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डायबिटीज़ में आँखें कमज़ोर क्यों होती हैं? Diabetic Retinopathy और आयुर्वेद

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

आई ड्रॉप्स (Eye Drops), लेज़र सर्जरी (Laser Surgery) और स्टेरॉयड के इंजेक्शन का इस्तेमाल डायबिटीज़ के कारण आँखों में आई कमज़ोरी (Diabetic Retinopathy) जैसी गंभीर बीमारियों में काफी आम है। ये तकनीकें और दवाएँ आँखों के पर्दे (Retina) पर आई सूजन को कुछ समय के लिए कम कर देती हैं या लेज़र के ज़रिए रिसती हुई नसों को जलाकर बंद कर देती हैं, जिससे मरीज़ को लगता है कि उसकी नज़र ठीक हो गई है और परेशानी ख़त्म हो गई है। 

लेकिन कई बार ऐसा होता है कि कुछ महीनों बाद या दवा का असर ख़त्म होने के तुरंत बाद फिर से भयंकर धुँधलापन, आँखों के सामने जाले उड़ना और भारीपन की समस्या होने लगती है और रेटिनोपैथी पहले से भी भयंकर रूप में वापस आ जाती है। इसके कारण कई हो सकते हैं जैसे लगातार हाई ब्लड शुगर का रहना, लेज़र के कारण पर्दे का कमज़ोर होना, या सबसे महत्वपूर्ण शरीर के अंदर मौजूद बढ़ा हुआ पित्त दोष और टॉक्सिन्स जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं। इस बात को समझना ज़रूरी है, ताकि वक्त रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सके और आँखों की रोशनी हमेशा के लिए जाने से बचाई जा सके।

डायबेटिक रेटिनोपैथी (Diabetic Retinopathy) की समस्या क्या है?

डायबेटिक रेटिनोपैथी डायबिटीज़ (मधुमेह) की वजह से होने वाली आँखों की एक गंभीर बीमारी है। एक सामान्य इंसान में आँखों के पर्दे (रेटिना) की नसें स्वस्थ होती हैं और सही रोशनी दिमाग तक पहुँचाती हैं। लेकिन जब खून में शुगर (ग्लूकोज़) का स्तर लगातार हाई रहता है, तो यह आँखों की बारीक और नाज़ुक नसों (Blood Vessels) को डैमेज कर देता है। ये नसें कमज़ोर होकर सूज जाती हैं और उनमें से खून या पानी (Fluid) रिसने लगता है।

इसके कारण रेटिना पर सूजन आ जाती है और नज़र धुँधली होने लगती है। जब बीमारी बढ़ती है, तो आँखें ऑक्सीजन की कमी पूरी करने के लिए नई, लेकिन बेहद कमज़ोर नसें बनाने लगती हैं जो जल्दी फट जाती हैं और आँखों में खून भर जाता है। आमतौर पर लोग इसका शिकार अनियंत्रित शुगर, बढ़ते वज़न, हाई ब्लड प्रेशर या गलत खानपान के कारण होते हैं। लेज़र सर्जरी कराने पर कुछ समय के लिए आराम मिल जाता है, लेकिन यह शरीर के अंदर मौजूद उस बढ़े हुए शुगर और वात-पित्त दोष को ठीक नहीं करती जिसके कारण नसें बार-बार कमज़ोर होती हैं। बीमारी का अंदरूनी इलाज न करने पर इंसान हमेशा के लिए अंधा हो सकता है।

डायबिटीज़ में आँखों की बीमारियाँ कितने प्रकार की होती हैं?

शुगर के कारण आँखों की तकलीफ से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ देखी जाती हैं:

  • नॉन-प्रोलिफरेटिव डायबेटिक रेटिनोपैथी (NPDR): यह शुरुआती स्टेज है। इसमें आँखों की नसें कमज़ोर होकर गुब्बारे की तरह फूल जाती हैं और उनसे हल्का खून या पानी रिसने लगता है।
  • प्रोलिफरेटिव डायबेटिक रेटिनोपैथी (PDR): यह गंभीर और एडवांस स्टेज है। इसमें पुरानी नसें बंद हो जाती हैं और रेटिना पर नई, कमज़ोर नसें उगने लगती हैं जो फटकर आँखों में भारी खून (Vitreous Hemorrhage) भर देती हैं।
  • डायबेटिक मैक्यूलर एडिमा (DME): इसमें रेटिना के सबसे अहम हिस्से 'मैक्यूला' (Macula) में पानी भर जाता है और सूजन आ जाती है, जिससे सामने की चीज़ें बिल्कुल धुँधली दिखने लगती हैं।
  • काला मोतिया (Glaucoma) और मोतियाबिंद (Cataract): डायबिटीज़ के मरीज़ों में आँखों का प्रेशर बढ़ने (Glaucoma) और लेंस के जल्दी धुँधले होने (Cataract) का ख़तरा सामान्य लोगों से दोगुना होता है।

डायबेटिक रेटिनोपैथी के लक्षण और संकेत

लेज़र या इंजेक्शन से आराम मिलने के बाद नज़र का बार-बार धुँधला होना आंतरिक स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • धुँधलापन (Blurred Vision): चीज़ें साफ न दिखना, ऐसा लगना जैसे आँखों के सामने कोई धुंध या कोहरा छा गया हो।
  • फ्लोटर्स (Floaters): आँखों के सामने काले धब्बे, जाले या तैरती हुई आकृतियाँ (मक्खियों जैसा) दिखाई देना।
  • नज़र का बदलना: सुबह के समय नज़र कुछ और होना और शाम तक शुगर लेवल के हिसाब से नज़र का बदल जाना।
  • रंगों की पहचान कम होना: रंगों का फीका लगना या सही रंग पहचानने में दिक्कत होना।
  • बीच की नज़र ख़राब होना: पढ़ते समय या किसी का चेहरा देखते समय बीच के हिस्से में काले धब्बे या खाली जगह दिखाई देना।
  • अचानक रोशनी जाना: आँखों में नई नसों के फटने से अचानक भारी खून आना और रोशनी का एकदम से चला जाना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

बार-बार आँखों की समस्या लौटने के मुख्य कारण क्या हैं?

सर्जरी के बाद भी बार-बार आँखों की नज़र कमज़ोर होने के पीछे सिर्फ बाहरी कारण नहीं, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं। मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

  • रक्त में शुगर और आम का संचय: गलत खान-पान जैसे बहुत ज़्यादा मीठा, मैदा और भारी चीज़ें खाने से शुगर बढ़ती है और शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) बनता है। यह 'रक्त धातु' को ख़राब कर आँखों की नसों को ब्लॉक कर देता है।
  • पित्त और वात दोष का असंतुलन: आयुर्वेद में आँखों को पित्त (अग्नि) का स्थान माना गया है। बढ़ा हुआ पित्त और वात आँखों की नसों को सुखा देता है और उनमें सूजन व जलन पैदा करता है।
  • ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल: अगर शुगर के साथ बीपी (BP) भी हाई रहे, तो आँखों की बारीक नसों पर दबाव दोगुना हो जाता है और वे जल्दी फट जाती हैं।
  • ख़राब पाचन और लिवर की कमज़ोरी: पेट साफ न होना और लिवर का कमज़ोर होना शरीर की गंदगी बाहर नहीं निकलने देता, जो खून के ज़रिए आँखों तक पहुँचकर डैमेज करती है।
  • मानसिक तनाव: लगातार स्ट्रेस लेने से ब्लड शुगर अचानक शूट कर जाता है जो सीधे रेटिना पर हमला करता है।

डायबेटिक रेटिनोपैथी के जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

आँखों की इस बीमारी को अगर अनदेखा किया जाए या सही समय पर इसका अंदरूनी इलाज न मिले, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • पूर्ण अंधापन (Complete Blindness): नसों के बार-बार फटने और रेटिना डैमेज होने से आँखों की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती है।
  • रेटिना का उखड़ना (Retinal Detachment): बीमारी बढ़ने पर आँखों में स्कार टिश्यू (Scar tissue) बन जाते हैं, जो रेटिना को उसकी जगह से खींचकर उखाड़ देते हैं।
  • आँखों का प्रेशर बढ़ना (Neovascular Glaucoma): नई नसों के बनने से आँखों से तरल बाहर निकलने का रास्ता बंद हो जाता है, जिससे भयंकर दर्द और प्रेशर बढ़ता है।
  • मानसिक तनाव और डिप्रेशन: नज़र कमज़ोर होने से इंसान का अपना रोज़मर्रा का काम करना मुश्किल हो जाता है, जिससे वह डिप्रेशन का शिकार हो जाता है।

समय पर डॉक्टर से परामर्श और उचित आयुर्वेदिक इलाज लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से डायबेटिक रेटिनोपैथी सिर्फ आँखों की दिक्कत नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'मधुमेहजन्य तिमिर' (Madhumehajanya Timira) या 'दृष्टि दोष' की श्रेणी में रखा जाता है। यहाँ यह माना जाता है कि जब अनियंत्रित मधुमेह (Diabetes) के कारण शरीर में वात और पित्त दोष बुरी तरह बिगड़ जाते हैं और 'रक्त धातु' (Blood) दूषित हो जाती है, तो यह 'दृष्टि पटल' (Retina) की बारीक नसों (सिराओं) को कमज़ोर कर देती है। 

डॉक्टर नाड़ी देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। वे ढूँढते हैं कि कहीं पेट में 'आम' यानी टॉक्सिन्स तो नहीं जमा हो गए हैं, जिसने खून को गाढ़ा और अशुद्ध कर दिया है। जब तक यह अशुद्ध रक्त और बढ़ा हुआ शुगर शरीर में रहेगा, आँखों की नसें बार-बार रिसती रहेंगी। आयुर्वेद में बस लेज़र से नसों को जलाना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, शुगर कंट्रोल हो, आँखों को अंदर से पोषण (Nutrition) मिले, पाचन सुधरे और रेटिना प्राकृतिक रूप से मज़बूत बने।

डायबेटिक रेटिनोपैथी के लिए महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में खून को साफ़ करने, शुगर कंट्रोल करने और आँखों की नसों को मज़बूती देने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • आमलकी (Amla): आयुर्वेद में इसे 'चक्षुष्य' (आँखों के लिए सर्वश्रेष्ठ) माना गया है। यह विटामिन सी से भरपूर है, जो शुगर को कंट्रोल करता है और आँखों की नसों की सूजन को ख़त्म करता है।
  • त्रिफला (Triphala): यह तीन जड़ी-बूटियों का मिश्रण है जो पेट को साफ़ करता है, पित्त दोष को शांत करता है और आँखों की रोशनी तेज़ी से बढ़ाता है।
  • पुनर्नवा (Punarnava): यह रेटिना में भरे हुए अतिरिक्त पानी (Macular Edema) को प्राकृतिक रूप से सोखने और सूजन उतारने में अचूक है।
  • गुडूची (गिलोय/Giloy): यबेहतरीन इम्यूनिटी बूस्टर है और रक्त शर्करा (Blood Sugar) को संतुलित कर खून की अशुद्धियों को दूर करती है।

आयुर्वेदिक थैरेपीज़ 

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, टॉक्सिन्स बाहर निकालकर और आँखों को पोषण देने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • गहरी सफाई और दृष्टि पोषण: जब रेटिनोपैथी पुरानी हो और नज़र लगातार गिर रही हो, तो जीवा आयुर्वेद में नेत्र तर्पण और विरेचन जैसी पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय: यह 7 से 21 दिनों तक चलने वाली शरीर के अंदरूनी अंगों और आँखों की गहरी सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • टॉक्सिन्स बाहर निकालना (विरेचन): 'विरेचन' प्रक्रिया में मरीज़ को औषधीय जड़ी-बूटियाँ देकर पेट साफ़ कराया जाता है। इससे खून में जमा अतिरिक्त शुगर, बढ़ा हुआ पित्त और 'आम' पूरी तरह बाहर निकल जाता है।
  • नसों को मज़बूत करने के लिए नेत्र तर्पण: आँखों के चारों ओर उड़द की दाल का घेरा बनाकर उसमें औषधीय सिद्ध घी को कुछ देर रोककर रखा जाता है (नेत्र तर्पण)। यह शुद्ध घी आँखों के पर्दे और सूखी हुई नसों तक गहराई से पहुँचकर उन्हें पोषण, चिकनाई और ताक़त देता है।

डायबिटीज़ और आँखों के रोगी के लिए शुद्ध आहार

क्या खाएँ?

  • ताज़ा और हल्का भोजन: लौकी, तोरई, परवल, मूंग की दाल और करेले का इस्तेमाल बढ़ाएँ, यह शुगर को कंट्रोल करते हैं।
  • गाय का घी और आँवला: अपने रोज़मर्रा के आहार में थोड़ा सा शुद्ध गाय का घी और ताज़ा आँवला ज़रूर शामिल करें, यह आँखों के लिए अमृत है।
  • साबुत अनाज: जौ (Barley), ज्वार और बाजरा खाएँ, ये धीरे-धीरे पचते हैं और ब्लड में एकदम से शुगर नहीं बढ़ाते।

क्या न खाएँ?

  • मीठा और रिफाइंड चीज़ें: चीनी, मिठाइयाँ, कोल्ड ड्रिंक, और मैदा से बनी चीज़ों का सेवन बिल्कुल बंद कर दें।
  • खट्टी और मसालेदार चीज़ें: ज़्यादा मिर्च-मसाले, अचार, और खट्टी चीज़ें पित्त को भड़काती हैं, जिससे आँखों में भारी जलन और सूजन बढ़ती है।
  • बासी और जंक फूड: पिज़्ज़ा, बर्गर, और फ्रिज में रखा बासी खाना बिल्कुल न खाएँ, क्योंकि ये शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ाते हैं और रक्त को दूषित करते हैं।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में रेटिनोपैथी की समस्या का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बीमारी और शरीर की स्थिति: ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे शुगर कितनी अनियंत्रित है, आँखों का पर्दा कितना डैमेज हो चुका है, और मरीज़ की एलोपैथिक दवाओं पर निर्भरता कितनी ज़्यादा है।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर बीमारी की शुरुआत है, तो शुगर कंट्रोल होने के साथ आमतौर पर 1 से 2 महीने में धुँधलापन कम होने लगता है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर बीमारी सालों पुरानी है, बार-बार खून आता है या लेज़र हो चुका है, तो नसों को पूरी तरह पोषण मिलने और शुगर संतुलित होने में 6 से 12 महीने भी लग सकते हैं।
  • उपचार का तरीका: इस प्राकृतिक इलाज में मुख्य रूप से पित्त-शामक और शुगर कंट्रोल करने वाली जड़ी-बूटियाँ, पंचकर्म (नेत्र तर्पण), सही डाइट और योग शामिल होता है।
  • स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर अपनी डाइट का कड़ाई से पालन करता है, तो ब्लड शुगर नॉर्मल रहता है और भविष्य में लेज़र सर्जरी के बिना भी आँखों की रोशनी सुरक्षित रहती है।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम रेनू लूम्बा है, मेरी उम्र 60 साल है और मैं पेशे से टीचर रही हूँ। मुझे पिछले 25 सालों से सेहत से जुड़ी कुछ समस्याएं रहती थीं और मैं बॉर्डरलाइन डायबिटीज पर थी। लेकिन इसी साल जनवरी में जब मैंने टेस्ट करवाया, तो मेरी डायबिटीज अचानक बहुत ज़्यादा निकली। हम बहुत घबरा गए थे। एलोपैथिक डॉक्टर ने दवाइयाँ बताईं, लेकिन हम एलोपैथी शुरू नहीं करना चाहते थे क्योंकि हमें पता था कि वो दवाइयां उम्र भर खानी पड़ेंगी। मेरे हस्बैंड हमेशा टीवी पर डॉक्टर प्रताप चौहान जी को फॉलो करते थे, तो उन्होंने सुझाव दिया कि हमें जीवा चलना चाहिए। 

हम जीवा के कालकाजी क्लिनिक गए, जहाँ हमें डायबिटीज मैनेजमेंट प्रोग्राम के बारे में पता चला। उस प्रोग्राम के तहत मेरे हाथ पर 15 दिन के लिए एक सेंसर लगाया गया, जो यह मॉनिटर करता था कि किस चीज को खाने से मेरा शुगर लेवल अप-डाउन हो रहा है। 

मॉनिटरिंग के बाद मेरी दवाइयां शुरू की गईं और उसके बहुत अच्छे परिणाम आए। मेरा HbA1c जो पहले 8.2 था, अब घटकर 6.4 आ गया है। मैं जीवा की मेडिसिंस और उनके द्वारा दिए गए डाइट चार्ट से बहुत खुश हूँ। 4 महीने के पैकेज के बाद मैं खुद को बहुत हेल्दी, एक्टिव और एनर्जेटिक महसूस कर रही हूँ। मैं डॉक्टर प्रताप चौहान और जीवा की पूरी टीम की बहुत शुक्रगुजार हूँ क्योंकि यहाँ पर्सनल अटेंशन दी जाती है। मैं आप सबसे भी यही कहूँगी कि अगर आपको डायबिटीज की प्रॉब्लम है, तो प्लीज जीवा जॉइन कीजिए।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

डायबेटिक रेटिनोपैथी में आधुनिक और आयुर्वेदिक इलाज का नज़रिया बिल्कुल अलग है:

  • आधुनिक चिकित्सा: यह बीमारी को बाहर से कंट्रोल करने और लेज़र के ज़रिए रिसती हुई नसों को जलाकर बंद करने (Photocoagulation) पर काम करती है। स्टेरॉयड के इंजेक्शन पर्दे की सूजन को कुछ समय के लिए कम कर देते हैं। लेकिन यह बीमारी की जड़ यानी हाई शुगर और दूषित रक्त को ख़त्म नहीं करता। कुछ समय बाद रेटिना की दूसरी नसें रिसने लगती हैं और बीमारी फिर से वापस आ जाती है।
  • आयुर्वेदिक चिकित्सा: आयुर्वेद बीमारी की असली वजह यानी बिगड़े हुए मेटाबॉलिज़्म, रक्त की अशुद्धि और वात-पित्त के असंतुलन को ख़त्म करता है। इसमें जड़ी-बूटियों (आमलकी, गिलोय) और पंचकर्म के ज़रिए शरीर का शुगर लेवल नॉर्मल किया जाता है और नसों को अंदर से पोषण दिया जाता है। इसमें थोड़ा समय लगता है, लेकिन रेटिना की ताक़त प्राकृतिक रूप से ऐसी बन जाती है कि नसों का रिसना बंद हो जाता है और नज़र स्थायी रूप से सुरक्षित रहती है।

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

आँखों की समस्या होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • अचानक से आँखों के सामने बहुत सारे काले धब्बे या जाले तैरते हुए दिखाई दें।
  • किसी एक आँख या दोनों आँखों की रोशनी अचानक कम होने लगे।
  • सीधी लाइनें टेढ़ी-मेढ़ी या लहरदार दिखने लगें।
  • आँखों में तेज़ दर्द हो या भारीपन महसूस हो।
  • शुगर लेवल लगातार हाई रहे और दवाइयों से भी कंट्रोल न हो रहा हो।

समय पर सलाह लेने से रोग का सही निदान होता है और रेटिना को स्थायी रूप से डैमेज होने या अंधेपन से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से डायबिटीज़ में नज़र कमज़ोर होने (Diabetic Retinopathy) की समस्या मुख्य रूप से अनियंत्रित रक्त शर्करा, दूषित रक्त और पित्त दोष के बिगड़ने से जुड़ी होती है। गलत खान-पान, बहुत ज़्यादा मीठा खाने, तनाव लेने और पेट ख़राब रहने से शरीर में टॉक्सिन्स ('आम') बनते हैं जो आँखों की बारीक सिराओं (नसों) को डैमेज कर देते हैं। यही नसें पर्दे (रेटिना) पर रिसकर सूजन और खून भर देती हैं। सिर्फ लेज़र से नसों को जला देने से कुछ देर के लिए पर्दा साफ़ हो जाता है लेकिन बीमारी अंदर ही रहती है। इलाज में शुगर को कंट्रोल करना और नसों को पोषण देना सबसे ज़्यादा आवश्यक है। इसमें दोषों को संतुलित करना, ताज़ा और हल्का खाना खाना, आमलकी और गिलोय जैसी जड़ी-बूटियाँ इस्तेमाल करना, और पंचकर्म (नेत्र तर्पण) युक्त दिनचर्या अपनाना शामिल है जिससे बीमारी को जड़ से ठीक किया जा सके और आँखों की रोशनी बची रहे।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

ज़रूरी नहीं, लेकिन अगर शुगर लंबे समय तक अनियंत्रित (Uncontrolled) रहे, तो रेटिनोपैथी होने का ख़तरा बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है।

अगर रेटिना पूरी तरह से डैमेज (Detached) हो गया है, तो रोशनी वापस लाना मुश्किल है। इसलिए शुरुआती लक्षणों में ही आयुर्वेदिक इलाज और शुगर कंट्रोल करना बहुत ज़रूरी है।

हाँ, हाई ब्लड शुगर आँखों के लेंस में तरल पदार्थ जमा कर देता है, जिससे डायबिटीज़ के मरीज़ों में कम उम्र में ही मोतियाबिंद हो जाता है।

हाँ, त्रिफला चूर्ण या त्रिफला घृत आँखों के स्वास्थ्य के लिए सबसे बेहतरीन आयुर्वेदिक औषधियों में से एक है, यह रोशनी बढ़ाता है।

नहीं, अगर आप जड़ से आयुर्वेदिक इलाज करते हैं और अपनी शुगर व डाइट को कंट्रोल में रखते हैं, तो भारी दवाइयों और आई ड्रॉप्स पर निर्भरता ख़त्म की जा सकती है।

आमतौर पर शुरुआती स्टेज में आँखें लाल नहीं होतीं, लेकिन अगर नई नसें फट जाएं तो आँखों के अंदर भारी खून भर जाता है जिससे आँखें लाल हो सकती हैं।

नहीं, यह समस्या चश्मे के नंबर (Refractive error) की नहीं, बल्कि आँखों के पर्दे (Retina) के डैमेज होने की है, इसलिए सिर्फ चश्मा लगाने से यह ठीक नहीं होती।

बिल्कुल, वज़न (मोटापा) कम करने से शरीर में इंसुलिन का रिस्पॉन्स बेहतर होता है, जिससे ब्लड शुगर प्राकृतिक रूप से कंट्रोल में आ जाती है।

हाँ, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार सुबह ओस वाली घास पर नंगे पैर चलने से पैरों की नसों के ज़रिए आँखों को ठंडक मिलती है और पित्त शांत होता है।

स्क्रीन ज़्यादा देखने से रेटिनोपैथी सीधे तौर पर नहीं बढ़ती, लेकिन इससे आँखें सूख (Dry Eyes) जाती हैं और थकावट होती है, जो कमज़ोर रेटिना के लिए और ज़्यादा नुक़सानदायक साबित हो सकता है।

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