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रीढ़ की हड्डी में Gap बढ़ना — क्या Degenerative Disc Disease रुक सकती है?

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 29 Apr, 2026
  • category-iconUpdated on 29 Apr, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5011

आप सुबह उठते हैं, थोड़ा सा आगे झुकते हैं, और अचानक आपकी कमर में एक भयंकर 'कड़क' की आवाज़ के साथ ऐसा दर्द उठता है कि आप सीधे खड़े नहीं हो पाते। कुछ दिनों तक दर्द सहने के बाद आप एक्स-रे (X-Ray) या एमआरआई (MRI) करवाते हैं। रिपोर्ट देखकर डॉक्टर आपको एक डरावना शब्द कहते हैं, "आपकी रीढ़ की हड्डी में 'गैप' (Gap) आ गया है, और आपको डीजेनेरेटिव डिस्क डिज़ीज़ (Degenerative Disc Disease - DDD) है।" इसके बाद आपको बताया जाता है कि यह उम्र का तकाज़ा है, अब यह दर्द ज़िंदगी भर रहेगा, और अंत में शायद सर्जरी करवानी पड़े।

यह सुनकर इंसान मानसिक रूप से टूट जाता है। लेकिन क्या सच में आपकी रीढ़ की हड्डी अब कभी ठीक नहीं हो सकती? क्या यह 'गैप' लाइलाज है?

सच्चाई यह है कि "रीढ़ में गैप आना" एक बहुत ही आम बोलचाल का शब्द है, जिसे मेडिकल साइंस और आयुर्वेद दोनों में बहुत अलग नज़रिए से देखा जाता है। जब हम इस बीमारी को सिर्फ पेनकिलर्स या कैल्शियम की गोलियों से ठीक करने की कोशिश करते हैं, तो हम असल में डैमेज को और तेज़ कर रहे होते हैं। 

रीढ़ की हड्डी में 'गैप' का असली विज्ञान क्या है?

लोग अक्सर कहते हैं कि "हड्डियों के बीच गैप बढ़ गया है", लेकिन वैज्ञानिक रूप से ज़्यादातर मामलों में यह गैप कम होता है (Disc Space Narrowing)। इसे समझने के लिए रीढ़ की बनावट को जानना ज़रूरी है।

  • शॉक एब्जॉर्बर (Shock Absorber): हमारी रीढ़ की हड्डी छोटी-छोटी हड्डियों (Vertebrae) से बनी है। हर दो हड्डियों के बीच रबर या जेली जैसी एक गद्दी होती है, जिसे 'डिस्क' (Spinal Disc) कहते हैं। यह गद्दी 80% पानी से बनी होती है और स्प्रिंग की तरह झटके सहती है।
  • डिस्क का सूखना (Dehydration): गलत पोस्चर, लगातार बैठे रहने या बढ़ती उम्र के कारण इस डिस्क का पानी सूखने लगता है। जब गद्दी का पानी सूख जाता है, तो वह सिकुड़कर चपटी (Flat) हो जाती है।
  • गैप का कम होना और नसों का दबना: डिस्क के सिकुड़ने से दो हड्डियों के बीच की जगह (Gap) कम हो जाती है। इसके कारण हड्डियाँ आपस में रगड़ खाने लगती हैं और वहाँ से गुज़रने वाली नसें (जैसे साइटिक नर्व) दबने लगती हैं, जिससे कमर से लेकर पैरों तक भयंकर दर्द और झुनझुनी होती है।
  • बोन स्पर्स (Bone Spurs): जब हड्डियाँ रगड़ खाती हैं, तो शरीर उन्हें बचाने के लिए एक्स्ट्रा हड्डी उगाने लगता है (जिन्हें ओस्टियोफाइट्स कहते हैं)। ये नुकीली हड्डियाँ दर्द को और भयंकर बना देती हैं।

डिस्क डीजेनेरेशन के मुख्य कारण: हम कहाँ गलती कर रहे हैं?

यह बीमारी अब सिर्फ बुढ़ापे की निशानी नहीं रही; आजकल 30-35 साल के युवाओं में यह तेज़ी से बढ़ रही है।

  • सिडेंटरी लाइफस्टाइल (Sedentary Lifestyle): दिन में 10-12 घंटे लगातार कुर्सी पर बैठे रहना रीढ़ की निचली डिस्क (L4-L5) पर खड़े होने की तुलना में 40% ज़्यादा दबाव डालता है।
  • गलत पोस्चर (Text Neck & Slouching): सोफे पर धँसकर बैठना या लैपटॉप पर झुककर काम करना रीढ़ के प्राकृतिक आकार (S-curve) को तबाह कर देता है।
  • भारी वज़न गलत तरीके से उठाना: जिम में ईगो-लिफ्टिंग (Ego lifting) करना या झटके से भारी सामान उठाना डिस्क को अचानक डैमेज कर देता है।
  • मोटापा (Obesity): पेट की चर्बी रीढ़ की हड्डी को आगे की तरफ खींचती है, जिससे डिस्क पर हमेशा भारी तनाव बना रहता है।

आयुर्वेद इस 'गैप' और 'डीजेनेरेशन' को कैसे समझता है?

आधुनिक चिकित्सा जहाँ सूखी हुई डिस्क के लिए सीधे सर्जरी या स्टेरॉयड्स की बात करती है, वहीं आयुर्वेद इसे शरीर के अंदरूनी कुपोषण और 'दोषों' के असंतुलन के रूप में देखता है।

  • वात दोष का भयंकर प्रकोप: आयुर्वेद में 'वात' (हवा और आकाश तत्व) का स्वभाव रूखा और सुखाने वाला माना गया है। जब गलत खान-पान और लाइफस्टाइल से वात भड़कता है, तो यह रीढ़ की हड्डी में जाकर प्राकृतिक नमी (श्लेषक कफ) को पूरी तरह सुखा देता है।
  • धातु क्षय (Tissue Depletion): आयुर्वेद के अनुसार, डिस्क का सूखना और हड्डियों का रगड़ खाना 'अस्थि धातु' (Bones) और 'मज्जा धातु' (Bone Marrow/Nerves) के कमज़ोर होने (क्षय) का सीधा परिणाम है।
  • आम (Toxins) का ब्लॉकेज: जब पाचन कमज़ोर होता है, तो पेट में 'आम' (गंदगी) बनता है। यह आम नसों में जाकर ब्लड सर्कुलेशन को ब्लॉक कर देता है, जिससे डिस्क को ताज़ा ऑक्सीजन और पोषण नहीं मिल पाता, और वह डीजेनेरेट होने लगती है।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण

हमारा लक्ष्य आपके दर्द को पेनकिलर से सुन्न करना नहीं है। हम आपकी सूखी हुई डिस्क की असली 'ग्रीसिंग' (Lubrication) को वापस लाते हैं और डीजेनेरेशन की प्रक्रिया को रोकते हैं।

  • वात शमन और स्नेहन: सबसे पहले भड़के हुए वात को शांत करने के लिए शरीर को अंदरूनी और बाहरी चिकनाई (औषधीय घी और तेल) दी जाती है, ताकि डिस्क का रूखापन खत्म हो।
  • अग्नि दीपन (मेटाबॉलिज़्म सुधारना): पाचन को तेज़ किया जाता है ताकि शरीर में जमा 'आम' बाहर निकले और रीढ़ की हड्डी तक ताज़ा रक्त (Blood flow) पहुँच सके।
  • धातु पोषण (Tissue Rejuvenation): हड्डियों और नसों को ताक़त देने वाली विशेष रसायन औषधियों का उपयोग किया जाता है ताकि जो डैमेज हुआ है, उसे हील किया जा सके।

रीढ़ की हड्डी को 'रिहाइड्रेट' और मज़बूत करने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें हड्डियों के डैमेज को रोकने और सूजन को खींचने के लिए बहुत ही जादुई औषधियाँ दी हैं:

  • अस्थिशृंखला (Hadjod): जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह हड्डियों को जोड़ने और अस्थि धातु को प्राकृतिक कैल्शियम और ताक़त देने वाली आयुर्वेद की सबसे शक्तिशाली जड़ी-बूटी है।
  • गुग्गुलु (त्रयोदशांग गुग्गुलु): यह भयंकर कमर दर्द, नसों के दबने (Sciatica) और रीढ़ की हड्डी की सूजन को अंदर से खींचकर वात को शांत करता है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): कमज़ोर हो चुकी पीठ की मांसपेशियों (Core and Back muscles) को ताक़त देने के लिए यह एक जादुई रसायन है। यह नर्वस सिस्टम को भी रिलैक्स करता है।
  • शल्लाकी (Boswellia): यह रीढ़ की हड्डी और कार्टिलेज के अंदर चल रही सूजन को बिना किसी साइड इफेक्ट के प्राकृतिक रूप से कम करता है।

पंचकर्म थेरेपी: सूखी हुई डिस्क के लिए 'अमृत'

जब दर्द असहनीय हो और एमआरआई में डिस्क पूरी तरह सूखी (Desiccated) दिखे, तो दवाइयों के साथ पंचकर्म थेरेपी जादुई असर करती है।

  • कटि बस्ती (Kati Basti): डीजेनेरेटिव डिस्क के लिए इससे बेहतर कोई इलाज नहीं है। कमर के निचले हिस्से पर उड़द की दाल के आटे का घेरा बनाकर उसमें गुनगुना औषधीय तेल भरा जाता है। यह तेल त्वचा और मांसपेशियों के रास्ते सीधे सूखी हुई डिस्क तक पहुँचता है और उसे गहराई से नमी (Hydration) देता है।
  • अभ्यंग और स्वेदन (Abhyanga & Swedana): महानारायण जैसे वात-शामक तेलों से मालिश और जड़ी-बूटियों की भाप देने से रीढ़ की जकड़ी हुई मांसपेशियाँ खुल जाती हैं और ब्लड फ्लो तेज़ हो जाता है।
  • बस्ती (Basti/Enema): चूँकि वात का मुख्य स्थान 'पक्वाशय' (आंतें) है, इसलिए औषधीय तेल का एनिमा देकर वात को जड़ से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।

रीढ़ की हड्डी को बचाने के लिए लाइफस्टाइल टिप्स (क्या करें, क्या न करें)

डिस्क डीजेनेरेशन को रोकने के लिए आपको अपनी दिनचर्या में कुछ सख़्त अनुशासन लाने होंगे:

बिंदु क्या करें कैसे लाभ मिलता है
आगे झुकना (Forward Bending) बंद करें भारी सामान उठाते समय या झाड़ू-पोंछा लगाते हुए कमर से झुकने के बजाय घुटनों को मोड़कर स्क्वाट पोज़िशन अपनाएं रीढ़ की हड्डी (स्पाइन) पर अचानक दबाव नहीं पड़ता, डिस्क पर स्ट्रेस कम होता है और चोट का जोखिम घटता है
भुजंगासन (Cobra Pose) रोज़ाना धीरे-धीरे और सही तकनीक से भुजंगासन का अभ्यास करें रीढ़ की डिस्क अपनी सही स्थिति में रहती है, बैक मसल्स मज़बूत होती हैं और दर्द में राहत मिलती है
वज़न को नियंत्रित रखें पेट की अतिरिक्त चर्बी कम करने के लिए संतुलित डाइट और नियमित एक्सरसाइज़ अपनाएं L4-L5 रीढ़ पर दबाव कम होता है, पोस्चर सुधरता है और कमर दर्द की संभावना घटती है
वात-शामक आहार लें ठंडा, बासी और सूखा खाना बंद करें; रोज़ाना गाय का शुद्ध घी डाइट में शामिल करें शरीर को अंदर से चिकनाई मिलती है, वात शांत होता है और जोड़ों व नसों की सेहत बेहतर होती है

जीवा आयुर्वेद में हम मरीज़ों की जाँच कैसे करते हैं?

जब आप 'गैप' और डिस्क डैमेज की रिपोर्ट लेकर आते हैं, तो हम केवल एमआरआई पर निर्भर नहीं रहते, हम आपके शरीर की प्रकृति को पढ़ते हैं।

  • नाड़ी परीक्षा: सबसे पहले पल्स चेक करके यह समझना कि वात दोष ने रीढ़ की हड्डी के किस हिस्से को सबसे ज़्यादा सुखाया है।
  • शारीरिक मूल्याँकन: डॉक्टर आपके चलने के तरीके, पोस्चर, और नसों की जकड़न को बहुत बारीकी से चेक करते हैं।
  • पाचन और लाइफस्टाइल चेक: आपकी 'जठराग्नि' की स्थिति और काम करने के तरीके (बैठने के घंटे) का विश्लेषण किया जाता है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

हम आपको "यह कभी ठीक नहीं होगा" कहकर डराते नहीं हैं; हम आपको एक पारदर्शी और सुरक्षित समाधान देते हैं।

  • जीवा से संपर्क करें: बेझिझक होकर सीधे हमारे नंबर 0129 4264323 पर कॉल करें। हमारे स्वास्थ्य विशेषज्ञ आपसे बहुत प्यार और धैर्य से बात करेंगे।
  • अपॉइंटमेंट फिक्स करें: आप हमारे 80 से भी ज़्यादा क्लिनिक में आकर आराम से डॉक्टर से आमने-सामने मिल सकते हैं।
  • ऑनलाइन वीडियो कंसल्टेशन: दर्द के कारण सफर करना मुश्किल है, तो घर बैठे वीडियो कॉल से डॉक्टर से बात करें और अपनी एमआरआई रिपोर्ट दिखाएं।
  • व्यक्तिगत प्लान: आपकी प्रकृति के अनुसार खास जड़ी-बूटियाँ, अस्थि पोषक रसायन और एक पूरा वात-शामक रूटीन तैयार किया जाता है।

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

सूखी हुई डिस्क और कमज़ोर हड्डियों को दोबारा ताक़त देने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: दर्द और जकड़न में भारी आराम मिलेगा। सुबह उठने पर कमर में होने वाली कटकट कम हो जाएगी।
  • 1 से 3 महीने तक: मांसपेशियों का तनाव खत्म हो जाएगा। दबी हुई Sciatica नस ढीली पड़ने लगेगी, जिससे पैरों की झुनझुनी गायब हो जाएगी।
  • 3 से 6 महीने तक: आपकी रीढ़ की हड्डी की मांसपेशियाँ और अस्थि धातु अंदर से पूरी तरह मज़बूत हो जाएंगे। डीजेनेरेशन की प्रक्रिया रुक जाएगी और आप एक सामान्य जीवन जी सकेंगे।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय जरूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएं शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

  • प्रामाणिक पंचकर्म चिकित्सा
  • सात्विक भोजन
  • आधुनिक उपचार सेवाएं
  • आरामदायक आवास
  • जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने वाली कई अन्य सुविधाएं

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताजा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

मरीज़ जीवा आयुर्वेद पर भरोसा क्यों करते हैं?

हम आपको ज़िंदगी भर पेनकिलर्स खाने या जल्दबाज़ी में सर्जरी कराने की सलाह नहीं देते।

  • जड़ से इलाज: हम सिर्फ दर्द को नहीं दबाते; हम आपकी सूखी हुई डिस्क को प्राकृतिक पोषण देते हैं और डीजेनेरेशन को रोकते हैं।
  • विशेषज्ञ डॉक्टर: हमारे पास सालों का बहुत ही शानदार अनुभव है। हमने हज़ारों ऐसे केस देखे हैं जहाँ मरीज़ों को सर्जरी के लिए बोल दिया गया था, और हमने उन्हें प्राकृतिक रूप से हील किया है।
  • कस्टमाइज्ड केयर: हर इंसान की डिस्क का डैमेज अलग होता है। हमारा इलाज बिल्कुल आपकी एमआरआई रिपोर्ट और शरीर की प्रकृति के अनुसार होता है।
  • प्राकृतिक और सुरक्षित: हमारी औषधियाँ पूरी तरह प्राकृतिक हैं, जो शरीर को बिना कोई नुकसान पहुँचाए अंदर से रिपेयर करती हैं।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेद
इलाज का मुख्य लक्ष्य पेनकिलर्स, स्टेरॉयड इंजेक्शन, और अंततः सर्जरी (Spinal Fusion) पर निर्भरता। वात दोष' को शांत करना और 'अस्थि-मज्जा' धातु को पोषण देकर प्राकृतिक हीलिंग करना।
शरीर को देखने का नज़रिया रीढ़ को केवल एक मैकेनिकल स्ट्रक्चर मानता है जिसका पुर्ज़ा (डिस्क) खराब हो गया है। शरीर को ऊर्जा (वात) और पोषण का तंत्र मानता है, जिसे 'कटि बस्ती' से रिहाइड्रेट किया जा सकता है।
डाइट और जीवनशैली की भूमिका पोस्चर के अलावा डाइट पर कोई खास ध्यान नहीं। वात-शामक डाइट (जैसे घी) और लाइफस्टाइल को उपचार का सबसे अहम हिस्सा मानता है।
लंबा असर सर्जरी के बाद भी दर्द लौट सकता है और रिकवरी लंबी होती है। जड़ से पोषण मिलने के कारण डीजेनेरेशन रुक जाता है और व्यक्ति स्थायी राहत पाता है।

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए?

अगर आपको कमर दर्द के साथ शरीर के ये गंभीर अलार्म बजें, तो इसे बिल्कुल इग्नोर न करें:

  • अगर आपको मल या मूत्र विसर्जन (Bowel or Bladder Control) पर अपना नियंत्रण खोता हुआ महसूस हो (यह 'Cauda Equina Syndrome' का आपातकालीन संकेत है)।
  • अगर आपके पैरों में अचानक भयंकर कमज़ोरी आ जाए और चलते समय पैर ज़मीन पर घिसटने लगे (Foot Drop)।
  • अगर पैरों के बीच के हिस्से (Saddle area) में पूरी तरह सुन्नपन आ जाए।
  • अगर कमर दर्द के साथ लगातार तेज़ बुखार रहने लगे।

निष्कर्ष

रीढ़ की हड्डी में 'गैप' आना या डिस्क का डीजेनेरेट होना कोई ऐसी सज़ा नहीं है जिसके साथ आपको ज़िंदगी भर समझौता करना पड़े। यह सच है कि उम्र और गलत लाइफस्टाइल के साथ डिस्क की गद्दी सूख जाती है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इसका एकमात्र इलाज सर्जरी या पेनकिलर है। हमारा शरीर खुद को रिपेयर करने की अद्भुत क्षमता रखता है, बशर्ते हम उसे सही माहौल दें। जब हम वात-वर्धक खाना खाते हैं और लगातार बैठकर रीढ़ पर दबाव डालते हैं, तो हम खुद अपनी हड्डियों को सुखा रहे होते हैं। आयुर्वेद आपको इस खामोश तबाही से बाहर निकलने का सबसे तार्किक और प्राकृतिक रास्ता दिखाता है। बीमारी की जड़ को समझें। सही आयुर्वेदिक उपचार, अस्थिशृंखला व गुग्गुलु जैसी औषधियों, और पंचकर्म की 'कटि बस्ती' को अपनाकर आप अपनी सूखी हुई डिस्क को दोबारा रिहाइड्रेट कर सकते हैं। अपनी 'अग्नि' का सम्मान करें, अपने पोस्चर को सुधारें, और जीवा आयुर्वेद के साथ एक दर्द-मुक्त, लचीली और फौलादी रीढ़ की हड्डी पाएं।

FAQs

आम बोलचाल में लोग इसे गैप आना कहते हैं, लेकिन मेडिकल भाषा में इसे डिस्क स्पेस नैरोइंग (Disc space narrowing) कहते हैं। इसका मतलब है कि दो हड्डियों के बीच की गद्दी (डिस्क) सूख कर पिचक गई है, जिससे हड्डियों के बीच की जगह (गैप) कम हो गई है।

यह मुख्य रूप से बढ़ती उम्र, लगातार घंटों तक गलत पोस्चर में बैठे रहने, भारी वज़न उठाने और शरीर में पानी (Hydration) व पोषण की कमी के कारण डिस्क के सूखने (Dehydration) से होती है।

एलोपैथी मानती है कि डीजेनेरेशन वापस नहीं होता (Irreversible), लेकिन आयुर्वेद के अनुसार कटि बस्ती और वात-शामक औषधियों (जैसे अश्वगंधा, अस्थिशृंखला) के उपयोग से डिस्क को दोबारा नमी (Rehydrate) दी जा सकती है और दर्द व डैमेज को रोका जा सकता है।

आयुर्वेद इसे वात दोष का प्रकोप मानता है। वात का स्वभाव रूखापन है। जब शरीर में वात बढ़ता है, तो वह रीढ़ की प्राकृतिक चिकनाई (श्लेषक कफ) को सुखा देता है, जिससे हड्डियाँ रगड़ खाती हैं।

कटि बस्ती में कमर पर उड़द के आटे का घेरा बनाकर औषधीय गर्म तेल रोका जाता है। यह तेल त्वचा के छिद्रों से अंदर जाकर सूखी हुई डिस्क और नसों को भारी नमी और चिकनाई (Lubrication) देता है, जिससे वात का दर्द तुरंत शांत होता है।

बहुत ज़रूरी है! पेट की चर्बी (Belly fat) रीढ़ की हड्डी को आगे की तरफ खींचती है, जिससे निचली डिस्क (L4-L5) पर बहुत ज़्यादा अतिरिक्त भार पड़ता है। वज़न कम करते ही कमर का 50% दर्द अपने आप कम हो जाता है।

हल्की स्ट्रेचिंग, पैदल चलना और योग में भुजंगासन (Cobra Pose) सबसे सुरक्षित और फायदेमंद हैं। आगे झुकने वाले व्यायाम, भारी वज़न उठाना या झटके वाले खेल बिल्कुल नहीं खेलने चाहिए।

चूँकि डिस्क डीजेनेरेशन वात (ठंडा और रूखा) की बीमारी है, इसलिए ठंडी सिकाई से जकड़न बढ़ सकती है। इसमें हमेशा गर्म सिकाई (Hot compress) या तिल के तेल की मालिश ज़्यादा फायदेमंद होती है।

सर्जरी केवल तभी आवश्यक है जब नसें पूरी तरह दब जाएं, मल-मूत्र पर नियंत्रण खत्म हो जाए (Red flags), या पैर सुन्न हो जाएं। ज़्यादातर मामलों (90%) में आयुर्वेद, सही पोस्चर और फिजियोथेरेपी से बिना सर्जरी के दर्द को जड़ से खत्म किया जा सकता है।

वात को शांत करने के लिए रोज़ाना अपने आहार में गाय का शुद्ध घी शामिल करें। इसके अलावा दूध, भीगे हुए बादाम, अखरोट और ताज़ा सुपाच्य भोजन लें। बासी, फ़्रिज का ठंडा और रुखा खाना बिल्कुल बंद कर दें।

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