Diseases Search
Close Button
 
 

थायरॉइड की दवा बढ़ती क्यों जाती है? एलोपैथी कंट्रोल vs आयुर्वेदिक हार्मोन बैलेंस

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

आजकल भारत में थायरॉइड की बीमारी जिस तेजी से घर-घर में फैल रही है, वो सच में डराने वाली बात है। नई रिपोर्ट्स की मानें तो हमारे देश में करीब 4.2 करोड़ लोग इस बीमारी से जूझ रहे है। इसका सीधा सा मतलब है कि हर दसवें इंसान का थायरॉइड बिगड़ा हुआ है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम इसे सिर्फ खून की एक 'टेस्ट रिपोर्ट' या गले की एक मामूली बीमारी मानकर टाल देते हैं। लेकिन ये बीमारी हमारे शरीर के पूरे सिस्टम को अंदर से खोखला कर देती है।

थायरॉइड क्या है और यह कैसे काम करता है?

थायरॉइड हमारे गले के निचले हिस्से में मौजूद एक छोटी सी ग्रंथि (ग्लैंड) होती है, जो बिल्कुल किसी तितली जैसी दिखती है। इसका असली काम कुछ खास तरह के केमिकल (हार्मोन) बनाना है, जो हमारे शरीर के इंजन (मेटाबॉलिज्म) को चलाते हैं। मेटाबॉलिज्म का सीधा सा मतलब है कि हम जो खाना खाते हैं, शरीर उसे कितनी जल्दी ताकत (एनर्जी) में बदलता है।

थायरॉइड के प्रमुख प्रकार और उनकी पहचान

ये बीमारी मुख्य रूप से दो तरह की होती है। ये इस बात पर तय होता है कि आपके गले की ये ग्रंथि कितनी तेज या सुस्त काम कर रही है:

  • हाइपोथायरॉइडिज्म (सुस्त थायरॉइड): आजकल सबसे ज्यादा यही बीमारी देखने को मिलती है। इसमें आपकी थायरॉइड ग्रंथि सुस्त पड़ जाती है और जरूरत भर के हार्मोन नहीं बना पाती। इससे शरीर का पूरा इंजन धीमा पड़ जाता है। नतीजा? आपका वजन अचानक तेजी से बढ़ने लगता है, दिन भर भयंकर थकावट रहती है, पेट साफ नहीं होता (कब्ज) और दूसरों के मुकाबले आपको बहुत ज्यादा ठंड लगती है।
  • हाइपरथायरॉइडिज्म (अति-सक्रिय या तेज थायरॉइड): इसमें आपकी ग्रंथि पगला जाती है और जरूरत से बहुत ज्यादा हार्मोन खून में फेंकने लगती है। इससे शरीर का इंजन हद से ज्यादा तेज दौड़ने लगता है। इसके मरीजों का वजन अचानक बहुत तेजी से गिरने लगता है, हर वक्त एक अजीब सी घबराहट रहती है, दिल ऐसे धड़कता है जैसे बाहर आ जाएगा और इन्हें भयंकर गर्मी लगती है।

थायरॉइड हार्मोन का शरीर पर प्रभाव

थायरॉइड के ये हार्मोन हमारे शरीर के लिए बिल्कुल एक 'रिमोट कंट्रोल' की तरह काम करते हैं। भले ही ये ग्रंथि बहुत छोटी सी है, लेकिन इसके बनाए हुए हार्मोन खून के जरिए शरीर के कोने-कोने तक पहुंचते हैं और हर अंग पर अपना असर डालते हैं:

  • शरीर की ताकत (ऊर्जा का स्तर): ये हार्मोन ही तय करते हैं कि आपका शरीर खाने से कैसे ताकत बनाएगा। जब इनका बैलेंस सही होता है, तो आप दिनभर घोड़े की तरह दौड़ते हैं। लेकिन इनका बैलेंस बिगड़ते ही आप बिना कुछ किए भी हर वक्त थके-हारे और सुस्त पड़े रहते हैं।
  • वजन पर कंट्रोल: ये शरीर की चर्बी (कैलोरी) जलाने की स्पीड को कंट्रोल करते हैं। जब हार्मोन कम बनते हैं, तो शरीर फैट जलाने के बजाय उसे जमा करने लगता है और इंसान मोटा हो जाता है। वहीं, जब हार्मोन बहुत ज्यादा बनते हैं, तो इंसान सूखकर कांटा होने लगता है।
  • शरीर की गर्मी (तापमान): ये हार्मोन शरीर की अंदरूनी गर्माहट को बैलेंस रखते हैं। यही वजह है कि थायरॉइड के मरीजों को अक्सर या तो बहुत ज्यादा ठंड सताती है या फिर पंखे के नीचे भी पसीने छूटते हैं।
  • दिमाग और मूड (मानसिक स्वास्थ्य): इन हार्मोन्स का सीधा कनेक्शन आपके दिमाग से होता है। इनके बिगड़ते ही इंसान बात-बात पर घबराने लगता है, उसे बेवजह की टेंशन होने लगती है या फिर वो गहरे डिप्रेशन (उदासी) में चला जाता है।
  • दिल और पाचन: ये आपके दिल की धड़कन और पेट की सफाई (पाचन) को भी कंट्रोल करते हैं। इनके बिगड़ने से कब्ज या बार-बार दस्त लगने जैसी पेट की बीमारियां घर कर लेती हैं।

थायरॉइड होने के मुख्य कारण

आखिर ये बीमारी होती क्यों है? इसके पीछे हमारी अपनी खराब लाइफस्टाइल और कुछ शारीरिक कमियां होती हैं। आइए इसके असली कारणों को समझते हैं:

  • हर वक्त की टेंशन (अत्यधिक तनाव): आजकल की इस भागमभाग और हर बात की टेंशन लेना इस ग्रंथि का सबसे बड़ा दुश्मन है। जब आप बहुत ज्यादा स्ट्रेस लेते हैं, तो शरीर में कुछ ऐसे गंदे हार्मोन निकलते हैं जो थायरॉइड के पूरे सिस्टम का कबाड़ा कर देते हैं।
  • उल्टा-सीधा खान-पान: खाने में आयोडीन का बहुत कम या बहुत ज्यादा होना, दोनों ही इसके लिए खतरनाक हैं। इसके अलावा, खाने में जरूरी विटामिन्स की कमी भी इस ग्रंथि को अंदर से बहुत कमजोर कर देती है।
  • खानदानी बीमारी (आनुवंशिकता): अगर आपके मम्मी-पापा या परिवार में किसी और को थायरॉइड की दिक्कत रही है, तो बहुत चांस है कि ये बीमारी आपको भी अपनी चपेट में ले ले।
  • शरीर का ही खुद पर हमला (ऑटोइम्यून बीमारियां): कई बार हमारे शरीर का अपना सिक्योरिटी सिस्टम (इम्यूनिटी) पगला जाता है और गलती से अपनी ही थायरॉइड ग्रंथि पर हमला बोल देता है। इसे 'हाशिमोटो' या 'ग्रेव्स' बीमारी कहा जाता है। इससे ग्रंथि डैमेज हो जाती है और अपना काम भूल जाती है।
  • हार्मोन्स का ऊपर-नीचे होना: खासकर औरतों में जब वो मां बनती हैं, या जब उनके पीरियड्स हमेशा के लिए बंद (मेनोपॉज) होते हैं, तब शरीर में हार्मोन्स का बड़ा भूचाल आता है। 

थायरॉइड की दवा और उसकी निर्भरता

अब बात करते हैं उन गोलियों की जो थायरॉइड के मरीज रोज सुबह खाली पेट खाते हैं। लोगों के मन में इन दवाइयों को लेकर कई सवाल होते हैं, जिन्हें मैं आसान भाषा में समझा देता हूं:

थायरॉइड की दवा शुरू क्यों होती है? 

जब आपके गले की ये ग्रंथि बीमार या सुस्त पड़ जाती है और शरीर को जितने हार्मोन चाहिए उतने नहीं बना पाती, तब डॉक्टर आपको बाहर से गोली के रूप में वही हार्मोन खाने को देते हैं। ये गोली सिर्फ आपके शरीर में उस हार्मोन की कमी को पूरा करती है। इसे खाते ही आपका सुस्त पड़ा इंजन फिर से चालू हो जाता है और वजन बढ़ने या थकावट जैसी दिक्कतों में फौरन आराम दिखने लगता है।

समय के साथ दवा की पावर (डोज) क्यों बढ़ती जाती है? 

आपने अक्सर देखा होगा कि जो दवा 25mg की गोली से शुरू हुई थी, वो कुछ सालों में बढ़कर 100mg तक पहुंच जाती है। ऐसा क्यों? क्योंकि ये अंग्रेजी दवाइयां सिर्फ शरीर में हार्मोन की भरपाई करती हैं, आपकी बीमार ग्रंथि का इलाज नहीं करतीं। जब शरीर को बाहर से बना-बनाया हार्मोन मुफ्त में मिलने लगता है, तो आपकी थायरॉइड ग्रंथि बिल्कुल कामचोर हो जाती है और जो थोड़ा-बहुत हार्मोन वो बना रही थी, वो भी बनाना बंद कर देती है। चूंकि बीमारी की असली जड़ (जैसे टेंशन या खराब पाचन) जस की तस रहती है, इसलिए ग्रंथि और ज्यादा सूख जाती है और डॉक्टर को आपकी गोली का पावर बढ़ाना पड़ता है।

क्या ये दवा जिंदगी भर खानी पड़ेगी? 

यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपने कितनी जल्दी अपना इलाज शुरू किया है:

  • अगर बीमारी बहुत पुरानी हो चुकी है: अगर आपकी ग्रंथि पूरी तरह सूख चुकी है या उसने बिल्कुल काम करना बंद कर दिया है, तो मजबूरी में कई बार ये गोली जिंदगी भर खानी पड़ सकती है।
  • अगर बीमारी नई है: अगर आपको थायरॉइड हुए ज्यादा समय नहीं हुआ है, तो अपने खान-पान को सुधारकर, सही लाइफस्टाइल और आयुर्वेद की मदद लेकर इस ग्रंथि को दोबारा जिंदा किया जा सकता है। सही इलाज से धीरे-धीरे इस गोली की पावर कम की जा सकती है और कई बार तो ये छूट भी जाती है।

आयुर्वेद में थायरॉइड को कैसे देखा जाता है?

आयुर्वेद थायरॉइड को सिर्फ गले की एक ग्रंथि (ग्लैंड) की बीमारी मानकर नहीं छोड़ देता। हमारे वैद्यों के हिसाब से, यह शरीर के तीन मेन पिलर्स वात (गैस), पित्त (गर्मी) और कफ तथा पाचन अग्नि के बीच का पूरा तालमेल बिगड़ने की निशानी है। आयुर्वेद इस बीमारी को ऊपर से नहीं दबाता, बल्कि इसकी एकदम जड़ तक जाता है।

  1. वात-पित्त-कफ का बैलेंस और हार्मोन्स की गड़बड़ी: शरीर में हार्मोन्स का सही बनना इस बात पर टिका है कि आपके शरीर का अंदरूनी बैलेंस कैसा है:
  • कफ का भड़कना और सुस्ती: जब शरीर में 'कफ' जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है, तो शरीर में भारीपन और आलस भर जाता है। यही वजह है कि सुस्त थायरॉइड (हाइपोथायरॉइड) वाले मरीजों में कफ बहुत ज्यादा होता है, जिससे उनका वजन तेजी से बढ़ता है और हर वक्त थकावट रहती है।
  • वात और गर्मी (पित्त) का असर: शरीर में वात या गैस बढ़ने से अंदरूनी सूखापन आता है और हार्मोन्स के सिग्नल डगमगा जाते हैं। वहीं, गर्मी (पित्त) बिगड़ने से शरीर का तापमान और खाना पचाने की स्पीड दोनों का कबाड़ा हो जाता है।
  1. पेट की आग (पाचन), शरीर का आम: आयुर्वेद के नजरिए से थायरॉइड की सबसे बड़ी जड़ 'मंदाग्नि' यानी आपके सुस्त पड़े पाचन में छिपी है:
  • आम बनना: जब आपकी पाचन अग्नि ठंडी पड़ जाती है, तो खाया हुआ खाना ठीक से पचता नहीं। यही आधा-अधूरा पचा हुआ खाना पेट में सड़कर एक चिपचिपा और जहरीला तत्व बना देता है, जिसे हम 'आम' कहते हैं।
  • नसों और रास्तों का जाम होना: यह चिपचिपा तत्व शरीर की पतली-पतली नसों और रास्तों में जाकर उन्हें बिल्कुल जाम कर देता है। ये वही रास्ते हैं जहां से शरीर के हर अंग तक हार्मोन्स और असली पोषण पहुंचती है।
  • इंजन (मेटाबॉलिज्म) का बैठ जाना: जब ये सारे रास्ते ब्लॉक हो जाते हैं, तो गले की थायरॉइड ग्रंथि को ना तो सही सिग्नल मिल पाता है और ना ही पोषण। नतीजा? शरीर का पूरा इंजन बैठ जाता है। इसी पूरी गड़बड़ी को आज की अंग्रेजी दवाइयों में 'थायरॉइड' कहा जाता है।

थायरॉइड को जड़ से मिटाने का आयुर्वेदिक तरीका

आयुर्वेद में हम थायरॉइड को सिर्फ हार्मोन की कमी या ज्यादती नहीं मानते। हमारा मानना है कि यह शरीर के अंदर की बड़ी गड़बड़ी है खासकर बढ़ा हुआ कफ-वात, ठंडा पड़ा पाचन। हमारा मकसद सिर्फ बाहर से गोली देकर हार्मोन कंट्रोल करना नहीं है, बल्कि उस सूख चुकी ग्रंथि में दोबारा जान फूंकना है ताकि वो अपना काम खुद कर सके।

  • कफ-वात को शांत करना और ग्रंथि को ताकत देना: थायरॉइड में सबसे ज्यादा कफ और वात (गैस) का बैलेंस बिगड़ता है। कफ बढ़ने से पाचन सुस्त होता है और वात बिगड़ने से हार्मोन्स का बहाव रुक जाता है।आयुर्वेद में ऐसी खास देसी दवाइयां दी जाती हैं जो इन दोनों को शांत करती हैं और थायरॉइड ग्रंथि की अंदरूनी सर्विसिंग करके उसे दोबारा फिट बनाती हैं।
  • पाचन सुधारना और अंदरूनी डिटॉक्स: ठंडे पड़े पाचन से जो टॉक्सिन बना है, वही तो सारे रास्तों को जाम कर रहा है। रास्तों के बंद होने से हार्मोन्स का आना-जाना रुक जाता है। हमारे इलाज से सबसे पहले पेट की आग को तेज किया जाता है और शरीर का सारा टॉक्सिन बाहर निकाला जाता है, ताकि आपका इंजन फिर से फर्राटे भर सके।
  • शरीर का इंजन (मेटाबॉलिज्म) सेट करना: थायरॉइड का सीधा कनेक्शन आपकी एनर्जी और फैट पचाने की स्पीड से है। आयुर्वेदिक इलाज से इस सुस्त पड़े इंजन को दोबारा स्टार्ट किया जाता है। जैसे ही इंजन पटरी पर आता है, थकावट गायब हो जाती है और तेजी से बढ़ता या घटता वजन अपने आप नॉर्मल होने लगता है।
  • अंदरूनी ताकत (ओजस) वापस लाना: लंबे समय तक थायरॉइड रहने से शरीर अंदर से बिल्कुल खोखला और कमजोर हो जाता है। इलाज का एक बड़ा हिस्सा शरीर को अंदर से असली पोषण देना है, ताकि आपकी वो पुरानी ताकत (ओजस) वापस लौट आए।
  • दिमाग और शरीर का बैलेंस: हर वक्त की टेंशन, गुस्सा और घबराहट सीधे थायरॉइड पर वार करते हैं। इसलिए सिर्फ दवा से काम नहीं चलता। आयुर्वेद में सही दिनचर्या, हल्के-फुल्के योग और ध्यान (मेडिटेशन) के जरिए दिमाग को रिलैक्स किया जाता है। जब दिमाग शांत रहेगा, तो शरीर के हार्मोन्स खुद-ब-खुद लाइन पर आ जाएंगे।

थायरॉइड को ठीक करने वाली देसी औषधियाँ

आयुर्वेद में थायरॉइड का इलाज सिर्फ बाहर से गोली देकर हार्मोन्स को कुछ दिन के लिए कंट्रोल करना नहीं है। इसका असली मकसद आपके गले की ग्रंथि को दोबारा ताकत देना और आपके पाचन के इंजन को एकदम सेट करना है:

  • कांचनार गुग्गुल: गले की किसी भी ग्रंथि या उसमें आई सूजन के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है। यह थायरॉइड ग्रंथि की सूजन को उतारती है और उसे अंदर से इतना सपोर्ट देती है कि वो अपना काम खुद कर सके।
  • अश्वगंधा: थायरॉइड की वजह से जो दिन भर थकावट और कमजोरी छाई रहती है, अश्वगंधा उसे जड़ से मिटा देता है। यह शरीर में फुर्ती भरता है और ऊपर-नीचे हो रहे हार्मोन्स को वापस पटरी पर ले आता है।
  • त्रिफला: थायरॉइड में सबसे ज्यादा आपका पाचन बिगड़ता है और कब्ज रहती है। त्रिफला पेट की अंदर से सफाई करता है और शरीर में जमे सारे टॉक्सिन्स को बाहर निकालकर पाचन अग्नि को तेज कर देता है।

थायरॉइड को  ठीक करने के लिए असरदार आयुर्वेदिक थेरेपी

सिर्फ खाने वाली दवाइयों से ही नहीं, शरीर की पूरी अंदरूनी धुलाई करने और सुस्त पड़ी ग्रंथि को दोबारा जगाने के लिए आयुर्वेद में कुछ खास बाहरी तरीके (पंचकर्म) भी अपनाए जाते हैं जो बहुत गहराई में काम करते हैं:

  • हल्के तेल की मालिश (अभ्यंग): जब खास जड़ी-बूटियों वाले गुनगुने तेल से तसल्ली से पूरे शरीर की मालिश की जाती है, तो दिमाग की सारी टेंशन हवा हो जाती है। इससे बंद नसों में खून का बहाव तेज होता है और हार्मोन्स अपने आप सुधरने लगते हैं।
  • देसी भाप (स्वेदन): मालिश के बाद जब शरीर को जड़ी-बूटियों के पानी से बनी हल्की भाप दी जाती है, तो पसीने के रास्ते शरीर का सारा चिपचिपा कचरा बाहर निकल जाता है और आपका सुस्त पड़ा मेटाबॉलिज्म (इंजन) एकदम स्टार्ट हो जाता है।
  • बस्ती: शरीर में गैस (वात) का भड़कना हार्मोन्स को रोक देता है। बस्ती के जरिए इस गैस को शांत किया जाता है, जिससे हार्मोन्स का पूरा बैलेंस सुधर जाता है और पुरानी से पुरानी बीमारी टूट जाती है।
  • पेट और शरीर की डीप-क्लीनिंग (वमन और विरेचन): थायरॉइड में शरीर के अंदर बहुत ज्यादा भारीपन (कफ) और गर्मी (पित्त) भर जाती है। इन थेरेपी के जरिए शरीर की इस गंदगी और जमे हुए कफ को बाहर खींच लिया जाता है। आप इसे शरीर की पूरी सर्विसिंग समझ सकते हैं। 

थायरॉइड डाइट गाइड: क्या खाएं और किन चीजों से बचें

क्या खाएं (Dos)

ये चीजें थायरॉइड संतुलन में मदद करती हैं:

  • ताजा, हल्का और सुपाच्य भोजन
  • हरी सब्जियां और फल
  • आयोडीन युक्त प्राकृतिक आहार (सीमित मात्रा में)
  • साबुत अनाज और प्रोटीन युक्त भोजन
  • हर्बल चाय और गर्म पानी

क्या न खाएं (Don’ts)

ये चीजें थायरॉइड असंतुलन बढ़ा सकती हैं:

  • अत्यधिक जंक और प्रोसेस्ड फूड
  • बहुत ठंडी और बासी चीजें
  • अत्यधिक शक्कर और तला-भुना भोजन
  • अनियमित खाने की आदतें
  • अत्यधिक कैफीन

पेशेंट टेस्टिमोनियल

मैं फरीदाबाद से सुनील सिंह हूँ। कुछ समय पहले मेरा वजन अचानक बढ़ने लगा, जिसके बाद जांच कराने पर पता चला कि मुझे थायरॉइड की समस्या है। मैंने एलोपैथिक दवाइयाँ लीं, लेकिन उनसे मेरे वजन और स्वास्थ्य में कोई खास सुधार नहीं हुआ।

इसके बाद मेरी हालत और बिगड़ गई और दोबारा जांच में पता चला कि मुझे फैटी लिवर (ग्रेड 3) और किडनी से जुड़ी कुछ समस्याएँ भी हैं। इस दौरान मैं बहुत तनाव में रहने लगा और मेरी नींद भी प्रभावित हो गई।

फिर मैंने जीवा आयुर्वेद से संपर्क किया। यहाँ डॉक्टरों ने मेरी पूरी जांच करके मेरी समस्या के मूल कारण को समझा और उसी के अनुसार इलाज शुरू किया।

मुझे आयुर्वेदिक दवाइयों के साथ-साथ मेरे लिए विशेष डाइट प्लान भी दिया गया। धीरे-धीरे मेरी सेहत में सुधार हुआ और मेरा फैटी लिवर ग्रेड 3 से घटकर ग्रेड 1 हो गया।

आज मैं पहले से काफी बेहतर महसूस करता हूँ और आयुर्वेदिक जीवनशैली को सभी को अपनाने की सलाह देता हूँ।

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए? 

  • बिना कारण अचानक वजन बढ़ना या कम होना
  • लगातार थकान, कमजोरी या सुस्ती महसूस होना
  • बालों का ज्यादा झड़ना या स्किन में बदलाव
  • दिल की धड़कन तेज या अनियमित होना
  • ठंड या गर्मी को असामान्य रूप से सहन न कर पाना
  • गर्दन में सूजन या थायरॉइड ग्रंथि का बढ़ना
  • नींद की समस्या या मूड स्विंग्स (चिंता, डिप्रेशन)
  • पीरियड्स अनियमित होना या फर्टिलिटी से जुड़ी समस्या
  • कब्ज या पाचन से जुड़ी लगातार समस्या
  • थायरॉइड रिपोर्ट (TSH/T3/T4) असामान्य आना

निष्कर्ष

थायरॉइड केवल हार्मोन का असंतुलन नहीं, बल्कि शरीर के मेटाबॉलिज्म, पाचन और समग्र संतुलन से जुड़ी समस्या है। आधुनिक चिकित्सा जहां हार्मोन लेवल को नियंत्रित कर तत्काल प्रबंधन में मदद करती है, वहीं आयुर्वेद इस समस्या के मूल कारणों, जैसे दोष असंतुलन, कमजोर अग्नि और ‘आम’, पर काम करता है। सही आहार, संतुलित जीवनशैली और व्यक्तिगत आयुर्वेदिक उपचार के साथ थायरॉइड को लंबे समय तक संतुलित रखा जा सकता है और समग्र स्वास्थ्य में सुधार लाया जा सकता है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

कुछ मामलों में, खासकर शुरुआती स्टेज में, थायरॉइड को काफी हद तक ठीक या कंट्रोल किया जा सकता है। लेकिन पुरानी स्थिति में इसे लंबे समय तक मैनेज करना पड़ता है।

नहीं, सिर्फ हाइपोथायरॉइड में वजन बढ़ सकता है। हाइपरथायरॉइड में उल्टा वजन तेजी से कम भी हो सकता है।

 नहीं, पुरुषों को भी थायरॉइड हो सकता है। लेकिन महिलाओं में यह समस्या ज्यादा देखी जाती है।

 नहीं, यह कोई नशे वाली दवा नहीं है। यह शरीर में हार्मोन की कमी को पूरा करती है।

नहीं, लेकिन कई लोगों में बाल झड़ना एक लक्षण हो सकता है। इलाज से यह धीरे-धीरे कम हो सकता है।

हाँ, अगर थायरॉइड अनकंट्रोल हो तो प्रेगनेंसी पर असर पड़ सकता है। इसलिए डॉक्टर की सलाह बहुत जरूरी होती है।

तनाव कम करने से थायरॉइड को कंट्रोल करने में मदद मिलती है। लेकिन सिर्फ तनाव कम करने से पूरी बीमारी ठीक नहीं होती।

 हाँ, हल्का व्यायाम और योग बहुत फायदेमंद होते हैं। यह मेटाबॉलिज्म और एनर्जी को बेहतर बनाता है।

हाँ, अगर जीवनशैली खराब हो जाए तो दोबारा असंतुलन हो सकता है। इसलिए लगातार देखभाल जरूरी होती है।

हाँ, सही इलाज और डाइट के साथ पूरी तरह सामान्य जीवन संभव है। बस नियमित जांच और दवा का ध्यान रखना जरूरी है।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us