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Periods के दौरान ज्यादा fatigue किस बात का संकेत हो सकती है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

अक्सर हम सोचते हैं कि पीरियड्स के दौरान थोड़ी बहुत थकान होना तो आम बात है। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि कई बार यह सुस्ती इतनी बढ़ जाती है कि बिस्तर से उठने का भी मन नहीं करता? दरअसल, माहवारी के दौरान हमारे शरीर में हॉर्मोन्स का एक बहुत बड़ा तूफ़ान आता है। जब एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन ऊपर-नीचे होते हैं, तो इसका सीधा असर हमारी एनर्जी पर पड़ता है। सिर्फ एक पेनकिलर या एनर्जी ड्रिंक पी लेने से यह कमज़ोरी दूर नहीं होती। जब तक आप अपने शरीर की अंदरूनी ज़रूरत को नहीं समझेंगे, यह थकान हर महीने आपको ऐसे ही परेशान करेगी। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि यह कोई आम सुस्ती नहीं है, बल्कि आपका शरीर आपसे कह रहा है कि उसे अंदर से पोषण और आराम की सख़्त ज़रूरत है।

माहवारी में शरीर इतनी बुरी तरह क्यों टूट जाता है?

हमारे शरीर में पीरियड्स शुरू होने से ठीक पहले हॉर्मोन्स का स्तर तेज़ी से गिरता है। जैसे ही एस्ट्रोजन हॉर्मोन कम होता है, शरीर की एनर्जी भी एकदम से डाउन हो जाती है। इसके अलावा, ब्लीडिंग के कारण शरीर से बहुत सारा तरल पदार्थ और आयरन बाहर निकल जाता है। जब शरीर में नया खून बनने की प्रक्रिया चल रही होती है, तो दिल और दिमाग को ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है। इसी भारी मेहनत की वजह से हमारी माँसपेशियाँ दुखने लगती हैं, पिंडलियों में भयंकर दर्द होता है और हमें ऐसा लगता है जैसे किसी ने शरीर का सारा दम निकाल लिया हो।

क्या हर बार कमज़ोरी का मतलब सिर्फ खून की कमी ही होता है? 

जी नहीं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। कई बार लड़कियाँ बहुत अच्छी डाइट लेती हैं, उनका हीमोग्लोबिन भी एकदम सही होता है, फिर भी पीरियड्स में वो निढाल हो जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि समस्या खून की कमी में नहीं, बल्कि शरीर में होने वाली अंदरूनी सूजन (Inflammation) में है। माहवारी के दौरान गर्भाशय को साफ करने के लिए 'प्रोस्टाग्लैंडीन' नाम का रसायन निकलता है। अगर यह शरीर में ज़रूरत से ज़्यादा बन जाए, तो न सिर्फ भयंकर क्रैम्प्स आते हैं, बल्कि यह पूरे शरीर में सूजन और दर्द पैदा कर देता है, जिससे आप बिना कुछ किए ही बुरी तरह थक जाती हैं।

पीरियड्स के उन दिनों में शरीर के अंदर क्या-क्या उथल-पुथल होती है? 

जब एक औरत माहवारी से गुज़रती है, तो उसके शरीर के अंदर कई सारे बदलाव एक साथ चल रहे होते हैं:

  • हॉर्मोन्स का क्रैश होना: एस्ट्रोजन और सेरोटोनिन (खुशी देने वाला हॉर्मोन) का अचानक गिरना मूड स्विंग्स और भयंकर थकान लाता है।
  • गर्भाशय में सिकुड़न: पुराना खून बाहर निकालने के लिए बच्चेदानी लगातार सिकुड़ती है, जिससे पेट और कमर में मरोड़ उठती है।
  • आयरन का बाहर निकलना: हेवी फ्लो के कारण शरीर का बहुत सारा आयरन निकल जाता है, जिससे दिमाग तक ऑक्सीजन कम पहुँचती है।
  • पाचन का बिगड़ना: इन्हीं हॉर्मोन्स की वजह से कई बार गैस, ब्लोटिंग या डायरिया हो जाता है, जो शरीर को और निचोड़ देता है।

अगर थकान बर्दाश्त से बाहर हो जाए, तो ये किन गंभीर बीमारियों का इशारा है?

अगर आपको हर महीने पीरियड्स में इतनी थकान होती है कि आप अपने रोज़मर्रा के काम भी नहीं कर पातीं, तो इसे सिर्फ 'नॉर्मल' मानकर नज़रअंदाज़ न करें। यह कुछ बड़ी दिक्कतों का संकेत हो सकता है:

  • एंडोमेट्रियोसिस (Endometriosis): इसमें गर्भाशय की लाइनिंग बाहर बढ़ने लगती है, जिससे बहुत ज़्यादा दर्द और थकावट होती है।
  • पीसीओएस (PCOS): हॉर्मोनल इम्बैलेंस की इस बीमारी में शरीर का मेटाबॉलिज़्म सुस्त पड़ जाता है और हमेशा कमज़ोरी लगती है।
  • एनीमिया (Anemia): अगर ब्लीडिंग ज़्यादा होती है, तो शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की भारी कमी हो जाती है।
  • फाइब्रॉयड्स (Fibroids): गर्भाशय में गांठें होने की वजह से माहवारी लंबी चलती है और शरीर पूरी तरह टूट जाता है।

आयुर्वेद माहवारी में होने वाली इस सुस्ती को कैसे देखता है? 

आयुर्वेद के अनुसार, महिलाओं के शरीर में मासिक धर्म का चक्र मुख्य रूप से 'अपान वात' (नीचे की तरफ जाने वाली ऊर्जा) द्वारा कंट्रोल होता है। जब आप पीरियड्स से पहले गलत खानपान रखती हैं, ठंडी चीज़ें खाती हैं या बहुत ज़्यादा भागदौड़ करती हैं, तो शरीर में 'वात' (हवा तत्व) बिगड़ जाता है। बढ़ा हुआ वात जब शरीर के रस और रक्त को सोखने लगता है, तो शरीर में रूखापन और कमज़ोरी आ जाती है। आयुर्वेद कहता है कि जब तक आप अपने शरीर के वात दोष को शांत और गर्म नहीं करेंगी, तब तक यह टूटन और थकान कभी ठीक नहीं होगी।

पीरियड्स की थकान मिटाने वाली जड़ी-बूटियाँ 

प्रकृति ने महिलाओं की सेहत के लिए ऐसी कई शानदार जड़ी-बूटियाँ दी हैं जो गर्भाशय को ताकत देने के साथ-साथ एनर्जी भी लौटाती हैं:

  • शतावरी: यह महिलाओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यह हॉर्मोन्स को बैलेंस करती है और शरीर को अंदर से फौलादी ताकत देती है।
  • अशोक की छाल: यह गर्भाशय की सूजन को उतारती है, हेवी ब्लीडिंग को कंट्रोल करती है और कमर दर्द से तुरंत राहत देती है।
  • सफ़ेद मूसली: पीरियड्स में होने वाली भयंकर कमज़ोरी और चक्कर आने की समस्या में यह एनर्जी बूस्टर का काम करती है।
  • अजवाइन और सोंठ: यह पेट की गैस और वात को तुरंत शांत करती है, जिससे क्रैम्प्स में आराम मिलता है और थकान मिटती है।

क्या बहुत ज़्यादा मानसिक तनाव लेने से भी माहवारी का दर्द और कमज़ोरी बढ़ जाती है? 

बिलकुल! आप जितना ज़्यादा स्ट्रेस लेती हैं, आपका शरीर उतना ही ज़्यादा अंदर से थकता है। स्ट्रेस लेने से शरीर में कॉर्टिसोल हार्मोन भर जाता है, जो सीधे तौर पर आपके फील-गुड हार्मोन्स को मार देता है। जब दिमाग शांत नहीं होता, तो शरीर की नसें सिकुड़ जाती हैं और गर्भाशय में खून का बहाव ठीक से नहीं हो पाता। खून के बहाव में रुकावट आने से पेट में भयंकर मरोड़ उठती है और शरीर इस दर्द से लड़ने में अपनी बची-खुची एनर्जी भी गँवा देता है। इसीलिए तनावमुक्त रहना माहवारी में सबसे अच्छी दवा माना जाता है।

खाने-पीने की वो गलतियां जो आपकी कमज़ोरी को दोगुना कर देती हैं 

हम अक्सर जाने-अनजाने में कुछ ऐसा खा या पी लेते हैं जो हमारी पीरियड्स की परेशानी को कई गुना बढ़ा देता है:

  • खाली पेट चाय-कॉफी पीना: इससे शरीर में भयंकर एसिडिटी और डिहाइड्रेशन होता है, जो क्रैम्प्स और बेचैनी को और बढ़ा देता है।
  • ज़्यादा नमक वाला खाना (चिप्स/जंक फूड): नमक शरीर में पानी को रोक लेता है (Water retention), जिससे पेट फूलता है और शरीर भारी-भारी लगने लगता है।
  • बहुत ज़्यादा मीठा या चॉकलेट्स: ये एकदम से एनर्जी तो देते हैं, लेकिन थोड़ी ही देर में शुगर लेवल क्रैश हो जाता है और आप पहले से भी ज़्यादा थका हुआ महसूस करती हैं।
  • ठंडा पानी या कोल्ड ड्रिंक्स: ये गर्भाशय की नसों को सिकोड़ देते हैं, जिससे पुराना खून बाहर निकलने में दिक्कत होती है और दर्द बढ़ जाता है।
  • मैदा और पैकेटबंद खाना: यह पचने में भारी होता है, जिससे सारी ऊर्जा पेट की तरफ चली जाती है और सुस्ती छा जाती है।

पीरियड्स का दर्द ही नहीं, वो अंदरूनी थकान भी जो हिम्मत तोड़ देती है 

कई बार लड़कियाँ सब कुछ सही करती हैं, फिर भी कुछ दूसरी छुपी हुई बीमारियों की वजह से पीरियड्स बहुत थका देने वाले हो जाते हैं:

  • थायराइड (Thyroid): थायराइड ग्रंथि के धीमे पड़ने से पूरा मेटाबॉलिज़्म सुस्त हो जाता है, जिससे हमेशा नींद आती है और पीरियड्स इरेगुलर हो जाते हैं।
  • विटामिन डी और बी12 की कमी: इन विटामिन्स की कमी से हड्डियाँ दुखने लगती हैं, नसों में कमज़ोरी आती है और माहवारी में चक्कर आने लगते हैं।
  • लो ब्लड प्रेशर: पीरियड्स के दौरान ब्लड फ्लो कम होने से बीपी गिर सकता है, जिससे आँखों के सामने अंधेरा छाना और भयंकर सुस्ती होती है।
  • खराब गट हेल्थ (कमज़ोर आंतें): अगर आपका पेट पहले से ही खराब रहता है, तो पीरियड्स में शरीर ज़रूरी विटामिन्स को सोख ही नहीं पाता।

पीरियड्स के दिनों को आसान बनाने के लिए लाइफस्टाइल में क्या बदलें? 

अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कुछ छोटे-छोटे बदलाव करके आप अपनी माहवारी को बहुत आरामदायक बना सकती हैं:

  • नींद से समझौता न करें: उन दिनों में कम से कम 8 से 9 घंटे की गहरी नींद लें ताकि शरीर खुद को अंदर से रिपेयर कर सके।
  • हल्की स्ट्रेचिंग करें: भारी जिम के बजाय बटरफ्लाई पोज़ या चाइल्ड पोज़ (Yoga) करें, इससे पेल्विक एरिया की जकड़न खुल जाती है।
  • गरम तासीर का खाना खाएं: सूप, खिचड़ी या दलिया जैसी गर्म और आसानी से पचने वाली चीज़ें खाएं जो पेट पर भारी न पड़ें।
  • पैरों को गर्म रखें: नंगे पैर ठंडे फर्श पर न चलें, जुराबें पहनकर रहें, क्योंकि पैरों की ठंडक सीधे गर्भाशय तक पहुँचकर दर्द बढ़ाती है।

आयुर्वेद माहवारी की इस परेशानी को जड़ से कैसे मिटाता है? 

आयुर्वेद सिर्फ दर्द को नहीं दबाता, बल्कि यह पता लगाता है कि आपकी माहवारी इतनी कष्टदायक क्यों हो रही है। आयुर्वेद यह मानता है कि माहवारी महिलाओं के शरीर के लिए एक प्राकृतिक डिटॉक्स प्रक्रिया है। इसमें सबसे पहले डॉक्टर आपकी प्रकृति देखकर आपके दोष (मुख्यतः वात) को बैलेंस करते हैं। शरीर की अंदरूनी सफाई और ताकत के लिए 'बस्ती कर्म' या औषधीय तेलों का इस्तेमाल किया जाता है। आपका पूरा डाइट प्लान ऐसे सेट किया जाता है जो शरीर में गर्माहट लाए और खून की कमी को पूरा करे, जिससे शरीर अगली माहवारी के लिए पहले से ही मज़बूत हो जाता है।

डॉक्टर को कब दिखाएं? 

घरेलू उपाय अपनाने के बाद भी अगर आपकी थकावट और कमज़ोरी जानलेवा महसूस हो रही है, तो आपको तुरंत अपनी गायनेकोलॉजिस्ट से मिलना चाहिए:

  • जब आपको पीरियड्स में लगातार बुखार रहने लगे और शरीर बुरी तरह से कांपने लगे (यह इन्फेक्शन का संकेत हो सकता है)।
  • ब्लीडिंग इतनी ज़्यादा हो कि हर घंटे आपको पैड बदलना पड़े और खून के बड़े-बड़े थक्के (Clots) आने लगें।
  • चक्कर खाकर बेहोशी आने लगे या आपकी साँस बहुत ज़्यादा फूलने लगे।
  • माहवारी खत्म होने के कई दिनों बाद भी पेट के निचले हिस्से में चाकू चुभने जैसा भयंकर दर्द बना रहे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक इलाज में क्या फर्क है?

पहलू आधुनिक चिकित्सा (एलोपैथी) आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
उपचार का मुख्य फोकस दर्द, हार्मोनल असंतुलन और अन्य चिकित्सीय कारणों का वैज्ञानिक उपचार करना। शरीर के संतुलन और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाने पर ध्यान।
उपचार का तरीका दर्द निवारक दवाइयाँ, हार्मोनल उपचार, सप्लीमेंट्स और अन्य चिकित्सकीय उपाय। जड़ी-बूटियाँ, पंचकर्म, आहार-विहार, योग और पारंपरिक उपचार।
बीमारी को देखने का दृष्टिकोण हार्मोन, प्रजनन तंत्र और अन्य संभावित कारणों का चिकित्सकीय मूल्यांकन। शरीर के संतुलन, पाचन और जीवनशैली को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
असर होने की गति कई उपचार अपेक्षाकृत जल्दी राहत दे सकते हैं। प्रभाव धीरे-धीरे दिखाई दे सकता है और नियमित पालन पर आधारित होता है।
दीर्घकालिक दृष्टिकोण रोग नियंत्रण, लक्षणों का प्रबंधन और आवश्यक फॉलो-अप पर जोर। संतुलित आहार, दिनचर्या और स्वस्थ जीवनशैली के माध्यम से दीर्घकालिक स्वास्थ्य बनाए रखने का प्रयास।

निष्कर्ष: 

हमेशा याद रखें कि माहवारी कोई बीमारी नहीं है, बल्कि यह एक औरत के शरीर की वो अद्भुत ताकत है जो उसे जीवन देने के काबिल बनाती है। जब भी पीरियड्स के दौरान आपका शरीर थकान से चूर होने लगे, तो उसे कोसने के बजाय उसकी आवाज़ को सुनें। यह प्रकृति का आपको रुकने और खुद पर ध्यान देने का इशारा है। अपनी इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में खुद के लिए थोड़ा सा वक्त चुराएँ। अपने खानपान में पौष्टिक चीज़ें शामिल करें, खुद को भरपूर आराम दें और मानसिक तनाव को दूर रखें। जब आप अपने शरीर की कद्र करेंगी और उसे सही पोषण देंगी, तो यकीनन आपके पीरियड्स के वो दिन भी पूरी तरह से आसान और सुखद गुज़रेंगे।

References:

https://www.who.int/news/item/22-06-2022-who-statement-on-menstrual-health-and-rights

https://www.ncbi.nlm.nih.gov/books/NBK279054/

https://www.who.int/news-room/fact-sheets/detail/menstrual-health

https://www.healthline.com/health/womens-health/stages-of-menstrual-cycle

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहाने से कोई नुकसान नहीं है, बल्कि गुनगुने पानी से नहाने से माँसपेशियों की जकड़न खुलती है। बस ठंडे पानी से बाल धोने से बचें क्योंकि यह शरीर के तापमान को अचानक गिरा देता है, जिससे दर्द बढ़ सकता है।

हाँ, पपीते और अनानास में गर्माहट पैदा करने वाले एंजाइम होते हैं जो गर्भाशय को सिकोड़ते हैं। अगर इन्हें पीरियड्स के दौरान ज़्यादा खाया जाए, तो ब्लीडिंग और क्रैम्प्स दोनों तेज़ हो सकते हैं।

ऑर्गेज़्म के दौरान शरीर से 'एंडोर्फिन' नाम का फील-गुड हॉर्मोन रिलीज़ होता है, जो एक प्राकृतिक पेनकिलर का काम करता है और मूड को रिलैक्स करके दर्द में आराम दिला सकता है।

 यह प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन के बढ़ने की वजह से होता है। यह हॉर्मोन शरीर में पानी को रोक लेता है, जिससे स्तनों की दूध बनाने वाली ग्रंथियाँ सूज जाती हैं और भारीपन महसूस होता है।

मेंस्ट्रुअल कप शरीर की अंदरूनी एनर्जी को तो नहीं बढ़ाता, लेकिन बार-बार पैड बदलने के झंझट, लीकेज के डर और रैशेज़ से छुटकारा दिलाकर मानसिक शांति ज़रूर देता है, जिससे चिड़चिड़ापन कम होता है।

हाँ, यह पूरी तरह सुरक्षित है। माहवारी का आपकी इम्यूनिटी या वैक्सीन के असर से कोई लेना-देना नहीं होता। बस वैक्सीन लगने के बाद हल्की सुस्ती आ सकती है जो एकदम नॉर्मल है।

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर का मेटाबॉलिज़्म धीमा हो जाता है और हॉर्मोन्स (पेरीमेनोपॉज़ के कारण) तेज़ी से बदलने लगते हैं, जिससे रिकवरी में ज़्यादा समय लगता है और थकावट बढ़ जाती है।

हाँ, इसे 'एमेनोरिया' कहा जाता है। जब शरीर का फैट बहुत ज़्यादा कम हो जाता है और स्ट्रेस लेवल हाई रहता है, तो दिमाग गर्भाशय को सिग्नल देना बंद कर देता है, जिससे पीरियड्स रुक जाते हैं।

अक्सर डिलीवरी के बाद गर्भाशय फैल जाता है और हॉर्मोन्स पूरी तरह से रीसेट हो जाते हैं। इसलिए कई महिलाओं को पहले के मुकाबले क्रैम्प्स कम महसूस होते हैं, लेकिन शरीर कमज़ोर होने के कारण थकान ज़्यादा लग सकती है।

यह कोई भ्रम नहीं है। हॉर्मोन्स के बदलाव के कारण शरीर बहुत सारा पानी (Water retention) जमा कर लेता है और गैस की वजह से पेट फूल जाता है, जिससे वज़न मशीन पर 1-2 किलो ज़्यादा दिख सकता है। पीरियड्स खत्म होते ही यह वापस नॉर्मल हो जाता है।

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