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सीढ़ियां चढ़ते समय दर्द — क्या यह osteoarthritis का शुरुआती संकेत है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 23 Apr, 2026
  • category-iconUpdated on 19 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
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अक्सर हम अपने बदन की छोटी-मोटी तकलीफों को नजरअंदाज कर देते हैं। जैसे सीढ़ियां चढ़ते वक्त घुटने में हल्की टीस उठना या कुर्सी से उठते ही जोड़ों का अकड़ जाना। हम सोचते हैं कि ये तो बस दिनभर की थकान है या फिर उम्र का असर है। पर सच तो ये है कि ये दर्द हमेशा थकान नहीं होता। कई बार यह ऑस्टियोआर्थराइटिस (जोड़ों की घिसावट) का एक शुरुआती संकेत हो सकता है। जब जोड़ों के बीच की कुदरती गद्दी घिसने लगती है, तो सीढ़ियां चढ़ते समय शरीर हमें इशारा देने लगता है।

जोड़ों की घिसावट (ऑस्टियोआर्थराइटिस) क्या है?

यह हमारे जोड़ों के घिसने की समस्या है। हमारे जोड़ों में हड्डियों के ऊपर एक मुलायम गद्दी होती है, जिसे कार्टिलेज कहते हैं। यह गद्दी हड्डियों को आपस में रगड़ने से बचाती है। जब यह गद्दी समय के साथ घिसकर पतली हो जाती है, तो हड्डियों का गैप कम हो जाता है। इसके बाद हड्डियां एक-दूसरे से टकराने लगती हैं, जिससे दर्द, सूजन और जोड़ों में जकड़न होने लगती है।

सीढ़ियां चढ़ते समय दर्द क्यों बढ़ जाता है?

जब हम सीढ़ियां चढ़ते हैं, तो घुटनों पर हमारे नॉर्मल चलने से कहीं ज्यादा वजन पड़ता है। ऊपर की तरफ जोर लगाने पर घुटने आपस में तेजी से दबते हैं। अगर गद्दी पहले से ही घिस चुकी है या जोड़ों के बीच की नेचुरल चिकनाई (ग्रीस) खत्म हो गई है, तो ये हड्डियां आपस में जोर से टकराती हैं। इसी वजह से जो दर्द जमीन पर चलने में नहीं होता, वो सीढ़ियां चढ़ते ही करंट की तरह महसूस होने लगता है।

शरीर के शुरुआती इशारे

बीमारी के गंभीर होने से पहले हमारा शरीर हमें कुछ संकेत देता है। इन्हें पहचानकर आप अपने जोड़ों को ज्यादा खराब होने से बचा सकते हैं:

  • चलते-फिरते दर्द होना: शुरुआत में दर्द सिर्फ तभी होता है जब आप जोड़ों पर मेहनत वाला काम करते हैं, जैसे सीढ़ियां चढ़ना या वजन उठाना। आराम करते ही यह ठीक हो जाता है।
  • सुबह की जकड़न: सोकर उठने पर जोड़ों का एकदम जाम महसूस होना। हालांकि, थोड़ा चलने-फिरने पर आधे घंटे के अंदर यह अपने आप खुल जाता है।
  • हड्डियों से चटकने की आवाज: घुटने मोड़ने या सीधा करने पर हड्डियों से 'कट-कट' की आवाज आना इस बात का सबूत है कि हड्डियां आपस में रगड़ खा रही हैं।
  • हिलने-डुलने में मुश्किल: जोड़ों को पूरी तरह मोड़ने या सीधा करने में तकलीफ होना।
  • सूजन और दर्द: जोड़ों के पास हल्की सूजन दिखना और उस जगह को छूने या दबाने पर दर्द महसूस होना।

ये घिसावट क्यों होती है?

इसे सिर्फ 'बुढ़ापे की बीमारी' समझना गलत है। आज की लाइफस्टाइल में ये दिक्कतें किसी को भी हो सकती हैं:

  • बढ़ती उम्र: उम्र के साथ जोड़ों की गद्दी को रिपेयर करने की शरीर की रफ्तार धीमी हो जाती है।
  • मोटापा: शरीर का वजन सीधे घुटनों पर पड़ता है। यह वजन न सिर्फ जोड़ों को दबाता है, बल्कि अंदर ही अंदर सूजन पैदा करके गद्दी को तेजी से घिसाता है।
  • पुरानी चोट: बचपन या जवानी में लगी कोई चोट (जैसे लिगामेंट की चोट) कई साल बाद जोड़ों की घिसावट का कारण बन सकती है।
  • ज्यादा मेहनत वाला काम: बार-बार झुकना, भारी वजन उठाना या दिनभर घंटों खड़े रहना जोड़ों पर ऐसा दबाव डालता है कि वे समय से पहले घिस जाते हैं।
  • परिवार में समस्या: कभी-कभी जोड़ों की बनावट जन्मजात ऐसी होती है या परिवार में ये बीमारी पहले से चली आ रही होती है।

जोड़ों के अंदर आखिर होता क्या है?

घुटनों का दर्द अचानक पैदा नहीं होता, यह अंदर ही अंदर धीरे-धीरे पनपता है:

  • गद्दी का घिसना: जो मुलायम गद्दी हड्डियों को रगड़ से बचाती है, उसके घिसने से हड्डियां आपस में छिलने लगती हैं।
  • चिकनाई (ग्रीस) का कम होना: जोड़ों के बीच की नेचुरल चिकनाई सूखने से हड्डियां सूखी घास की तरह रगड़ खाती हैं। आयुर्वेद के हिसाब से शरीर में 'वात' (गैस और रूखापन) बढ़ने से ऐसा होता है।
  • मांसपेशियों का ढीला पड़ना: अगर घुटनों के पास की मांसपेशियां कमजोर हैं, तो सारा बोझ और झटके सीधे हड्डियों पर पड़ते हैं, जिससे जोड़ों की घिसावट कई गुना तेज हो जाती है।

जोड़ों का दर्द और आयुर्वेद: आइए बिल्कुल आसान भाषा में समझें

आयुर्वेद में जोड़ों के दर्द का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि आपकी हड्डियां कमजोर हो गई हैं। असल खेल तो शरीर की 'वात' और घुटनों की 'ग्रीस' के बीच का है। होता क्या है कि जब हमारा पाचन खराब रहने लगता है, तो खाना पचने के बजाय पेट में सड़कर एक जहर बन जाता है। आयुर्वेद में इसे 'आम' कहते हैं। बस यही जोड़ों में जाकर चिपक जाता है और वहाँ दर्द या जकड़न शुरू हो जाती है।

 वात, आम और घुटने: आखिर कनेक्शन क्या है?

  • चलने-फिरने का इंजन: शरीर को चलाने का सारा जिम्मा 'वात' यानी वायु का होता है। अगर शरीर में गैस का बैलेंस सही है, तो आप दौड़िए-भागिए, उठने-बैठने में कोई दिक्कत नहीं होगी।
  • वात: वात की तासीर ठंडी और एकदम सूखी होती है। जब शरीर में बेमतलब की गैस बढ़ती है न, तो वह जोड़ों की सारी नमी और चिकनाई खत्म कर देती है। इसी सूखेपन के कारण हड्डियां आपस में रगड़ खाती हैं और चलते वक्त 'कट-कट' की आवाज आती है।
  • आम का असर: पाचन सुस्त होने पर जो तत्व पेट में बनता है, वह खून के साथ बहकर घुटनों में जम जाता है। इसके बाद घुटने पत्थर जैसे भारी हो जाते हैं और सूजन आ जाती है।

घुटनों को घिसने से कैसे बचाएं? (आयुर्वेद का तरीका)

सिर्फ पेनकिलर खाकर दर्द को सुलाना कोई परमानेंट इलाज तो है नहीं। हमारा पूरा फोकस इस बात पर रहता है कि घुटनों की घिसावट रुके और वो सूखी हुई ग्रीस वापस कैसे आए:

  • वात को ठंडा करना: घिसावट की असली वजह वो भड़की हुई 'गैस' है। सबसे पहले जड़ी-बूटियाँ देकर इसी रूखेपन को खत्म किया जाता है, जिससे दर्द अपने आप शांत हो जाता है।
  • घुटनों को अंदर से खुराक: हड्डियों को छिलने से बचाने के लिए उनके बीच कुदरती चिकनाई बढ़ाई जाती है, ताकि घुटने की गद्दी (कार्टिलेज) और ज्यादा न घिसे।
  • बाहरी सिकाई और मालिश: जब दर्द पुराना हो, तो मालिश और सिकाई जोड़ों की बहुत गहराई में जाकर नसों को खोल देती है, जिससे अकड़न तुरंत टूट जाती है।

दर्द खींचने वाली असरदार देसी जड़ी-बूटियाँ

मरीज की तासीर देखकर जोड़ों की घिसावट रोकने के लिए कुछ खास जड़ी-बूटियाँ दी जाती हैं:

  • शल्लकी: समझ लीजिए कि सूजन उतारने के लिए इससे बढ़िया कुछ नहीं। यह घुटनों की गद्दी को बचा लेती है और चलने-फिरने में आसानी लाती है।
  • गुग्गुलु: इसका काम है शरीर में जमे टॉक्सिन्स को बाहर निकालना। यह गैस को शांत करके अकड़न को बहुत जल्दी खोल देता है।
  • अश्वगंधा: यह हड्डियों में ताकत भरता है ताकि वो जल्दी न घिसें और लंबे समय तक आपका साथ दें।
  • हल्दी: पुरानी से पुरानी सूजन और दर्द को जड़ से खींचने में हल्दी का कोई जवाब नहीं है।

जोड़ों में नई जान डालने वाली खास थेरेपी

जब बीमारी ज्यादा बिगड़ जाए, तो सिर्फ दवाइयों से बात नहीं बनती। तब शरीर को अंदर से रिपेयर करने के लिए ये तरीके अपनाए जाते हैं:

  • जानु बस्ती: इसमें घुटने के चारों तरफ आटे की एक पाल (घेरा) बनाकर उसमें हल्का गरम औषधीय तेल भर देते हैं। यह तेल अंदर तक जाकर हड्डियों के दर्द को एकदम कम कर देता है।
  • पोटली से सिकाई (पत्र पिण्ड स्वेद): जड़ी-बूटियों वाले खास पत्तों की पोटली बनाकर घुटनों की अच्छी तरह सिकाई की जाती है। इससे रुका हुआ खून दौड़ने लगता है और काफी सुकून मिलता है।
  • मालिश (अभ्यंग): महानारायण जैसे असरदार वात-शामक तेलों से मालिश करने पर जोड़ों का सूखापन भाग जाता है और चिकनाई बनी रहती है।
  • बस्ती: वात (गैस) को जड़ से खत्म करने का यह आयुर्वेद का रामबाण तरीका है। औषधीय एनीमा के जरिए शरीर की गैस बाहर निकाल दी जाती है, जिससे घुटनों का घिसना वहीं के वहीं रुक जाता है।

Osteoarthritis के लिए डाइट और लाइफस्टाइल टिप्स

क्या खाएं:

  • हल्का और आसानी से पचने वाला भोजन
  • घी और healthy fats (जोड़ों को लुब्रिकेशन देने के लिए)
  • ताजी सब्जियां और फल
  • तिल, अलसी और अखरोट (हड्डियों और joints के लिए फायदेमंद)
  • गुनगुना पानी और हर्बल ड्रिंक्स

क्या न खाएं:

  • ज्यादा ठंडा और बासी खाना
  • तला-भुना और processed food
  • अधिक मीठा और refined चीजें
  • ज्यादा चाय-कॉफी
  • लंबे समय तक एक ही जगह बैठना या inactivity

पेशेंट टेस्टिमोनियल 

मेरा नाम अनिल कुमारी वर्मा है, मेरी उम्र 60 वर्ष है और मैं दिल्ली से हूँ। साल 2008 में मुझे अर्थराइटिस हो गया था। मेरे पैरों में अचानक सूजन आ गई और बहुत तेज दर्द रहने लगा। हम डॉक्टर के पास गए, एक्स-रे करवाया गया तो ऑपरेशन की सलाह दी गई। मैंने कई दवाइयाँ भी लीं, लेकिन कोई खास आराम नहीं मिला। धीरे-धीरे मेरा आयुर्वेद पर विश्वास बढ़ा। फिर मेरी एक दोस्त ने मुझे जीवा आयुर्वेद के बारे में बताया। इसके बाद मैं जीवाग्राम गई और वहाँ से इलाज शुरू कराया। यहाँ मुझे सही मार्गदर्शन, थेरेपी और आयुर्वेदिक उपचार मिला, जिससे मेरी स्थिति में सुधार आने लगा।

कब डॉक्टर से सलाह लें?

अगर आपको घुटनों या अन्य जोड़ों में लगातार दर्द, जकड़न, सूजन या चलने-फिरने में कठिनाई महसूस हो रही है, तो इसे नजरअंदाज न करें। खासकर अगर सुबह उठते समय stiffness ज्यादा हो, सीढ़ियां चढ़ने-उतरने में दिक्कत हो या दर्द धीरे-धीरे बढ़ रहा हो, तो तुरंत डॉक्टर या विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।

निष्कर्ष

Osteoarthritis सिर्फ उम्र से जुड़ी समस्या नहीं, बल्कि जोड़ों के अंदर धीरे-धीरे होने वाले क्षय का संकेत है। सही समय पर डाइट, एक्सरसाइज और उपचार अपनाकर इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। आयुर्वेद और मॉडर्न दोनों अप्रोच मिलकर दर्द कम करने, joints को मजबूत बनाने और जीवन की गुणवत्ता बेहतर करने में मदद करते हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं, हालांकि यह उम्र के साथ बढ़ता है, लेकिन जोड़ों में चोट, मोटापा या खराब जीवनशैली के कारण अब यह युवाओं में भी देखा जा रहा है।

अगर आवाज़ के साथ दर्द या सूजन भी है, तो यह कार्टिलेज के घिसने का संकेत हो सकता है। बिना दर्द की आवाज़ अक्सर केवल हवा के बुलबुले (गैस) के कारण होती है।

हाँ, कम तापमान के कारण जोड़ों का लुब्रिकेंट (Synovial fluid) गाढ़ा हो जाता है और नसें अधिक संवेदनशील हो जाती हैं, जिससे दर्द और जकड़न बढ़ जाती है।

बिल्कुल। कम दबाव वाले व्यायाम जैसे टहलना या साइकिल चलाना मांसपेशियों को मजबूत करते हैं, जिससे जोड़ों पर पड़ने वाला बोझ कम होता है।

आयुर्वेद 'रसायन' औषधियों और 'जानु बस्ती' जैसी थेरेपी के जरिए कार्टिलेज के और अधिक नुकसान को रोकने और जोड़ों के पोषण (Nourishment) में मदद करता है।

पुरानी जकड़न और वात के दर्द के लिए 'गर्म सिकाई' (स्वेदन) बेहतर है। लेकिन अगर जोड़ में चोट लगी है या बहुत सूजन और लाली है, तो 'ठंडी सिकाई' करें।

हाँ, शरीर के वजन में केवल 10% की कमी भी जोड़ों पर पड़ने वाले दबाव को काफी कम कर सकती है और दर्द में 50% तक सुधार ला सकती है।

 जब पाचन खराब होता है, तो शरीर में 'आम' बनता है। यह विषैला पदार्थ जोड़ों में जमा होकर सूजन और गंभीर जकड़न पैदा करता है।

ये कुछ हद तक मदद कर सकते हैं, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार अश्वगंधा और शल्लकी जैसे प्राकृतिक विकल्प जोड़ों को अधिक गहराई से पोषण देते हैं।

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