'जीवा' (Jiva) आया। अब मैं पूरी तरह से ठीक हूँ। मेरे इलाज के लिए 'जीवा' के डॉक्टरों का बहुत-बहुत धन्यवाद। अब मेरा आयुर्वेद में पक्का विश्वास है और मैं दूसरों को भी यही सलाह दूँगा कि वे आयुर्वेद को ही अपनाएँ।

दर्शन (फरीदाबाद)  

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

तुलना का आधार आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक चिकित्सा
उपचार का दृष्टिकोण बैक्टीरिया को मारने पर केंद्रित बीमारी की जड़ पर काम करना
कार्य करने का तरीका एंटीबायोटिक्स से इन्फेक्शन को जल्दी खत्म करना शरीर के अंदर का वातावरण संतुलित करना
मूल कारण पर प्रभाव पित्त असंतुलन और टॉक्सिन्स को नहीं सुधारता पित्त दोष और टॉक्सिन्स को संतुलित करता है
उपचार विधियाँ एंटीबायोटिक दवाइयाँ जड़ी-बूटियाँ और प्राकृतिक उपचार
दुष्प्रभाव अच्छे बैक्टीरिया भी नष्ट, इम्युनिटी कमज़ोर सामान्यतः सुरक्षित, शरीर के अनुरूप सुधार
परिणाम अस्थायी राहत, इन्फेक्शन बार-बार हो सकता है बैक्टीरिया के लिए प्रतिकूल वातावरण, स्थायी आराम
समय जल्दी असर थोड़ा समय लगता है, लेकिन दीर्घकालिक लाभ

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए

UTI होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि

  •   पेशाब में साफ तौर पर खून आने लगे।
  •   दर्द और जलन बर्दाश्त से बाहर हो जाए।
  •   तेज़ बुखार के साथ कंपकंपी और ठंड लगने लगे।
  •   कमर और पसलियों के नीचे भयंकर दर्द महसूस हो।
  •   लगातार उल्टियाँ होने लगें।

समय पर सलाह लेने से रोग का सही निदान होता है और किडनी को स्थायी रूप से खराब होने से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से बार-बार होने वाला UTI मुख्य रूप से पित्त दोष के बिगड़ने तथा शरीर में अशुद्धियों के जमा होने से जुड़ा होता है। कम पानी पीने, गलत खान-पान, साफ-सफाई न रखने और पेशाब रोकने से मूत्र मार्ग में इन्फेक्शन पनपता है। सिर्फ एंटीबायोटिक खाने से दर्द छिप जाता है लेकिन बीमारी जड़ से खत्म नहीं होती। इलाज में शरीर की अंदरूनी शुद्धि और पित्त को शांत करना सबसे ज़्यादा आवश्यक है। इसमें गोखरू-चंदन जैसी जड़ी-बूटियाँ इस्तेमाल करना और स्वस्थ दिनचर्या अपनाना शामिल है जिससे बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सके।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, अगर शरीर की शुद्धि के लिए सही आयुर्वेदिक औषधियाँ खाई जाएँ और डाइट व हाइजीन का पालन किया जाए, तो इसे जड़ से खत्म किया जा सकता है।

नहीं, यह सिर्फ उस समय के बैक्टीरिया को मारता है। अंदरूनी तौर पर पित्त को संतुलित किए बिना यह बीमारी बार-बार लौटती है।

हाँ, पानी कम पीने से मूत्र गाढ़ा हो जाता है और उसमें मौजूद बैक्टीरिया तेज़ी से बढ़ते हैं।

हाँ, गोखरू सबसे अच्छा प्राकृतिक उपाय है जो मूत्र मार्ग को साफ कर जलन और इन्फेक्शन को खत्म करने में मदद करता है।

हाँ, कैफीन शरीर में पित्त और गर्मी बढ़ाता है जो जलन का बड़ा कारण है।

हाँ, टाइट कपड़े नमी और पसीना रोक कर रखते हैं, जो बैक्टीरिया को पनपने के लिए अनुकूल माहौल देते हैं।

हाँ, नारियल पानी की तासीर ठंडी होती है और यह मूत्र मार्ग की प्राकृतिक सफाई करता है।

हाँ, लंबे समय तक पेशाब रोकने से ब्लैडर में बैक्टीरिया अपनी संख्या बढ़ा लेते हैं जो इन्फेक्शन का कारण बनता है।

हाँ, अगर इन्फेक्शन ब्लैडर से ऊपर किडनी तक पहुँच जाए, तो तेज़ बुखार और ठंड लग सकती है।

हाँ, कब्ज़ और खराब पाचन से शरीर में टॉक्सिन्स जमा होते हैं जो अंदरूनी गर्मी बढ़ाते हैं और मूत्र रोग पैदा करते हैं।

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