Diseases Search
Close Button
 
 

Millets (बाजरा/ज्वार) का ट्रेंड तो आया, लेकिन गलत तरीके से खाने पर Thyroid बिगाड़ सकता है

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

आज वज़न कम करने और फिट रहने के लिए मिलेट्स जैसे बाजरा, ज्वार, रागी खाने का ट्रेंड बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है। लोग रोज़ाना इन्हें अपनी डाइट में शामिल कर रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन्हें गलत तरीके से खाना आपके थायरॉइड को पूरी तरह खराब कर सकता है? आधुनिक विज्ञान के अनुसार इनमें 'गोइट्रोजेन्स' होते हैं, जो थायरॉइड ग्रंथि के काम को धीमा कर देते हैं। वहीं आयुर्वेद मानता है कि मिलेट्स स्वभाव से बेहद रूखे होते हैं। इन्हें बिना सही विधि भिगोना, घी मिलाना के खाने से शरीर में भयंकर वात दोष बढ़ता है और मेटाबॉलिज़्म कमज़ोर हो जाता है। आइए जानें कि आयुर्वेद कैसे इस ट्रेंड की सही जानकारी देकर आपके थायरॉइड और पाचन को प्राकृतिक रूप से साफ और मज़बूत बनाता है।

मिलेट्स की ज़रूरत क्यों महसूस होती है? डाइट का बदलता रूप

आधुनिक फिटनेस विज्ञान और सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण, जब लोगों को पता चला कि गेहूँ और चावल में ग्लूटेन या शुगर ज़्यादा है, तो उन्होंने अचानक से मिलेट्स मोटे अनाज की तरफ दौड़ लगा दी। वज़न घटाने, शुगर कंट्रोल करने और माँसपेशियाँ स्वस्थ रखने के लिए लोग सुबह-शाम बाजरा, ज्वार या रागी की रोटियाँ खाने लगे। यह सच है कि मिलेट्स पोषक तत्वों से भरपूर हैं, लेकिन जब बिना आयुर्वेद के नियमों को जाने, इन्हें सीधा पीसकर या सूखा खाया जाता है, तो यह शरीर के नाज़ुक हार्मोनल संतुलन  विशेषकर थायरॉइड ग्रंथि-  पर बहुत खराब असर डालता है। हर इंसान का शरीर अलग होता है, और हर किसी को रोज़ाना मोटे अनाज की ज़रूरत नहीं होती।

भारत में Millets कितने प्रकार के इस्तेमाल हो रहे हैं?

आजकल घरों में मुख्य रूप से इन मिलेट्स का ट्रेंड सबसे ज़्यादा है:

  • बाजरा : यह तासीर में बहुत गर्म होता है। बिना घी के खाने पर यह शरीर में रूखापन पैदा करता है।
  • ज्वार : यह पचने में भारी होता है और इसका अत्यधिक सेवन पेट में गैस (वात) बढ़ाता है।
  • रागी : यह कैल्शियम का अच्छा स्रोत है, लेकिन इसका बहुत ज़्यादा सेवन थायरॉइड के मरीज़ों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
  • कोदो और फॉक्सटेल : वज़न कम करने के लिए इन्हें बहुत खाया जाता है, लेकिन बिना भिगोए पकाने से ये शरीर से नमी सोख लेते हैं।

गलत तरीके से Millets खाने पर थायरॉइड द्वारा दिए जाने वाले भयंकर लक्षण

मोटे अनाज से तुरंत वज़न कम होने के बाद शरीर का अंदर से बीमार पड़ना थायरॉइड के कमज़ोर होने का संकेत है। इसके मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:

  • अचानक वज़न बढ़ना: मिलेट्स खाने के बावजूद वज़न कम होने के बजाय तेज़ी से बढ़ना।
  • भयंकर थकान और सुस्ती: रात भर सोने के बाद भी शरीर का टूटा हुआ महसूस होना और ऊर्जा खत्म हो जाना।
  • त्वचा और बालों का रूखापन: वात बढ़ने के कारण त्वचा का फटना और बालों का गुच्छों में झड़ना।
  • लगातार कब्ज़ रहना: मिलेट्स के रूखेपन के कारण आँतों का सूख जाना और मल का सख्त हो जाना।
  • गले में भारीपन: थायरॉइड ग्रंथि पर दबाव पड़ने के कारण गले में हल्की सूजन या भारीपन महसूस होना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

Millets से थायरॉइड (Thyroid) कमज़ोर होने के असली कारण

रोज़ाना बाजरा या ज्वार खाने के बाद भी शरीर अंदर से कमज़ोर क्यों हो जाता है? इसके मुख्य अंदरूनी कारण इस प्रकार हैं:

  • गोइट्रोजेन्स का भयंकर प्रभाव: मिलेट्स में कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो शरीर को आयोडीन सोखने से रोकते हैं। आयोडीन के बिना थायरॉइड ग्रंथि अपने हॉर्मोन T3/T4 नहीं बना पाती और कमज़ोर हो जाती है।
  • शरीर में वात का भड़कना: आयुर्वेद के अनुसार मिलेट्स 'रुक्ष' और 'कषाय' होते हैं। जब इन्हें लगातार खाया जाता है, तो शरीर का वात दोष भड़क जाता है, जो मेटाबॉलिज़्म को धीमा कर देता है।
  • पाचक अग्नि का मंद होना: मोटे अनाज पचने में भारी होते हैं। कमज़ोर पाचन वाले लोग जब इन्हें खाते हैं, तो यह पचने के बजाय 'आम' बनाता है, जो थायरॉइड के रास्तों को ब्लॉक कर देता है।
  • बिना भिगोए पकाना: आजकल लोग सीधा पैकेट से आटा निकालकर गूँथ लेते हैं। बिना 6-8 घंटे भिगोए मिलेट्स में मौजूद फाइटिक एसिड और गोइट्रोजेन्स नष्ट नहीं होते, जो सीधा ज़हर का काम करते हैं।

थायरॉइड को अनदेखा करने के गंभीर जोखिम

मिलेट्स के साइड इफेक्ट्स और थायरॉइड की कमज़ोरी को अगर अनदेखा किया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • स्थायी हाइपोथायरायडिज्म : थायरॉइड ग्रंथि हमेशा के लिए काम करना बंद कर सकती है, जिससे आपको जीवन भर हार्मोन की गोलियाँ खानी पड़ेंगी।
  • महिलाओं में PCOD/PCOS: हार्मोनल असंतुलन के कारण महिलाओं में पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं और ओवरीज़ Ovaries में गांठें बन जाती हैं।
  • हृदय गति का धीमा होना: थायरॉइड हार्मोन कम होने से हार्ट बीट धीमी हो जाती है और कोलेस्ट्रॉल बढ़ने लगता है।
  • जोड़ों का दर्द : बढ़ा हुआ वात दोष शरीर की सारी चिकनाई सुखा देता है, जिससे घुटनों और जोड़ों में भयंकर दर्द शुरू हो जाता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?   

आयुर्वेद मिलेट्स खाने के खिलाफ नहीं है, बल्कि वह इसके 'संस्कार' बनाने की विधि पर ज़ोर देता है। आयुर्वेद में थायरॉइड की समस्या को 'गलगण्ड' Galaganda या वात-कफ के असंतुलन से जोड़कर देखा जाता है। जब पाचक अग्नि कमज़ोर होती है और 'आम' बनता है, तो वह थायरॉइड ग्रंथि के कार्य को रोक देता है। डॉक्टर नाड़ी देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। आयुर्वेद में बस बाहर से कृत्रिम हार्मोन Thyroxine की गोली देना मकसद नहीं है, बल्कि वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, मिलेट्स का वातनाशक तरीके से इस्तेमाल हो, 'आम' खत्म हो, और पाचक अग्नि प्राकृतिक रूप से मज़बूत बने।

थायरॉइड को प्राकृतिक रूप से मज़बूत बनाने वाली अचूक आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में मिलेट्स के रूखेपन को काटने, मेटाबॉलिज़्म बढ़ाने और थायरॉइड को मज़बूत बनाने में ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • कांचनार : आयुर्वेद में इसे थायरॉइड और ग्रंथि की सूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यह थायरॉइड को प्राकृतिक रूप से हार्मोन बनाने के लिए प्रेरित करती है।
  • अश्वगंधा : यह नर्वस सिस्टम और एंडोक्राइन सिस्टम को ताकत देती है। यह तनाव कम करती है और थायरॉइड ग्रंथि की कमज़ोरी को दूर करती है।
  • गुग्गुल Guggul : यह शरीर में जमे हुए अतिरिक्त 'आम' और फैट को पिघलाता है और मेटाबॉलिज़्म (पाचक अग्नि) को तेज़ी से बढ़ाता है।
  • पुनर्नवा : कमज़ोर थायरॉइड के कारण शरीर में जो पानी भर जाता है Water retention सूजन), यह उसे पेशाब के रास्ते साफ करती है।

जमे हुए टॉक्सिन्स (आम) को बाहर निकालने की पंचकर्म चिकित्सा

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, जमे हुए 'आम' और दोषों को बाहर निकालकर संपूर्ण स्वास्थ्य पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • गहरी सफाई और वात शमन: जब थायरॉइड की समस्या पुरानी हो और शरीर मोटा व रूखा हो चुका हो, तो जीवा आयुर्वेद में उद्वर्तन और विरेचन जैसी पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • उद्वर्तन : यह जड़ी-बूटियों के पाउडर से की जाने वाली एक खास मालिश है। यह बंद स्रोतों को खोलती है, फैट को काटती है और थायरॉइड को एक्टिव करती है।
  • टॉक्सिन्स बाहर निकालना: 'विरेचन' प्रक्रिया में मरीज़ को औषधीय जड़ी-बूटियाँ देकर पेट साफ कराया जाता है। इससे शरीर में जमा पुराना 'आम' और कफ-वात दोष पूरी तरह बाहर निकल जाते हैं।

मिलेट्स खाने का सही तरीका 

आयुर्वेदिक वेलनेस में यह समझना बहुत ज़रूरी है कि 'अनाज' तभी ताकत देता है जब उसे सही 'संस्कार' (विधि) से पकाया जाए। थायरॉइड को बचाने के लिए इन डाइट रूल्स का पालन करें:

क्या खाएँ और मिलेट्स कैसे पकाएँ?

  • मिलेट्स को भिगोना ज़रूरी है: मिलेट्स बनाने से पहले उन्हें 6 से 8 घंटे पानी में ज़रूर भिगोएँ। इससे उनके अंदर का 'गोइट्रोजेन' और रूखापन खत्म हो जाता है।
  • घी का प्रयोग: मिलेट्स की रोटी या खिचड़ी बनाते समय उसमें शुद्ध गाय का घी ज़रूर डालें। घी वात दोष को शांत करता है और मिलेट्स को पचने में आसान बनाता है।
  • गेहूँ और चावल का संतुलन: रोज़ाना सिर्फ मिलेट्स न खाएँ। पुराने चावल और गेहूँ को अपनी डाइट में जगह दें, जो शरीर को प्राकृतिक नमी देते हैं।

क्या न खाएँ?

  • कच्चे या बिना भीगे मिलेट्स: मिलेट्स का सूखा आटा सीधा गूँथकर इस्तेमाल करने की आदत बिल्कुल बंद कर दें।
  • पत्ता गोभी और फूलगोभी Cruciferous Veggies: इनमें भी गोइट्रोजेन्स होते हैं। अगर खाएँ भी, तो अच्छी तरह पकाकर (कच्ची सलाद के रूप में बिल्कुल नहीं)।
  • ठंडी और बासी चीज़ें: फ्रिज का ठंडा पानी और बासी खाना पाचक अग्नि को खत्म कर थायरॉइड को सुस्त बना देता है।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में थायरॉइड गलगण्ड का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है:

  • हल्की समस्या में सुधार: अगर TSH लेवल थोड़ा ही बढ़ा है, तो सही डाइट मिलेट्स का सही उपयोग और दवाइयों से आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों में ही मेटाबॉलिज़्म सुधरने लगता है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर थायरॉइड सालों पुराना है और आप रोज़ाना 100 mg या उससे ज़्यादा की गोली खाते हैं, तो ग्रंथि को पूरी तरह स्वस्थ Regenerate) होने में 6 से 8 महीने लग सकते हैं।
  • स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर प्राकृतिक आहार का कड़ाई से पालन करता है, तो थायरॉइड प्राकृतिक रूप से ताकतवर हो जाता है और गोलियों पर निर्भरता खत्म हो जाती है।

मरीज़ों का भरोसा 

मेरा वजन पहले लगभग 85 किलो रहता था, लेकिन अचानक वह बढ़ना शुरू हुआ और 115 किलो तक पहुँच गया। जब मैंने डॉक्टर को दिखाया और टेस्ट करवाए, तो मुझे थायराइड डिटेक्ट हुआ। डॉक्टर ने मुझे 75mg की टैबलेट शुरू की, लेकिन उससे मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ा, बल्कि सीने में दर्द की शिकायत होने लगी।दोबारा जांच और अल्ट्रासाउंड कराने पर पता चला कि मुझे थर्ड ग्रेड फैटी लिवर (Fatty Liver Grade 3) है और किडनी में पथरी की भी समस्या है। मैं इतना परेशान हो गया कि मुझे रात को नींद आना भी बंद हो गई थी।फिर मुझे जीवा आयुर्वेद और डॉक्टर प्रताप चौहान के बारे में पता चला। जब मैंने कॉल किया, तो उन्होंने सबसे पहले मेरा वेट, हाइट और लाइफस्टाइल के बारे में विस्तार से पूछा और फिर दवाइयां शुरू कीं। जीवा का ट्रीटमेंट लेने के बाद मेरा थर्ड ग्रेड फैटी लिवर घटकर पहले ग्रेड 1 पर आया और अब वह पूरी तरह ठीक हो गया है। मुझे लगता है कि अगर थायराइड का पता चलते ही मैं जीवा आयुर्वेद चला जाता, तो शायद मुझे फैटी लिवर, यूरिक एसिड और किडनी स्टोन जैसी समस्याओं का सामना ही न करना पड़ता। मेरी आप सबसे विनती है कि किसी भी समस्या के लिए जीवा आयुर्वेद जरूर जाएं ताकि आपको मेरी तरह परेशान न होना पड़े। 

आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक उपचार में क्या अंतर है?

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य सिंथेटिक थायरॉक्सिन देकर हार्मोन लेवल को मैनेज करना अग्नि को सुधारकर थायरॉइड ग्रंथि को प्राकृतिक रूप से सक्रिय करना
नज़रिया समस्या को केवल थायरॉइड ग्रंथि की कमी मानना इसे पाचन (अग्नि) और पूरे मेटाबॉलिज़्म के असंतुलन का परिणाम मानना
उपचार तरीका बाहरी हार्मोन सप्लीमेंट पर निर्भरता जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक तरीकों से ग्रंथि को भीतर से उत्तेजित करना
डाइट और लाइफस्टाइल डाइट और दिनचर्या पर सीमित ध्यान अग्नि-वर्धक आहार, योग और संतुलित दिनचर्या पर ज़ोर
लंबा असर शरीर बाहरी हार्मोन पर निर्भर हो जाता है शरीर खुद हार्मोन बनाने में सक्षम होकर दीर्घकालिक संतुलन प्राप्त करता है

डॉक्टर की सलाह कब लें?

आहार में बदलाव या थायरॉइड के लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • डाइट कंट्रोल करने के बावजूद वज़न बहुत तेज़ी से बढ़ने लगे।
  • गले के सामने के हिस्से में गाँठ या भारी सूजन (Goiter) महसूस हो।
  • महिलाओं में पीरियड्स (Menstruation) बहुत ज़्यादा हैवी हो जाएं या महीनों तक न आएं।
  • दिन भर भयंकर सुस्ती रहे और थोड़ी सी भी ठंड बर्दाश्त न हो (Cold Intolerance)।

निष्कर्ष:

आयुर्वेद के हिसाब से थायरॉइड का कमज़ोर होना मुख्य रूप से पाचक अग्नि के मंद होने और बिना सही विधि (संस्कार) के रूखे आहार (जैसे कच्चे मिलेट्स) खाने से जुड़ी समस्या है। अप्राकृतिक तरीके से मिलेट्स खाने से शरीर में 'गोइट्रोजेन्स' और वात दोष बढ़ता है, जो ग्रंथि को सुस्त कर देता है। सिर्फ बाहरी ट्रेंड फॉलो करने से फिटनेस नहीं आती। इलाज में थायरॉइड की शुद्धि, कांचनार जैसी जड़ी-बूटियाँ और मिलेट्स को भिगोकर पकाने का शुद्ध तरीका सबसे ज़्यादा आवश्यक है, जिससे थायरॉइड की असली ताकत बिना किसी हार्मोनल गोली के जीवन भर बनी रहे।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, खा सकते हैं, लेकिन रोज़ाना नहीं। इन्हें खाने से पहले 6-8 घंटे पानी में भिगोना (Soak) बहुत ज़रूरी है और बनाते समय घी का प्रयोग करना चाहिए ताकि इनका वात दोष और गोइट्रोजेन खत्म हो सके।

रागी में कैल्शियम बहुत होता है, लेकिन इसमें गोइट्रोजेनिक तत्व भी होते हैं। बिना भिगोए या बहुत अधिक मात्रा में रागी खाने से थायरॉइड हार्मोन का बनना धीमा हो सकता है।

ये वो प्राकृतिक तत्व हैं जो शरीर को आयोडीन का इस्तेमाल करने से रोकते हैं। आयोडीन की कमी से थायरॉइड ग्रंथि अपना काम नहीं कर पाती और हाइपोथायरायडिज्म हो जाता है।

नहीं, आयुर्वेद के अनुसार ज़्यादातर मिलेट्स पचने में भारी (Guru) और रूखे (Ruksha) होते हैं। कमज़ोर पाचन वालों को इससे गैस और कब्ज़ की भयंकर समस्या हो सकती है।

आयुर्वेद थायरॉइड के मरीज़ों को पुराना चावल (Old Rice), जौ (Barley) और मूंग की दाल को सबसे सुपाच्य और सुरक्षित मानता है, क्योंकि ये मेटाबॉलिज़्म को सुधारते हैं।

हाँ, क्रूसिफेरस सब्ज़ियों (Cruciferous Veggies) में भी गोइट्रोजेन्स होते हैं। थायरॉइड के मरीज़ों को इन्हें कच्चा (सलाद के रूप में) बिल्कुल नहीं खाना चाहिए, हमेशा अच्छी तरह पकाकर खाएँ।

बिल्कुल नहीं। अगर आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों और सही डाइट (पंचकर्म) से पाचक अग्नि (Metabolism) को ठीक कर लिया जाए, तो वज़न बहुत आसानी और तेज़ी से कम होता है।

हाँ, रात भर पानी में भीगा हुआ सूखा धनिया सुबह उबालकर पीने से थायरॉइड ग्रंथि की सूजन कम होती है और यह वात-पित्त को संतुलित करने में बहुत फायदेमंद है।

यह एक बड़ा भ्रम है। जीवा आयुर्वेद में सही उपचार और डाइट से जब ग्रंथि अपना काम खुद करने लगती है, तो धीरे-धीरे डॉक्टर की सलाह से गोलियों की डोज़ कम होकर पूरी तरह छूट सकती है।

मिलेट्स को रात भर पानी में भिगोना, उसका पानी फेंककर ताज़े पानी में पकाना, और खाते समय उसमें शुद्ध गाय का घी और जीरा या अजवायन जैसे पाचक मसाले मिलाना ही इसका सही संस्कार है।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us