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दवा लेने के बाद भी गर्दन दर्द बार-बार क्यों लौटता है? आयुर्वेद में इसका कारण क्या है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 10 Apr, 2026
  • category-iconUpdated on 17 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
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आज की डिजिटल ज़िंदगी में गर्दन का दर्द एक ऐसी आम समस्या बन चुका है जिसे हम अक्सर मामूली समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। बहुत से लोग दर्द होने पर पेनकिलर खा लेते हैं जिससे कुछ वक़्त के लिए तो आराम मिल जाता है लेकिन दवा का असर खत्म होते ही दर्द दोबारा लौट आता है। बार-बार लौटने वाला यह दर्द इस बात का संकेत है कि समस्या केवल मांसपेशियों की थकान नहीं बल्कि गर्दन की हड्डियों और नसों के भीतर छिपी कोई गंभीर खराबी है। समय पर इसका सही इलाज इसलिए बेहद ज़रूरी है क्योंकि लापरवाही बरतने पर यह दर्द हाथों की सुन्नता और स्थायी कमज़ोरी का कारण बन सकता है।

सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस क्या होता है?

गर्दन के इस पुराने दर्द को चिकित्सीय भाषा में सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस कहा जाता है। इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझें तो यह हमारी गर्दन की हड्डियों और उनके बीच मौजूद डिस्क के घिसने की प्रक्रिया है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है या गलत पोस्चर के कारण गर्दन पर दबाव पड़ता है हड्डियों के बीच का कुशन (डिस्क) सूखने लगता है। जब यह कुशन कमज़ोर होता है तो हड्डियाँ आपस में रगड़ खाने लगती हैं और नसों पर दबाव डालती हैं। यही कारण है कि दर्द केवल गर्दन तक सीमित नहीं रहता बल्कि कंधों और हाथों तक फैलने लगता है।

सर्वाइकल के विभिन्न प्रकार और अवस्थाएँ

गर्दन की समस्या को उसकी गंभीरता के आधार पर इन पाँच श्रेणियों में समझा जा सकता है

मस्कुलर स्ट्रेन इसमें दर्द केवल मांसपेशियों तक सीमित रहता है जो ज़्यादातर गलत तरीके से सोने या अचानक झटका लगने से होता है।

डिस्क डिजनरेशन इस अवस्था में हड्डियों के बीच मौजूद डिस्क सूखने लगती है जिससे गर्दन में लचीलापन कम हो जाता है।

हर्नियेटेड डिस्क जब डिस्क का अंदरूनी हिस्सा बाहर निकलकर नसों को दबाने लगता है तो दर्द बहुत तेज़ और असहनीय हो जाता है।

सर्वाइकल माइलोपैथी यह एक गंभीर स्थिति है जहाँ स्पाइनल कॉर्ड पर दबाव पड़ने के कारण पूरे शरीर का संतुलन बिगड़ने लगता है।

सर्वाइकल रेडिकुलोपैथी इसमें गर्दन की दबी हुई नस के कारण हाथों में बिजली के झटके जैसा दर्द और झनझनाहट महसूस होती है।

शरीर में दिखने वाले मुख्य लक्षण

गर्दन और कंधों में जकड़नसुबह उठने पर गर्दन को हिलाने-डुलाने में बहुत ज़्यादा दिक़्क़त महसूस होना।

हाथों में सुन्नता उंगलियों और हथेलियों में बार-बार चींटियाँ चलने जैसा अहसास या सुन्नपन होना।

सिर चकराना और सिरदर्द गर्दन के पिछले हिस्से से शुरू होकर सिर के ऊपरी हिस्से तक जाने वाला तेज़ दर्द।

पकड़ कमज़ोर होना हाथों में इतनी कमज़ोरी महसूस होना कि पेन पकड़ने या कप उठाने में भी परेशानी आए।

आवाज़ में घर्षण गर्दन घुमाते समय हड्डियों के आपस में टकराने या चटकने जैसी आवाज़ें सुनाई देना।

गर्दन दर्द के मुख्य कारण

गलत पोस्चर घंटों तक कंप्यूटर या मोबाइल की स्क्रीन की ओर गर्दन झुकाकर काम करना इसका सबसे बड़ा कारण है।

पुरानी चोट अतीत में लगी कोई चोट या दुर्घटना जिसका असर हड्डियों पर लंबे वक़्त बाद दिखाई देता है।

भारी सामान उठाना सिर या कंधों पर अचानक बहुत ज़्यादा वज़न डालने से गर्दन की नसों पर खिंचाव आता है।

हड्डियों का घिसना बढ़ती उम्र के साथ हड्डियों में कैल्शियम की कमी और घिसाव होना एक प्राकृतिक लेकिन कष्टदायक कारण है।

मानसिक तनाव अत्यधिक चिंता और तनाव के कारण गर्दन की मांसपेशियाँ लगातार खिंची रहती हैं जो अंततः पुराने दर्द में बदल जाती हैं।

जोखिम बढ़ाने वाले कारण और जटिलताएं

जोखिम बढ़ाने वाले कारण

डेस्क जॉब जो लोग दिन भर एक ही स्थिति में बैठकर काम करते हैं उनमें इसका ख़तरा सबसे अधिक होता है।

धूम्रपान तंबाकू का सेवन डिस्क तक पहुँचने वाले पोषण को रोक देता है जिससे हड्डियाँ जल्दी घिसती हैं।

मोटापा शरीर का अधिक वज़न रीढ़ की हड्डी के ऊपरी हिस्से पर ज़्यादा दबाव डालता है।

व्यायाम की कमी गर्दन की मांसपेशियों का कमज़ोर होना उन्हें चोट और खिंचाव के प्रति संवेदनशील बनाता है।

आनुवंशिकता यदि परिवार में बड़ों को रीढ़ की हड्डी की समस्या रही है तो अगली पीढ़ी में इसका जोखिम बढ़ जाता है।

होने वाली जटिलताएं

स्थायी कमज़ोरी यदि नसों का दबाव बना रहे तो हाथों की मांसपेशियाँ हमेशा के लिए कमज़ोर हो सकती हैं।

लकवा का ख़तरा गंभीर स्थितियों में स्पाइनल कॉर्ड दबने से अंगों के काम करने की शक्ति जा सकती है।

मूत्र नियंत्रण खोना रीढ़ की हड्डी पर अत्यधिक दबाव पड़ने से शरीर के निचले अंगों का नियंत्रण बिगड़ सकता है।

क्रॉनिक पेन दर्द इतना ज़िद्दी हो जाता है कि सामान्य कामकाज करना भी नामुमकिन लगने लगता है।

डिप्रेशन लंबे समय तक रहने वाला दर्द व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करता है।

बीमारी की जाँच कैसे की जाती है?

शारीरिक परीक्षण डॉक्टर गर्दन को विभिन्न दिशाओं में घुमाकर दर्द और लचीलेपन की जाँच करते हैं।

एक्स-रे हड्डियों के बीच की दूरी कम होने या हड्डी के बढ़ने (Osteophytes) का पता लगाने के लिए।

एमआरआई यह नसों और डिस्क की स्थिति को देखने का सबसे बेहतर और सटीक तरीका है।

सीटी स्कैन हड्डियों की संरचना में आए सूक्ष्म बदलावों को गहराई से समझने के लिए।

ईएमजी टेस्ट यह जाँचती है कि नसें मांसपेशियों तक सिग्नल सही तरह से पहुँचा पा रही हैं या नहीं।

आयुर्वेद में ग्रीवा स्तंभ (गर्दन दर्द)

आयुर्वेद में गर्दन के पुराने दर्द को ग्रीवा स्तंभ कहा जाता है। यह केवल एक शारीरिक दर्द नहीं है बल्कि शरीर के भीतर चल रहे दोषों के असंतुलन का एक गंभीर संकेत है। आयुर्वेद इसे इस प्रकार समझाता है

वात दोष का प्रकोप गर्दन की गतिशीलता के लिए व्यान वायु ज़िम्मेदार होती है। जब गलत खान-पान या तनाव के कारण शरीर में वात (वायु) बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है तो यह हड्डियों के बीच के स्नेहक को सुखा देता है। जैसे एक सूखी लकड़ी जल्दी टूटती है वैसे ही वात के कारण गर्दन की हड्डियाँ और डिस्क रूखी होकर घिसने लगती हैं।

धातु क्षय (Degeneration) आयुर्वेद के अनुसार जब अस्थि धातु (Bone tissue) को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता तो हड्डियों का क्षय होने लगता है। यह पोषण अक्सर पेट की खराबी के कारण रुकता है जिससे हड्डियाँ उम्र से पहले कमज़ोर हो जाती हैं।

आम और मार्गावरोध कभी-कभी शरीर में अधपचा भोजन आम (Toxins) के रूप में जमा हो जाता है। यह चिपचिपा पदार्थ नसों के रास्तों को अवरुद्ध कर देता है। जब नसों में संचार रुकता है तो गर्दन में असहनीय जकड़न और हाथों में सुन्नपन महसूस होता है।

जीवा आयुर्वेद में हम केवल दर्द का इलाज नहीं करते बल्कि उस व्यक्ति का इलाज करते हैं जिसे दर्द है। हमारी जाँच प्रक्रिया बहुत ज़्यादा विस्तृत और वैज्ञानिक है

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

नमस्कार मैं बी.एल. त्रिपाठी ग्वालियर से हूँ। मेरी पत्नी गिरिजा त्रिपाठी पिछले 5 साल से सर्वाइकल और थायराइड से बहुत परेशान थीं। हमने ग्वालियर शहर में कई एलोपैथिक डॉक्टरों से इलाज कराया लेकिन जब तक दवा लेते थे तब तक ही आराम मिलता था दवा बंद होने पर समस्या फिर वैसी ही हो जाती थी।

इनमें गर्दन में बहुत दर्द होता था हाथ में सुन्नपन रहता था और घबराहट बहुत होती थी। इस वजह से ये बहुत परेशान थीं। फिर हमने जीवा का नाम सुना और उनके परामर्श केंद्र पर गए। हमने अक्टूबर 2021 से यहाँ की दवा शुरू की।

जब से जीवा की दवा ले रहे हैं हाथ-पैरों का दर्द कम हो गया है और अब घबराहट भी नहीं होती। आज हमें दवा लेते हुए काफी समय हो गया है अब थायराइड भी कंट्रोल में है हाथ-पैरों और गर्दन का दर्द बिल्कुल ठीक है और सिर दर्द भी बंद हो गया है।

हम इस दवा को लगातार ले रहे हैं और अब इस समस्या के लिए कोई भी एलोपैथिक दवाई नहीं ले रहे हैं। इसके लिए हम जीवा को बहुत-बहुत धन्यवाद देते हैं।

एलोपैथी और आयुर्वेद में क्या अंतर है?

विशेषता आधुनिक इलाज (Allopathy) आयुर्वेदिक इलाज (Ayurveda)
मुख्य लक्ष्य इसका प्राथमिक उद्देश्य सूजन को कम करना और दर्द के संकेतों को मस्तिष्क तक पहुँचने से रोकना है। इसका लक्ष्य शरीर के भीतर बढ़े हुए वात (वायु) को शांत करना और हड्डियों को पोषण देना है।
उपयोग की जाने वाली चीज़ें इसमें दर्द निवारक गोलियां (Painkillers) स्टेरॉयड्स और मांसपेशियों को ढीला करने वाली दवाएं दी जाती हैं। इसमें कस्टमाइज़्ड जड़ी-बूटियाँ औषधीय तेल और ग्रीवा बस्ती जैसी विशेष थेरेपी का उपयोग होता है।
दुष्प्रभाव (Side Effects) लंबे वक़्त तक पेनकिलर्स लेने से किडनी लिवर और पेट की परत को नुकसान पहुँचने का खतरा रहता है। आयुर्वेदिक उपचार प्राकृतिक और अपेक्षाकृत सुरक्षित होता है जो पूरे शरीर की सेहत सुधारने पर ज़ोर देता है।
इलाज का आधार यह अक्सर केवल लक्षणों (Symptoms) का इलाज करता है जिससे दवा का असर खत्म होते ही दर्द लौट आता है। यह दर्द के मूल कारण (Root Cause) जैसे खराब पाचन तनाव और पोषण की कमी पर काम करता है।
दीर्घकालिक प्रभाव गंभीर स्थिति में यह सर्जरी या फिजियोथेरेपी को अंतिम विकल्प के रूप में देखता है। यह हड्डियों और डिस्क के प्राकृतिक लचीलेपन को बहाल करने का प्रयास करता है जिससे सर्जरी की ज़रूरत टाली जा सकती है।

डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए?

गर्दन का दर्द कभी-कभी एक बड़ी मुसीबत की दस्तक हो सकता है। यदि आपको नीचे दिए गए संकेतों में से कोई भी महसूस हो तो उसे नज़रअंदाज़ न करें और तुरंत डॉक्टर से मिलें

अचानक कमज़ोरी यदि आपके हाथ से चीज़ें छूटने लगें या पकड़ बहुत ज़्यादा कमज़ोर हो जाए।

असहनीय दर्द दर्द जो रात में सोने न दे और गर्दन को थोड़ा भी हिलाना मुमकिन न हो।

सुन्नपन का बढ़ना यदि उंगलियों और बाहों में झनझनाहट इतनी बढ़ जाए कि महसूस होना ही बंद हो जाए।

संतुलन बिगड़ना चलते समय लड़खड़ाना या शरीर का संतुलन बनाए रखने में दिक़्क़त होना।

तेज़ सिरदर्द और चक्कर यदि गर्दन दर्द के साथ तेज़ चक्कर आएँ या आंखों के सामने अंधेरा छाने लगे।

निष्कर्ष

गर्दन का दर्द केवल एक शारीरिक पीड़ा नहीं है बल्कि यह आपकी थकी हुई रीढ़ की हड्डी की पुकार है। जब तक आप केवल बाहरी मलहम या गोलियों का सहारा लेंगे दर्द लौटता रहेगा। आयुर्वेद का होलिस्टिक हीलिंग नज़रिया आपके पूरे शरीर के संतुलन पर काम करता है।

जल्दी इलाज शुरू करने से न केवल आपकी गर्दन का दर्द ठीक होता है बल्कि आपके नर्वस सिस्टम को भी नई ताज़गी मिलती है। अपनी रीढ़ की हड्डी का ख्याल रखें क्योंकि यह आपके शरीर का आधार है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

पूरी तरह तकिया हटाना हमेशा सही नहीं होता। एक पतला और सही बनावट वाला तकिया गर्दन की हड्डी को सहारा देने के लिए ज़रूरी है।

हाँ, जब गर्दन की नसें दबती हैं, तो मस्तिष्क तक रक्त का संचार प्रभावित होता है, जिससे चक्कर आने की समस्या बहुत ज़्यादा देखी जाती है।

यदि बिना विशेषज्ञ की सलाह के कठिन आसन किए जाएँ, तो दर्द बढ़ सकता है। लेकिन 'सूक्ष्म व्यायाम' और 'प्राणायाम' बहुत फ़ायदा पहुँचाते हैं।

बिल्कुल! इसे 'टेक्स्ट नेक सिंड्रोम' कहते हैं। गर्दन झुकाकर मोबाइल चलाना डिस्क पर अतिरिक्त दबाव डालता है।

आयुर्वेद के अनुसार वात दोष में 'उष्ण' (गर्म) सिकाई ज़्यादा प्रभावी होती है क्योंकि यह जकड़न को खोलती है।

जी हाँ, आयुर्वेद के अनुसार शरीर में बनने वाली 'गैस' (वायु) जब ऊपर की ओर गति करती है, तो वह गर्दन की नसों में जकड़न और दर्द पैदा कर सकती है। इसलिए पेट साफ़ रखना इस दर्द को रोकने के लिए बहुत ज़्यादा ज़रूरी है।

हमेशा स्क्रीन को अपनी आँखों के लेवल पर रखें ताकि गर्दन झुकानी न पड़े। हर 30 मिनट में एक छोटा सा ब्रेक लें और अपनी गर्दन को धीरे-धीरे दोनों तरफ घुमाएँ, इससे मांसपेशियों को आराम करने का वक़्त मिलता है।

साधारण मालिश के बजाय औषधीय तेलों (जैसे महानारायण तेल) से हल्के हाथों से किया गया 'स्नेहन' बहुत फ़ायदा पहुँचाता है। बहुत ज़्यादा ज़ोर से मालिश करना या गर्दन को झटका देना नुकसानदेह हो सकता है।

केवल कैल्शियम खाने से दर्द खत्म नहीं होता। आयुर्वेद मानता है कि जब तक शरीर की पाचन शक्ति (Agni) सही नहीं होगी, तब तक कैल्शियम हड्डियों तक नहीं पहुँचेगा। आयुर्वेद इस अवशोषण (Absorption) को सुधारने पर ज़ोर देता है।

जब दर्द बहुत तेज़ हो, तब भारी वज़न उठाने से बचना चाहिए क्योंकि इससे नसों पर दबाव और बढ़ सकता है। दर्द कम होने के बाद ही विशेषज्ञ की सलाह पर हल्की स्ट्रेचिंग शुरू करना बेहतर है।

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