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Bone Spurs (हड्डी पर अतिरिक्त वृद्धि) — Painful क्यों होते हैं? आयुर्वेदिक उपचार

  • category-iconPublished on 08 May, 2026
  • category-iconUpdated on 08 May, 2026
  • category-iconJoint Health
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आजकल जोड़ों के दर्द और गलत पॉश्चर के कारण 'बोन स्पर्स' (Bone Spurs) यानी हड्डी पर अतिरिक्त वृद्धि की समस्या तेज़ी से बढ़ रही है। लोग इस भयंकर दर्द से बचने के लिए रोज़ाना पेनकिलर या स्टेरॉयड इंजेक्शन का इस्तेमाल करते हैं। ये दवाएँ कुछ समय के लिए नसों की सूजन को दबा देती हैं, लेकिन असर खत्म होते ही दर्द वापस आ जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, यह 'अस्थिगत वात' का बिगड़ा हुआ रूप है जहाँ शरीर में वात दोष बढ़कर जोड़ों की प्राकृतिक चिकनाई सुखा देता है। घर्षण से शरीर बचाव के लिए अतिरिक्त हड्डी का निर्माण करता है।

Bone Spurs (हड्डी पर अतिरिक्त वृद्धि) क्या है?

बोन स्पर्स (Osteophytes) हड्डियों के किनारों पर विकसित होने वाली चिकनी, कठोर और अतिरिक्त हड्डियाँ होती हैं। आमतौर पर ये शरीर के जोड़ों (जहाँ दो हड्डियाँ मिलती हैं) या रीढ़ की हड्डी में बनते हैं। एक सामान्य इंसान में हड्डियाँ और कार्टिलेज बिना किसी रुकावट के काम करते हैं, लेकिन जब जोड़ों की कार्टिलेज घिसने लगती है, तो शरीर उस जगह की मरम्मत करने और उसे स्थिर (Stabilize) करने के लिए नई हड्डी बनाने लगता है, जिसे 'बोन स्पर' कहते हैं। ये स्पर्स खुद में दर्दनाक नहीं होते, लेकिन जब ये अतिरिक्त हड्डियाँ आस-पास की नसों, माँसपेशियों या लिगामेंट्स से रगड़ खाती हैं, तो भयंकर दर्द और सूजन पैदा करती हैं। आधुनिक चिकित्सा में इसके लिए पेनकिलर या अंततः सर्जरी का रास्ता अपनाया जाता है, जो बीमारी की जड़ (वात और घर्षण) को ठीक नहीं करता।

Bone Spurs और जोड़ों की तकलीफ से जुड़ी मुख्य बीमारियाँ कौन सी हैं?

हड्डियों की वृद्धि और दर्द से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ देखी जाती हैं:

  • ऑस्टियोआर्थराइटिस (Osteoarthritis): बोन स्पर्स का सबसे मुख्य कारण यही है, जहाँ उम्र या घिसाव के कारण जोड़ों (जैसे घुटनों) की कार्टिलेज खत्म हो जाती है।
  • प्लांटर फैसीसाइटिस (Heel Spurs): एड़ी की हड्डी पर नीचे की तरफ एक नुकीली हड्डी का बढ़ जाना, जिससे सुबह पैर ज़मीन पर रखते ही भयंकर दर्द होता है।
  • सर्वाइकल स्पॉन्डिलोसिस (Cervical Spondylosis): गर्दन की रीढ़ की हड्डी में स्पर्स बनना, जो नसों को दबाकर हाथों में सुन्नपन पैदा करते हैं।
  • लम्बर स्पॉन्डिलोसिस (Lumbar Spondylosis): कमर के निचले हिस्से की रीढ़ में हड्डी का बढ़ना, जिससे पैरों में साइटिका (Sciatica) का दर्द जाने लगता है।

Bone Spurs के लक्षण और संकेत

पेनकिलर से आराम मिलने के बाद दर्द का बार-बार लौट आना कई आंतरिक स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • जोड़ों में दर्द और जकड़न: प्रभावित जोड़ को हिलाने पर भारी दर्द होना और उसकी प्राकृतिक मूवमेंट रुक जाना।
  • सुन्नपन और झुनझुनी: अगर रीढ़ की हड्डी का स्पर किसी नस (Nerve) को दबा रहा है, तो बाँहों या पैरों में सुई चुभने जैसी झुनझुनी होती है।
  • त्वचा के नीचे गाँठ: कई बार उँगलियों या जोड़ों के पास ये अतिरिक्त हड्डियाँ त्वचा के नीचे एक कठोर गाँठ के रूप में महसूस होती हैं।
  • मांसपेशियों में कमज़ोरी: नस दबने के कारण हाथों या पैरों से किसी चीज़ को पकड़ने की ताक़त कम हो जाना।
  • दवा का असर खत्म होते ही वापसी: पेनकिलर का असर खत्म होते ही कुछ ही घंटों के भीतर भयंकर दर्द और जकड़न का फिर से शुरू हो जाना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

हड्डी बढ़ने और दर्द बार-बार लौटने के कारण (वात और आम वृद्धि)

बोन स्पर्स बनने और दर्द के पीछे सिर्फ उम्र का बढ़ना कारण नहीं है, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं:

  • अस्थिगत वात का भड़कना: गलत खान-पान और रूखी जीवनशैली से शरीर में 'वात दोष' भड़कता है, जो जोड़ों की चिकनाई (श्लेषक कफ) को सुखा देता है।
  • कार्टिलेज का घिसना: भारी वज़न, चोट या मोटापे के कारण दो हड्डियों के बीच का कुशन (Cartilage) घिस जाता है, जिससे हड्डियाँ आपस में रगड़ खाती हैं।
  • गलत पॉश्चर (Posture): लैपटॉप या फोन पर लगातार गलत तरीके से बैठने से रीढ़ की हड्डी पर असामान्य दबाव पड़ता है, जिससे वहाँ स्पर्स बनने लगते हैं।
  • पोषण की कमी: शरीर में कैल्शियम का सही से अवशोषण (Absorption) न होना और जठराग्नि कमज़ोर होना।
  • पेनकिलर पर निर्भरता: रोज़ाना दर्द की गोली खाने से शरीर प्राकृतिक रूप से जोड़ों को पोषण देना भूल जाता है।

Bone Spurs के जोखिम और गंभीर जटिलताएँ

इस अतिरिक्त हड्डी और दर्द को अगर अनदेखा किया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • नसों का स्थायी नुकसान: रीढ़ की हड्डी में बढ़ा हुआ स्पर अगर नस को पूरी तरह दबा दे, तो हाथों या पैरों में लकवा (Paralysis) जैसी स्थिति आ सकती है।
  • चलने-फिरने से लाचारी: घुटनों या एड़ी का स्पर इंसान का चलना-फिरना पूरी तरह बंद कर सकता है।
  • हड्डी टूटने का खतरा: कमज़ोर हड्डियों के ऊपर बनी ये अतिरिक्त वृद्धि कई बार दबाव पड़ने पर टूटकर जोड़ों के बीच फँस सकती है।
  • मानसिक तनाव और अवसाद: लगातार दर्द के डर से इंसान का सामान्य काम करना मुश्किल हो जाता है, जिससे वह डिप्रेशन का शिकार हो जाता है।

समय पर डॉक्टर से परामर्श लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

Bone Spurs (अस्थिगत वात) पर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से बोन स्पर्स बनना सिर्फ एक यांत्रिक (Mechanical) दिक्कत नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'अस्थिगत वात' और 'वात व्याधि' की श्रेणी में रखा जाता है। जोड़ों के बीच एक तरल पदार्थ होता है जिसे आयुर्वेद में 'श्लेषक कफ' कहा जाता है। जब शरीर में वात दोष बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है, तो वह अपने रूखे गुण (Dryness) के कारण इस श्लेषक कफ को सुखा देता है। चिकनाई खत्म होने से हड्डियों में भयंकर घर्षण (Friction) होता है। शरीर इस घर्षण से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए अतिरिक्त कैल्शियम वहाँ जमा करने लगता है, जो बोन स्पर का रूप ले लेता है। आयुर्वेद में बस दर्द को सुन्न करना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि वात शांत हो, जोड़ों को अंदर से 'स्नेहन' (चिकनाई) मिले और बीमारी आगे बढ़ना रुके।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण क्या है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति का शरीर और स्वास्थ्य अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके शरीर के अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: दर्द उठने के समय, सुन्नपन और जोड़ों की जकड़न की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: एक्स-रे रिपोर्ट और रोज़ाना खायी जाने वाली पेनकिलर का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • जीवनशैली का विश्लेषण: रोज़ाना के खान-पान, पॉश्चर और वज़न को परखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: वात असंतुलन और जोड़ों के रूखेपन को पकड़ने के बाद ही हड्डियों को पोषण देने का सबसे सटीक इलाज शुरू किया जाता है।

वात शांत करने और Bone Spurs का दर्द दूर करने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में नसों को ताक़त देने, वात शांत करने और जोड़ों को चिकनाई देने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • शल्लकी (Shallaki): यह बोन स्पर्स के दर्द और जोड़ों की सूजन को प्राकृतिक रूप से खत्म करने की सबसे शक्तिशाली जड़ी-बूटी है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): यह नसों की कमज़ोरी को दूर करती है और दबी हुई नसों के कारण होने वाले सुन्नपन में नई ताक़त देती है।
  • गुग्गुल (Guggulu): यह शरीर में वात और 'आम' (टॉक्सिन्स) को पिघलाकर बाहर निकालता है और हड्डियों को पोषण देता है।
  • शिग्रु (Shigru): यह हड्डियों के घर्षण से पैदा हुई भारी सूजन को काटता है और जोड़ों में रक्त संचार बढ़ाता है।

हड्डियों को पोषण देने के लिए पंचकर्म: वात शमन और स्नेहन

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, जोड़ों का रूखापन खत्म करने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • बस्ती और अभ्यंग: जब दर्द सालों पुराना हो और डॉक्टर ने सर्जरी की सलाह दी हो, तो बस्ती जैसी पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय: यह 7 से 21 दिनों तक चलने वाली वात नाड़ियों की गहरी चिकित्सा की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • जोड़ों को गहरा पोषण (बस्ती): जानु बस्ती (घुटनों के लिए), ग्रीवा बस्ती (गर्दन के लिए) या कटी बस्ती (कमर के लिए) में औषधीय तेलों का घेरा बनाकर जोड़ों को गहरी चिकनाई (स्नेहन) दी जाती है।
  • दर्द निवारण के लिए पत्र पोटली स्वेदन: औषधीय पत्तों की पोटली बनाकर प्रभावित जोड़ की सिकाई की जाती है, जिससे जकड़न पिघलती है और स्पर का दर्द शांत होता है।

Bone Spurs के रोगी के लिए सही और शुद्ध आहार

जोड़ों के रूखेपन को दूर करने के लिए वात दोष को शांत करने वाला, स्निग्ध और गर्म आहार चुनना महत्वपूर्ण है:

क्या खाएँ?

  • गर्म और स्निग्ध भोजन: भोजन में शुद्ध देसी घी, तिल के तेल और मेवों का इस्तेमाल बढ़ाएँ, यह वात को शांत करने और जोड़ों में चिकनाई लाने में मदद करते हैं।
  • हल्दी और दूध: रात को सोते समय गर्म दूध में चुटकी भर हल्दी डालकर पिएँ, यह सूजन को अंदर से खत्म करता है।
  • गर्म तासीर वाले मसाले: खाने में सोंठ, लहसुन, और मेथी का प्रयोग ज़रूर करें, ये दर्द को प्राकृतिक रूप से काटते हैं।

क्या न खाएँ?

  • रूखा और बादी का खाना: राजमा, छोले, मटर, और बासी खाना कभी न खाएँ, यह शरीर में तुरंत वात और गैस पैदा करता है जो दर्द को भड़काता है।
  • ठंडी और वात बढ़ाने वाली चीज़ें: आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक, फ्रिज का ठंडा पानी और बर्फ का सेवन बिल्कुल बंद कर दें।
  • मैदा और जंक फूड: पिज़्ज़ा, पैकेटबंद चीज़ों का सेवन बिल्कुल बंद कर दें, क्योंकि ये शरीर में सूजन बढ़ाते हैं।

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच कैसे होती है

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच पूरी समझ के साथ की जाती है। यहाँ कोशिश होती है कि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जाए।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी और दर्द के लक्षणों को आराम से सुना जाता है।
  • आपकी एक्स-रे रिपोर्ट और पहले इस्तेमाल किए गए स्टेरॉयड के बारे में पूछा जाता है।
  • आपके खाने-पीने और रूखी चीज़ें लेने की आदतों को समझा जाता है।
  • आपकी नींद, मानसिक तनाव और पॉश्चर की स्थिति पर ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति को जाना जाता है।
  • जोड़ों की जकड़न और नसों की कमज़ोरी को बारीकी से समझा जाता है।

इन सब चीज़ों को समझने के बाद आपके लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो हड्डियों के घर्षण को रोक सके।

जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे +919266714040 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

बोन स्पर्स की समस्या का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बीमारी और शरीर की स्थिति: ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे स्पर का आकार कितना बड़ा है और पेनकिलर पर निर्भरता कितनी ज़्यादा है।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर एड़ी या घुटने के दर्द की शुरुआत है, तो आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों में ही जकड़न कम होने लगती है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर स्पर्स सालों पुराने हैं, तो आयुर्वेद अतिरिक्त हड्डी को पूरी तरह गला तो नहीं सकता, लेकिन 6 महीने के इलाज से जोड़ों की चिकनाई वापस आ जाती है और इंसान पूरी तरह दर्द मुक्त (Asymptomatic) हो जाता है।
  • उपचार का तरीका: इस प्राकृतिक इलाज में वातनाशक जड़ी-बूटियाँ, पंचकर्म और सही व्यायाम शामिल होता है।
  • स्थायी परिणाम: पॉश्चर और डाइट का कड़ाई से पालन करने पर रगड़ खाना बंद हो जाता है और भविष्य में बोन स्पर का बढ़ना रुक जाता है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।

आधुनिक उपचार और वात-आधारित आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य पेनकिलर्स, स्टेरॉयड और सर्जरी से दर्द को दबाना वात दोष शांत कर जोड़ों की प्राकृतिक चिकनाई वापस लाना
नज़रिया Bone Spur को केवल हड्डी की अतिरिक्त वृद्धि मानना वात वृद्धि और श्लेषक कफ की कमी को मूल कारण मानना
उपचार तरीका दर्दनाशक दवाएँ, इंजेक्शन और स्पर हटाने की सर्जरी शल्लकी, गुग्गुल और प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से घर्षण कम करना
डाइट और लाइफस्टाइल आराम और दर्द कंट्रोल पर मुख्य फोकस वात-शामक आहार, तेल मालिश और संतुलित गतिविधि पर ज़ोर
लंबा असर सर्जरी के बाद भी स्पर दोबारा बनने और दर्द लौटने का खतरा प्राकृतिक रूप से दर्द में स्थायी राहत और जोड़ों की मजबूती बढ़ना

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • दर्द इतना भयंकर हो जाए कि प्रभावित जोड़ को हिलाना बिल्कुल नामुमकिन लगने लगे।
  • रीढ़ की हड्डी में स्पर के कारण हाथों या पैरों में भारी सुन्नपन आ जाए।
  • सुन्नपन के साथ-साथ मल-मूत्र (Bowel/Bladder) पर नियंत्रण खत्म होने लगे।
  • पेनकिलर खाने के बाद भी दर्द और जकड़न में कोई कमी न आ रही हो।

समय पर सलाह लेने से शरीर को लकवा या सर्जरी जैसी बड़ी जटिलताओं से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के अनुसार बोन स्पर्स (Bone Spurs) होना सिर्फ बुढ़ापे की निशानी नहीं, बल्कि यह शरीर में वात दोष के बिगड़ने और जोड़ों में भारी रूखापन आने का स्पष्ट संकेत है। जब गलत खान-पान और खराब पॉश्चर से हड्डियाँ आपस में रगड़ खाती हैं, तो शरीर खुद को बचाने के लिए यह अतिरिक्त हड्डी बनाता है। बाहरी पेनकिलर या स्टेरॉयड सिर्फ दर्द के सिग्नल को सुन्न करते हैं, लेकिन रगड़ और वात को खत्म नहीं करते। शल्लकी, अश्वगंधा जैसी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों और पंचकर्म से जोड़ों की चिकनाई को वापस लाकर इस दर्दनाक समस्या को जड़ से ठीक किया जाता है।

FAQs

आयुर्वेद अतिरिक्त बनी हुई हड्डी (Spur) को पूरी तरह गलाकर गायब नहीं कर सकता, लेकिन आयुर्वेदिक इलाज से वात शांत होता है, सूजन खत्म होती है और जोड़ों की चिकनाई वापस आ जाती है, जिससे मरीज़ बिना सर्जरी के पूरी तरह दर्द मुक्त जीवन जी सकता है।

बिल्कुल, आयुर्वेद के अनुसार जब एड़ी पर वात दोष का दबाव बढ़ता है, तो वहाँ की लिगामेंट्स में रूखापन आता है और शरीर बचाव के लिए वहाँ कैल्शियम जमा कर स्पर बना देता है।

अतिरिक्त हड्डी (Spur) अपने आप में दर्द नहीं करती। दर्द तब होता है जब यह नुकीली हड्डी आस-पास की नाज़ुक नसों, माँसपेशियों या लिगामेंट्स को लगातार रगड़ती है या दबाती है।

हाँ, वात दोष का गुण रूखा (Dry) होता है। जब यह शरीर में बढ़ता है, तो जोड़ों के बीच मौजूद 'श्लेषक कफ' (Lubrication) को सुखा देता है, जिससे हड्डियाँ आपस में घिसने लगती हैं।

नहीं, बोन स्पर कैल्शियम की कमी से नहीं बल्कि घर्षण के कारण अतिरिक्त कैल्शियम के जमाव से होता है। बिना ज़रूरत भारी कैल्शियम खाने से स्पर और तेज़ी से बढ़ सकता है।

वात दोष और जकड़न को शांत करने के लिए प्रभावित जोड़ पर गुनगुने आयुर्वेदिक तेल की मालिश के बाद गर्म सिकाई करना सबसे ज़्यादा फायदेमंद होता है।

हाँ, शल्लकी (Boswellia) में प्राकृतिक रूप से दर्द निवारक और सूजन कम करने वाले गुण होते हैं। यह बिना किसी साइड इफेक्ट के स्पर की रगड़ से होने वाले दर्द को तुरंत शांत करती है।

बिल्कुल, लगातार सिर झुकाकर काम करने से रीढ़ की हड्डी के कार्टिलेज पर असामान्य दबाव पड़ता है, जिससे वे घिसते हैं और शरीर वहाँ बोन स्पर बना लेता है।

नहीं, भारी वज़न उठाने या जिम करने से घिसे हुए जोड़ों पर और ज़्यादा दबाव पड़ेगा, जिससे स्पर तेज़ी से बढ़ेगा और दर्द भयंकर हो जाएगा। सिर्फ हल्के योगासन ही करें।

हाँ, जानु बस्ती या ग्रीवा बस्ती जैसी पंचकर्म चिकित्सा जोड़ों को गहराई तक तेल का पोषण (स्नेहन) देती है, जिससे रूखापन खत्म होता है और जकड़न व दर्द में जादुई तरीके से आराम मिलता है।

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