Diseases Search
Close Button
 
 

Mobile देखते हुए खाना खाना — Ayurveda के अनुसार यह ज़हर जैसा क्यों है?

Information By Dr. Keshav Chauhan

आजकल की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में फोन हमारी ऐसी ज़रूरत बन गया है कि इसे खुद से दूर रखना लगभग नामुमकिन सा लगता है। सुबह आँख खुलते ही स्क्रीन और रात को सोने से पहले भी वही स्क्रीन। हद तो तब हो जाती है जब खाना खाते वक्त भी हमारी नज़रें थाली पर नहीं, बल्कि मोबाइल पर टिकी होती हैं। यह आदत इतनी आम हो चुकी है कि इसके नुकसान हमें दिखाई ही नहीं देते।

लेकिन आयुर्वेद की मानें तो खाना सिर्फ पेट भरने का ज़रिया नहीं है, बल्कि यह हमारे शरीर और मन दोनों को पोषण देने का एक तरीका है। जब हम फोन देखते हुए खाते हैं, तो हमारा ध्यान पूरी तरह से भटक जाता है। इससे हमारा हाज़मा कमज़ोर होने लगता है और शरीर को खाने का पूरा फायदा नहीं मिल पाता। सच कहूँ तो, यह छोटी सी दिखने वाली आदत धीरे-धीरे हमारी पूरी सेहत को खोखला कर सकती है।

फोन के साथ खाने की ये नई आदत 

आजकल खाना और मोबाइल मानो एक-दूसरे के बिना अधूरे हो गए हैं। कई लोगों को तो बिना कोई वीडियो देखे या सोशल मीडिया स्क्रॉल किए खाना बेस्वाद लगने लगता है। लगातार आते मेसेजेस और वीडियोज़ के बीच खाना अब एक सोच-समझकर की जाने वाली क्रिया नहीं, बल्कि बस एक आदत बन गई है। धीरे-धीरे ये सब इतना नॉर्मल लगने लगता है कि हमें पता ही नहीं चलता कि इसका कितना बुरा असर हो रहा है। न हमें खाने के स्वाद का पता चलता है और न ही ये अंदाज़ा रहता है कि हमने कितना खा लिया है। 

क्या यह सिर्फ एक आदत है या कोई बड़ी परेशानी? 

अगर आपको लगता है कि यह सिर्फ एक छोटी सी आदत है, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। दरअसल, यह हमारे शरीर और दिमाग के बीच के तालमेल को बिगाड़ने वाली एक बड़ी समस्या है। जब हम बिना ध्यान दिए खाना खाते हैं, तो खाना पेट में तो चला जाता है, लेकिन शरीर उसे ठीक से पचा नहीं पाता। दिमाग कहीं और बिज़ी होता है और शरीर कुछ और कर रहा होता है। इस असंतुलन की वजह से हमारी पाचन शक्ति कमज़ोर पड़ने लगती है, प्राकृतिक भूख का अहसास खत्म होने लगता है और पेट भरा होने पर भी वो संतुष्टि नहीं मिलती जो मिलनी चाहिए। आगे चलकर यही चीज़ पेट की कई बीमारियों की जड़ बन जाती है। 

फोन देखते हुए खाने के असल नुकसान

शुरुआत में भले ही मोबाइल के साथ खाना एक आम बात लगे, लेकिन वक्त के साथ यह हमारे शरीर पर गहरा असर छोड़ता है:

  • पाचन खराब होना: ध्यान न होने की वजह से हम खाने को ठीक से चबाते ही नहीं हैं। नतीजा यह होता है कि पेट भारी लगने लगता है और खाना पचने में दिक्कत होती है।
  • ज़रूरत से कम या ज़्यादा खा लेना: जब आँखें स्क्रीन पर हों, तो दिमाग ये सिग्नल ही नहीं दे पाता कि पेट भर गया है। ऐसे में या तो हम बहुत ज़्यादा खा लेते हैं या फिर बहुत कम।
  • गैस और अपच: आधा-अधूरा पचा हुआ खाना पेट में गैस, एसिडिटी और बेचैनी पैदा करता है।
  • संतुष्टि न मिलना: शरीर और दिमाग का कनेक्शन टूटने की वजह से खाना खाने के बाद भी लगता है कि कुछ अधूरा रह गया है।
  • वज़न बढ़ने का रिस्क: बिना सोचे-समझे खाने से कैलोरी का हिसाब बिगड़ जाता है, जिससे धीरे-धीरे मोटापा बढ़ने लगता है।
  • दिमागी थकान: लगातार स्क्रीन देखने से दिमाग को आराम नहीं मिल पाता, जिससे चिड़चिड़ापन और मानसिक थकान बढ़ जाती है।

'माइंडफुल ईटिंग' (ध्यान से खाना) आखिर है क्या?

माइंडफुल ईटिंग का सीधा सा मतलब है पूरी तरह से खाने पर ध्यान देकर खाना। इसमें आपका शरीर और दिमाग दोनों एक ही जगह मौजूद होते हैं। आप हर एक निवाले को आराम से चबाते हैं, उसके स्वाद, खुशबू और उसकी बनावट को महसूस करते हैं। यह सिर्फ खाने का तरीका नहीं है, बल्कि अपने शरीर की आवाज़ सुनने का तरीका है यह समझना कि कब सच में भूख लगी है और कब पेट भर गया है।

जब आपका पूरा ध्यान खाने पर होता है, तो हाज़मा बेहतर होता है, शरीर खाने से सारे ज़रूरी पोषक तत्व खींच पाता है और सबसे बड़ी बात, एक अजीब सा सुकून मिलता है। इससे आप ओवरईटिंग से भी बच जाते हैं, जिससे वज़न और पेट दोनों सही रहते हैं।

दिमाग और पेट का क्या कनेक्शन है?

आपको शायद पता हो कि हमारे पाचन और दिमाग के बीच एक बहुत गहरा और लगातार चलने वाला कनेक्शन होता है। जब दिमाग का पूरा फोकस खाने पर होता है, तभी हमारा शरीर सही मात्रा में पाचक रस (एंजाइम) छोड़ता है, जिससे खाना अच्छे से पचता है। लेकिन अगर दिमाग फोन में अटका है, तो यह पूरा प्रोसेस बिगड़ जाता है। ऐसे में खाना पचता नहीं, बल्कि पेट में पड़ा रहता है, जिससे गैस और भारीपन जैसी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। 

जल्दी-जल्दी खाने की आदत कैसे पड़ जाती है?

जब थाली से ज़्यादा ध्यान मोबाइल पर होता है, तो हमारे खाने की स्पीड अपने आप तेज़ हो जाती है। हम बस बिना सोचे-समझे जल्दी-जल्दी निवाले निगलते जाते हैं। यह अनजाने में की गई जल्दबाज़ी कब हमारी पक्की आदत बन जाती है, पता ही नहीं चलता। स्क्रीन में बिज़ी होने के कारण हम खाने को चबाना भूल जाते हैं, शरीर के सिग्नल समझ नहीं पाते और बिना रुके बस खाते चले जाते हैं।

आयुर्वेद का नज़रिया: पाचन पर इसका क्या असर होता है?

आयुर्वेद में खाने को बहुत पवित्र माना गया है। आयुर्वेद कहता है कि खाना हमेशा शांत मन से और एक अच्छे माहौल में खाना चाहिए ताकि शरीर उसे पूरी तरह अपना सके।

जब हम फोन में उलझकर खाते हैं, तो इसका सीधा असर हमारी 'पाचन अग्नि' (पेट की उस आग पर जो खाना पचाती है) पर पड़ता है। जब दिमाग कहीं और होता है, तो यह अग्नि कमज़ोर पड़ जाती है। खाना पचने की बजाय पेट में सड़ने लगता है। यही आधा पचा हुआ खाना धीरे-धीरे शरीर में 'आम' यानी एक तरह के ज़हरीले कचरे में बदल जाता है। यह कचरा ही आगे चलकर ढेरों बीमारियों को न्योता देता है।

आयुर्वेद इस समस्या को कैसे ठीक करता है?

फोन देखते हुए खाने से जो 'आम' (गंदगी) शरीर में बनता है, आयुर्वेद उसे सिर्फ ऊपर-ऊपर से ठीक नहीं करता, बल्कि उसकी जड़ पर काम करता है:

  • सबसे पहले, कुछ खास आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के ज़रिए पेट की 'पाचन अग्नि' को दोबारा मज़बूत किया जाता है।
  • फिर शरीर में जमा उस ज़हरीले कचरे को नेचुरल डिटॉक्स के ज़रिए बाहर निकाला जाता है, जिससे शरीर में हल्कापन आ जाए।
  • इसके साथ ही सही समय पर और सही तरीके से खाने (माइंडफुल ईटिंग) की आदत डालवाई जाती है।

पाचन सही रखने के लिए खाने का सही तरीका

आप क्या खा रहे हैं, यह तो ज़रूरी है ही, लेकिन आप 'कैसे' खा रहे हैं, यह उससे भी ज़्यादा मायने रखता है। खाने के कुछ बहुत ही आसान नियम हैं:

  • बिना किसी शोर-शराबे और बिना स्क्रीन के, शांति से बैठकर खाएं।
  • हर निवाले को खूब चबा-चबाकर खाएं ताकि पेट को उसे पचाने में कम मेहनत करनी पड़े।
  • जब सच में तेज़ भूख लगे, तभी खाएं।
  • खाने का एक फिक्स टाइम बनाएं, इससे पाचन का रूटीन सेट रहता है।

पेट को दुरुस्त करने वाली कुछ बेहतरीन आयुर्वेदिक औषधियां

अगर गलत आदतों से हाज़मा बिगड़ ही गया है, तो आयुर्वेद में कुछ ऐसी दवाइयां हैं जो इसे वापस पटरी पर ला सकती हैं:

  • त्रिफला चूर्ण: यह पेट साफ करने और कब्ज़ या भारीपन को दूर करने का सबसे बेहतरीन नुस्खा है।
  • हिंग्वाष्टक चूर्ण: यह पेट की आग को तेज़ करता है और गैस या अपच में तुरंत आराम देता है।
  • जीरकादि वटी: यह भूख को खोलती है और पाचन को एक्टिव करती है।
  • गिलोय (गुडूची): यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है और पेट को भी अंदर से बैलेंस रखती है।

आयुर्वेदिक थेरेपी जो अंदर से सफाई करती हैं

जब हाज़मा बहुत ज़्यादा बिगड़ जाता है, तो दवाओं के साथ-साथ कुछ आयुर्वेदिक थेरेपीज़ भी बहुत काम आती हैं:

  • अभ्यंग (तेल मालिश): जड़ी-बूटियों वाले तेल से मालिश करने से ब्लड सर्कुलेशन अच्छा होता है और शरीर हल्का लगता है।
  • स्वेदन (भाप): हल्की भाप लेने से शरीर की अशुद्धियां पसीने के रास्ते बाहर आ जाती हैं।
  • विरचन: यह एक तरह का डिटॉक्स है जो शरीर से पित्त और जमे हुए 'आम' को बाहर निकालता है।
  • शिरोधारा: दिमाग को शांत करने वाली यह थेरेपी स्ट्रेस कम करती है, जिसका सीधा और अच्छा असर आपके पाचन पर पड़ता है।

निष्कर्ष

मोबाइल देखते हुए खाना एक छोटी और सामान्य लगने वाली आदत है, लेकिन इसका असर शरीर के पाचन तंत्र और संपूर्ण स्वास्थ्य पर गहरा पड़ सकता है। आयुर्वेद के अनुसार, भोजन केवल पेट भरने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि शरीर और मन के संतुलन का आधार है।

जब हम सजग होकर, सही तरीके से और ध्यानपूर्वक भोजन करते हैं, तो पाचन अग्नि मजबूत होती है, शरीर को पूरा पोषण मिलता है और कई समस्याओं से बचाव होता है। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी इस आदत को समझें और धीरे-धीरे उसमें सुधार लाएं, ताकि स्वस्थ और संतुलित जीवन की ओर बढ़ा जा सके।

FAQs

हर बार तुरंत नुकसान महसूस नहीं होता, लेकिन यह आदत धीरे-धीरे पाचन को प्रभावित करती है। जब ध्यान भोजन पर नहीं होता, तो शरीर उसे सही तरीके से पचा नहीं पाता। समय के साथ गैस, भारीपन और अपच जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। इसलिए इसे लंबे समय तक जारी रखना सही नहीं माना जाता।

हाँ, टीवी देखते हुए खाना भी ध्यान भटकाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि मोबाइल ज्यादा व्यक्तिगत और लगातार ध्यान खींचता है। दोनों ही स्थितियों में mindful eating नहीं हो पाता, जिससे पाचन प्रभावित होता है।

बच्चों में यह आदत जल्दी बन जाती है और लंबे समय तक रहती है। इससे उनका पाचन, खाने की आदतें और भूख के संकेत प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए बच्चों को शुरू से ही बिना स्क्रीन के खाना सिखाना जरूरी है।

हाँ, क्योंकि ध्यान भटकने से व्यक्ति जरूरत से ज्यादा खा लेता है। उसे यह समझ नहीं आता कि पेट कब भर चुका है। इससे कैलोरी अधिक हो जाती है और धीरे-धीरे वज़न बढ़ सकता है।

भोजन वही रहता है, लेकिन उसका उपयोग शरीर सही तरीके से नहीं कर पाता। पाचन कमजोर होने से पोषक तत्वों का अवशोषण प्रभावित होता है। इससे शरीर को पूरा लाभ नहीं मिल पाता।

हाँ, लगातार स्क्रीन देखने से दिमाग को आराम नहीं मिलता। भोजन के समय भी यह जारी रहे तो मानसिक थकान और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है। यह मन और शरीर के संतुलन को बिगाड़ सकता है।

कभी-कभार ऐसा करना ज्यादा नुकसान नहीं करता, लेकिन अगर यह रोज की आदत बन जाए तो समस्या बढ़ सकती है। नियमित रूप से mindful eating अपनाना ज्यादा फायदेमंद होता है।

भोजन के समय मोबाइल को दूर रखें और खाने पर ध्यान केंद्रित करें। शुरुआत में थोड़ा मुश्किल लगेगा, लेकिन धीरे-धीरे यह नई आदत बन जाएगी। छोटे-छोटे बदलाव लंबे समय में असर दिखाते हैं।

हाँ, मोबाइल देखने से ध्यान बंट जाता है और व्यक्ति जल्दी-जल्दी खाना खाने लगता है। इससे चबाने की प्रक्रिया अधूरी रह जाती है और पाचन प्रभावित होता है।

हाँ, जब आप ध्यान से और धीरे-धीरे खाते हैं, तो पाचन बेहतर होता है और संतुष्टि भी मिलती है। इससे न केवल पाचन सुधरता है, बल्कि शरीर और मन दोनों में संतुलन आता है।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us