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40–45 उम्र के लोगों में Sciatica cases तेजी से क्यों बढ़ रहे हैं? Lifestyle क्या role play कर रहा है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

आज की तेज रफ्तार ज़िंदगी में, पीठ दर्द एक आम समस्या बन गई है। लेकिन जब यह दर्द आपकी कमर से शुरू होकर कूल्हों से होते हुए पैरों के नीचे तक जाने लगे, तो यह एक गंभीर चेतावनी हो सकती है। आजकल 40 से 45 वर्ष के युवाओं में साइटिका (Sciatica) के मामले बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। यह वह उम्र है जब इंसान अपने करियर और पारिवारिक जीवन में सबसे ज़्यादा सक्रिय होता है, लेकिन अचानक उठने वाला यह तेज और सुन्न कर देने वाला दर्द उन्हें पूरी तरह रुकने पर मजबूर कर देता है। आखिर ऐसा क्या हो गया है कि जिस बीमारी को कभी बुढ़ापे की निशानी माना जाता था, वह अब युवाओं को इतनी कम उम्र में अपना शिकार बना रही है? इसका सबसे बड़ा कारण हमारी बदलती और खराब जीवनशैली है।

साइटिका (Sciatica) असल में क्या है?

साइटिका कोई एक अकेली बीमारी नहीं है, बल्कि यह उन लक्षणों का एक समूह है जो साइटिक नर्व (Sciatic nerve) के दबने या उसमें जलन होने के कारण पैदा होते हैं। यह हमारे शरीर की सबसे लंबी और चौड़ी नस होती है, जो हमारी लोअर बैक (निचली कमर) से शुरू होकर कूल्हों के रास्ते दोनों पैरों की एड़ियों तक जाती है। जब रीढ़ की हड्डी के बीच की डिस्क खिसक जाती है (Herniated Disc) या हड्डियों के बीच का गैप कम हो जाता है, तो इस नस पर भारी दबाव पड़ता है। इसी दबाव के कारण कमर से लेकर पैरों तक बिजली के झटके जैसा दर्द, झुनझुनी या सुन्नपन महसूस होता है।

40 से 45 की उम्र: शरीर में होने वाले अहम बदलाव

40 की उम्र पार करते ही हमारे शरीर में कई प्राकृतिक बदलाव होने शुरू हो जाते हैं। 40 साल की उम्र तक हमारी हड्डियों का घनत्व (Bone Mass) अपने चरम पर होता है और इसके बाद धीरे-धीरे हड्डियाँ अपना कैल्शियम और मजबूती खोने लगती हैं। रीढ़ की हड्डी के बीच शॉक-एब्जॉर्बर का काम करने वाली डिस्क (Spinal Discs) में प्राकृतिक रूप से पानी की कमी (Dehydration) होने लगती है, जिससे वे सिकुड़ने लगती हैं। अगर इस उम्र में सही पोषण और जीवनशैली का ध्यान न रखा जाए, तो ये प्राकृतिक बदलाव बहुत तेज़ी से साइटिका जैसी गंभीर समस्याएँ पैदा कर देते हैं।

युवाओं में साइटिका के मामले तेजी से बढ़ने के मुख्य कारण

कुछ दशक पहले तक साइटिका मुख्य रूप से 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में देखा जाता था, लेकिन आज क्लिनिक में आने वाले ज़्यादातर मरीज़़ 40 से 45 की उम्र के युवा हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह हमारी आधुनिक जीवनशैली है। हमारी दिनचर्या मशीनी हो गई है, जहाँ शारीरिक मेहनत कम और मानसिक तनाव ज़्यादा है। खान-पान की खराब आदतें, स्क्रीन के सामने गलत पोस्चर में बैठे रहना और अचानक से जिम जाकर भारी वज़न उठाना, ये सब मिलकर हमारी रीढ़ की हड्डी को समय से पहले बूढ़ा बना रहे हैं।

घंटों लगातार बैठे रहना: रीढ़ की हड्डी का सबसे बड़ा दुश्मन

आजकल की कॉर्पोरेट जॉब्स में एक व्यक्ति दिन में औसतन 8 से 10 घंटे कुर्सी पर बैठता है। लंबे समय तक बैठे रहने से हमारी रीढ़ की हड्डी की निचली डिस्क (Lumbar Region) पर खड़े होने की तुलना में लगभग 40% से ज़्यादा दबाव पड़ता है। जब आप घंटों एक ही स्थिति में बैठे रहते हैं, तो आपकी साइटिक नसों लगातार दबती रहती हैं। इसके अलावा, लगातार बैठने से कूल्हे की मांसपेशी (Piriformis muscle) भी सख्त हो जाती है, जो साइटिक नर्व को दबाकर साइटिका के दर्द को जन्म देती है।

वर्क फ्रॉम होम (Work From Home) और गलत पोस्चर की मार

महामारी के बाद से 'वर्क फ्रॉम होम' का चलन काफी बढ़ गया है। ऑफिस में कम से कम एर्गोनोमिक कुर्सियाँ होती थीं, लेकिन घर पर लोग सोफे, बिस्तर या डाइनिंग टेबल पर झुककर काम करते हैं। बिस्तर पर लेटकर या आगे की तरफ झुककर (Slouching) लैपटॉप पर काम करने से हमारी रीढ़ की हड्डी का प्राकृतिक कर्व (S-Curve) खराब हो जाता है। यह गलत पोस्चर रीढ़ की हड्डी की डिस्क को पीछे की तरफ धकेलता है, जिससे नसें दबने लगती हैं और साइटिका का जन्म होता है।

शारीरिक गतिविधि (Physical Activity) की कमी और कमज़ोर मांसपेशीयाँ

हमारे शरीर को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि उसे लगातार चलते-फिरते रहना चाहिए। लेकिन आज के समय में हमारी शारीरिक गतिविधि लगभग शून्य हो गई है। व्यायाम न करने की वजह से हमारी कोर मांसपेशीयाँ (Core Muscles) और पीठ की मांसपेशीयाँ कमज़ोर हो जाती हैं। जब कोर कमज़ोर होता है, तो शरीर का सारा वज़न और झटके सहने का काम सीधे रीढ़ की हड्डी पर आ जाता है। यही अतिरिक्त भार डिस्क को डैमेज करता है।

तनाव (Stress) और साइटिका का आपस में क्या संबंध है?

यह सुनकर आपको हैरानी हो सकती है, लेकिन आपका मानसिक तनाव सीधे तौर पर आपके पीठ दर्द और साइटिका से जुड़ा है। 40-45 की उम्र करियर और परिवार को लेकर सबसे ज़्यादा तनाव (Stress) वाली होती है। जब आप लगातार तनाव में रहते हैं, तो आपका शरीर 'फाइट या फ्लाइट' मोड में चला जाता है, जिससे पीठ और गर्दन की मांसपेशीयाँ सिकुड़ कर सख्त हो जाती हैं। यह लगातार रहने वाली जकड़न रीढ़ की हड्डी के एलाइनमेंट को बिगाड़ देती है और साइटिक नर्व पर दबाव डालती है।

वजन का बढ़ना (Obesity) और कमर पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव

खराब डाइट और बैठे रहने वाली जीवनशैली के कारण युवाओं में मोटापा तेज़ी से बढ़ रहा है। खासकर पेट के आसपास जमा होने वाली चर्बी (Belly Fat) हमारी रीढ़ की हड्डी के लिए बहुत खतरनाक है। बढ़ा हुआ पेट आपके 'सेंटर ऑफ ग्रेविटी' को आगे की तरफ खींचता है, जिससे रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से (Lumbar spine) पर भारी दबाव पड़ता है। इस अतिरिक्त भार को संभालने के चक्कर में डिस्क अपनी जगह से खिसक सकती है और साइटिका का दर्द शुरू हो जाता है।

आधुनिक डाइट और रीढ़ की हड्डी का कुपोषण

हमारी आज की डाइट में पैकेटबंद खाना, जंक फूड और रिफाइंड शुगर बहुत ज़्यादा है। इस तरह के खाने से शरीर में भारी मात्रा में सूजन (Inflammation) बढ़ती है। इसके अलावा, ज़्यादातर युवाओं में विटामिन डी (Vitamin D), कैल्शियम और विटामिन बी-12 (Vitamin B12) की भारी कमी पाई जा रही है। विटामिन बी-12 हमारी नसों की सुरक्षा परत (Myelin sheath) को स्वस्थ रखने के लिए बहुत ज़रूरी है। इसके बिना नसें कमज़ोर हो जाती हैं और थोड़ा सा दबाव भी साइटिका के भयंकर दर्द में बदल जाता है।

साइटिका के शुरुआती लक्षण क्या हैं?

इन्हें बिल्कुल नजरअंदाज न करें

साइटिका अचानक से एक दिन में नहीं होता; आपका शरीर पहले ही कई संकेत देने लगता है।

  • कमर के निचले हिस्से में लगातार एक धीमा दर्द या जकड़न बने रहना।
  • लंबे समय तक खड़े रहने या बैठने पर कूल्हों और पैरों में खिंचाव महसूस होना।
  • खांसते या छींकते समय अचानक कमर से पैरों तक बिजली के झटके जैसा दर्द उठना।
  • पैरों की उँगलियों में सुन्नपन (Numbness) या चींटियाँ चलने जैसा महसूस होना।

अगर आपको इनमें से कोई भी लक्षण दिख रहा है, तो तुरंत सचेत होने की ज़रूरत है।

इसे नजरअंदाज करने पर क्या जटिलताएँ हो सकती हैं?

अगर आप अब भी यह मानकर बैठे हैं कि यह तो बस एक आम मौसमी दर्द है और खुद ही चला जाएगा, तो आप अनजाने में अपनी नसों को बहुत बड़े खतरे में डाल रहे हैं। जो दर्द आज सिर्फ ज़्यादा काम करने पर आपको परेशान कर रहा है, वह धीरे-धीरे आपकी नसों को हमेशा के लिए कमज़ोर और सूजा हुआ बना देगा। महीनों तक नसों पर बना हुआ दबाव अंततः स्थायी नर्व डैमेज का रूप ले लेता है, जिसके बाद आपको रोज़ दर्द निवारक दवाईयाँ (Painkillers) खानी पड़ सकती हैं। कई बार यह इतना बढ़ जाता है कि मरीज़़ के अपने पैरों पर नियंत्रण ही खत्म हो जाता है।

आयुर्वेद साइटिका को कैसे समझता है? (गृध्रसी)

आयुर्वेद इस साइटिका के दर्द को सिर्फ रीढ़ की हड्डी की कोई बाहरी चोट नहीं मानता। आयुर्वेद में इसे 'गृध्रसी' कहा जाता है, जो मुख्य रूप से आपके शरीर में 'वात दोष' के भयंकर असंतुलन से पैदा होने वाली एक बहुत ही गहरी अंदरूनी बीमारी है। शरीर में वात यानी हवा की दिशा हमेशा सही और संतुलित होनी चाहिए। लेकिन जब खराब जीवनशैली और गलत खानपान के कारण रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में बहुत ज़्यादा वात बढ़ जाता है, तो वह नसों को सुखाकर उन्हें सिकोड़ देता है। जब तक शरीर की अंदरूनी ताकत मज़बूत नहीं होगी और वात शांत नहीं होगा, मौसम का हर बदलाव और थोड़ा सा भी तनाव आपको ऐसे ही बीमार करता रहेगा।

साइटिका में राहत के लिए जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें नसों की सूजन से बचने और हड्डियों को मज़बूत बनाने के लिए बहुत ही जादुई और सुरक्षित जड़ी-बूटियाँ दी हैं, जो बिना कोई सुस्ती लाए अपना काम करती हैं।

  • अश्वगंधा: यह नसों को मज़बूती देने और वात को शांत करने के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यह मांसपेशियों की सूजन को शांत करती है।
  • गुग्गुलु: यह आयुर्वेद में हड्डियों और जोड़ों के रोगों की सबसे अचूक और ताकतवर दवा मानी जाती है। यह रीढ़ की हड्डी के आसपास की सूजन को खींचकर नसों को आज़ाद करती है।
  • निर्गुंडी: यह साइटिक नर्व की भयंकर सूजन और दर्द को तुरंत खींच लेती है। यह कमर दर्द और झुनझुनी में सच में जादू सा असर करती है।

आयुर्वेदिक थेरेपी साइटिका में कैसे काम करती है?

जब गोलियाँ और मलहम पूरी तरह बेअसर हो जाएँ और दर्द रातों की नींद हराम कर दे, तो हमारी प्राचीन पंचकर्म थेरेपी सीधे आपकी नसों की गहराई में जाकर काम करती है।

  • स्वेदन: इसमें कमर और पीठ पर खास औषधीय गर्म तेलों से मालिश करने के बाद जड़ी-बूटियों की भाप दी जाती है। यह रीढ़ की हड्डी के आसपास की जकड़ी हुई मांसपेशियों को तुरंत ढीला कर देती है।
  • कटि बस्ती: इसमें कमर के निचले हिस्से (Lumbar region) पर उड़द की दाल के आटे से एक घेरा बनाकर उसमें गुनगुना औषधीय तेल भरा जाता है। यह सूखी हुई डिस्क को दोबारा नमी देता है और साइटिक नस को शांत करता है।

साइटिका में वात-शामक डाइट प्लान क्या हो?

आप जो खाते हैं, वही आपके शरीर में जाकर या तो बीमारी बनाता है या ताकत। साइटिका के दर्द को खत्म करने के लिए एक वात-शामक डाइट लेना बहुत ज़्यादा ज़रूरी है। 

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - नसों को ठंडक और चिकनाई देने वाले) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - गर्मी और रूखापन बढ़ाने वाले)
अनाज (Grains) पुराना चावल, ओट्स, जौ (Barley), मूंग दाल की खिचड़ी। मैदा, वाइट ब्रेड, बासी रोटियाँ, सूखे और पैकेटबंद बिस्कुट।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी (नसों की खुश्की के लिए सबसे बड़ा अमृत)। रिफाइंड ऑयल, बहुत ज़्यादा डीप-फ्राइड और मसालेदार चीज़ें।
पेय पदार्थ (Beverages) नारियल पानी, धनिया-जीरे का पानी, पुदीने की छाछ, गन्ने का रस। अत्यधिक डार्क कॉफी, शराब, बर्फ का ठंडा पानी।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, कद्दू, परवल, खीरा (पानी से भरपूर सब्ज़ियाँ)। बहुत ज़्यादा तीखी लाल मिर्च, कटहल, भारी लहसुन, बैंगन।
फल (Fruits) तरबूज़, खरबूजा, मीठे अंगूर, पपीता, उबला हुआ सेब। बहुत ज़्यादा खट्टे फल, बिना मौसम के डिब्बाबंद फल।

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

आयुर्वेद कोई ऐसा केमिकल नहीं है जो एक मिनट में दर्द को खत्म कर दे और आपको नींद ला दे। आपकी कमज़ोर नसों को पूरी तरह रिसेट होने और रीढ़ को नई ताकत मिलने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: आपकी पाचन शक्ति मज़बूत होगी; कमर का भयंकर खिंचाव और दर्द कम होने लगेंगे। दबी हुई नस के ढीला होने से पैरों का भारीपन भी कम महसूस होने लगेगा।
  • 1 से 3 महीने तक: रात को आने वाले भयंकर दर्द के दौरे काफी कम हो जाएँगे। रातों की नींद बेहतर होगी; शरीर का भारीपन कम होकर एक प्राकृतिक हल्कापन महसूस होगा।
  • 3 से 6 महीने तक: आपकी रीढ़ और पैरों की नसें अंदर से पूरी तरह साफ और ताकतवर बन जाएँगी। आपकी इम्युनिटी और हड्डियों का लचीलापन इतना सुधर जाएगा कि आपको यह दर्द दोबारा छू भी नहीं पाएगा।

मरीज़ों के अनुभव

मेरा नाम चंद्र सिंह है, मेरी उम्र  60+ है और मैं दिल्ली से हूँ। मुझे साइटिका और एलर्जी की समस्या थी। कई जगह इलाज कराने के बाद मैंने जीवाग्राम से उपचार शुरू किया। डॉक्टर ने मेरी पूरी हिस्ट्री समझकर उपचार शुरू किया।

थेरेपी और आयुर्वेदिक उपचार से मुझे काफी लाभ मिला, दर्द में राहत मिली और स्वास्थ्य में सुधार हुआ। यहाँ का वातावरण, दिनचर्या, योग और देखभाल बहुत अच्छी है। स्टाफ और डॉक्टर भी बहुत सहयोगी हैं।

मैं सभी को जीवा ग्राम में उपचार लेने की सलाह देता हूँ।

चंद्र सिंह

दिल्ली

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

साइटिका के इस असहनीय दर्द से निपटने के लिए हम अक्सर जल्दबाज़ी में कदम उठाते हैं और तुरंत राहत ढूँढते हैं। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि आप अपने शरीर और इस बीमारी के साथ कैसा बर्ताव कर रहे हैं, क्योंकि सिर्फ पेनकिलर खाने और आयुर्वेद की गहराई को अपनाने में ज़मीन-आसमान का अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य नर्व सिग्नल्स को ब्लॉक करने के लिए पेनकिलर्स या स्टेरॉयड (Steroid) के इंजेक्शन देना और सर्जरी की सलाह देना। पित्त और वात को शांत करना, नसों की खुश्की दूर करना और 'कटि बस्ती' द्वारा प्राकृतिक रूप से स्पाइन को डिकंप्रेस करना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल एक याँत्रिक (Mechanical) डिस्क प्रोलैप्स और स्थानीय सूजन की समस्या मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए वात-पित्त दोषों और स्नायु में जमे 'आम' का एक संपूर्ण सिंड्रोम मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल डाइट पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता, केवल दर्द सहने तक फिजियोथेरेपी की सलाह दी जाती है। डाइट में 'स्नेहन' (घी/चिकनाई), सही पोश्चर, और शरीर को ठंडा व हाइड्रेटेड रखने पर विशेष ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर पेनकिलर छोड़ने पर दर्द और झुनझुनी फिर से दोगुनी तेज़ी से वापस आते हैं (Rebound effect)। शरीर की नसें और लिगामेंट्स अंदर से इतने मज़बूत हो जाते हैं कि वे दबाव सहना और प्राकृतिक रूप से हील होना सीख जाते हैं।

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए? (Red Flags of Sciatica)

साइटिका के हर दर्द को महज़ एक आम दर्द समझकर घर पर ठीक करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। कई बार यह शरीर का एक बहुत ही गंभीर संकेत होता है, जिसे नज़रअंदाज़ करना खतरनाक हो सकता है। अगर आपको शरीर में ये गंभीर संकेत दिखें, तो बिना देरी किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना बहुत ज़रूरी है:

  • अगर दर्द इतना भयंकर हो जाए कि आपके लिए अपने पैरों पर खड़ा होना या दो कदम चलना भी बहुत मुश्किल हो जाए।
  • अगर आपको पैरों में अचानक बहुत ज़्यादा कमज़ोरी महसूस होने लगे और चलते समय आपका पैर ज़मीन पर घिसटने लगे (Foot Drop)।
  • अगर दर्द के साथ-साथ आपको मल या मूत्र विसर्जन (Bowel or Bladder Control) पर अपना नियंत्रण खोता हुआ महसूस हो (यह नसों के डैमेज होने का एक बहुत बड़ा और आपातकालीन संकेत है)।
  • अगर पैरों का सुन्नपन (Numbness) लगातार बढ़ता जा रहा हो और सुई चुभने जैसा एहसास बंद ही न हो रहा हो।
  • अगर कमर दर्द के साथ आपको अचानक तेज़ बुखार रहने लगे या बिना किसी कारण के तेज़ी से वज़न गिरने लगे।

निष्कर्ष

40-45 की उम्र में साइटिका (Sciatica) का होना इस बात का सीधा संकेत है कि आपकी जीवनशैली आपकी रीढ़ की हड्डी पर बहुत भारी पड़ रही है। लगातार घंटों तक बैठे रहना, गलत पोस्चर, तनाव और खराब खान-पान ने आपकी साइटिक नर्व को एक गंभीर खतरे में डाल दिया है। जब दर्द असहनीय हो जाता है, तो पेनकिलर्स और मलहम कुछ समय के लिए राहत ज़रूर दे सकते हैं, लेकिन वे समस्या की जड़ यानी रीढ़ की दबी हुई नसों को ठीक नहीं कर सकते। आयुर्वेद आपको इस दर्द को जड़ से मिटाने का एक स्थायी और प्राकृतिक समाधान देता है। सही आयुर्वेदिक उपचार, पंचकर्म थेरेपी, और वात-शामक जीवनशैली अपनाकर आप इस बीमारी को न केवल मात दे सकते हैं, बल्कि भविष्य में होने वाली रीढ़ की हड्डी की गंभीर जटिलताओं से भी खुद को बचा सकते हैं। अपने शरीर के संकेतों को सुनें, सही समय पर सही कदम उठाएँ, और जीवा आयुर्वेद के साथ अपनी ज़िंदगी को दर्द-मुक्त बनाएँ।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

इस उम्र में लगातार बैठकर काम करने, गलत पोस्चर, शारीरिक व्यायाम की कमी और मानसिक तनाव के कारण रीढ़ की हड्डी की नसों पर भारी दबाव पड़ता है। हमारी इसी आधुनिक और खराब जीवनशैली के कारण अब यह बीमारी युवाओं में बहुत तेज़ी से आम हो गई है।

जी हाँ, बिना सही तकनीक (Form) सीखे भारी वज़न उठाने या अपनी क्षमता से ज़्यादा उठाने (Ego Lifting) से रीढ़ की हड्डी की डिस्क पर अचानक बहुत ज़्यादा ज़ोर पड़ता है। इससे डिस्क अपनी जगह से खिसक सकती है और साइटिक नर्व बुरी तरह दब सकती है।

बिल्कुल! आयुर्वेद में साइटिका (जिसे गृध्रसी कहा जाता है) को बिना किसी सर्जरी के जड़ से ठीक किया जा सकता है। इसमें वात-शामक जड़ी-बूटियों, पंचकर्म और 'कटि बस्ती' जैसी प्राकृतिक और सुरक्षित थेरेपी का उपयोग करके नसों के दबाव को हटाया जाता है।

आपको हमेशा हल्का, गर्म और सुपाच्य भोजन लेना चाहिए। शरीर में नसों के रूखेपन (वात) को कम करने के लिए शुद्ध गाय का घी बहुत फायदेमंद है। फ्रिज का ठंडा पानी, कोल्ड ड्रिंक, जंक फूड और बासी खाने से बिल्कुल बचना चाहिए क्योंकि ये वात बढ़ाकर दर्द को तुरंत भड़काते हैं।

हल्का पैदल चलना नसों में रक्त संचार बढ़ाता है और यह फायदेमंद हो सकता है। लेकिन अगर दर्द बहुत तेज़ है या पैरों में भयंकर सुन्नपन (Numbness) आ रहा है, तो उस समय ज़्यादा चलने से बचना चाहिए और शरीर को आराम देना चाहिए।

आयुर्वेद के अनुसार, साइटिका मुख्य रूप से 'वात' दोष के भयंकर रूप से बढ़ने के कारण होता है। वात को शांत करने और नसों की जकड़न को खोलने के लिए हमेशा गर्म सिकाई (Hot Compress) या औषधीय तेल से हल्की मालिश ज़्यादा असरदार और फायदेमंद होती है।

शुरुआती कुछ ही हफ्तों में कमर के दर्द और जकड़न में भारी आराम मिल जाता है। लेकिन गहराई में दबी हुई नस को पूरी तरह आज़ाद करने, वात को जड़ से खत्म करने और रीढ़ को दोबारा अंदरूनी ताक़त देने में आमतौर पर 3 से 6 महीने का अनुशासित समय लग सकता है।

जी हाँ, जब आप लगातार मानसिक तनाव में रहते हैं, तो आपके शरीर की मांसपेशियाँ सिकुड़ जाती हैं और हमेशा जकड़ी रहती हैं। यह लगातार बनी रहने वाली जकड़न रीढ़ की हड्डी पर बहुत ज़्यादा अतिरिक्त दबाव डालती है, जो साइटिका के दर्द को और भी गंभीर बना देती है।

पीठ के बल सीधा सोना और अपने घुटनों के ठीक नीचे एक हल्का तकिया लगाना सबसे अच्छा माना जाता है। अगर आप करवट लेकर सोना पसंद करते हैं, तो अपने दोनों घुटनों के बीच एक तकिया रख लें; इससे रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधी रहती है और साइटिक नस पर दबाव नहीं पड़ता।

अगर दर्द इतना असहनीय हो जाए कि आपके लिए खड़े होना मुश्किल हो जाए, पैरों में अचानक भारी कमज़ोरी आ जाए, चलते समय पैर ज़मीन पर घिसटने लगे, या आपका मल-मूत्र पर से नियंत्रण हटने लगे, तो यह एक बहुत गंभीर संकेत है और बिना एक पल की देरी किए तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए।

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