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Uric Acid Normal होने पर भी Joint Pain क्यों रह सकता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

अक्सर हम सोचते हैं कि अगर हमारे घुटनों, एड़ियों या उँगलियों में दर्द है, तो पक्का हमारा यूरिक एसिड बढ़ गया होगा। हम तुरंत लैब की तरफ भागते हैं, ब्लड टेस्ट कराते हैं और जब रिपोर्ट एकदम 'नॉर्मल' आती है, तो हम गहरी उलझन में पड़ जाते हैं। अगर यूरिक एसिड नहीं बढ़ा है, तो फिर यह दर्द कहाँ से आ रहा है? दरअसल, हमारे जोड़ों के दर्द का सिर्फ एक ही कारण नहीं होता। 

कई बार जब हमारे शरीर का यूरिक एसिड लेवल सामान्य हो जाता है, तब भी पुरानी सूजन या क्रिस्टल्स जोड़ों में जमे रह जाते हैं। सिर्फ खून में यूरिक एसिड नॉर्मल दिख जाने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि आपके जोड़ों के अंदर की दुनिया भी पूरी तरह से शांत हो चुकी है। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि शरीर सिर्फ एक रिपोर्ट का मोहताज़ नहीं है, बल्कि वह अपनी अंदरूनी कमज़ोरी की तरफ इशारा कर रहा है।

रिपोर्ट नॉर्मल आने के बाद भी दर्द खत्म क्यों नहीं होता?

जब शरीर में लंबे समय तक यूरिक एसिड ज़्यादा रहता है, तो वह छोटे-छोटे शीशे जैसे क्रिस्टल्स (सुइयों जैसे आकार के) बनाकर हमारे जोड़ों के बीच जमा हो जाता है। जब आप दवाइयाँ खाते हैं या परहेज़ करते हैं, तो आपके खून (ब्लड) में तो यूरिक एसिड नॉर्मल हो जाता है, लेकिन जो क्रिस्टल्स पहले से ही जोड़ों में घर बना चुके हैं, वो रातों-रात गायब नहीं होते। जब तक वो क्रिस्टल्स पूरी तरह से पिघलकर शरीर से बाहर नहीं निकल जाते, तब तक वो वहाँ की माँसपेशियों और नसों में चुभते रहते हैं। इसी चुभन की वजह से रिपोर्ट सही आने के बाद भी आपको भारी दर्द और सूजन का सामना करना पड़ता है।

क्या सिर्फ यूरिक एसिड ही घुटनों और उँगलियों के दर्द का ज़िम्मेदार है?

जी नहीं, ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है। कई बार हम सारा दोष यूरिक एसिड पर डाल देते हैं, जबकि दिक्कत कहीं और होती है। उम्र के साथ जोड़ों के बीच की गद्दी (कार्टिलेज) घिसने लगती है, जिसे ऑस्टियोआर्थराइटिस कहते हैं। कई बार किसी पुरानी चोट का असर सालों बाद उभर कर आता है। अगर आप दिन भर गलत पोस्चर (मुद्रा) में बैठते हैं या आपका वज़न अचानक से बढ़ गया है, तो उसका सारा भार आपके घुटनों और एड़ियों पर ही तो पड़ेगा। ऐसे में यूरिक एसिड नॉर्मल होने के बावजूद भी आपके जोड़ों में कटकट की आवाज़ और भयंकर दर्द रह सकता है।

शरीर के अंदर छुपे वो ट्रिगर्स, जो दर्द को वापस ले आते हैं

जब हम दर्द से परेशान होते हैं, तो शरीर के अंदर कई ऐसी चीज़ें चल रही होती हैं जिन पर हमारा ध्यान नहीं जाता:

  • पुरानी सूजन (इन्फ्लेमेशन): एक बार जोड़ों में सूजन आ जाए, तो वह शरीर के अंदर छुप कर बैठ जाती है और ज़रा सी सर्दी या गलत खानपान मिलते ही वापस ट्रिगर हो जाती है।
  • खून के बहाव में कमी: जब जोड़ों तक सही मात्रा में खून और ऑक्सीजन नहीं पहुँच पाता, तो वहाँ दर्द शुरू हो जाता है।
  • हड्डियों का कमज़ोर होना: बोन डेंसिटी (हड्डियों का घनत्व) कम होने से भी ऐसा दर्द उठता है जो लगता बिल्कुल यूरिक एसिड जैसा है।
  • माँसपेशियों में अकड़न: आसपास की नसों और माँसपेशियों के टाइट हो जाने से जोड़ों पर खिंचाव पड़ता है, जिससे तेज़ दर्द महसूस होता है।

लगातार बना रहने वाला ये दर्द किन दूसरी बीमारियों की घंटी हो सकता है?

अगर यूरिक एसिड नॉर्मल है और फिर भी महीनों से दर्द नहीं जा रहा है, तो इसे हल्के में न लें। यह कुछ अन्य गंभीर परेशानियों का संकेत हो सकता है:

  • रुमेटाइड आर्थराइटिस (गठिया बाय): यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें हमारा ही इम्यून सिस्टम हमारे जोड़ों पर हमला कर देता है, जिससे तेज़ दर्द और सूजन आती है।
  • थायराइड की गड़बड़ी: थायराइड के असंतुलित होने से शरीर में पानी भरने लगता है और जोड़ों में भारीपन और दर्द पैदा होता है।
  • ऑटोइम्यून बीमारियाँ: शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता जब खुद ही हड्डियों को नुकसान पहुँचाने लगे, तो ऐसा दर्द होता है।
  • यूरिक एसिड का स्यूडो-गॉउट: इसमें यूरिक एसिड नहीं, बल्कि कैल्शियम के क्रिस्टल्स जोड़ों में जमा हो जाते हैं और बिल्कुल यूरिक एसिड जैसा ही दर्द देते हैं।

जोड़ों की इस पुरानी तकलीफ पर आयुर्वेद का क्या नज़रिया है?

आयुर्वेद के अनुसार, हमारे शरीर में किसी भी प्रकार का दर्द मुख्य रूप से 'वात दोष' (हवा तत्व) के बिगड़ने से होता है। जब शरीर में रूखापन बढ़ जाता है, तो जोड़ों के बीच की चिकनाई (साइनोवियल फ्लूइड) सूखने लगती है। इस स्थिति को आयुर्वेद में 'संधिगत वात' कहा जाता है। जब बढ़ा हुआ वात जोड़ों में जाकर बैठ जाता है, तो हड्डियों में रगड़ शुरू हो जाती है। इसका सीधा मतलब यह है कि जब तक आप शरीर से इस रूखेपन को दूर करके वात को शांत नहीं करेंगे, तब तक रिपोर्ट चाहे कितनी भी नॉर्मल क्यों न आ जाए, आपकी हड्डियों का दर्द और कड़-कड़ की आवाज़ बंद नहीं होगी। 

दर्द और सूजन को जड़ से खींच निकालने वाली कुछ असरदार जड़ी-बूटियाँ

हमारी प्रकृति के पास हड्डियों और जोड़ों की ग्रीस वापस लाने के लिए कई बेहतरीन उपाय मौजूद हैं:

  • गिलोय: यह शरीर से हर तरह की पुरानी सूजन को कम करता है और इम्यून सिस्टम को इतना मज़बूत बनाता है कि दर्द खुद-ब-खुद कम होने लगता है।
  • निर्गुण्डी: इसे जोड़ों के दर्द का काल माना जाता है। इसकी पत्तियों का लेप या तेल लगाने से भयंकर से भयंकर अकड़न में तुरंत आराम मिलता है।
  • शल्लकी (बोसवेलिया): यह हड्डियों के बीच की घिस चुकी गद्दी (कार्टिलेज) को दोबारा रिपेयर करने और घर्षण कम करने में बहुत असरदार है।
  • अश्वगंधा: यह नसों को ताक़त देता है और शरीर के अंदरूनी तनाव को कम करता है, जिससे जोड़ों का दर्द भी शांत होता है।

क्या हमारा बिगड़ा हुआ रूटीन भी जोड़ों की ग्रीस सुखा रहा है?

बिल्कुल! हमारा शरीर चलने-फिरने के लिए बना है। अगर आप 8-10 घंटे लगातार कुर्सी पर बैठे रहते हैं, तो आपके जोड़ों में जकड़न आनी ही है। जब आप हिलते-डुलते नहीं हैं, तो शरीर के जोड़ अपनी प्राकृतिक चिकनाई खोने लगते हैं। इसके अलावा, कम पानी पीने की आदत भी एक बड़ा कारण है। हमारे जोड़ों के बीच के तरल पदार्थ का ज़्यादातर हिस्सा पानी ही होता है। जब आप पर्याप्त पानी नहीं पीते, तो वह ग्रीस गाढ़ी और सूखी होने लगती है। यही वजह है कि बिना यूरिक एसिड बढ़े भी आपके जोड़ जाम होने लगते हैं।

जाने-अनजाने में हो रही खानपान की वो भूलें, जो दर्द बढ़ा देती हैं

हम अनजाने में कई ऐसी चीज़ें खाते-पीते हैं जो हमारे जोड़ों के लिए धीमे ज़हर का काम करती हैं:

  • फ्रिज का ठंडा पानी या कोल्ड ड्रिंक्स: ये शरीर में वात बढ़ाते हैं और जोड़ों की माँसपेशियों को तुरंत सिकोड़ देते हैं, जिससे दर्द ट्रिगर हो जाता है।
  • ज़्यादा खट्टी चीज़ें खाना: बासी खाना, अचार या बहुत ज़्यादा खटाई सीधे तौर पर हड्डियों में सूजन और दर्द को न्यौता देते हैं।
  • रिफाइंड तेल और पैकेट बंद खाना: इनमें मौजूद ट्रांस फैट शरीर के अंदरूनी इन्फ्लेमेशन (सूजन) को बढ़ा देते हैं, जिससे जोड़ों में जलन होती है।
  • रात को भारी दालें और राजमा खाना: भले ही यूरिक एसिड नॉर्मल हो, लेकिन रात के समय इन्हें पचाना मुश्किल होता है और ये शरीर में गैस बनाकर दर्द पैदा करते हैं।
  • मैदा और चीनी की अधिकता: ये दोनों चीज़ें शरीर को अंदर से एसिडिक बनाती हैं और हड्डियों से कैल्शियम को सोखने लगती हैं।

वो कमियां और दिक्कतें, जो हड्डियों को अंदर से खोखला कर रही हैं

कई बार आप सब कुछ सही करते हैं, फिर भी शरीर के अंदर कुछ विटामिन्स की कमी इस दर्द की असली वजह होती है:

  • विटामिन डी की कमी: इसके बिना आपका शरीर कैल्शियम को सोख ही नहीं सकता। इसकी कमी से हड्डियाँ अंदर से भुरभुरी और कमज़ोर हो जाती हैं।
  • कैल्शियम की कमी: जब शरीर में कैल्शियम कम होता है, तो हड्डियाँ खुद को कमज़ोर महसूस करती हैं और ज़रा सा चलने पर भी दर्द करने लगती हैं।
  • विटामिन बी12 की कमी: इसकी कमी से नसों में भारी कमज़ोरी आती है, जिससे पैरों में झनझनाहट और एड़ियों में अजीब सा दर्द रहता है।
  • वज़न का अधिक होना: आपके शरीर का 5 किलो एक्स्ट्रा वज़न आपके घुटनों पर 20 किलो के बराबर दबाव डालता है, जो दर्द का एक बहुत बड़ा कारण है।

पेनकिलर (दर्द निवारक) पर रोज़ाना निर्भर रहना कितना भारी पड़ सकता है?

जब भी जोड़ों में दर्द उठता है, हम बिना सोचे-समझे एक पेनकिलर खा लेते हैं। यह गोली आपके दिमाग को कुछ देर के लिए सुन्न कर देती है ताकि आपको दर्द का अहसास न हो, लेकिन यह जोड़ों की खराबी को बिल्कुल ठीक नहीं करती। अगर आप रोज़ाना इन गोलियों का सेवन करेंगे, तो यह आपकी किडनी और लिवर पर बेहद खतरनाक असर डालेंगी। धीरे-धीरे आपके पेट में अल्सर बन सकते हैं और शरीर अपनी प्राकृतिक हीलिंग क्षमता पूरी तरह भूल जाएगा।

बिना दवा के जोड़ों को आराम पहुँचाने वाले कुछ आज़माए हुए घरेलू नुस्खे

आप बिना भारी दवाइयों के भी कुछ बेहद आसान और प्राकृतिक तरीकों से अपने दर्द पर काबू पा सकते हैं:

  • तिल के तेल की मालिश: रोज़ रात को हल्का गुनगुना तिल का तेल लेकर घुटनों और एड़ियों की मालिश करें। इससे रूखापन खत्म होगा और खून का दौरा तेज़ होगा।
  • हल्दी वाला दूध: रात को सोने से पहले एक चुटकी हल्दी और गाय का घी दूध में मिलाकर पिएँ, यह शरीर की अंदरूनी सूजन को स्पंज की तरह सोख लेता है।
  • सेंधा नमक की सिकाई: हल्के गर्म पानी में सेंधा नमक डालकर अपने पैरों को 15 मिनट के लिए उसमें डुबोकर रखें। इससे माँसपेशियों की सारी अकड़न तुरंत ढीली हो जाती है।
  • हल्की स्ट्रेचिंग: सुबह उठकर बिस्तर पर ही अपने पैरों और हाथों की उँगलियों को धीरे-धीरे स्ट्रेच करें ताकि जाम हुए जोड़ खुल सकें।

उठने-बैठने के तरीकों में वो छोटे बदलाव, जो बड़ा आराम देंगे

अपनी रोज़ाना की ज़िंदगी में छोटे-छोटे बदलाव करके आप अपनी हड्डियों की उम्र बढ़ा सकते हैं:

  • लगातार एक जगह न बैठें: हर एक घंटे में उठकर 2 मिनट के लिए थोड़ा टहल लें, इससे जोड़ों में खून का संचार बना रहेगा।
  • सही जूते-चप्पल पहनें: घर में नंगे पैर सख्त ज़मीन पर न चलें और बाहर जाते समय ऐसे जूते पहनें जिनका सोल मुलायम हो।
  • पालथी मारकर ज़्यादा देर न बैठें: अगर घुटनों में तकलीफ है, तो ज़मीन पर बैठने से बचें क्योंकि इससे घुटनों के जॉइंट्स पर बहुत ज़्यादा खिंचाव पड़ता है।
  • सीढ़ियाँ आराम से चढ़ें: सीढ़ियाँ चढ़ते और उतरते समय पूरा वज़न एक साथ घुटने पर न डालें, सहारे का इस्तेमाल करें।

आयुर्वेदिक तरीके से शरीर की अंदरूनी मरम्मत कैसे होती है?

आयुर्वेद कभी भी सिर्फ दर्द को नहीं दबाता, बल्कि यह देखता है कि दर्द किस वजह से पनप रहा है। इसमें सबसे पहले नाड़ी परीक्षण के द्वारा शरीर के बढ़े हुए वात दोष का पता लगाया जाता है। इसके बाद शरीर की रुकी हुई गंदगी को बाहर निकालने के लिए पंचकर्म जैसी प्रक्रियाएँ की जाती हैं। 'जानु बस्ति' नामक थेरेपी में घुटनों के चारों ओर उड़द के आटे की रिंग बनाकर उसमें औषधीय गर्म तेल भरा जाता है, जो सीधे जोड़ों के अंदर जाकर सूख चुकी ग्रीस को वापस ले आता है। इसके साथ ही खानपान सुधारकर शरीर को खुद से ठीक होने की ताक़त दी जाती है।

हड्डियों के डॉक्टर (ऑर्थोपेडिक) से मिलने में बिल्कुल भी देरी कब न करें?

भले ही आप घरेलू उपाय कर रहे हों, लेकिन कुछ स्थितियों में आपको तुरंत एक विशेषज्ञ के पास जाना चाहिए:

  • जोड़ों के आसपास बहुत तेज़ लालिमा (रेडनेस) आ जाए और वो जगह छूने पर गर्म लगे।
  • जब दर्द के साथ-साथ आपको तेज़ बुखार भी आ रहा हो (यह इन्फेक्शन का लक्षण हो सकता है)।
  • आपके घुटने या टखने आपका वज़न बिल्कुल न सह पा रहे हों और आप खड़े भी न हो पा रहे हों।
  • जब जोड़ों का आकार अचानक से टेढ़ा-मेढ़ा लगने लगे या उँगलियों की शेप बिगड़ने लगे।

आधुनिक दवाइयाँ और प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान: दोनों में क्या फर्क है?

पहलू आधुनिक चिकित्सा (एलोपैथी) आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
मुख्य उद्देश्य दर्द, सूजन और बीमारी के कारणों का वैज्ञानिक उपचार करना। शरीर के संतुलन और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाने पर जोर देना।
इलाज का तरीका दवाइयाँ, फिजियोथेरेपी, जीवनशैली में बदलाव और आवश्यकता अनुसार अन्य चिकित्सा उपाय। जड़ी-बूटियाँ, अभ्यंग (मालिश), आहार-विहार और पारंपरिक उपचार।
राहत मिलने का समय कई उपचार अपेक्षाकृत जल्दी राहत दे सकते हैं। प्रभाव धीरे-धीरे दिखाई दे सकता है और दीर्घकालिक संतुलन पर ध्यान देता है।
पाचन से जुड़ाव पाचन और जोड़ों की समस्या का मूल्यांकन चिकित्सा कारणों के आधार पर किया जाता है। पाचन और शरीर के संतुलन को स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
दीर्घकालिक दृष्टिकोण रोग प्रबंधन, कार्यक्षमता बनाए रखने और जटिलताओं को रोकने पर ध्यान। जीवनशैली, आहार और शरीर के संतुलन के माध्यम से दीर्घकालिक स्वास्थ्य का प्रयास।
जीवनशैली की भूमिका उपचार के साथ व्यायाम, वजन नियंत्रण और स्वस्थ आदतों की सलाह दी जाती है। आहार, दिनचर्या और प्राकृतिक जीवनशैली को उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

आखिरी और सबसे ज़रूरी बात

हमेशा याद रखें कि आपका शरीर कोई मशीन नहीं है जो सिर्फ लैब की रिपोर्ट देखकर काम करे। अगर आपकी यूरिक एसिड की रिपोर्ट नॉर्मल है लेकिन फिर भी दर्द है, तो यह आपका शरीर आपसे कुछ कहने की कोशिश कर रहा है। हो सकता है उसे आराम की ज़रूरत हो, या शायद कुछ ज़रूरी विटामिन्स की। दर्द को सिर्फ एक दुश्मन न मानें, बल्कि इसे शरीर का अलार्म समझें। अपनी जीवनशैली में थोड़ा सा ठहराव लाएँ, पौष्टिक चीज़ें खाएँ, खुद को हाइड्रेटेड रखें और बेवजह गोलियां खाकर शरीर को सुन्न करने से बचें। जब आप अपने शरीर की छोटी-छोटी ज़रूरतों का ध्यान रखेंगे, तो आपके जोड़ भी बुढ़ापे तक आपका पूरा साथ निभाएंगे।

References:

https://www.ncbi.nlm.nih.gov/books/NBK273/

https://platform.who.int/mortality/themes/theme-details/topics/indicator-groups/indicator-group-details/MDB/gout

https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC3247913/

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, बिल्कुल। जब तापमान गिरता है, तो हमारे शरीर के अंदर की रक्त वाहिकाएँ (न नसें) सिकुड़ जाती हैं। इससे जोड़ों तक खून सही से नहीं पहुँच पाता और बैरोमेट्रिक प्रेशर बदलने की वजह से हड्डियों के अंदर मौजूद फ्लूड (तरल पदार्थ) में दबाव बनता है, जिससे बिना किसी बीमारी के भी तेज़ दर्द महसूस होता है।

नहीं, एकदम से पुरानी डाइट पर लौटना गलत है। रिपोर्ट नॉर्मल आने का मतलब यह नहीं है कि आपकी किडनी ने हमेशा के लिए यूरिक एसिड छानने की पूरी ताक़त वापस पा ली है। अगर आप अचानक से फिर भारी प्रोटीन और प्यूरीन खाएंगे, तो कुछ ही दिनों में दर्द का अटैक वापस आ सकता है। इसे धीरे-धीरे ही अपनी डाइट में शामिल करें।

हाँ, यह बहुत आम है। मेनोपॉज़ के बाद महिलाओं के शरीर में 'एस्ट्रोजन' नाम का हार्मोन अचानक कम हो जाता है। यह हार्मोन जोड़ों को अंदर से सूजन से बचाता है। इसके कम होते ही शरीर के ज़्यादातर जोड़ों में अचानक से दर्द और जकड़न महसूस होने लगती है, जिसका यूरिक एसिड से कोई लेना-देना नहीं होता।

ज़्यादातर मामलों में दवाइयों और डाइट से ये क्रिस्टल्स (जिन्हें टोफाई कहा जाता है) धीरे-धीरे अपने आप घुल जाते हैं। लेकिन अगर किसी ने सालों तक इसका इलाज नहीं कराया और ये क्रिस्टल्स गोल्फ की गेंद जितने बड़े और सख्त होकर त्वचा फाड़ने लगें या हड्डियों को गलाने लगें, तब डॉक्टर इन्हें सर्जरी से निकालने की सलाह देते हैं।

हाँ, इसे 'साइकोसोमैटिक पेन' कहा जाता है। जब आप बहुत ज़्यादा मानसिक तनाव में होते हैं, तो शरीर में सूजन पैदा करने वाले केमिकल (जैसे कॉर्टिसोल) बहुत बढ़ जाते हैं। इससे आपका नर्वस सिस्टम दर्द को लेकर अति-संवेदनशील हो जाता है और आपको शरीर के हर जोड़ में भारी दर्द महसूस होता है।

इसे 'एसिम्प्टोमैटिक हाइपरयूरिसीमिया' कहते हैं। अगर आपको कभी दर्द या सूजन नहीं हुई है, तो तुरंत केमिकल वाली दवा शुरू करने की ज़रूरत नहीं होती। ऐसे में डॉक्टर सिर्फ पानी बढ़ाने, वज़न कम करने और डाइट में बदलाव करने की सलाह देते हैं।

बिल्कुल। अगर आपकी माँसपेशियाँ कमज़ोर हैं और आप अचानक से जिम में भारी वज़न उठाते हैं, तो सारा भार सीधे आपके टेंडन्स और लिगामेंट्स (जोड़ों के जोड़) पर पड़ता है। इससे वहाँ माइक्रो-टीयर (छोटी-छोटी टूट-फूट) हो जाती है और भयंकर दर्द होता है, जो यूरिक एसिड जैसा ही महसूस होता है।

हाँ, बच्चों में इसे अक्सर 'ग्रोइंग पेंस' (बढ़ती उम्र का दर्द) कहा जाता है। जब बच्चे तेज़ी से लंबाई पकड़ते हैं, तो उनकी हड्डियों और माँसपेशियों के विकास की गति में थोड़ा फर्क आ जाता है, जिसकी वजह से उनके पैरों और घुटनों में रात के समय अक्सर दर्द रहता है।

हाँ, ब्लड प्रेशर कम करने वाली कुछ दवाइयाँ (जैसे डाययूरेटिक्स या वॉटर पिल्स), अस्थमा की दवाइयाँ और टीबी के इलाज में दी जाने वाली कुछ गोलियां जोड़ों में रूखापन और भयंकर दर्द पैदा कर सकती हैं। यह दर्द दवा का साइड इफेक्ट होता है न कि बढ़ा हुआ यूरिक एसिड।

जी हाँ! यह एक बहुत ही हैरान करने वाला सच है। जब आपको गठिया (गाउट) का बहुत तेज़ अटैक आता है और जोड़ भयंकर सूजे होते हैं, तो उस समय खून टेस्ट कराने पर यूरिक एसिड बिल्कुल 'नॉर्मल' आ सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि खून का सारा एक्स्ट्रा यूरिक एसिड निकलकर जोड़ों में छुप चुका होता है। डॉक्टर हमेशा अटैक के शांत होने के 2 हफ्ते बाद असली लेवल चेक करने की सलाह देते हैं।

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