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Hormonal Imbalance के Early Signs जिन्हें अक्सर Normal समझ लिया जाता है

Information By Dr. Keshav Chauhan

आजकल की भागदौड़ और तनाव भरी ज़िंदगी में हार्मोनल इंबैलेंस (Hormonal Imbalance) एक आम समस्या बन गया है। हम अक्सर थकान, वज़न बढ़ने, बालों के झड़ने या मुँहासों को काम का तनाव मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। ये छोटे बदलाव दरअसल शरीर में हार्मोन्स के बिगड़ने के शुरुआती संकेत (Early signs) होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, गलत खान-पान और खराब दिनचर्या से शरीर के वात, पित्त और कफ दोष असंतुलित हो जाते हैं, जो हमारे एंडोक्राइन सिस्टम पर भारी असर डालते हैं। समय पर इन संकेतों को पहचानकर आयुर्वेदिक जीवनशैली अपनाने से इस बीमारी को जड़ से रोका जा सकता है।

हार्मोनल इंबैलेंस (Hormonal Imbalance) और इसके शुरुआती संकेत क्या हैं?

हार्मोन्स हमारे शरीर के केमिकल मैसेंजर होते हैं, जो खून के ज़रिए शरीर के अलग-अलग अंगों तक पहुँचकर भूख, नींद, भावनाएँ और मेटाबॉलिज़्म को कंट्रोल करते हैं। जब शरीर में इन हार्मोन्स (जैसे थायरॉइड, इंसुलिन, एस्ट्रोजन या कॉर्टिसोल) का स्तर ज़रूरत से ज़्यादा या कम हो जाता है, तो इसे हार्मोनल इंबैलेंस कहते हैं। शुरुआती दौर में इसके लक्षण इतने आम होते हैं कि लोग इन्हें 'नॉर्मल' समझकर गैस, थकान या कमज़ोरी की दवा खाने लगते हैं। आधुनिक चिकित्सा में इसके लिए भारी हार्मोनल पिल्स (Hormonal Pills) दी जाती हैं, जो बाहरी रूप से हार्मोन्स को बदलती हैं, लेकिन जड़ से एंडोक्राइन सिस्टम को ठीक नहीं करतीं। बिना डॉक्टर की सलाह के लगातार दवा खाना लिवर और पाचन पर बुरा असर डालता है।

हार्मोनल इंबैलेंस से जुड़ी मुख्य बीमारियाँ कौन सी हैं?

हार्मोन्स के असंतुलन से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ देखी जाती हैं:

  • पीसीओएस/पीसीओडी (PCOS/PCOD): महिलाओं में ओवरी के अंदर गांठे बनना और पीरियड्स का अनियमित होना।
  • थायरॉइड (Hypothyroidism/Hyperthyroidism): मेटाबॉलिज़्म का धीमा या बहुत तेज़ हो जाना, जिससे वज़न और ऊर्जा पर सीधा असर पड़ता है।
  • इंसुलिन रेजिस्टेंस (Insulin Resistance): ब्लड शुगर का अनियंत्रित होना, जो आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज़ बन जाता है।
  • एड्रिनल फटीग (Adrenal Fatigue): भारी तनाव के कारण कॉर्टिसोल का स्तर बिगड़ना, जिससे हमेशा भयंकर थकान रहती है।

Hormonal Imbalance के Early Signs (जिन्हें हम नज़रअंदाज़ करते हैं)

अस्थायी इलाज से आराम मिलने के बाद इन लक्षणों का बार-बार लौट आना हार्मोन बिगड़ने का संकेत हो सकता है:

  • अचानक वज़न बढ़ना (खासकर पेट पर): कम खाने के बावजूद पेट के आस-पास चर्बी (Belly fat) का तेज़ी से जमा होना (इंसुलिन/कॉर्टिसोल असंतुलन)।
  • लगातार थकान और सुस्ती: 8 घंटे की नींद के बाद भी सुबह उठते ही शरीर का टूटा हुआ महसूस होना (थायरॉइड/एड्रिनल समस्या)।
  • बालों का झड़ना और रूखी त्वचा: कंघी करते समय बालों का गुच्छों में गिरना और चेहरे पर अचानक भारी मुँहासे आना।
  • मूड स्विंग्स और चिड़चिड़ापन: छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना, एंग्जायटी और रोने का मन करना।
  • नींद न आना (Insomnia): रात भर करवटें बदलना और दिमाग का शांत न हो पाना।
  • अनियमित पीरियड्स: महिलाओं में मासिक धर्म का समय पर न आना या बहुत ज़्यादा दर्द होना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

बार-बार हार्मोन बिगड़ने के कारण (वात, पित्त और कफ वृद्धि)

हार्मोनल इंबैलेंस के पीछे सिर्फ बाहरी कारण नहीं, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं:

  • दोषों का असंतुलन: शरीर में वात (तनाव), पित्त (गर्मी) और कफ (मोटापा) के बिगड़ने से ग्रंथियों (Glands) का काम रुक जाता है।
  • खराब पाचन और 'आम': पेट साफ न होने से शरीर में विषैले टॉक्सिन्स (आम) बनते हैं, जो हार्मोन्स के रास्ते को ब्लॉक कर देते हैं।
  • चीनी और रिफाइंड कार्ब्स: बहुत ज़्यादा मीठा और मैदा खाने से इंसुलिन एकदम से बढ़ता और घटता है, जो पूरे हार्मोनल सिस्टम को हिला देता है।
  • मानसिक तनाव (Stress): लगातार चिंता करने से कॉर्टिसोल हार्मोन हमेशा हाई रहता है, जो बाकी अच्छे हार्मोन्स को बनने से रोकता है।
  • नींद की कमी: रात में देर तक जागने से शरीर की प्राकृतिक बायोलॉजिकल क्लॉक (Circadian rhythm) बिगड़ जाती है।

Hormonal Imbalance के जोखिम और गंभीर जटिलताएँ

इस असंतुलन को अगर 'नॉर्मल' मानकर छोड़ दिया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • बांझपन (Infertility): महिलाओं और पुरुषों में प्रजनन क्षमता कमज़ोर हो जाती है।
  • मोटापा और डायबिटीज़: इंसुलिन के बिगड़ने से इंसान गंभीर मोटापे और शुगर का शिकार हो जाता है।
  • हड्डियों की कमज़ोरी (Osteoporosis): एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरोन की कमी से हड्डियाँ भुरभुरी होकर जल्दी टूटने लगती हैं।
  • मानसिक अवसाद (Depression): लगातार बिगड़े हुए हार्मोन्स इंसान को गहरे डिप्रेशन और एंग्जायटी का शिकार बना देते हैं।

समय पर डॉक्टर से परामर्श लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

हार्मोनल असंतुलन (दोष प्रकोप) पर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से हार्मोनल इंबैलेंस सिर्फ केमिकल की कमी या अधिकता नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'रस धातु क्षय', 'अग्निमांद्य' और तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) के असंतुलन की श्रेणी में रखा जाता है। जब हमारी पाचक अग्नि कमज़ोर होती है, तो शरीर को सही पोषण (रस) नहीं मिलता और ग्रंथियाँ (Glands) काम करना धीमा कर देती हैं। बढ़ा हुआ वात दिमाग को अशांत करता है, पित्त खून को दूषित करता है और कफ मेटाबॉलिज़्म को रोक देता है। डॉक्टर नाड़ी देखकर ढूँढते हैं कि शरीर का कौन सा दोष सबसे ज़्यादा बिगड़ा हुआ है। आयुर्वेद में बस बाहरी पिल्स (Pills) देना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि अग्नि सुधरे, टॉक्सिन्स बाहर निकलें और एंडोक्राइन सिस्टम प्राकृतिक रूप से अपना काम दोबारा शुरू करे।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण क्या है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति का शरीर और स्वास्थ्य अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: थकान, वज़न बढ़ने और मूड स्विंग्स के समय की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: पुरानी रिपोर्ट और इस्तेमाल की गई हार्मोनल पिल्स का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • जीवनशैली का विश्लेषण: रोज़ाना के खान-पान, सोने के समय और तनाव के स्तर को परखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: दोषों के असंतुलन को पकड़ने के बाद ही मेटाबॉलिज़्म को सही करने का सबसे सटीक इलाज शुरू किया जाता है।

हार्मोन्स को संतुलित करने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में मेटाबॉलिज़्म को सुधारने, तनाव कम करने और हार्मोन्स को बैलेंस करने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • अश्वगंधा (Ashwagandha): यह नर्वस सिस्टम को ताक़त देती है, कॉर्टिसोल (तनाव हार्मोन) को कम करती है और थायरॉइड के काम को सुधारती है।
  • शतावरी (Shatavari): महिलाओं के हार्मोनल इंबैलेंस (PCOS/पीरियड्स) को ठीक करने और प्रजनन तंत्र को मज़बूत करने के लिए यह सर्वश्रेष्ठ औषधि है।
  • कांचनार (Kanchanar): यह शरीर की ग्रंथियों (Glands) की सूजन को खत्म करती है और पीसीओडी या थायरॉइड जैसी समस्याओं को जड़ से काटती है।
  • ब्राह्मी (Brahmi): यह भयंकर मूड स्विंग्स, एंग्जायटी और नींद न आने की समस्या को दूर कर दिमाग को शांत करती है।

हार्मोनल बैलेंस के लिए पंचकर्म: दोष शोधन और मेटाबॉलिज़्म सुधार

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, एंडोक्राइन सिस्टम को वापस ट्रैक पर लाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • विरेचन और शिरोधारा: जब हार्मोनल इंबैलेंस सालों पुराना हो और बाहरी दवाएँ काम न कर रही हों, तो पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय: यह 7 से 21 दिनों तक चलने वाली शरीर के गहरे डिटॉक्स की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • पित्त और टॉक्सिन्स का डिटॉक्स (विरेचन): औषधीय घी पिलाकर लिवर और आँतों में जमे टॉक्सिन्स को मल के रास्ते बाहर निकाला जाता है, जिससे हार्मोन्स का उत्पादन सही होता है।
  • तनाव मुक्ति के लिए शिरोधारा: माथे पर औषधीय तेल की लगातार धार गिराई जाती है, जो पिट्यूटरी ग्रंथि (Pituitary Gland) को रिलैक्स कर कॉर्टिसोल को तेज़ी से घटाती है।

Hormonal Imbalance के रोगी के लिए सही और शुद्ध आहार

हार्मोन्स को प्राकृतिक रूप से बैलेंस करने के लिए दोषों को शांत करने वाला, सुपाच्य और सात्विक आहार चुनना महत्वपूर्ण है:

क्या खाएँ?

  • हल्का और स्निग्ध भोजन: पुराना चावल, मूंग की दाल और शुद्ध देसी घी का इस्तेमाल बढ़ाएँ, यह हार्मोन्स बनाने वाले हेल्दी फैट्स देते हैं।
  • सीड साइकलिंग (Seed Cycling): अलसी (Flax), कद्दू (Pumpkin) और तिल के बीजों का सेवन करें, ये प्राकृतिक रूप से एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन को बैलेंस करते हैं।
  • गर्म तासीर वाले मसाले: खाने में दालचीनी, मेथी और हल्दी का प्रयोग ज़रूर करें, ये इंसुलिन को कंट्रोल करते हैं।

क्या न खाएँ?

  • मैदा और चीनी: बिस्किट, कोल्ड ड्रिंक और पैकेटबंद मीठी चीज़ें बिल्कुल बंद कर दें, ये इंसुलिन को बिगाड़ कर हार्मोन्स का भारी नुकसान करते हैं।
  • सोया उत्पाद: ज़्यादा सोया चंक्स या कच्चा सोयाबीन खाने से थायरॉइड और एस्ट्रोजन हार्मोन बुरी तरह प्रभावित होते हैं।
  • प्लास्टिक में रखा गर्म खाना: प्लास्टिक के डिब्बों में गर्म खाना खाने से केमिकल (BPA) शरीर में जाकर नकली हार्मोन्स (Endocrine disruptors) का काम करते हैं, इनसे बचें।

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच कैसे होती है

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच पूरी समझ के साथ की जाती है। यहाँ कोशिश होती है कि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जाए।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी, थकान और शुरुआती लक्षणों को आराम से सुना जाता है।
  • आपकी पुरानी रिपोर्ट और हार्मोनल पिल्स के इस्तेमाल के बारे में पूछा जाता है।
  • आपके खाने-पीने और मीठी चीज़ें लेने की आदतों को समझा जाता है।
  • आपकी नींद, मासिक धर्म (महिलाओं में), तनाव और वज़न बढ़ने की स्थिति पर ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति को जाना जाता है।

इन सब चीज़ों को समझने के बाद आपके लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो आपके हार्मोन्स को प्राकृतिक रूप से संतुलित करे।

जीवा आयुर्वेद से संपर्क कैसे करें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे +919266714040 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

हार्मोन्स की समस्या का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बीमारी और शरीर की स्थिति: ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे असंतुलन कितना पुराना है और पिल्स पर निर्भरता कितनी ज़्यादा है।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर शुरुआती संकेत हैं, तो आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों में ही ऊर्जा का स्तर सुधरने लगता है और मूड स्विंग्स कम हो जाते हैं।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर पीसीओडी या थायरॉइड सालों पुराना है, तो शरीर के मेटाबॉलिज़्म को पूरी तरह प्राकृतिक रूप में आने में 6 महीने से 1 साल लग सकता है।
  • स्थायी परिणाम: आहार, योगासन और प्राकृतिक जीवनशैली का कड़ाई से पालन करने पर हार्मोन्स बैलेंस हो जाते हैं और भविष्य में बिना बाहरी दवाओं के स्वस्थ रहते हैं।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक उपचार और दोष-आधारित आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य सिंथेटिक हार्मोनल पिल्स देकर हार्मोन स्तर को कंट्रोल करना अग्नि सुधारकर, दोष संतुलित कर और एंडोक्राइन सिस्टम को प्राकृतिक रूप से सक्रिय करना
नज़रिया समस्या को केवल हार्मोन या ग्रंथि की बीमारी मानना वात, पित्त, कफ असंतुलन और कमजोर मेटाबॉलिज़्म को मूल कारण मानना
उपचार तरीका Birth control pills, Thyroxine और हार्मोन रिप्लेसमेंट पर निर्भरता अश्वगंधा, शतावरी, कांचनार, पंचकर्म और प्राकृतिक डिटॉक्स से जड़ से सुधार
डाइट और लाइफस्टाइल सीमित डाइट सलाह, मुख्य फोकस दवाइयों पर सात्विक आहार, योग, शिरोधारा, अच्छी नींद और तनाव नियंत्रण पर ज़ोर
लंबा असर दवा छोड़ते ही लक्षण दोबारा लौटने का खतरा हार्मोन्स और मेटाबॉलिज़्म का दीर्घकालिक प्राकृतिक संतुलन

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • बिना ज़्यादा खाए वज़न बेतहाशा बढ़ने लगे या एकदम से गिरने लगे।
  • भारी थकान इतनी ज़्यादा हो कि सुबह बिस्तर से उठने का मन न करे।
  • महिलाओं में पीरियड्स कई-कई महीनों तक न आएँ या भारी ब्लीडिंग हो।
  • लगातार तनाव, डिप्रेशन या मूड में भारी बदलाव रहने लगे जो कंट्रोल न हो रहा हो।

समय पर सलाह लेने से शरीर को गंभीर बीमारियों (जैसे इनफर्टिलिटी या डायबिटीज़) से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के अनुसार हार्मोनल इंबैलेंस (Hormonal Imbalance) शरीर में वात, पित्त और कफ दोषों के असंतुलन और कमज़ोर अग्नि का सीधा परिणाम है। आजकल हम बालों के झड़ने, अत्यधिक थकान, अनियमित नींद और बढ़ते वज़न जैसे शुरुआती संकेतों को 'नॉर्मल' मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जो आगे चलकर थायरॉइड या पीसीओडी बन जाते हैं। बाहरी हार्मोनल पिल्स सिर्फ लक्षणों को दबाती हैं, शरीर को अंदर से ठीक नहीं करतीं। प्राकृतिक जड़ी-बूटियों (अश्वगंधा, शतावरी), सही आहार, और खराब जीवनशैली में बदलाव लाकर हम एंडोक्राइन सिस्टम को फिर से मज़बूत कर सकते हैं और हार्मोनल समस्याओं को जड़ से खत्म कर सकते हैं।

FAQs

हाँ, जब थायरॉइड या एड्रिनल ग्रंथि सही से काम नहीं करतीं और शरीर में कॉर्टिसोल का स्तर बिगड़ जाता है, तो पूरी नींद लेने के बाद भी भयंकर थकान और सुस्ती बनी रहती है।

बिल्कुल, भारी मानसिक तनाव के कारण शरीर लगातार कॉर्टिसोल पैदा करता है, जिससे वात दोष भड़कता है और शरीर के बाकी ज़रूरी हार्मोन्स (जैसे एस्ट्रोजन या टेस्टोस्टेरोन) का बनना रुक जाता है।

हाँ, ज़्यादा मीठा या मैदा खाने से जब शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस (Insulin Resistance) हो जाता है, तो शरीर फैट को जलाने के बजाय सीधे पेट के आस-पास चर्बी के रूप में जमा करने लगता है।

नहीं, अगर मौसम के अलावा भी बाल लगातार झड़ रहे हैं और त्वचा बहुत रूखी है, तो यह थायरॉइड या शरीर में बढ़ा हुआ एण्ड्रोजन (PCOD) हार्मोन होने का एक स्पष्ट शुरुआती संकेत है।

हाँ, मेलाटोनिन (Melatonin) हार्मोन हमें नींद दिलाता है। जब रात में देर तक फोन की नीली रोशनी आँखों पर पड़ती है या वात बढ़ा रहता है, तो यह हार्मोन नहीं बनता और नींद उड़ जाती है।

हाँ, प्लास्टिक में मौजूद रसायन (BPA) शरीर में जाकर एंडोक्राइन डिसरप्टर्स (Endocrine Disruptors) का काम करते हैं, जो हमारे प्राकृतिक हार्मोन्स की नकल करके पूरे सिस्टम को बुरी तरह बिगाड़ देते हैं।

हाँ, अश्वगंधा एक बेहतरीन एडाप्टोजेन (Adaptogen) है जो तनाव कम करता है और महिलाओं व पुरुषों दोनों के थायरॉइड और प्रजनन हार्मोन्स को बिना किसी नुकसान के प्राकृतिक रूप से संतुलित करता है।

बिल्कुल, रिफाइंड चीनी सीधे आपके इंसुलिन को स्पाइक करती है और शरीर में भारी सूजन (पित्त और कफ) पैदा करती है। इसे छोड़ते ही हार्मोन्स तेज़ी से अपनी सही स्थिति में आने लगते हैं।

नहीं, अगर पीरियड्स बार-बार मिस हो रहे हैं या भारी दर्द हो रहा है, तो यह 'रस धातु' की कमज़ोरी और एस्ट्रोजन-प्रोजेस्टेरोन के भारी असंतुलन का शुरुआती संकेत है।

हाँ, आयुर्वेद में कांचनार, शतावरी और पंचकर्म (विरेचन) के ज़रिए शरीर की जमे हुए टॉक्सिन्स को निकाला जाता है और पाचक अग्नि को सुधारकर पीसीओडी को प्राकृतिक रूप से जड़ से ठीक किया जाता है।

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