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क्या Ayurveda slow treatment है या root-cause approach?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

जब भी घर में किसी को कोई बीमारी होती है और आयुर्वेदिक इलाज का नाम लिया जाता है, तो सबसे पहला जवाब यही मिलता है,  "आयुर्वेद फायदा तो करता है, लेकिन इसका असर बहुत धीरे होता है।" यह बात हमारे दिमाग में इतनी गहराई से बैठ गई है कि हम आयुर्वेद को सिर्फ लंबी चलने वाली बीमारियों का इलाज मान चुके हैं।

लेकिन क्या आयुर्वेद सच में सिर्फ एक 'स्लो ट्रीटमेंट' (धीमा इलाज) है? या फिर इसके पीछे कोई ऐसा कारण है जिसे हम समझ नहीं पाए हैं? आइए, आज इसी बात को बिल्कुल सुलझाते हैं और जानते हैं कि आयुर्वेद असल में काम कैसे करता है।

आयुर्वेद 'धीमा इलाज' करता है ऐसा क्यों मानते हैं?

इसके पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें हैं, जो हमारी आज की सोच और रहन-सहन से जुड़ी हैं:

1. तुरंत आराम पाने की आदत: आज के ज़माने में हमें हर चीज़ तुरंत चाहिए। अगर सिर में दर्द है, तो हम चाहते हैं कि एक गोली खाएं और 10 मिनट में दर्द गायब हो जाए। एसिडिटी हो रही है, तो एक पुड़िया घोलकर पिएं और गैस खत्म।

जब हम इसी उम्मीद के साथ आयुर्वेद के पास जाते हैं, तो हमें निराशा होती है। क्योंकि आयुर्वेद शरीर को एक मशीन की तरह नहीं देखता जिसमें बटन दबाया और दर्द बंद हो गया। आयुर्वेद शरीर को खुद को ठीक करने का समय देता है, जो हमें थोड़ा धीमा लग सकता है।

2. हमारी खराब लाइफस्टाइल का असर: ज़रा सोचिए, आप पिछले 10 सालों से बाहर का तला-भुना खा रहे हैं, रात को 2 बजे तक जाग रहे हैं, और दिन भर कुर्सी पर बैठे रहते हैं। इन 10 सालों की खराब आदतों ने आपके शरीर में जो बीमारियां पैदा की हैं, क्या वे 10 दिन की आयुर्वेदिक दवा से ठीक हो सकती हैं?

बिल्कुल नहीं। जो बीमारी शरीर में सालों से जड़ें जमा रही थी, उसे ठीक होने में शरीर को थोड़ा समय तो लगेगा ही। लोग इसे आयुर्वेद का धीमापन मान लेते हैं, जबकि असल में यह आपके शरीर के ठीक होने का समय है।

आयुर्वेद का काम: सिर्फ दर्द नहीं, बीमारी की जड़ खत्म करना (Root-Cause Approach)

आयुर्वेद का सबसे बड़ा उसूल यही है कि वह सिर्फ बीमारी के 'लक्षण' (Symptoms) को नहीं दबाता, बल्कि उस बीमारी की 'जड़' (Root Cause) को खत्म करता है।

इसे एक सीधे से उदाहरण से समझते हैं: मान लीजिए आपके घर की एक दीवार पर पानी की सीलन (नमी) आ रही है। अब आपके पास दो रास्ते हैं। पहला रास्ता, आप उस सीलन के ऊपर एक अच्छा सा पेंट कर दें। दीवार तुरंत सुंदर दिखने लगेगी। लेकिन कुछ महीनों बाद वह सीलन फिर से बाहर आ जाएगी क्योंकि दीवार के अंदर का पाइप अभी भी लीक कर रहा है।

दूसरा रास्ता, आप दीवार को थोड़ा तोड़ें, अंदर के उस लीक हो रहे पाइप को ढूंढें और उसे ठीक करें। इसमें मेहनत लगेगी, समय लगेगा, घर में थोड़ी गंदगी भी फैलेगी, लेकिन जब पाइप ठीक हो जाएगा, तो दीवार पर सीलन जिंदगी भर के लिए खत्म हो जाएगी।

हमारी आज की दवाइयां अक्सर उस 'पेंट' की तरह काम करती हैं, जो दर्द को तुरंत छुपा देती हैं। लेकिन आयुर्वेद उस 'प्लंबर' की तरह है, जो बीमारी वाले पाइप की लीकेज को ढूंढकर उसे हमेशा के लिए बंद करता है। इसलिए आयुर्वेद को 'धीमा' नहीं, बल्कि 'समझदार' इलाज कहना ज्यादा सही होगा।

आयुर्वेद बीमारी की जड़ तक आखिर पहुंचता कैसे है?

आयुर्वेद आपके शरीर को कुछ बहुत ही आसान और कुदरती नियमों से समझता है:

वात, पित्त और कफ का बैलेंस: आयुर्वेद कहता है कि हमारा शरीर तीन चीज़ों से चलता है, वात (हवा/गैस), पित्त (गर्मी/एसिड) और कफ (भारीपन/बलगम)। जब तक ये तीनों बराबर हैं, आप एकदम फिट हैं। जैसे ही कोई एक चीज़ बढ़ती या घटती है, आप बीमार पड़ जाते हैं। आयुर्वेद सिर्फ बुखार या दर्द की दवा नहीं देता, बल्कि यह देखता है कि आपके शरीर में वात, पित्त या कफ में से क्या बिगड़ा हुआ है, और उसे वापस बैलेंस में लाता है।

पाचन अग्नि और आम: आयुर्वेद मानता है कि सारी बीमारियों की शुरुआत हमारे पेट से होती है। हमारे पेट में खाना पचाने की एक 'आग' होती है। जब हम गलत टाइम पर गलत खाना खाते हैं, तो यह आग सुस्त पड़ जाती है। ऐसे में खाना पचने के बजाय पेट में सड़ने लगता है। इस सड़े हुए खाने से शरीर में एक चिपचिपा टॉक्सिन बनता है, जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं।

यही खून में मिलकर शरीर के अलग-अलग हिस्सों में जाता है और वहां जाकर दर्द, सूजन या बीमारियां पैदा करता है। आयुर्वेद सबसे पहले इसी को शरीर से बाहर निकालता है और पाचन अग्नि को फिर से तेज़ करता है।

एक्सपर्ट डॉक्टर की विशेष सलाह

बीमारी की जड़ को समझने और जीवनशैली में सुधार के लिए आयुर्वेदिक दृष्टिकोण बेहद प्रभावी है, लेकिन इसे आपातकालीन या गंभीर तीव्र स्थितियों का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। यदि अचानक तेज़ बुखार आए, असहनीय दर्द हो, सांस लेने में दिक्कत हो, या कोई पुरानी बीमारी तेज़ी से बिगड़ने लगे, तो बिना देरी किए आधुनिक चिकित्सा के डॉक्टर से तुरंत जांच कराएं। गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में केवल घरेलू नुस्खों या धीमे इलाज पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है; सही समय पर सटीक मेडिकल डायग्नोसिस ही सर्वोत्तम इलाज की पहली सीढ़ी है। 

क्या हर बीमारी को ठीक करने में आयुर्वेद को बहुत लंबा समय लगता है?

इलाज में कितना समय लगेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी कितनी पुरानी है।

  • नई बीमारियां: अगर आपको अचानक से सर्दी-जुकाम हुआ है, हल्का बुखार है, गैस बन गई है या पेट खराब हो गया है, तो आयुर्वेदिक दवाइयां, काढ़े और चूर्ण आपको एक-दो दिन में ही आराम दे सकते हैं।
  • पुरानी बीमारियां: अगर आपको 5 साल से थायरॉइड, शुगर (डायबिटीज़), गठिया (जोड़ों का दर्द) या अस्थमा है, तो इसे ठीक होने में कुछ महीने लग सकते हैं। क्योंकि यह बीमारी शरीर की गहराइयों (नसों और हड्डियों) तक पहुंच चुकी है।

क्या आयुर्वेद में तुरंत आराम मिल सकता है?

बिल्कुल मिल सकता है! कई मामलों में आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ बहुत ही तेज़ी से काम करती हैं।

जैसे, अगर आपके पेट में गैस या मरोड़ उठ रही है, तो हींग, अजवाइन और काला नमक का पानी आपको 15 मिनट में आराम दे सकता है। अगर आपको सूखी खांसी आ रही है, तो मुलेठी से तुरंत गले की खराश शांत हो जाती है। इसलिए यह सोचना कि आयुर्वेद कभी तुरंत काम नहीं करता, बिल्कुल गलत है।

इलाज में आपके खान-पान (Diet) और लाइफस्टाइल का कितना बड़ा रोल है?

यह आयुर्वेद का सबसे ज़रूरी हिस्सा है। आप दुनिया की सबसे महंगी और अच्छी आयुर्वेदिक दवा खा लें, लेकिन अगर आपका खान-पान खराब है, तो वो दवा शरीर में कोई काम नहीं करेगी।

आजकल हम चाहते हैं कि हम पिज्जा-बर्गर भी खाते रहें, रात को 2 बजे तक मोबाइल भी चलाएं और एक गोली खाकर स्वस्थ भी रहें। आयुर्वेद इस बात को नहीं मानता। आयुर्वेद कहता है कि आधा इलाज दवा करती है और आधा इलाज आपका सही खाना, समय पर सोना और खुश रहना करता है। अगर आप दवा के साथ-साथ अपने रूटीन को भी सुधार लेते हैं, तो आयुर्वेद का असर आपको बहुत जल्दी दिखाई देने लगता है।

क्या आयुर्वेद का असर हमेशा के लिए रहता है?

हाँ, ज्यादातर मामलों में ऐसा ही होता है। क्योंकि आयुर्वेद बीमारी के कारण को खत्म कर देता है, इसलिए जब आप एक बार ठीक हो जाते हैं, तो बीमारी के वापस आने के चांस बहुत कम हो जाते हैं।

अगर ठीक होने के बाद आप फिर से अपनी पुरानी खराब आदतों (गलत खाना, कम सोना, स्ट्रेस लेना) पर लौट जाते हैं, तो शरीर फिर से बीमार पड़ सकता है। सेहतमंद बने रहने के लिए आपको अच्छी आदतों को अपनी ज़िन्दगी  का हिस्सा बनाना पड़ता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद को सिर्फ "धीमा इलाज" कह देना इसके साथ नाइंसाफी होगी। आयुर्वेद उस समझदार माली की तरह है, जो पेड़ के पीले पड़ते पत्तों पर हरा रंग नहीं पोतता, बल्कि पेड़ की जड़ों में जाकर खाद और पानी डालता है। जड़ों तक पानी पहुंचने में थोड़ा समय ज़रूर लगता है, लेकिन जब पत्ते हरे होते हैं, तो वो हमेशा के लिए हरे रहते हैं।

हर इंसान का शरीर अलग है, उसकी बीमारी अलग है, इसलिए उसके ठीक होने का समय भी अलग होता है। अगर आप थोड़ा धैर्य रखें, अपने खाने-पीने की आदतों को सुधारें और किसी अच्छे आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह लें, तो आयुर्वेद आपको सिर्फ बीमारी से नहीं बचाता, बल्कि आपको एक नई और ऊर्जा से भरी हुई ज़िन्दगी देता है।

References

WHO international standard terminologies on ayurveda

Contribution of world health organization in the global acceptance of Ayurveda - PMC

WHO benchmarks for the practice of ayurveda

A glimpse of Ayurveda – The forgotten history and principles of Indian traditional medicine - PMC

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

कुछ मामलों में दोनों उपचार साथ चल सकते हैं, लेकिन ऐसा केवल योग्य डॉक्टर या आयुर्वेद विशेषज्ञ की सलाह से ही करना चाहिए। इससे दवाओं के बीच संभावित प्रभावों को समझकर सुरक्षित उपचार किया जा सकता है।

आयुर्वेद का उद्देश्य शरीर के संतुलन को बेहतर बनाना और बीमारी के कारणों को कम करना है। लेकिन हर बीमारी का परिणाम उसकी गंभीरता, अवधि, व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति और उपचार का पालन करने पर निर्भर करता है।

हाँ। यदि आपको लंबे समय से कोई समस्या है, तो आवश्यक मेडिकल जांच और रिपोर्ट के आधार पर उपचार की योजना बनाना अधिक उचित होता है। इससे बीमारी की वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिलती है।

नहीं। अधिकांश मामलों में दवाएं सीमित समय के लिए दी जाती हैं। जब स्वास्थ्य में सुधार होने लगता है, तो विशेषज्ञ आपकी स्थिति के अनुसार दवाओं की मात्रा या अवधि में बदलाव कर सकते हैं।

नहीं। आयुर्वेद का उपयोग कई सामान्य और मौसमी स्वास्थ्य समस्याओं में भी किया जाता है। हालांकि, किसी भी तीव्र या गंभीर स्थिति में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना आवश्यक होता है।

हर व्यक्ति के लिए परहेज़ अलग हो सकता है। आमतौर पर केवल उन खाद्य पदार्थों से बचने की सलाह दी जाती है जो आपकी समस्या को बढ़ा सकते हैं। अनावश्यक रूप से बहुत सख्त डाइट की आवश्यकता हमेशा नहीं होती।

हाँ। विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार योग, प्राणायाम और ध्यान को उपचार के साथ जोड़ने से तनाव कम करने, पाचन सुधारने और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

आयुर्वेदिक उपचार बच्चों, वयस्कों और बुजुर्गों सभी के लिए अलग-अलग तरीके से तय किया जाता है। इसलिए उम्र, स्वास्थ्य और अन्य बीमारियों को ध्यान में रखकर ही दवा और डाइट का चयन किया जाता है।

सटीक समय बताना संभव नहीं होता। इलाज की अवधि बीमारी की प्रकृति, उसकी गंभीरता, आपकी जीवनशैली और शरीर की प्रतिक्रिया पर निर्भर करती है।

हमेशा योग्य और पंजीकृत आयुर्वेद चिकित्सक से ही सलाह लें। उनके अनुभव, आपकी बीमारी की समझ, उचित जांच, व्यक्तिगत उपचार योजना और नियमित फॉलो-अप जैसी बातों पर ध्यान देना चाहिए।

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