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IBS और Anxiety — गर्मी में दोनों क्यों बढ़ जाते हैं?

Information By Dr. Keshav Chauhan

गर्मियों का मौसम आते ही सिर्फ पसीना और थकान ही नहीं बढ़ती, बल्कि शरीर के अंदर एक ऐसा भूचाल आता है जो आपके पेट और दिमाग दोनों को एक साथ जकड़ लेता है। अचानक से पेट में मरोड़ उठना, बार-बार टॉयलेट भागने की मजबूरी और उसी वक्त सीने में एक अजीब सी घबराहट महसूस होना कोई इत्तेफाक नहीं है।

जब बाहर का तापमान बढ़ता है, तो शरीर के अंदर का पित्त (गर्मी) भी भड़क उठता है, जो आपकी आंतों की परत को छील देता है और दिमाग की नसों को ओवर-एक्टिव कर देता है। एक तरफ पेट में आग लगी होती है और दूसरी तरफ दिमाग विचारों की आंधी से जूझ रहा होता है।

गर्मी का मौसम पेट और दिमाग पर एक साथ भारी क्यों पड़ता है?

हमारा शरीर मौसम के हर बदलाव पर बहुत गहराई से प्रतिक्रिया देता है। गर्मियों में जब पारा 40 के पार जाता है, तो शरीर के अंदरूनी सिस्टम्स पर भारी दबाव पड़ता है, जिससे आंतें और नर्वस सिस्टम दोनों एक साथ टूट जाते हैं।

  • पित्त का भयंकर प्रकोप: गर्मी सीधे शरीर के पित्त दोष को बढ़ाती है। यह अतिरिक्त गर्मी आंतों की नसों को संवेदनशील बना देती है, जिससे आईबीएस (IBS) के लक्षण अचानक से भड़क उठते हैं।
  • गट-ब्रेन एक्सिस (Gut-Brain Axis) का ओवरलोड: आपकी आंतें और आपका दिमाग एक ही नर्व (Vagus nerve) से जुड़े हैं। पेट की गर्मी और मरोड़ सीधे दिमाग को सिग्नल भेजती है, जिससे बिना बात के एंग्जायटी (Anxiety) शुरू हो जाती है।
  • डिहाइड्रेशन और जठराग्नि: पसीने के कारण शरीर में पानी की कमी हो जाती है। इससे पाचन तंत्र सुस्त पड़ जाता है और भोजन पचने के बजाय आंतों में सड़कर भारी गैस बनाता है।
  • कॉर्टिसोल (Stress Hormone) का ट्रिगर होना: गर्मी की थकावट और बेचैनी शरीर में स्ट्रेस लेवल को बढ़ाती हैं, जो सीधा पाचन और मस्तिष्क का संबंध (Gut-brain connection) बिगाड़ कर आंतों की गति को अनियंत्रित कर देता है।

गर्मी में भड़कने वाली आंतों और बेचैनी की समस्या किन रूपों में सामने आती है?

हर इंसान का शरीर इस तेज़ गर्मी और मानसिक तनाव को अलग-अलग तरीके से हैंडल करता है। शरीर में फैले हुए दोषों के असंतुलन के आधार पर यह दोहरी मार मुख्य रूप से तीन प्रकारों में देखी जाती है:

  • वात-प्रधान मार: इसमें आंतों में भयंकर खुश्की आ जाती है। इंसान को पेट में गैस और ब्लोटिंग के साथ-साथ हर समय एक अज्ञात डर और भविष्य की चिंता सताती रहती है।
  • पित्त-प्रधान मार: जब गर्मी और तनाव एक साथ मिलते हैं, तो इंसान बहुत ज़्यादा चिड़चिड़ा हो जाता है। इसमें बार-बार टॉयलेट जाने की हाज़त होती है और मल के साथ अत्यधिक जलन व कई बार कब्ज़ और डायरिया का बारी-बारी से चक्र चलता है।
  • कफ-प्रधान मार: इस स्थिति में मल में बहुत अधिक चिपचिपापन (Mucus) आता है। इंसान को अत्यधिक सुस्ती रहती है और क्रोनिक फटीग (Chronic fatigue) के साथ-साथ एक गहरा मानसिक अवसाद (Depression) महसूस होता है।

क्या आपका शरीर भी गट-ब्रेन कनेक्शन टूटने के ये अलार्म बजा रहा है?

आंतों की मरोड़ और दिमाग की उलझन रातों-रात एक भयंकर बीमारी नहीं बनती। शरीर बहुत पहले से कई छोटे-छोटे संकेत देने लगता है, जिन्हें हम अक्सर सामान्य थकावट या मौसम का असर मान लेते हैं:

  • सुबह उठते ही टॉयलेट की भागदौड़: आँख खुलते ही पेट में भयंकर मरोड़ उठना और कई बार टॉयलेट जाने के बाद भी पेट का साफ न होना।
  • खाना खाते ही घबराहट: दोपहर का भोजन करते ही अचानक दिल की धड़कन तेज़ हो जाना और सीने में एंग्जायटी और पैनिक (Anxiety and panic) जैसा महसूस होना।
  • पसीने के साथ हॉट फ्लैशेस (Hot Flashes): थोड़ी सी भी गर्मी या तनाव होने पर पूरे शरीर से एकदम से पसीना छूटना और दिमाग का सुन्न पड़ जाना।
  • अनजाना डर और बेचैनी: बिना किसी बड़ी वजह के हमेशा ऐसा महसूस होना कि कुछ बहुत बुरा होने वाला है, जो मानसिक तनाव का सबसे बड़ा अलार्म है।

तुरंत आराम पाने के चक्कर में लोग क्या गलतियाँ करते हैं और उनकी जटिलताएं?

गर्मी की इस भयंकर बेचैनी और पेट की मरोड़ से घबराकर मरीज़ अक्सर ऐसे शॉर्टकट अपना लेते हैं, जो शरीर के लिए तुरंत तो राहत देते हैं लेकिन भविष्य के लिए धीमा ज़हर बन जाते हैं:

  • बर्फ का ठंडा पानी पीना: गर्मी शांत करने के लिए फ्रिज का पानी पीना जठराग्नि को पूरी तरह बुझा देता है। यह पाचन और आयुर्वेद के नियमों का सबसे बड़ा उल्लंघन है, जो आईबीएस को भड़काता है।
  • एंटी-डिप्रेसेंट और एंटासिड का एक साथ सेवन: दिमाग शांत करने की गोलियाँ और पेट की जलन रोकने की दवाइयाँ एक साथ लेना आंतों की प्राकृतिक गति को हमेशा के लिए अपाहिज कर देता है।
  • खाना छोड़ देना या भूखे रहना: पेट खराब होने के डर से मील्स (Meals) स्किप करना, जिससे नसों में रूखापन आता है और घबराहट दोगुनी हो जाती है।
  • भविष्य की जटिलताएं: अगर इन दोनों समस्याओं की जड़ को न काटा जाए, तो आंतें पूरी तरह से कमज़ोर हो जाती हैं और इंसान को सुविधाजनक जीवनशैली के कारण गंभीर डिप्रेशन और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का सामना करना पड़ता है।

आयुर्वेद पेट की गर्मी और दिमाग की उलझन को कैसे देखता है?

आधुनिक विज्ञान जहाँ पेट के डॉक्टर और दिमाग के डॉक्टर को बिल्कुल अलग मानता है, वहीं आयुर्वेद इन दोनों को एक ही धागे से जुड़ा हुआ मानता है।

  • पाचक पित्त और साधक पित्त का भड़कना: पेट का 'पाचक पित्त' जब गर्मी से भड़कता है, तो वह सीधा दिमाग के 'साधक पित्त' (जो भावनाओं को नियंत्रित करता है) को दूषित कर देता है, जिससे गुस्सा और एंग्जायटी बढ़ती है।
  • समान वात की विकृति: आंतों की गति को 'समान वात' चलाता है। तनाव के कारण जब यह वात बेकाबू होता है, तो वह आंतों में भयंकर मरोड़ पैदा करता है।
  • मनोवह स्रोतस में रुकावट: पेट में बना हुआ ज़हरीला 'आम' (Toxins) जब दिमाग की सूक्ष्म नसों (मनोवह स्रोतस) तक पहुँचता है, तो वह विचारों को ब्लॉक कर देता है और इंसान हमेशा भारीपन में रहता है।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण इन दोनों समस्याओं पर कैसे काम करता है?

जीवा आयुर्वेद में हम केवल आपकी आंतों को रोकने वाली गोलियाँ या दिमाग को सुलाने वाली दवाइयाँ नहीं देते। हमारा लक्ष्य उस हाईवे (गट-ब्रेन एक्सिस) को साफ करना है जहाँ से यह बीमारी पनप रही है।

  • आम का पाचन (Toxin removal): सबसे पहले प्राकृतिक औषधियों से आंतों में सालों से जमे हुए 'आम' को पिघलाकर बाहर निकाला जाता है, जिससे आंतों की भारीपन और मरोड़ शांत होती है।
  • नर्वस सिस्टम को शांत करना: दिमाग के ओवर-एक्टिव अलार्म को बंद करने और कॉर्टिसोल के स्तर को नीचे लाने के लिए खास मेध्य (Brain tonic) रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है।
  • दोषों का सटीक संतुलन: गर्मियों में भड़के हुए पित्त को शांत करने के लिए बिल्कुल शीतल (ठंडी) औषधियों का प्रयोग किया जाता है, जो पेट और दिमाग दोनों को एक साथ ठंडक देती हैं।

आंतों को ठंडक और दिमाग को शांति देने वाली आयुर्वेदिक डाइट

आपका खाना ही आपके पेट की आग और दिमाग की शांति का सबसे बड़ा नियंत्रक है। गर्मी के इस मौसम में गट-ब्रेन एक्सिस को ठीक रखने के लिए आपको इस विशेष आयुर्वेदिक डाइट को अपनाना होगा।

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - शीतवीर्य और सुपाच्य) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - गर्मी और मरोड़ बढ़ाने वाले)
अनाज (Grains) पुराना जौ, ओट्स, दलिया, मूंग दाल की पतली खिचड़ी। मैदा, वाइट ब्रेड, पैकेटबंद नूडल्स, भारी और नया चावल।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, परवल, कद्दू, पेठा (हल्के मसालों में पकी हुई)। कच्चा सलाद, अत्यधिक टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च, कटहल।
फल (Fruits) पपीता, सेब (उबला हुआ), अनार, बेल (Bael), मीठे अंगूर। बहुत अधिक खट्टे फल, बिना मौसम के फल, पैकेटबंद मीठे जूस।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी (आंतों के लिए अमृत), कच्ची घानी नारियल का तेल। रिफाइंड ऑयल, बहुत अधिक मक्खन, बार-बार जलाया हुआ बाज़ार का तेल।
पेय पदार्थ (Beverages) बेल का शर्बत, ताज़ा मट्ठा (भुना जीरा डालकर), सौंफ और धनिया का पानी। बहुत ज़्यादा कैफीन (कॉफी), शराब (Alcohol), पैकेटबंद कोल्ड ड्रिंक्स।

दिमाग की उलझन और पेट की मरोड़ को शांत करने वाली चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में प्रकृति ने हमें ऐसे दिव्य रसायन दिए हैं, जो एक ही समय में आपकी आंतों के छालों को भरते हैं और दिमाग के ओवरलोड को जादुई रूप से शांत कर देते हैं:

  • ब्राह्मी (Brahmi): गर्मी और स्ट्रेस के कारण जब दिमाग सुन्न होने लगता है, तो ब्राह्मी (Brahmi) दिमाग की नसों को फौलादी शांति और ठंडक प्रदान करती है।
  • कुटज (Kutaja): आईबीएस के कारण होने वाले भयंकर डायरिया और आंतों की मरोड़ को तुरंत रोकने के लिए कुटज (Kutaja) आयुर्वेद की सबसे शक्तिशाली औषधि है।
  • बिल्व (Bilva / Bael): आंतों की परत (Gut lining) पर जमे हुए ज़हरीले 'आम' को खुरच कर बाहर निकालने और मल को बांधने में बिल्व (Bilva) एक संजीवनी की तरह काम करता है।
  • गिलोय (Giloy): शरीर की अतिरिक्त गर्मी (पित्त) को शांत करने और अति-सक्रिय इम्युनिटी को वापस पटरी पर लाने के लिए गिलोय (Giloy) का सेवन बहुत लाभकारी है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): पेट की खराबी से आई भयंकर कमज़ोरी को दूर करने और स्ट्रेस के हॉर्मोन को गिराने के लिए अश्वगंधा (Ashwagandha) शरीर को तनाव सहने की भारी ताकत देता है।

नसों और आंतों की गर्मी निकालने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब स्ट्रेस और एसिडिटी आंतों की गहराई तक जम चुकी हो और केवल खाने वाली दवाइयाँ असर न कर रही हों, तो पंचकर्म की ये बाहरी थेरेपीज़ पूरे शरीर को तुरंत रीबूट कर देती हैं:

  • शिरोधारा (Shirodhara): माथे के मध्य पर औषधीय तेल की लगातार धारा गिराने की यह जादुई शिरोधारा (Shirodhara) प्रक्रिया ओवरएक्टिव दिमाग को तुरंत शांत कर देती है और एंग्जायटी के अटैक्स को रोकती है।
  • तक्रधारा (Takradhara): गर्मियों में विशेष रूप से औषधीय मट्ठे (Buttermilk) से की जाने वाली यह तक्रधारा (Takradhara) प्रक्रिया दिमाग और पेट दोनों की भयंकर गर्मी को सोख लेती है।
  • विरेचन (Virechana): लिवर और आंतों की डीप-क्लीनिंग के लिए यह प्रक्रिया की जाती है। विरेचन थेरेपी (Virechana therapy) के ज़रिए शरीर से अत्यधिक पित्त (गर्मी) को मल के रास्ते बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे आंतें पूरी तरह शांत हो जाती हैं।

जीवा आयुर्वेद में हम मरीज़ों की जाँच कैसे करते हैं?

हम केवल आपके डायरिया या नींद न आने की बात सुनकर आपको कोई दवा नहीं थमाते। हम आपके तनाव और शरीर के बिगड़े हुए सिस्टम की जड़ तक जाते हैं:

  • नाड़ी परीक्षा: सबसे पहले नाड़ी (Pulse) चेक करके यह समझना कि आपके अंदर प्राण वात और पाचक पित्त का स्तर क्या है और आंतों में 'आम' कितना जमा है।
  • शारीरिक और मानसिक मूल्याँकन: आपकी जीभ पर जमी सफेद परत, वज़न गिरने का पैटर्न, और आपके बात करने की गति (Restlessness) की बहुत बारीकी से जाँच की जाती है।
  • लाइफस्टाइल ऑडिट: आप दिन भर में क्या खाते हैं? क्या आप पित्त शांत करने वाले आहार (Pitta pacifying foods) लेते हैं? इन सभी आदतों का गहराई से विश्लेषण किया जाता है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

हम आपको केवल एक डाइट चार्ट और दवाइयाँ थमाकर अकेला नहीं छोड़ते। इस तनाव-मुक्त और ऊर्जावान जीवन की यात्रा में हम एक सच्चे मार्गदर्शक की तरह हर कदम पर आपके साथ रहते हैं:

  • जीवा से संपर्क करें: बिना किसी संकोच के सीधे हमारे नंबर +919266714040 पर कॉल करें और अपनी बीमारी के बारे में चर्चा शुरू करें।
  • अपॉइंटमेंट फिक्स करें: आप हमारे 80 से भी ज़्यादा क्लिनिक नेटवर्क में आकर आराम से डॉक्टर से आमने-सामने मिल सकते हैं।
  • ऑनलाइन वीडियो कंसल्टेशन: अगर बार-बार टॉयलेट जाने की मजबूरी के कारण घर से निकलना मुश्किल है, तो आप अपने घर बैठे वीडियो कॉल के ज़रिए डॉक्टर से पूरी बात कर सकते हैं।
  • व्यक्तिगत प्लान: आपकी शरीर की प्रकृति के अनुसार खास औषधियाँ, उपयुक्त पंचकर्म थेरेपी और एक व्यक्तिगत डाइट रूटीन तैयार किया जाता है।

आंतों और दिमाग को पूरी तरह शांत होने में कितना समय लगता है?

सालों से खराब पड़े गट-ब्रेन कनेक्शन को दोबारा प्राकृतिक आराम और ऊर्जा की स्थिति में लाने में थोड़ा अनुशासित और लगातार समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: आपकी जठराग्नि मज़बूत होगी। आंतों की मरोड़ और बार-बार टॉयलेट जाने की समस्या में भारी कमी आएगी। दिमाग की बेचैनी शांत होने लगेगी।
  • 3-4 महीने: शरीर के अंदर से 'आम' पूरी तरह साफ हो जाएगा। बिना वजह डर लगने की समस्या (एंग्जायटी) खत्म हो जाएगी और मल बंधकर आना शुरू हो जाएगा।
  • 5-6 महीने: आपका नर्वस सिस्टम और पाचन तंत्र पूरी तरह से रीबूट हो जाएगा। आईबीएस और एंग्जायटी की जड़ कट जाएगी और आप किसी भी मौसम का सामना मज़बूती से कर पाएंगे।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय जरूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएं शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

  • प्रामाणिक पंचकर्म चिकित्सा
  • सात्विक भोजन
  • आधुनिक उपचार सेवाएं
  • आरामदायक आवास
  • जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने वाली कई अन्य सुविधाएं

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताजा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

मरीज़ जीवा आयुर्वेद पर भरोसा क्यों करते हैं?

हम आपको केवल एंटी-डिप्रेसेंट्स और पेट बांधने वाली गोलियों का गुलाम नहीं बनाते, बल्कि आपके शरीर की अपनी प्राकृतिक हीलिंग शक्ति को वापस लाते हैं:

  • जड़ से इलाज: हम सिर्फ बीमारी के लक्षण नहीं दबाते; हम आपकी जठराग्नि को ठीक करते हैं और नसों को अंदर से मज़बूत करते हैं।
  • विशेषज्ञ डॉक्टर: हमारे पास सालों का शानदार अनुभव है। हमने हज़ारों लोगों को आईबीएस, लगातार रहने वाली कब्ज़ और पैनिक अटैक्स के भयंकर जाल से सफलतापूर्वक बाहर निकाला है।
  • कस्टमाइज्ड केयर: आपका आईबीएस वात बढ़ने के कारण है या पित्त के भड़कने से? हमारा इलाज बिल्कुल आपके मूल कारण (Root Cause) पर आधारित होता है।
  • प्राकृतिक और सुरक्षित: एलोपैथिक स्लीपिंग पिल्स और आईबीएस की गोलियाँ आंतों को सुखा देती हैं, जबकि हमारी आयुर्वेदिक औषधियाँ पूरी तरह सुरक्षित हैं।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

आंतों और दिमाग की इन कॉमन बीमारियों को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य आईबीएस के लिए एंटी-स्पास्मोडिक और तनाव के लिए एंटी-डिप्रेसेंट्स देना। प्राण वात को शांत करना, जठराग्नि को बढ़ाना और 'आम' (Toxins) को बाहर निकालना।
शरीर को देखने का नज़रिया पेट और दिमाग को बिल्कुल अलग-अलग बीमारियों के रूप में देखना। इसे पूरे गट-ब्रेन एक्सिस (Gut-Brain Axis) का फेलियर मानना जहाँ दोनों एक-दूसरे को बिगाड़ते हैं।
डाइट और लाइफस्टाइल केवल मसालेदार खाना छोड़ने की सलाह, दिनचर्या या मन की शांति पर कोई खास ज़ोर नहीं। व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार दोष-शामक आहार, मेडिटेशन और स्वस्थ दिनचर्या को ही सबसे बड़ा आधार मानना।
लंबा असर गोलियाँ छोड़ने पर घबराहट, मरोड़ और डायरिया तुरंत वापस आ जाते हैं। शरीर अंदर से इतना मज़बूत हो जाता है कि वह प्राकृतिक रूप से स्ट्रेस को हैंडल करना और मल को बांधना सीख जाता है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद इस गहरी थकावट और आईबीएस को पूरी तरह रिवर्स कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर संकेत दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • मल में ताज़ा खून आना: अगर बार-बार टॉयलेट जाने के साथ मल में लाल खून या डामर (Tar) जैसा काला मल आए (यह अल्सरेटिव कोलाइटिस का संकेत हो सकता है)।
  • बिना वजह तेज़ी से वज़न गिरना: अगर लगातार डायरिया के कारण एक ही महीने में आपका वज़न कई किलो गिर जाए और भयंकर कमज़ोरी आ जाए।
  • असहनीय तेज़ पेट दर्द: अगर पेट में ऐसी भयंकर मरोड़ उठे जो किसी भी पोज़िशन में लेटने पर शांत न हो और साथ में तेज़ बुखार आ जाए।
  • पैनिक अटैक के साथ सीने में भारी दर्द: अगर एंग्जायटी इतनी बढ़ जाए कि छाती में जकड़न हो और बायीं बांह में दर्द जाने लगे (इसे केवल एंग्जायटी न समझें)।

निष्कर्ष

गर्मियों की इस चिलचिलाती धूप में आईबीएस और एंग्जायटी का एक साथ भड़कना कोई मामूली मौसम का बदलाव नहीं है। यह आपके शरीर का वह चीखता हुआ अलार्म है जो बता रहा है कि आपके पेट की आग और दिमाग की नसें पूरी तरह से अपना संतुलन खो चुकी हैं। जब आप इस अलार्म को केवल एंटासिड की गोलियों, एंटी-डिप्रेसेंट्स और कैफीन के घूँट से दबाने की कोशिश करते हैं, तो आप अपने गट-ब्रेन कनेक्शन को हमेशा के लिए अपाहिज कर देते हैं। इस खतरनाक चक्र से बाहर निकलें। अपनी डाइट में गाय का घी, बेल का शर्बत और ताज़ी सब्ज़ियाँ शामिल करें। ब्राह्मी, कुटज और गिलोय जैसी दिव्य आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और पंचकर्म की तक्रधारा व विरेचन थेरेपी से अपने शरीर के ज़हर और भयंकर गर्मी को बाहर निकालें। इस दोहरी मार से राहत पाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

FAQs

गर्मियों में बाहर के तापमान के साथ शरीर का पित्त (गर्मी) भी बढ़ जाता है। यह बढ़ा हुआ पित्त आंतों की परत को संवेदनशील बना देता है और जठराग्नि को कमज़ोर कर देता है, जिससे भोजन पचने के बजाय आंतों में मरोड़ और डायरिया पैदा करता है।

बिल्कुल। पेट और दिमाग गट-ब्रेन एक्सिस के ज़रिए सीधे जुड़े होते हैं। आंतों में बनने वाला ज़हरीला आम जब नसों के ज़रिए दिमाग तक पहुँचता है, तो वह स्ट्रेस हॉर्मोन को बढ़ा देता है, जिससे बिना वजह डर, एंग्जायटी और डिप्रेशन महसूस होता है।

नहीं। दही तासीर में गर्म (उष्ण) और पचने में भारी (गुरु) होता है। आईबीएस के मरीज़ों को दही खाने से आंतों में चिपचिपाहट और मरोड़ बढ़ सकती है। दही की जगह घर का ताज़ा बना हुआ मट्ठा (छाछ) भुने हुए जीरे के साथ पीना सबसे बेहतरीन है।

इसे आयुर्वेद में गैस्ट्रो-कोलिक रिफ्लेक्स का अति-सक्रिय होना कहा जाता है। जब नर्वस सिस्टम और आंतें कमज़ोर होती हैं, तो पेट में खाना पहुँचते ही दिमाग को तुरंत मल त्यागने का गलत सिग्नल मिलता है, जिससे घबराहट के साथ टॉयलेट भागना पड़ता है।

शत-प्रतिशत। गर्मी से राहत पाने के लिए फ्रिज का बर्फ वाला पानी पीने से जठराग्नि (पाचन की आग) पूरी तरह बुझ जाती है। इससे आंतों की नसें अचानक सिकुड़ जाती हैं (Spasm), जिससे भयंकर मरोड़ और गैस की समस्या ट्रिगर हो जाती है।

हाँ, कैमोमाइल टी नर्वस सिस्टम को शांत करने में मदद करती है, लेकिन अगर आपको आईबीएस के कारण भयंकर डायरिया है, तो बहुत अधिक हर्बल चाय पीने से पेट और ज़्यादा खराब हो सकता है। ऐसे में धनिया या सौंफ का पानी ज़्यादा सुरक्षित और असरदार है।

बिल्व (Bael) आयुर्वेद में आंतों के लिए अमृत है। यह आंतों की चिपचिपाहट (Mucus) को सोखता है, अल्सर को भरता है और मल को बांधने (ग्राही) का काम करता है। गर्मियों में इसका शर्बत पेट को जादुई ठंडक और मरोड़ से तुरंत राहत देता है।

आईबीएस के मरीज़ों को फलों का जूस पीने से बचना चाहिए क्योंकि इसमें फाइबर नहीं होता और यह आंतों में जाकर तेज़ी से फरमेंट (Ferment) होकर गैस बनाता है। जूस की जगह पूरा फल (जैसे पपीता या सेब) चबाकर खाना ज़्यादा फायदेमंद है।

हाँ। जब पेट में मरोड़ उठती है, तो शरीर का नर्वस सिस्टम (Sympathetic system) अचानक एक्टिव हो जाता है। इसके कारण स्ट्रेस हॉर्मोन तेज़ी से रिलीज़ होता है, जिससे मरीज़ को अचानक हॉट फ्लैशेस और भयंकर पसीना आने लगता है।

तक्राधारा में माथे पर औषधीय मट्ठे की लगातार धारा गिराई जाती है। मट्ठा तासीर में बहुत ठंडा होता है। यह माथे (नर्वस सिस्टम) के ज़रिए पूरे शरीर के प्राण वात और पित्त को शांत करता है, जिससे एंग्जायटी के साथ-साथ आंतों की गर्मी भी जादुई रूप से खत्म हो जाती है।

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