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Working Mother को 35 के बाद Joint Pain - Hormones का असली रोल

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 28 May, 2026
  • category-iconUpdated on 13 Jun, 2026
  • category-iconWomen's Health
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35 की उम्र पार करते ही अक्सर वर्किंग मदर्स (कामकाजी माताओं) को घुटनों और जोड़ों में दर्द, जकड़न और भारीपन सताने लगता है। दिनभर का ऑफिस, घर की भागदौड़, बच्चों की ज़िम्मेदारी और खुद के लिए आराम का ना होना ये सब शरीर को अंदर ही अंदर थका देते हैं।

इस उम्र में शरीर के हार्मोन्स भी तेज़ी से बदलने लगते हैं। औरतों के शरीर में जब ज़रूरी हार्मोन्स कम होते हैं, तो हड्डियों और जोड़ों की ग्रीस (चिकनाई) कम होने लगती है, जिससे उठते-बैठते दर्द होता है। आयुर्वेद साफ कहता है कि यह सिर्फ 'उम्र का तकाज़ा' नहीं है। असल में यह शरीर में 'वात' (हवा) के भड़कने, नसों के सूखने और सही डाइट न मिलने का नतीजा है। अगर सही समय पर रूटीन और खान-पान में सुधार लिया जाए, तो इस परेशानी को आसानी से दूर भगाया जा सकता है।

35 के बाद शरीर में क्या बदलाव शुरू होते हैं?

35 का आंकड़ा पार करते ही शरीर में कई बदलाव आने लगते हैं। यह सब रातों-रात नहीं होता, बल्कि शरीर धीरे-धीरे कुछ इशारे देता है:

  • एनर्जी डाउन होना: शरीर की एनर्जी बनाने की मशीन (मेटाबॉलिज़्म) सुस्त पड़ने लगती है। इसलिए थोड़ा सा काम करते ही थकावट होने लगती है।
  • मसल्स की रिकवरी में देरी: पहले दिनभर काम करके रात को सोकर सुबह एकदम फ्रेश उठते थे, लेकिन अब शरीर को थकावट से उबरने में ज्यादा टाइम लगता है।
  • हार्मोन्स का ऊपर-नीचे होना: शरीर के हार्मोन्स तेज़ी से बदलने लगते हैं, जिसका सीधा असर मूड और शारीरिक ताक़त पर पड़ता है।
  • जोड़ों की लचक कम होना: घुटनों और जोड़ों की फ्लेक्सिबिलिटी (लचक) कम होने लगती है। उठने-बैठने में शरीर कुछ जकड़ा हुआ सा महसूस होता है।
  • टेंशन का सीधा असर: अब दिमागी और शारीरिक टेंशन को शरीर पहले की तरह आसानी से नहीं झेल पाता, उसका सीधा असर आपकी सेहत और जोड़ों पर दिखता है।

कामकाजी माताओं की जीवनशैली और शरीर पर दबाव 

एक वर्किंग मदर की ज़िंदगी किसी मशीन से कम नहीं होती। ऑफिस की डेडलाइन्स, घर का राशन, बच्चों का होमवर्क और लगातार भागदौड़ इन सबके बीच खुद के आराम के लिए कोई वक्त ही नहीं बचता। हर वक्त की टेंशन और शारीरिक थकावट का सारा बोझ सीधा जोड़ों और मांसपेशियों पर पड़ता है। धीरे-धीरे शरीर टूटने लगता है और जोड़ों में जकड़न आ जाती है। यह कोई आम थकावट नहीं है; यह शरीर के अंदर की 'बैटरी' खत्म होने का पक्का इशारा है, जो आगे चलकर जोड़ों के दर्द की सबसे बड़ी वजह बनता है।

जोड़ों का दर्द आखिर शुरू कैसे होता है? 

जोड़ों का दर्द कोई अचानक होने वाला हादसा नहीं है। यह धीरे-धीरे पैर पसारता है। शुरू में शरीर बहुत छोटे-छोटे अलार्म बजाता है, जिन्हें हम अक्सर 'काम की थकान' समझकर टाल देते हैं:

  • हल्की जकड़न: शरीर में अजीब सी जकड़न रहना, खासकर जब आप आराम करके उठें।
  • सुबह की अकड़न (Morning Stiffness): सुबह सोकर उठने पर जोड़ों में ऐसा भारीपन और खिंचाव लगता है जैसे किसी ने आपको जकड़ रखा हो।
  • सीढ़ियां चढ़ने में आफत: सीढ़ियां चढ़ते या उतरते वक्त घुटनों में मीठा-मीठा दर्द और अजीब सा दबाव महसूस होना।
  • लगातार बैठने के बाद दर्द: ऑफिस की कुर्सी पर घंटों बैठने के बाद जब अचानक उठें, तो घुटने और कमर सीधी करने में जान निकलना।
  • चलने पर दर्द: थोड़ी देर तक ज्यादा पैदल चलने पर टखनों या घुटनों में दर्द होने लगना।
  • कट-कट की आवाज़: उठते-बैठते समय घुटनों से कट-कट या चटकने की आवाज़ें आती हैं।
  • बैटरी जल्दी डाउन होना: जरा सा काम करते ही शरीर का पूरी तरह से पस्त हो जाना।
  • मौसम के साथ दर्द: सर्दियां आने पर या मौसम में नमी बढ़ते ही जोड़ों का दर्द बढ़ जाना।

शुरुआती संकेत जिन्हें अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है 

शुरुआत में शरीर बहुत हलके इशारे देता है। हम अक्सर इन्हें 'बढ़ती उम्र' या 'आम थकावट' मानकर इग्नोर कर देते हैं, लेकिन यही आगे चलकर बड़ी बीमारी बन जाते हैं:

  • सुबह उठने पर अकड़न: बिस्तर से पैर नीचे रखते ही एड़ियों या घुटनों में भारी खिंचाव महसूस होना।
  • घुटनों का हल्का दर्द: ज़मीन पर बैठने या सीढ़ियां चढ़ने पर घुटनों पर दबाव पड़ना।
  • कुर्सी से उठने में दिक्कत: एक ही पोज़िशन में लंबे समय तक बैठने के बाद शरीर सीधा करने में खिंचाव आना।
  • रूटीन काम के बाद भारीपन: घर के छोटे-मोटे काम निपटाने के बाद ही पूरे बदन का टूट जाना।
  • पैदल चलने में परेशानी: थोड़ी दूर चलने पर ही पैरों की पिंडलियों या घुटनों में अजीब सा दर्द होना।

किन कारणों से 35 की उम्र के बाद कामकाजी माताओं में जोड़ों का दर्द शुरू हो सकता है? 

आखिर ऐसा क्या होता है कि 35 पार करते ही वर्किंग मदर्स के शरीर में दर्द घर कर जाता है? इसके पीछे हमारी ही कुछ मजबूरियां और गलत आदतें ज़िम्मेदार हैं:

  • हार्मोन्स का खेल: उम्र के साथ शरीर में हार्मोन्स बदलने लगते हैं। इससे हड्डियों को बांधे रखने वाली ग्रीस और लचक दोनों कम हो जाती हैं।
  • हर वक्त की भागदौड़ और टेंशन: घर और ऑफिस दोनों को परफेक्ट रखने के चक्कर में शरीर हमेशा एक प्रेशर कुकर की तरह दबाव में रहता है।
  • नींद की भारी कमी: रात को नींद पूरी न होने से शरीर खुद को 'रिपेयर' नहीं कर पाता, जिससे सुबह उठने पर जकड़न बढ़ती जाती है।
  • एक ही पोज़िशन में रहना: ऑफिस में घंटों कुर्सी पर जमे रहना या घर के कामों में लगातार खड़े रहना ये दोनों बातें जोड़ों का सत्यानाश कर देती हैं।
  • डाइट में कमी: सबके टिफिन पैक करने के चक्कर में खुद का खाना भूल जाना। सही खुराक (कैल्शियम/विटामिन) न मिलने से हड्डियां खोखली होने लगती हैं।
  • वर्कआउट का समय न मिलना: इतने बिज़ी रूटीन में कसरत के लिए वक्त ही नहीं बचता, जिससे जोड़ों में 'ज़ंग' लगने लगती है और वो जाम हो जाते हैं।
  • अंदरूनी ताक़त खत्म होना: लगातार काम और टेंशन के कारण शरीर अंदर से कमज़ोर पड़ जाता है, और इसीलिए दर्द बहुत जल्दी पकड़ लेता है।

आयुर्वेद में जोड़ों के दर्द को कैसे समझा जाता है? 

आयुर्वेद में जोड़ों के दर्द को 'संधिगत वात' कहा जाता है। आसान भाषा में समझें तो जब शरीर में वात (हवा) बेकाबू हो जाता है, तो जोड़ों के बीच की ग्रीस (चिकनाई) सूखने लगती है। हड्डियां आपस में रगड़ खाने लगती हैं, और वहीं से कटकट की आवाज़, सूजन, जकड़न और दर्द शुरू होता है।

यह सिर्फ 'बढ़ती उम्र' का नतीजा नहीं है। बेवक्त खाना, बहुत कम पानी पीना, फ्रिज का ठंडा और बासी खाना, हर वक्त की टेंशन और दिनभर एक ही जगह बैठे रहना ये सब इसके असली विलेन हैं। जब शरीर को सही खुराक और नमी नहीं मिलती, तो जोड़ों का सूखना और दर्द होना तय है।

आयुर्वेद का इलाज करने का तरीका 

आयुर्वेद जोड़ों के दर्द को सिर्फ हड्डियों की बीमारी नहीं मानता। यह शरीर में भड़के हुए वात, खराब हाज़मे और बिगड़े हुए रूटीन का सीधा नतीजा है:

  • असली जड़ पर वार: आयुर्वेद सिर्फ पेनकिलर देकर दर्द को सुन्न नहीं करता। दर्द क्यों है? टेंशन है, नींद पूरी नहीं हुई या खाना गलत है? पहले उस असल वजह को पकड़ा और ठीक किया जाता है।
  • वात और सूखेपन का इलाज: बढ़ा हुआ वात ही जोड़ों को सुखाता और जकड़ता है। इसलिए शरीर को अंदर से चिकनाई (नमी) और आराम देने वाले तरीके अपनाए जाते हैं।
  • जोड़ों को अंदरूनी ताक़त: घुटनों और जोड़ों को अंदर से फौलादी बनाया जाता है ताकि आप बिना दर्द के आराम से उठ-बैठ और चल-फिर सकें।
  • पाचन ठीक करना: अगर खाना पचेगा ही नहीं, तो हड्डियों को ताक़त कहाँ से मिलेगी? इसलिए पेट की आग (पाचन) को तेज़ करके शरीर का एनर्जी लेवल बढ़ाया जाता है।
  • रूटीन सुधारना: कुर्सी पर चिपके रहना, रात-रात भर जागना, टेंशन लेना और ठंडी चीज़ें खाना बंद करके लाइफस्टाइल को सुधारा जाता है।

दर्द वाले जोड़ों को सुकून देने वाली खास आयुर्वेदिक थेरेपी 

इन पुराने और आज़माए हुए देसी तरीकों का बस एक ही टारगेट है आपके दुखते और थके हुए जोड़ों को रिलैक्स करना और जकड़न को मोम की तरह पिघला देना:

  • अभ्यंग (तेल की चंपी): जड़ी-बूटियों में पके हुए हल्के गरम तेल से जब पूरे बदन की मालिश की जाती है, तो सूखे जोड़ों को ज़बरदस्त नमी मिलती है। इससे शरीर की सारी जकड़न मिनटों में ही छूमंतर हो जाती है।
  • स्वेदन (भाप लेना): हल्की गर्माहट वाली भाप जब स्किन के अंदर जाती है, तो शरीर का भारीपन और सालों पुरानी अकड़न बिल्कुल बर्फ की तरह पिघलने लगती है।
  • योग और गहरी सांसें: दिन में थोड़ा वक्त निकालकर हल्की-फुल्की स्ट्रेचिंग और लंबी सांसें लेने से न सिर्फ शरीर की लचक वापस लौटती है, बल्कि दिमाग की सारी टेंशन भी उड़ जाती है।

डाइट (खान-पान) में क्या-क्या बदलाव करें? 

जोड़ों के दर्द में आपका खाना ही आपकी सबसे बड़ी दवा है। डाइट ऐसी होनी चाहिए जो जोड़ों को अंदर से चिकनाई दे:

  • हल्का और जल्दी पचने वाला खाना: पेट पर बोझ डालने वाला भारी खाना बिल्कुल न खाएं। जो जल्दी पचे, वही खाएं।
  • ताज़ा और गरम खाना: फ्रिज का रखा ठंडा और बासी खाना वात को भड़काता है, इसलिए हमेशा गरम और ताज़ा खाना ही खाएं।
  • थोड़ा तिल और घी खाएं: असली देसी घी और तिल शरीर के अंदरूनी रूखेपन को दूर करके नसों को चिकनाई देते हैं।
  • हरी सब्ज़ियां और अच्छा खाना: शरीर और हड्डियों को असली ताक़त सब्ज़ियों और घर के पौष्टिक खाने से ही मिलती है।
  • ठंडी चीज़ों से तौबा करें: बर्फ वाला पानी, कोल्ड ड्रिंक या बहुत ठंडी चीज़ें दर्द और जकड़न को तुरंत बढ़ा देती हैं, इनसे दूर रहें।
  • टाइम पर खाएं: बेवक्त खाने की आदत पूरे शरीर के सिस्टम को हिला देती है। अपना एक टाइमटेबल बनाएं।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम उर्मिला राय है, मेरी उम्र 55 वर्ष है और मैं नोएडा सेक्टर 50 से हूँ। मुझे पैरों और हाथों में दर्द, घुटनों की समस्या और गैस्ट्रिक परेशानी थी। मुझे किसी ने जीवा आयुर्वेद के बारे में बताया, जिसके बाद मैंने यहाँ उपचार शुरू किया। यहाँ का ट्रीटमेंट, डाइट और लाइफस्टाइल गाइडेंस बहुत अच्छा है। थेरेपी और योग से भी मुझे काफी लाभ मिला। जीवाग्राम रहने के लिए भी बहुत अच्छी जगह है और यहाँ का वातावरण बहुत सकारात्मक है। अब मैं पहले से काफी बेहतर महसूस करती हूँ।

डॉक्टर के पास कब भागना चाहिए? 

अगर आप एक वर्किंग मदर हैं और 35 पार कर चुकी हैं, तो शरीर के इन इशारों को बिल्कुल इग्नोर न करें। तुरंत डॉक्टर के पास जाएं अगर:

  • दर्द कम होने का नाम ही न ले रहा हो और दिन-ब-दिन होता जा रहा हो।
  • सुबह उठते ही शरीर एकदम लकड़ी की तरह अकड़ जाता हो।
  • दो कदम चलने या ज़मीन पर बैठने में भी जान निकलती हो।
  • जोड़ों में सूजन आ गई हो या छूने पर गर्माहट महसूस हो।
  • दर्द की वजह से आपके रोज़ के काम (ऑफिस या घर) बुरी तरह रुकने लगें।
  • फुल रेस्ट करने के बाद भी दर्द टस से मस न हो।
  • शरीर में हर वक्त भारी थकावट और कमज़ोरी छाई रहे।

निष्कर्ष 

35 की उम्र के बाद कामकाजी माताओं में जोड़ों का दर्द सिर्फ 'उम्र का तकाज़ा' नहीं है। यह आपकी दिनभर की भागदौड़, टेंशन, नींद की कमी और शरीर के अंदरूनी बैलेंस के बिगड़ने का सीधा नतीजा है।

मॉडर्न साइंस जहां सिर्फ पेनकिलर से दर्द दबाने पर फोकस करती है, वहीं आयुर्वेद शरीर की सूखी पड़ी नसों को ग्रीस देकर वात को जड़ से शांत करने पर काम करता है। अगर आप सही टाइम पर अपना खान-पान सुधार लें, नींद पूरी लें और की टेंशन छोड़ दें, तो आप लंबे समय तक बिना किसी दर्द के एक एक्टिव और फिट लाइफ जी सकती हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हर बार जोड़ों का दर्द गंभीर बीमारी नहीं होता। कई बार यह शरीर की थकान, गलत दिनचर्या और लंबे समय तक एक ही स्थिति में काम करने का परिणाम हो सकता है। शुरुआत में यह हल्का होता है और धीरे-धीरे बढ़ सकता है। इसलिए शुरुआती संकेतों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। समय पर देखभाल से स्थिति को बेहतर किया जा सकता है।

यह समस्या केवल कामकाजी माताओं तक सीमित नहीं है। लेकिन उनके मामले में जिम्मेदारियों और तनाव के कारण संभावना अधिक हो सकती है। घर और काम दोनों को संभालने से शरीर को आराम कम मिलता है। इससे जोड़ों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

ठंडा मौसम कई लोगों में जकड़न और दर्द को बढ़ा सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ठंड से शरीर में सूखापन और कठोरता बढ़ सकती है। खासकर सुबह के समय जकड़न अधिक महसूस हो सकती है। उचित गर्माहट और देखभाल से राहत मिल सकती है।

लंबे समय तक बैठकर काम करने से जोड़ों की गतिशीलता कम हो सकती है। इससे जकड़न और stiffness बढ़ने लगती है। बीच-बीच में हल्की हरकत करना ज़रूरी होता है। नियमित अंतराल पर शरीर को सक्रिय रखना लाभदायक माना जाता है।

शरीर का अधिक वज़न जोड़ों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। इससे घुटनों और कमर में दर्द की संभावना बढ़ जाती है। संतुलित वज़न बनाए रखना जोड़ों की सेहत के लिए महत्वपूर्ण है। हल्की गतिविधि और सही खान-पान इसमें मदद कर सकते हैं।

लंबे समय तक तनाव में रहने से शरीर की मांसपेशियां सख्त हो सकती हैं। इससे दर्द महसूस करने की संवेदनशीलता बढ़ जाती है। तनाव शरीर के संतुलन को भी प्रभावित करता है। मानसिक शांति जोड़ों के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

शुरुआती जकड़न को नज़रअंदाज़ करना सही नहीं माना जाता। यह शरीर का शुरुआती संकेत हो सकता है कि संतुलन बिगड़ रहा है। समय पर ध्यान देने से समस्या बढ़ने से रोकी जा सकती है। नियमित देखभाल से राहत मिल सकती है।

उम्र के साथ शरीर में हार्मोन स्तर में बदलाव आ सकता है। इसका असर जोड़ों की लचीलापन और ताकत पर पड़ सकता है। इससे दर्द और जकड़न महसूस हो सकती है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।

हल्की और नियमित गतिविधि जोड़ों के लिए लाभदायक हो सकती है। इससे शरीर की गतिशीलता बनी रहती है और जकड़न कम हो सकती है। बहुत अधिक भारी व्यायाम से बचना चाहिए। संतुलित गतिविधि सबसे अच्छा विकल्प माना जाता है।

शुरुआती अवस्था में सही देखभाल से काफी सुधार संभव है। जीवनशैली में बदलाव इसका बड़ा हिस्सा होता है। नियमित दिनचर्या और संतुलन से लक्षण नियंत्रित हो सकते हैं। हर व्यक्ति में सुधार की गति अलग हो सकती है।

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