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Knee Pain सिर्फ उम्र की वजह से नहीं होता — Cartilage damage कब शुरू होता है

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 30 Apr, 2026
  • category-iconUpdated on 30 Apr, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5006

Knee Pain सिर्फ उम्र की वजह से नहीं होता — Cartilage damage कब शुरू होता है?

घुटनों का दर्द अक्सर एक खामोश चोर की तरह आता है। शुरुआत में यह सिर्फ एक मामूली सी 'कट-कट' की आवाज या सीढ़ियां चढ़ते समय हल्की सी कसक होती है, जिसे हम अक्सर "थकान" या "बढ़ती उम्र" का नाम देकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन हकीकत इससे कहीं अधिक गंभीर है। आपके घुटनों के बीच मौजूद वह नरम 'कुशन' जिसे कार्टिलेज (Cartilage) कहते हैं, वह 30 की उम्र के बाद ही घिसना शुरू हो सकता है। अगर आज आपने इस पर ध्यान नहीं दिया, तो कल एक छोटा कदम उठाना भी मुश्किल लगने लगेगा। अच्छी खबर यह है कि सही समय पर लिया गया फैसला न केवल इस बर्बादी को रोक सकता है, बल्कि आपके जोड़ों को फिर से जीवंत भी बना सकता है।

जोड़ों का दर्द: उम्र का तकाजा या लापरवाही?

घुटने का दर्द (Knee Pain) केवल बुजुर्गों की समस्या नहीं रह गया है। आजकल खराब जीवनशैली, पोषण की कमी और घंटों एक ही जगह बैठे रहने की वजह से युवाओं में भी कार्टिलेज डैमेज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। जब कार्टिलेज घिस जाता है, तो हड्डियां आपस में रगड़ने लगती हैं, जिससे असहनीय सूजन और अकड़न पैदा होती है। इसे नज़रअंदाज़ करने का मतलब है—भविष्य में सर्जरी या व्हीलचेयर को दावत देना। समय रहते इसका मूल कारण समझना और सही उपचार चुनना ही एकमात्र रास्ता है।

क्या है यह कार्टिलेज डैमेज (Knee Osteoarthritis)?

सरल भाषा में कहें तो, हमारे घुटने दो हड्डियों के जोड़ हैं। इन हड्डियों के सिरों पर एक चिकनी, रबर जैसी परत होती है जिसे कार्टिलेज कहते हैं। यह शॉक एब्जॉर्बर (Shock Absorber) का काम करती है। जब यह परत फटने लगती है या पतली हो जाती है, तो इसे ही मेडिकल भाषा में ऑस्टियोआर्थराइटिस या कार्टिलेज डैमेज कहा जाता है। आयुर्वेद में इसे 'संधिगत वात' कहा जाता है, जहाँ वात दोष के बढ़ने से जोड़ों का लुब्रिकेशन (स्नेहन) सूखने लगता है।

कार्टिलेज डैमेज के विभिन्न चरण: आपकी स्थिति क्या है?

कार्टिलेज का घिसना एक रात में नहीं होता, इसके मुख्य रूप से चार चरण होते हैं:

  • स्टेज 1 (शुरुआती): जोड़ों के बीच का गैप थोड़ा कम होने लगता है। कभी-कभी हल्का दर्द होता है।
  • स्टेज 2 (हल्का): सीढ़ियां चढ़ने या उकड़ू बैठने पर दर्द और 'कड़कड़' की आवाज आने लगती है।
  • स्टेज 3 (मध्यम): रोजमर्रा के काम में दर्द, सूजन और चलने में परेशानी। कार्टिलेज काफी हद तक घिस चुका होता है।
  • स्टेज 4 (गंभीर): हड्डियां आपस में टकराने लगती हैं। दर्द स्थायी हो जाता है और जोड़ों का आकार बिगड़ने लगता है।

शरीर के ये संकेत बताते हैं कि घुटने खतरे में हैं

आखिर क्यों हार मान रहे हैं आपके घुटने? (Causes)

  • वजन का अधिक होना: शरीर का हर एक्स्ट्रा किलो घुटनों पर चार गुना दबाव डालता है।
  • पुरानी चोट: बचपन या जवानी में लगी चोट जो ठीक से नहीं भरी।
  • पोषक तत्वों की कमी: कैल्शियम और विटामिन-D3 के कम स्तर।
  • गतिहीन जीवनशैली: मांसपेशियों का कमजोर होना, जिससे पूरा भार जोड़ों पर आता है।
  • वात दोष का असंतुलन: आयुर्वेद के अनुसार, शरीर में रूखापन बढ़ना।

रिस्क फैक्टर्स और संभावित जटिलताएं (Table)

रिस्क फैक्टर्स (खतरे की घंटी)

संभावित जटिलताएं (अगर इलाज न कराया)

बढ़ती उम्र (40+)

जोड़ों का पूरी तरह जाम हो जाना (Joint Rigidity)

आनुवंशिकता (Family History)

चलने-फिरने की क्षमता खो देना (Loss of Mobility)

भारी वजन उठाना या एथलेटिक गतिविधियां

हड्डियों का टेढ़ापन (Bow Legs)

मधुमेह (Diabetes) और मेटाबॉलिज्म विकार

क्रोनिक डिप्रेशन और नींद की कमी (दर्द के कारण)

महिलाओं में मेनोपॉज के बाद हार्मोनल बदलाव

सर्जरी (Knee Replacement) की मजबूरी

बीमारी की पहचान: आधुनिक और आयुर्वेदिक तरीका

आधुनिक निदान (Modern Diagnosis):

डॉक्टर आमतौर पर फिजिकल एग्जामिनेशन के बाद X-Ray, MRI या CT-Scan की सलाह देते हैं ताकि जोड़ों के बीच के गैप और कार्टिलेज की स्थिति देखी जा सके। इसके अलावा सूजन जांचने के लिए ब्लड टेस्ट भी किए जाते हैं।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण (Ayurvedic Perspective):

आयुर्वेद में केवल रिपोर्ट नहीं, बल्कि रोगी की प्रकृति देखी जाती है। चिकित्सक नाड़ी परीक्षा (Pulse Diagnosis) और अष्टविध परीक्षा के माध्यम से यह पता लगाते हैं कि शरीर में वात, पित्त या कफ में से कौन सा दोष बिगड़ा है और आम (विषाक्त तत्व) का संचय कहाँ हुआ है।

आयुर्वेद में घुटने के दर्द का मूल कारण

आयुर्वेद इसे 'संधिगत वात' मानता है। शरीर में जब 'वात' दोष (वायु) बढ़ जाता है, तो यह जोड़ों की चिकनाई (श्लेष्मक कफ) को सोख लेता है। इससे जोड़ों में रूखापन आता है और घर्षण शुरू हो जाता है। साथ ही, अगर पाचन खराब हो, तो शरीर में 'आम' (Toxins) बनने लगते हैं जो जोड़ों में जाकर जमा हो जाते हैं और दर्द व सूजन पैदा करते हैं।

जीवा आयुर्वेद का विशेष उपचार दृष्टिकोण

जीवा आयुर्वेद में हम 'One Size Fits All' पर विश्वास नहीं करते। हमारा उपचार 'आयुनीक' (Ayunique™) है, जो हर व्यक्ति के लिए कस्टमाइज्ड होता है। हमारा लक्ष्य केवल दर्द को दबाना नहीं, बल्कि:

  1. वात दोष को संतुलित करना।
  2. शरीर से विषाक्त तत्वों (आम) को बाहर निकालना।
  3. नेचुरल सप्लीमेंट्स के जरिए कार्टिलेज के पुनर्जन्म (Rejuvenation) में मदद करना।

घुटनों के लिए चमत्कारी आयुर्वेदिक जड़ी बूटियाँ

  • शल्लकी (Boswellia): यह सूजन को कम करने के लिए प्राकृतिक इबुप्रोफेन की तरह काम करती है।
  • गुग्गुल: जोड़ों के दर्द और वात को दूर करने की सबसे शक्तिशाली औषधि।
  • अश्वगंधा: मांसपेशियों को मज़बूती देता है ताकि जोड़ों पर कम भार पड़े।
  • हल्दी (Curcumin): इसमें प्राकृतिक एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं।
  • अदरक (Sonth): रक्त संचार बढ़ाता है और 'आम' को पचाता है।

राहत देने वाली विशेष आयुर्वेदिक थेरेपी (Panchakarma)

जीवा के केंद्रों पर दी जाने वाली ये थेरेपी घुटनों के लिए वरदान हैं:

  • जानु बस्ती (Janu Basti): घुटने के चारों ओर औषधीय तेल का एक घेरा बनाकर उसे गर्म तेल से भरा जाता है। यह जोड़ों को गहराई तक पोषण देता है।
  • पोटली स्वेद: जड़ी-बूटियों की पोटली से सिकाई करना जिससे सूजन तुरंत कम होती है।
  • अभ्यंग: विशेष वात-शामक तेलों से मालिश।

खान-पान: क्या खाएं और क्या बचाएं (Diet Table)

क्या खाएं (Dos)

क्या न खाएं (Don'ts)

देशी घी और तिल का तेल (सीमित मात्रा में)

बासी और ठंडा भोजन

गर्म और ताज़ा पका हुआ खाना

मैदा, जंक फूड और अधिक नमक

मेथी दाना, अदरक और लहसुन

राजमा, उड़द दाल और ठंडी तासीर वाली चीजें

अखरोट, बादाम और अलसी के बीज

कोल्ड ड्रिंक्स और आइसक्रीम

भरपूर पानी (हल्का गुनगुना)

कच्चे सलाद का अधिक सेवन (वात बढ़ाता है)

जीवा आयुर्वेद में हम मरीज़ों को कैसे समझते हैं?

जब आप जीवा में आते हैं, तो हमारी प्रक्रिया बहुत गहरी होती है। हम आपकी प्रकृति (वात, पित्त, कफ) का विश्लेषण करते हैं। आपकी जीवनशैली, मानसिक तनाव का स्तर और आपकी पाचन शक्ति की जांच की जाती है। यह संपूर्ण विश्लेषण हमें दर्द की जड़ तक ले जाता है, न कि केवल लक्षणों तक।

आपकी रिकवरी का सफर: स्टेप-बाय-स्टेप

  1. परामर्श (Consultation): विशेषज्ञ डॉक्टर के साथ विस्तृत चर्चा।
  2. दोष पहचान: आपके शरीर के असंतुलन को समझना।
  3. कस्टमाइज्ड डाइट प्लान: आपके लिए विशेष रूप से तैयार भोजन चार्ट।
  4. औषधियाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों से बनी दवाएँ।
  5. फॉलो-अप: आपकी प्रगति की निरंतर निगरानी।

उपचार का समय (Healing Timeline)

आयुर्वेद कोई जादू नहीं है, यह एक विज्ञान है। आम तौर पर, मरीज़ों को 4 से 6 हफ्तों में राहत महसूस होने लगती है। लेकिन गंभीर मामलों (स्टेज 3 या 4) में जोड़ों को मज़बूत बनाने और दीर्घकालिक राहत के लिए 6 महीने से 1 साल का समय लग सकता है।

आपको क्या परिणाम मिलेंगे?

  • घुटनों की सूजन और जकड़न में कमी।
  • सीढ़ियां चढ़ने और चलने-फिरने में सुगमता।
  • पेनकिलर्स (Painkillers) पर निर्भरता का कम होना।
  • बेहतर नींद और सक्रिय जीवनशैली।

मरीज़ों का अनुभव 

"एक समय ऐसा था जब नेब्युलाइज़र और नेज़ल स्प्रे के बिना मेरा एक दिन भी नहीं गुज़रता था। मेरा अस्थमा इतना गंभीर हो चुका था कि साँस लेना भी एक संघर्ष जैसा था। फिर मैंने टीवी पर डॉ. चौहान को देखा और जीवा आयुर्वेद से अपना इलाज शुरू करने का फैसला किया।

पिछले 6 महीनों से मैं जीवा की आयुर्वेदिक दवाएँ ले रहा हूँ और उनके बताए गए डाइट और लाइफस्टाइल प्लान का सख्ती से पालन कर रहा हूँ। नतीजा यह है कि आज मेरी दवाएँ और स्प्रे पूरी तरह बंद हो चुके हैं! मुझे नई जिंदगी देने के लिए मैं जीवा के सभी डॉक्टर्स और स्टाफ का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ।"

—-Monika Dixit

जीवा आयुर्वेद में इलाज की अनुमानित लागत

अपनी सेहत के लिए ज़रूरी आर्थिक निवेश को समझना ज़रूरी है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं की लागत में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी मेडिकल ज़रूरतों के हिसाब से सबसे सही विकल्प चुन सकें।

इलाज की लागत

जो मरीज़़ नियमित, लगातार देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और कंसल्टेशन की मासिक लागत आमतौर पर 3,000 रुपये से 3,500 रुपये के बीच होती है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित शुरुआती लागत है। अंतिम लागत मरीज़ की बीमारी की सही प्रकृति और गंभीरता पर निर्भर करती है।

प्रोटोकॉल

ज़्यादा व्यापक और व्यवस्थित तरीके के लिए, हम खास पैकेज प्रोटोकॉल देते हैं। ये प्लान शारीरिक लक्षणों और पूरी जीवनशैली में सुधार, दोनों पर ध्यान देने के लिए बनाए गए हैं। पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल की लागत में एक बार में 15,000 रुपये से 40,000 रुपये तक का पेमेंट शामिल होता है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

जिन मरीज़़ों को गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की ज़रूरत होती है, उनके लिए हमारे जीवाग्राम केंद्र बेहतरीन इलाज का अनुभव देते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में बना एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है, और यह ये सुविधाएँ देता है:

  • असली पंचकर्म थेरेपी
  • सात्विक भोजन
  • आधुनिक इलाज सेवाएँ
  • आरामदायक रहने की जगह
  • और भी कई जीवन-स्तर सुधारने वाली सुविधाएँ

जीवाग्राम में 7 दिनों के लिए पूरी तरह से समर्पित वेलनेस स्टे की लागत लगभग 1 लाख रुपये है, जो आपके शरीर और मन को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए लगातार, व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

मरीज़ जीवा आयुर्वेद पर भरोसा क्यों करते हैं?

पिछले कुछ सालों में, जीवा आयुर्वेद ने हज़ारों ऐसे मरीज़ों का भरोसा जीता है जो प्राकृतिक और पर्सनलाइज़्ड हेल्थकेयर समाधान ढूंढ रहे हैं। जीवा आयुर्वेद पर मरीज़ों के भरोसे के कुछ मुख्य कारण ये हैं:

  • बीमारी की जड़ पर आधारित इलाज

पारंपरिक इलाज के उलट, जो सिर्फ़ बीमारी के लक्षणों पर ध्यान देते हैं, आयुर्वेदिक इलाज बीमारी की जड़ को ठीक करने और शरीर में मौजूद उन अंदरूनी असंतुलनों को ठीक करने पर ज़ोर देता है जिनकी वजह से बीमारी होती है।

  • अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर

जीवा आयुर्वेद के पास अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टरों की एक बहुत बड़ी टीम है, जो किसी भी बीमारी के लिए इलाज सुझाने से पहले हर मरीज़ की स्थिति की अच्छी तरह से जांच करते हैं।

  • पर्सनलाइज़्ड "Ayunique™" इलाज का तरीका

आयुर्वेदिक इलाज बहुत ज़्यादा पर्सनलाइज़्ड होता है और हर व्यक्ति की प्रकृति और जीवनशैली के हिसाब से तैयार किया जाता है।

  • संपूर्ण इलाज

आयुर्वेदिक इलाज सिर्फ़ दवाओं तक ही सीमित नहीं है; इसमें खान-पान और जीवनशैली में बदलाव, साँस लेने की तकनीकें, और तनाव को मैनेज करने के तरीके भी शामिल हैं, ताकि शरीर और मन का पूरी तरह से इलाज हो सके।

  • पूरे भारत में मरीज़ों का भरोसा

बहुत बड़ी संख्या में मरीज़ों ने Jiva के इलाज के तरीकों और सुझावों को अपनाने के बाद अपनी सेहत में सुधार देखा है। इससे पता चलता है कि आयुर्वेदिक इलाज के लिए लोग जीवा आयुर्वेद पर कितना भरोसा करते हैं।

  • 95% मरीज़ों ने इलाज शुरू करने के 3 महीने के अंदर ही अपनी सेहत में काफ़ी सुधार देखा।
  • 88% मरीज़ों ने एलोपैथिक दवाएँ पूरी तरह से लेना बंद कर दिया।
  • हर दिन 8000+ मरीज़ों का कंसल्टेशन होता है।
  • दुनिया भर में 15 लाख से ज़्यादा संतुष्ट मरीज़़
  • 30+ वर्षों की आयुर्वेदिक विशेषज्ञता
  • पूरे भारत में 80+ क्लिनिक

आधुनिक उपचार बनाम आयुर्वेदिक उपचार 

आधार

आधुनिक चिकित्सा (Allopathy)

जीवा आयुर्वेद (Ayurveda)

दृष्टिकोण

केवल लक्षणों (Symptomatic) का इलाज।

जड़ (Root Cause) पर प्रहार।

दवाएँ

पेनकिलर्स और स्टेरॉयड (दुष्प्रभाव संभव)।

प्राकृतिक जड़ी-बूटी (कोई साइड इफेक्ट नहीं)।

समाधान

अंततः सर्जरी (Replacement)।

जोड़ों को पोषण देकर सर्जरी टालने का प्रयास।

जीवनशैली

डाइट पर कम ध्यान।

खान-पान और योग उपचार का अनिवार्य हिस्सा।

डॉक्टर से कब मिलें? 

जब घुटनों का दर्द आपकी सामान्य जीवनशैली में बाधा डालने लगे, आपकी रात की नींद खराब करने लगे या सीढ़ियां चढ़ने और खड़े होने जैसे साधारण कामों में भी आपको गिरने का डर महसूस होने लगे, तो इसे नज़रअंदाज़ करना भारी पड़ सकता है। कार्टिलेज का डैमेज एक गंभीर चेतावनी है, जिसे समय रहते न संभालने पर यह जोड़ों के स्थायी टेढ़ेपन या सर्जरी की नौबत ला सकता है। अगर आप रोज़ाना दर्द निवारक दवाओं (Painkillers) के सहारे चल रहे हैं, तो रुकिए—यह राहत नहीं, बल्कि समस्या को और गहरा बना रहा है। बिना देरी किए विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लें ताकि सही आयुर्वेदिक उपचार और पोषण से आपके जोड़ों को नई उम्र दी जा सके और आप फिर से अपनी खोई हुई आज़ादी और गतिशीलता वापस पा सकें।

संपर्क करें:

  • कॉल: 0129-4264323
  • वेबसाइट: www.jiva.com
  • परामर्श: पूरे भारत में ऑनलाइन और 80+ क्लिनिक उपलब्ध हैं।

निष्कर्ष: एक नई शुरुआत का संकल्प

घुटनों का दर्द कोई ऐसी सजा नहीं है जिसे आपको उम्र भर अपनी नियति मानकर सहना पड़े। असल में, यह आपके शरीर द्वारा भेजा गया एक संदेश है कि उसे अब विशेष देखभाल और सही पोषण की ज़रूरत है। कार्टिलेज का घिसना एक प्राकृतिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन इसे समय रहते थामना और जोड़ों को फिर से जीवंत करना पूरी तरह आपके हाथ में है। जब आप आयुर्वेद के प्राचीन ज्ञान को जीवा के आधुनिक और सटीक उपचार दृष्टिकोण के साथ जोड़ते हैं, तो आप केवल दर्द से राहत नहीं पाते, बल्कि अपनी खोई हुई सक्रिय जीवनशैली और मुस्कान को भी वापस पाते हैं। याद रखें, सर्जरी ही एकमात्र रास्ता नहीं है; प्रकृति और संयम के पास आपके हर मर्ज का इलाज है। एक दर्द-मुक्त और गतिशील भविष्य की ओर अपना पहला कदम आज ही बढ़ाएं।

FAQs

आयुर्वेद में 'रसायन' औषधियां होती हैं जो शरीर के ऊतकों (tissues) को पुनर्जीवित करने में मदद करती हैं। ये दवाएँ जोड़ों के लुब्रिकेशन को बढ़ाती हैं, जिससे घर्षण कम होता है और कार्टिलेज को और अधिक घिसने से रोककर उसे प्राकृतिक रूप से हील होने का माहौल मिलता है।

 जब दर्द बहुत ज़्यादा हो, तब जोड़ों को आराम देना जरूरी है। लेकिन पूरी तरह हिलना-डुलना बंद करना जोड़ों को जाम कर सकता है। दर्द थोड़ा कम होते ही विशेषज्ञ द्वारा बताए गए 'सूक्ष्म व्यायाम' शुरू करने चाहिए ताकि जोड़ों की जकड़न खत्म हो सके।

 जी हाँ, अगर जोड़ों में 'आम' (विषाक्त तत्व) जमा हैं और सूजन अधिक है, तो दबाव वाली मालिश दर्द को बढ़ा सकती है। हमेशा डॉक्टर की सलाह पर सही औषधीय तेल (जैसे महानारायण तेल) का चुनाव करें और हल्के हाथों से मालिश करें।

 यह आपकी समस्या की स्टेज पर निर्भर करता है। आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों में सूजन और दर्द में राहत दिखने लगती है, लेकिन जोड़ों को भीतर से मज़बूत बनाने के लिए 6 से 12 महीने का धैर्य रखना आवश्यक है।

बिल्कुल नहीं। आयुर्वेद का लक्ष्य शरीर को इतना सक्षम बनाना है कि वह खुद को ठीक रख सके। एक बार जब आपके दोष संतुलित हो जाते हैं और जोड़ मज़बूत हो जाते हैं, तो डॉक्टर धीरे-धीरे दवाएँ बंद कर देते हैं और आप केवल सही खान-पान से स्वस्थ रह सकते हैं।

 निश्चित रूप से। मेडिकल शोध बताते हैं कि शरीर का आधा किलो वजन कम होने पर घुटनों पर पड़ने वाला दबाव लगभग 2 किलो तक कम हो जाता है। वजन घटाना आपके उपचार की गति को दोगुना कर सकता है।

हाँ, आयुर्वेद के अनुसार ठंड का मौसम 'वात' दोष को बढ़ाता है, जिससे जोड़ों में रूखापन और जकड़न बढ़ जाती है। सर्दियों में घुटनों को गर्म रखना और गुनगुने तेल का प्रयोग करना बहुत फायदेमंद होता है।

पुराने चावल (जो वात न बढ़ाएं) खाए जा सकते हैं, लेकिन रात के समय दही, छाछ या ठंडी चीजों से बचना चाहिए। ये चीजें शरीर में सूजन और जकड़न को बढ़ा सकती हैं।

यदि मरीज़ पहली या दूसरी स्टेज में आता है, तो सर्जरी की नौबत को पूरी तरह टाला जा सकता है। तीसरी स्टेज में भी आयुर्वेद के जरिए आप एक लंबा और आरामदायक जीवन बिना सर्जरी के बिता सकते हैं।

हाँ, आप दोनों इलाज साथ में शुरू कर सकते हैं। जैसे-जैसे आयुर्वेद से आपकी स्थिति में सुधार होगा, आपके डॉक्टर धीरे-धीरे आपकी पेनकिलर्स या स्टेरॉयड्स की खुराक को कम करके उन्हें बंद करवा सकते हैं।

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