Diseases Search
Close Button
 
 

Creatinine 2-3 के बीच — Dialysis से कितनी दूर हैं? आयुर्वेदिक Support

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

जब शरीर में क्रिएटिनिन (Creatinine) का लेवल 2 से 3 के बीच पहुंच जाता है, तो यह सीधा इशारा है कि आपकी किडनी पर प्रेशर बढ़ रहा है और उसकी खून साफ करने (फिल्टर करने) की ताकत धीरे-धीरे कम हो रही है। यह रिपोर्ट देखते ही अक्सर लोगों के मन में डर बैठ जाता है कि क्या अब डायलिसिस की नौबत आ गई है या अभी भी हालात को संभाला जा सकता है?

इस स्थिति में शरीर भी कई अलार्म देने लगता है जैसे हमेशा थकान रहना, पैरों में सूजन, भूख न लगना और पेशाब के रूटीन में बदलाव। यह शरीर का एक 'चेतावनी' देने का तरीका है। इस वक्त सही देखभाल और लाइफस्टाइल में किए गए बदलाव बहुत अहम हो जाते हैं।

क्रिएटिनिन क्या होता है और शरीर में इसका महत्व 

क्रिएटिनिन शरीर का एक कचरा (Waste product) है। जब हम कोई काम करते हैं, तो हमारी मांसपेशियाँ टूटती और बनती हैं। इसी नॉर्मल प्रोसेस से क्रिएटिनिन बनता है। खून इसे बहाकर किडनी तक ले जाता है, और फिर हमारी स्वस्थ किडनी इसे फिल्टर करके पेशाब के रास्ते बाहर फेंक देती है। जब तक किडनी ठीक से काम कर रही है, क्रिएटिनिन का लेवल बिल्कुल नॉर्मल रहता है। लेकिन अगर किडनी फिल्टर करने की ताकत कमजोर पड़ जाए, तो यह कचरा शरीर से बाहर नहीं निकल पाता और खून में जमा होने लगता है। इसीलिए क्रिएटिनिन टेस्ट को किडनी की सेहत का सबसे बड़ा थर्मामीटर माना जाता है; यह साफ बताता है कि किडनी आपके शरीर की सफाई कितनी अच्छी तरह कर पा रही है।

Creatinine 2–3 का मेडिकल मतलब क्या दर्शाता है? 

अगर आपकी ब्लड रिपोर्ट में क्रिएटिनिन का लेवल 2 से 3 mg/dL के बीच आया है, तो इसका साफ मतलब है कि किडनी की फिल्टर करने की क्षमता घट गई है। शरीर की गंदगी पूरी तरह से बाहर नहीं निकल पा रही है और किडनी पर भारी दबाव पड़ रहा है।

यह लेवल नॉर्मल से काफी ज्यादा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आपको कल ही डायलिसिस शुरू करवाना पड़ेगा। हर मरीज की कंडीशन अलग होती है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि किडनी कितनी काम कर रही है और आपको लक्षण क्या आ रहे हैं। इसे आप एक "वॉर्निंग ज़ोन" या चेतावनी मान सकते हैं। अगर इसी वक्त आपने सही देखभाल शुरू कर दी, डाइट सुधार ली और लाइफस्टाइल बदल दिया, तो इस बीमारी को आगे बढ़ने से काफी हद तक रोका जा सकता है।

क्रिएटिनिन बढ़ने के शुरुआती कारण 

क्रिएटिनिन का बढ़ना इस बात का पक्का सबूत है कि किडनी दबाव में है और उसकी फिल्टर करने की ताकत कमजोर पड़ रही है। इसके पीछे अक्सर ये पुरानी और लंबी चलने वाली वजहें होती हैं:

  • लंबे समय से शुगर (मधुमेह): लगातार बढ़ा हुआ ब्लड शुगर किडनी की छोटी-छोटी छन्नियों (फिल्टरिंग यूनिट्स) को बुरी तरह डैमेज कर देता है।
  • हाई ब्लड प्रेशर: अगर बीपी लंबे समय तक हाई रहे, तो वह किडनी के अंदर की नसों पर भारी चोट करता है।
  • पानी कम पीना: दिन भर में पानी कम पीने से किडनी को शरीर की सफाई करने में बहुत ज्यादा जोर लगाना पड़ता है।
  • पेनकिलर्स (दर्द की दवाएं): बात-बात पर दर्द निवारक गोलियां खाना किडनी की कार्यक्षमता को धीरे-धीरे खत्म कर देता है।
  • बार-बार इन्फेक्शन होना: यूरीन या किडनी में बार-बार इन्फेक्शन होने से भी किडनी कमजोर हो जाती है।
  • खराब खानपान: बाहर का बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड और जंक फूड खाने से शरीर में कचरा बढ़ता है, जिसे साफ करने में किडनी पर एक्स्ट्रा बोझ पड़ता है।
  • जेनेटिक्स (पारिवारिक कारण): कुछ लोगों में किडनी की बीमारियां उन्हें अपने परिवार से मिलती हैं।

इन सारी वजहों से किडनी की छोटी छन्नियां धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती हैं और खून में क्रिएटिनिन जमा होने लगता है।

डायलिसिस कब शुरू करने की स्थिति आती है? 

डायलिसिस की जरूरत तब पड़ती है जब किडनी लगभग अपना पूरा काम करना बंद कर दे और शरीर से गंदगी बाहर निकालने में पूरी तरह फेल हो जाए। ऐसे में खून में टॉक्सिन्स (जहरीले तत्व) इतने ज्यादा बढ़ जाते हैं कि मरीज की हालत बिगड़ने लगती है। लेकिन ध्यान दें, डायलिसिस का फैसला कभी भी सिर्फ 'क्रिएटिनिन रिपोर्ट' देखकर नहीं लिया जाता। इसके लिए मरीज की हालत, लक्षण और GFR (किडनी के काम करने का असल प्रतिशत) को देखा जाता है।

क्या हर मरीज को डायलिसिस की जरूरत पड़ती है? 

किडनी की बीमारी हर इंसान में अलग रफ्तार से बढ़ती है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि हर मरीज को डायलिसिस करवाना ही पड़े। ऐसे कई लोग हैं जो स्टेज 3 या 4 की किडनी बीमारी में भी बिना डायलिसिस के लंबा और सामान्य जीवन जी रहे हैं। डायलिसिस की नौबत तब आती है जब:

  • GFR बहुत कम हो जाए: GFR (Glomerular Filtration Rate) बताता है कि किडनी खून कितनी तेजी से साफ कर रही है। जब यह बहुत ज्यादा गिर जाता है, तब स्थिति गंभीर हो जाती है।
  • शरीर में टॉक्सिन्स (जहर) जमा होने लगें: जब किडनी कचरा बाहर नहीं निकाल पाती, तो वो शरीर में घूमने लगता है। इससे थकान, उल्टी का मन होना और कमजोरी आने लगती है।
  • Fluid overload (पानी भर जाना): जब किडनी पेशाब नहीं बना पाती, तो शरीर में पानी जमा होने लगता है। पैरों में भारी सूजन आ जाती है, फेफड़ों में पानी भरने से सांस फूलने लगती है और शरीर भारी हो जाता है।
  • खतरनाक लक्षण दिखने लगें: जब लगातार उल्टियां हों, खाना बिल्कुल न खाया जाए, बेइंतहा कमजोरी हो और सांस लेने में भारी तकलीफ होने लगे, तब डायलिसिस पर विचार किया जाता है।

लक्षण जो खतरे का संकेत देते हैं 

जब किडनी की दिक्कत बढ़ने लगती है, तो शरीर कुछ खास अलार्म देता है। अगर आप इन्हें समय रहते पकड़ लें, तो बात बिगड़ने से बचाई जा सकती है:

  • लगातार थकान रहना: शरीर में गंदगी भरी होने के कारण आप बिना कोई काम किए भी थका हुआ और सुस्त महसूस करते हैं।
  • पैरों में सूजन: किडनी शरीर का फालतू पानी बाहर नहीं निकाल पाती, जो पैरों और टखनों में इकट्ठा होकर सूजन (Edema) बना देता है।
  • भूख मर जाना: खून में गंदगी (यूरिया) बढ़ने से पाचन बिगड़ जाता है और खाने का बिल्कुल मन नहीं करता।
  • उल्टी या जी मिचलाना: पेट हर वक्त भारी और खराब सा लगता है, बार-बार उल्टी करने का मन करता है।
  • सांस फूलना: जब फालतू पानी फेफड़ों के आस-पास जमा होने लगता है, तो जरा सा चलने पर भी सांस फूलने लगती है।
  • पेशाब में बदलाव: पेशाब बहुत कम या बहुत ज्यादा आना, झागदार पेशाब आना या बार-बार रात में उठना ये सब किडनी की कमजोरी के इशारे हैं।

अगर ये संकेत दिखें, तो समझ लीजिए कि किडनी मदद मांग रही है और तुरंत डॉक्टर को दिखाना जरूरी है।

आयुर्वेद में किडनी स्वास्थ्य का दृष्टिकोण 

आयुर्वेद में किडनी को 'मूत्रवह स्रोत' और 'वृक्क' अंग के रूप में देखा गया है। शरीर के अंदर पानी का बैलेंस बनाना और गंदगी को बाहर फेंकना, ये इसी का काम है। इसे शरीर का मेन क्लीनिंग सेंटर माना जाता है।

आयुर्वेद मानता है कि जब शरीर में कफ और वात दोष बिगड़ जाते हैं, तब किडनी की कार्यक्षमता पर असर पड़ता है। इसके साथ ही, जब शरीर की 'धातुएं' (Tissues) कमजोर पड़ जाती हैं, तो शरीर अपना कचरा सही से बाहर नहीं निकाल पाता और पूरा बैलेंस बिगड़ जाता है। इसी से किडनी की बीमारियां जन्म लेती हैं।

आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण

आयुर्वेद में किडनी की समस्या को केवल रिपोर्ट की गड़बड़ी नहीं माना जाता, बल्कि इसे शरीर के अंदरूनी असंतुलन, पाचन कमजोरी और अपशिष्ट संचय से जुड़ी स्थिति के रूप में देखा जाता है। उपचार की दिशा पूरे शरीर के संतुलन को सुधारने पर आधारित होती है।

  • बीमारी की असली जड़ पकड़ना: हम मरीज को सिर्फ क्रिएटिनिन कम करने की दवा थमा कर नहीं भेजते। हम पूरी तह तक जाते हैं कि आखिर आप दिनभर में क्या खा-पी रहे हैं, आपका पेट ठीक से साफ हो रहा है या नहीं, और शरीर में ये सारी गंदगी रुक क्यों रही है।
  • किडनी को नेचुरली सपोर्ट करना: हमारा सबसे अहम काम उस थकी-हारी किडनी पर से फालतू का बोझ हटाना है। जब प्रेशर कम होगा, तो वह खुद-ब-खुद अंदर से रिपेयर (हील) होने लगेगी।
  • पाचन सुधारने पर फोकस: ये बात आप कहीं लिख कर रख लीजिए कि किडनी की ज्यादातर बीमारियों की जड़ आपका खराब पेट ही होता है। इसलिए सबसे पहली चोट आपके पाचन को दुरुस्त करने पर ही की जाती है।
  • शरीर की सफाई: आपके शरीर के भीतर जो भी फालतू का 'कचरा' या टॉक्सिन्स अटक गए हैं, उन्हें पूरी तरह से नेचुरल तरीके से बाहर निकालने का रास्ता तैयार किया जाता है।
  • डाइट और लाइफस्टाइल में सुधार: आपके सोने, जागने और खाने-पीने का पूरा रूटीन कुछ इस तरीके से सेट किया जाता है कि बेचारी किडनी को हील होने के लिए पर्याप्त समय और आराम मिल सके।
  • लंबे समय का आराम: हमें दो-चार दिन वाले शॉर्टकट पर बिल्कुल भी यकीन नहीं है। हमारा सारा फोकस इस बात पर रहता है कि आप अंदर से फिट हों और लंबे समय तक बैलेंस में रहें।

उपचार में उपयोग होने वाले आयुर्वेदिक औषधियां

आयुर्वेद में किडनी की कमजोरी को वात और कफ असंतुलन तथा शरीर में विषैले पदार्थों के बढ़ने से जोड़ा जाता है। इसलिए औषधियों का उद्देश्य शरीर को संतुलित करना और किडनी पर दबाव कम करना माना जाता है।

  • पुनर्नवा: यह आपके शरीर में पानी के बैलेंस को एकदम सही कर देती है। चेहरे या पैरों पर जो भारी सूजन आ जाती है, उसे यह बहुत तेजी से खींचकर बाहर कर देती है।
  • वरुण: शरीर के भीतर सालों से जो कचरा जमा हो गया है, उसे पेशाब के रास्ते से बाहर धकेलने का यह एक बहुत ही पुराना और सौ फीसदी आजमाया हुआ नुस्खा है।
  • त्रिफला: सीधी सी बात है भई, पाचन मजबूत रहेगा तो गंदगी अपने आप बाहर जाएगी! त्रिफला आपके पेट के सिस्टम को इतना दुरुस्त कर देता है कि शरीर सारा कचरा खुद-ब-खुद बाहर फेंकने लगता है।
  • अर्जुन: यह ब्लड सर्कुलेशन की सारी रुकावटों को खोल देता है, जिससे आपकी थक चुकी किडनी तक सही मात्रा में साफ खून और ऑक्सीजन आसानी से पहुंचने लगता है।

उपचार में उपयोग होने वाली आयुर्वेदिक थेरेपी

ये आयुर्वेदिक पंचकर्म और थेरेपी सिर्फ शरीर का दर्द मिटाने के लिए नहीं हैं। इनका असली काम तो आपके शरीर की डीप-क्लीनिंग (डिटॉक्स) करके पूरे सिस्टम को 'रीसेट' करना है:

  • अभ्यंग (हर्बल तेल मालिश): जड़ी-बूटियों से पके हल्के गर्म तेल की मालिश लेते ही नसों में ब्लड का फ्लो दौड़ पड़ता है और भड़का हुआ वात एकदम शांत हो जाता है।
  • स्वेदन (हल्की भाप): दवाइयों वाले पानी की भाप से शरीर की जकड़न ऐसे टूटती है जैसे जादू, और पसीने के जरिए सारे टॉक्सिन्स आसानी से बाहर आ जाते हैं।
  • बस्ती थेरेपी: बिगड़े हुए वात को जड़ से उखाड़ने और आंतों की गहरी सफाई के लिए आयुर्वेद में इससे तगड़ा और अचूक इलाज कोई दूसरा नहीं है।

किडनी की बीमारी में कैसा हो खानपान? (सहायक आहार)

सच मानिए, इस बीमारी में आपकी डाइट ही आपका सबसे बड़ा अस्पताल है। सही खाना खाने से ही किडनी का बोझ घटेगा और सूजन उतरेगी।

क्या खाएं?

  • हल्का और सुपाच्य खाना: हमेशा ऐसा खाना खाएं जो पेट में जाते ही आसानी से पच जाए, ताकि आपकी पहले से ही थकी हुई किडनी को और ज्यादा मेहनत न करनी पड़े।
  • ताजे फल और मौसमी सब्जियां: ये चीजें शरीर को एकदम नेचुरल पोषण देती हैं और अंदरूनी सिस्टम को बैलेंस में रखती हैं।
  • खिचड़ी और मूंग दाल: ये पचने में इतनी हल्की होती हैं कि पेट को बिल्कुल शांत और रिलैक्स रखती हैं।
  • सही मात्रा में पानी: पानी हल्का गुनगुना पिएं या हर्बल चाय लें। इससे शरीर में पानी की कमी नहीं होगी और ओवरलोड भी नहीं पड़ेगा।
  • देसी घी: खाने में बहुत ही थोड़ी सी मात्रा में शुद्ध देसी घी शामिल करें। यह अंदर की खुश्की को मिटाकर वात को कंट्रोल में रखता है।

क्या न खाएं?

  • ज्यादा नमक और मसाले: ज्यादा नमक शरीर के अंदर पानी को रोक लेता है। नतीजा? शरीर में सूजन बढ़ने लगती है और किडनी पर भारी प्रेशर आ जाता है।
  • पैकेटबंद (प्रोसेस्ड) फूड: बिस्कुट, नमकीन या डिब्बाबंद खाने में मौजूद केमिकल्स सीधा आपकी किडनी पर हथौड़े की तरह वार करते हैं।
  • फ्रिज का ठंडा पानी: चिल्ड पानी पाचन को एकदम सुन्न कर देता है, जिससे खाना पचने के बजाय सड़ता है और टॉक्सिन्स बढ़ते हैं।
  • डीप फ्राई और भारी खाना: हद से ज्यादा तला-भुना खाना पचने में भारी होता है और शरीर में एक तरह से जहर (गंदगी) का काम करता है।
  • चाय और कॉफी: इनमें कैफीन होता है जो शरीर को अंदर से सुखा (Dehydrate) देता है। इससे किडनी का काम बेवजह बढ़ जाता है।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम डी.के.एल. दास है और मैं लखनऊ से हूँ। मैं हजरतगंज स्थित जीवा क्लिनिक में इलाज ले रहा हूँ। मुझे किडनी से जुड़ी समस्या थी और मेरा क्रिएटिनिन लेवल सामान्य से काफी ज्यादा बढ़कर लगभग 1.6 तक पहुँच गया था। इसके साथ ही मुझे लिवर से जुड़ी समस्या भी हो गई थी—SGPT और SGOT लेवल भी सामान्य से ऊपर थे। मेरा कोलेस्ट्रॉल भी बढ़ा हुआ था और मुझे यूरिन इन्फेक्शन की समस्या भी थी। मैं करीब एक साल पहले जीवा आयुर्वेद आया और यहाँ से उपचार शुरू किया। डॉक्टरों ने मेरी पूरी स्थिति को समझकर मुझे दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल से जुड़ी सलाह दी। नियमित उपचार के बाद मेरी सेहत में काफी सुधार हुआ। अब मेरे सभी पैरामीटर्स बेहतर हैं और मैं पहले से काफी स्वस्थ महसूस करता हूँ। मैं जीवा आयुर्वेद और यहाँ के डॉक्टरों का दिल से धन्यवाद करता हूँ। 

डॉक्टर से कब मिलना जरूरी है?

क्रिएटिनिन बढ़ने को कभी भी हल्के में न लें। अगर आपको शरीर में ये अलार्म दिखें, तो तुरंत किसी विशेषज्ञ या आयुर्वेदिक डॉक्टर के पास जाएं:

  • जब ब्लड रिपोर्ट में क्रिएटिनिन का लेवल लगातार ऊपर जा रहा हो।
  • जब पैरों, टखनों या चेहरे पर सूजन दिखने लगे।
  • पेशाब बहुत कम आने लगे या उसके रंग में बदलाव (जैसे झाग) दिखे।
  • बिना मेहनत किए भी थकान और कमजोरी लगे।
  • भूख बिल्कुल मर जाए या बार-बार उल्टी जैसा मन हो।
  • थोड़ा सा चलने पर ही सांस फूलने लगे।
  • रिपोर्ट में GFR (किडनी के फिल्टर करने की स्पीड) तेजी से गिर रहा हो।

निष्कर्ष

क्रिएटिनिन का बढ़ना सिर्फ एक 'खराब ब्लड रिपोर्ट' नहीं है; यह अंदर से किडनी के कमजोर होने का एक बड़ा अलार्म है। जहां एलोपैथी इसे सिर्फ किडनी के फेल होने की शुरुआत मानती है, वहीं आयुर्वेद इसे गहराई से देखता है और खराब पाचन, बिगड़े हुए लाइफस्टाइल और शरीर में जमा गंदगी से जोड़ता है।

सालों तक गलत खाना-पीना, पानी कम पीना, हद से ज्यादा टेंशन और बात-बात पर पेनकिलर्स खाने से किडनी धीरे-धीरे बैठ जाती है। इसलिए, सिर्फ किसी दवा से अपनी रिपोर्ट के नंबर घटाने के बजाय, अपने पूरे शरीर, डाइट और लाइफस्टाइल को अंदर से फिट रखने पर ध्यान दीजिए।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

क्रिएटिनिन बढ़ना हमेशा गंभीर किडनी डैमेज का संकेत नहीं होता। कभी-कभी पानी की कमी, दवाओं का असर या अस्थायी संक्रमण के कारण भी स्तर बढ़ सकता है। इसलिए एक ही रिपोर्ट के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला जाता। समय के साथ लगातार बढ़ोतरी अधिक महत्वपूर्ण संकेत मानी जाती है।

 क्रिएटिनिन को सीधे कम करने से ज्यादा जरूरी उसके कारण को नियंत्रित करना होता है। जब किडनी पर दबाव कम होता है और शरीर का संतुलन सुधरता है तो स्तर स्थिर हो सकता है। इसमें आहार, पानी और जीवनशैली का बड़ा योगदान होता है।

शुरुआती चरण में आमतौर पर कोई तेज दर्द नहीं होता। अधिकतर लोग थकान, कमजोरी या हल्की सूजन महसूस करते हैं। दर्द की अनुपस्थिति के बावजूद स्थिति अंदर से प्रभावित हो सकती है। इसलिए लक्षणों के बिना भी जांच जरूरी होती है।

पानी शरीर के लिए जरूरी है लेकिन केवल पानी बढ़ाने से समस्या ठीक नहीं होती। अगर किडनी की फिल्टर क्षमता कम है तो सिर्फ पानी से सुधार संभव नहीं होता। संतुलित मात्रा और कारण का इलाज दोनों जरूरी होते हैं।

हां, कई मामलों में पेशाब की मात्रा सामान्य दिखाई दे सकती है। लेकिन किडनी की कार्यक्षमता अंदर ही अंदर कम हो सकती है। इसलिए केवल पेशाब सामान्य होने से स्थिति को पूरी तरह ठीक नहीं माना जाता।

आहार का सीधा असर शरीर के मेटाबॉलिज्म और किडनी पर पड़ता है। अत्यधिक प्रोटीन या प्रोसेस्ड फूड से शरीर में अपशिष्ट बढ़ सकता है। संतुलित और हल्का भोजन किडनी पर दबाव कम करने में मदद करता है।

हां, कमजोरी और थकान सामान्य लक्षण हो सकते हैं। जब शरीर से अपशिष्ट ठीक से बाहर नहीं निकलता तो ऊर्जा स्तर कम हो सकता है। यह धीरे धीरे बढ़ने वाला संकेत भी हो सकता है।

कुछ स्थितियों में जैसे संक्रमण, दवाओं का असर या पानी की कमी से क्रिएटिनिन अचानक बढ़ सकता है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि हमेशा स्थायी किडनी समस्या हो। लगातार जांच से स्थिति स्पष्ट होती है।

नहीं, यह किसी भी उम्र में बढ़ सकता है। खराब जीवनशैली, डायबिटीज या उच्च रक्तचाप युवाओं में भी इसका कारण बन सकते हैं। इसलिए उम्र अकेला कारण नहीं माना जाता।

 यदि समय पर कारणों को नियंत्रित किया जाए तो इसकी बढ़ोतरी को धीमा किया जा सकता है। जीवनशैली सुधार, संतुलित आहार और नियमित जांच इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शुरुआती अवस्था में सुधार की संभावना अधिक होती है।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us