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Weight loss करने के बाद भी वजन वापस क्यों बढ़ जाता है? Metabolism को समझिए

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

आपने गौर किया होगा कि वजन घटाना जितना मुश्किल लगता है, उसे उसी जगह पर रोक कर रखना उससे भी बड़ा सिरदर्द है। हम डाइटिंग करते हैं, खूब पसीना बहाते हैं और वजन कम भी हो जाता है, लेकिन कुछ ही महीनों में सुई फिर वहीं पहुंच जाती है। आपको लगता होगा कि शायद आपकी ही कोई गलती है, पर असल में ऐसा नहीं है। यह हमारे शरीर की फितरत है। विज्ञान की भाषा में इसे 'होमियोस्टैसिस' (Homeostasis) कहते हैं। इसका सीधा सा मतलब है कि शरीर बदलाव नहीं चाहता। जैसे ही आप अचानक वजन गिराते हैं, शरीर को लगता है कि भुखमरी आ गई है या जान को खतरा है, और वो हर हाल में पुरानी स्थिति में लौटना चाहता है। 

मेटाबॉलिज्म (Metabolism) आखिर है क्या और यह काम कैसे करता है?

मेटाबॉलिज्म हमारे शरीर के अंदर लगा हुआ एक ऐसा इंजन है, जो हमारे खाने-पीने की चीजों को एनर्जी (ताकत) में बदलता है। हम सो भी रहे हों, तब भी यह इंजन चालू रहता है। आखिर सोते वक्त भी तो दिल को धड़कने, फेफड़ों को सांस लेने और खून को साफ होने के लिए एनर्जी चाहिए ही होती है न।

यह काम कैसे करता है:

  • बिल्कुल किसी इंजन की तरह: मेटाबॉलिज्म को आप शरीर के अंदर जलने वाली एक आग समझ सकते हैं। अगर यह आग तेज जल रही है, तो आपका खाना और कैलोरी फटाफट जलेगी और वजन कंट्रोल में रहेगा। लेकिन अगर यह धीमी पड़ गई, तो यही कैलोरी फैट यानी चर्बी बनकर शरीर के कोनों में जमा होने लगेगी।
  • BMR (बेसल मेटाबॉलिक रेट): यह इस पूरे सिस्टम का सबसे खास हिस्सा है। सोचिए आप दिन भर सोफे पर लेटे हैं, कुछ काम नहीं कर रहे हैं। फिर भी आपका शरीर खुद को जिंदा रखने के लिए जो एनर्जी खर्च कर रहा है, उसे BMR कहते हैं। हमारी दिनभर की 60 से 70 परसेंट एनर्जी तो सिर्फ इन्हीं बुनियादी कामों में खर्च हो जाती है।
  • एनर्जी का बैलेंस: आपने ऐसे कई लोग देखे होंगे जो दिनभर कुछ न कुछ खाते रहते हैं, फिर भी एकदम फिट रहते हैं। इसका राज यही है कि उनका BMR बहुत हाई होता है। उनका अंदरूनी इंजन बिना कुछ किए ही इतनी कैलोरी जला देता है कि शरीर में चर्बी टिक ही नहीं पाती।

वजन कम करने के बाद भी वजन क्यों बढ़ जाता है? 

वजन कम करने के बाद उसे स्थिर रखना एक चुनौती होती है। 

  • मेटाबॉलिज्म का धीमा होना: जब आप तेजी से वजन घटाते हैं, तो शरीर 'सुरक्षा मोड' में चला जाता है। वह कम ऊर्जा खर्च करने लगता है ताकि कैलोरी बची रहे। इसी वजह से वजन दोबारा बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है।
  • होमियोस्टैसिस (Homeostasis): हमारे शरीर की एक स्वाभाविक आदत होती है पुराने संतुलन को बनाए रखना। शरीर आपके पुराने 'भारी वजन' को ही सही मानता है और बार-बार उसी स्थिति में लौटने की कोशिश करता है।
  • भूख वाले हार्मोन: वजन घटने पर शरीर में ऐसे हार्मोन बढ़ जाते हैं जो आपको ज्यादा भूख का एहसास कराते हैं। यह शरीर का एक तरीका है जिससे वह आपसे ज्यादा खाना खिलवाकर खोई हुई चर्बी वापस पाना चाहता है।
  • मांसपेशियों (Muscles) का नुकसान: अगर वजन घटाने के दौरान आपने प्रोटीन कम लिया या सिर्फ कार्डियो किया, तो फैट के साथ मांसपेशियां भी कम हो जाती हैं। मांसपेशियाँ कैलोरी जलाने का मुख्य जरिया हैं; इनके कम होने से मेटाबॉलिज्म और सुस्त हो जाता है। 
  • पुरानी आदतों का असर: वजन कम होने के बाद अक्सर लोग ढीले पड़ जाते हैं और वापस पुराने खान-पान या सुस्त लाइफस्टाइल पर लौट आते हैं। शरीर इस एक्स्ट्रा कैलोरी को तुरंत फैट के रूप में जमा कर लेता है।

Crash Dieting और इसका Metabolic Impact

आजकल जल्दी से जल्दी पतले होने के चक्कर में लोग खाना-पीना लगभग छोड़ ही देते हैं, जिसे 'क्रैश डाइटिंग' कहते हैं। शुरू के कुछ दिनों में तो मशीन पर वजन कम दिखता है और बड़ी खुशी होती है। लेकिन अंदर ही अंदर शरीर घबरा जाता है। ऐसे में अपनी बची एनर्जी को बचाने के लिए शरीर मेटाबॉलिज्म को एकदम सुस्त कर देता है।

फिर जैसे ही आप डाइटिंग छोड़कर वापस नॉर्मल खाना शुरू करते हैं, आपका वो सुस्त पड़ा इंजन उस खाने को पचा नहीं पाता। नतीजा? शरीर उस सारे एक्स्ट्रा खाने को फैट बनाकर तेजी से जमा कर लेता है। इसे 'मेटाबॉलिक रिबाउंड' कहते हैं। यही वजह है कि डाइटिंग छोड़ने के बाद वजन पहले से भी ज्यादा तेजी से लौट आता है।

हार्मोन और वजन: आपका शरीर चर्बी जमा करने पर मजबूर क्यों हो जाता है?

हार्मोन हमारे शरीर के वो बॉस हैं, जो ये तय करते हैं कि आपका वजन कम होगा या बढ़ेगा। अगर शरीर में इनका बैलेंस बिगड़ जाए, तो आप चाहे कितनी भी सख्त डाइट कर लें, वजन वापस लौट ही आएगा:

  • थायरॉइड (मेटाबॉलिज्म का रिमोट कंट्रोल): आपके गले में मौजूद यह ग्लैंड मेटाबॉलिज्म की स्पीड तय करती है। अगर यह सुस्त पड़ जाए (हाइपोथायरायडिज्म), तो शरीर की एनर्जी खर्च करने की ताकत एकदम गिर जाती है। फिर आप हवा भी खाएं तो शरीर फूलने लगता है।
  • इंसुलिन रेजिस्टेंस: जब शरीर इंसुलिन हार्मोन का सही से इस्तेमाल नहीं कर पाता, तो खून में मौजूद शुगर एनर्जी बनने के बजाय सीधा चर्बी में बदलने लगती है। और सबसे ज्यादा ये चर्बी आपके पेट के आस-पास टायर की तरह जमा होती है।
  • टेंशन और कोर्टिसोल: आज की भागदौड़ में हर कोई स्ट्रेस में है। ज्यादा टेंशन लेने से शरीर में 'कोर्टिसोल' नाम का हार्मोन बढ़ने लगता है। यह शरीर को अलर्ट मोड (फाइट या फ्लाइट) पर डाल देता है, जिससे सारा फैट सीधे आपके पेट के हिस्से में जाकर जमा हो जाता है।
  • नींद की कमी: लेकिन जब हम गहरी नींद में होते हैं, तब शरीर अपने मेटाबॉलिज्म की रिपेयरिंग कर रहा होता है। अगर आप रात में ठीक से सो नहीं रहे हैं, तो अगले दिन भूख बढ़ाने वाले हार्मोन भड़क जाते हैं। ऐसे में आपको बार-बार कुछ खाने का मन करता है और वजन घटाना बस एक सपना बनकर रह जाता है।

गट हेल्थ (Gut Health) और वजन के बीच का संबंध 

आपकी आंतों की सेहत (Gut Health) और वजन का आपस में गहरा संबंध है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। हमारी आंतों में मौजूद करोड़ों सूक्ष्म जीव (Microbiome) सीधे तौर पर हमारे मेटाबॉलिज्म और वजन को नियंत्रित करते हैं।

गट हेल्थ वजन को कैसे प्रभावित करती है?

  • मेटाबॉलिज्म पर असर: आंतों में रहने वाले 'अच्छे बैक्टीरिया' मेटाबॉलिज्म को तेज रखते हैं। अगर इनका संतुलन बिगड़ जाए, तो वजन घटाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
  • फैट का जमाव: खराब गट हेल्थ की वजह से शरीर भोजन से जरूरत से ज्यादा फैट सोखने (absorb) लगता है, जिससे वजन दोबारा बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है।
  • हार्मोनल असंतुलन: आंतों के बैक्टीरिया उन हार्मोन्स को भी प्रभावित करते हैं जो हमें भूख या पेट भरने का अहसास कराते हैं। खराब गट हेल्थ के कारण आपको बार-बार भूख लग सकती है।
  • इन्फ्लेमेशन (सूजन): आंतों में 'बुरे बैक्टीरिया' बढ़ने से शरीर के अंदर सूजन बढ़ती है, जो मोटापे का एक बड़ा और छुपा हुआ कारण है।

आयुर्वेद में वजन और मेटाबॉलिज्म का कनेक्शन

आयुर्वेद में इस मेटाबॉलिज्म को 'अग्नि' यानी पेट की आग कहा जाता है। आसान शब्दों में समझें तो, जो आपके खाने को ताकत (एनर्जी) में बदलती है। जब तक ये तेज जलती है, आपका वजन एकदम कंट्रोल में रहता है। पर जैसे ही ये ठंडी पड़ती है, आपका खाया हुआ हर निवाला शरीर में चर्बी (फैट) बनकर जमा होने लगता है।

सुस्त पाचन और 'आम': जब पेट की यह आग सुस्त पड़ जाती है, तो खाना पचने के बजाय पेट में ही सड़ने लगता है। आयुर्वेद इसे 'आम' कहता है, जो एक तरह का चिपचिपा और जहरीला होता  है। यह शरीर की नसों और रास्तों को जाम कर देता है, जिससे मेटाबॉलिज्म ठप पड़ जाता है और मोटापा तेजी से बढ़ता है।

वात, पित्त और कफ का खेल: मोटापे का सीधा कनेक्शन शरीर के इन तीन दोषों के बिगड़ने से है:

  • कफ: जब शरीर में कफ बढ़ता है, तो इंसान को हर वक्त सुस्ती घेरे रहती है और यही कफ सीधा पेट और जांघों पर चर्बी के रूप में जमता है।
  • वात (गैस): इसके भड़कने से आपका पाचन कभी एक जैसा नहीं रहता। ऐसे में वजन को रोककर रखना बहुत मुश्किल हो जाता है।
  • पित्त (गर्मी): शरीर में पित्त बिगड़ने से अंदरूनी सूजन आ जाती है और आप जो भी हेल्दी खाते हैं, उसका असर शरीर को लग ही नहीं पाता।

आपकी अपनी 'प्रकृति': हर इंसान की शारीरिक बनावट (प्रकृति) अलग होती है, जो पैदाइशी तय होती है। यही प्रकृति डिसाइड करती है कि आपका इंजन (मेटाबॉलिज्म) तेज दौड़ेगा या धीरे। इसीलिए तो कुछ लोग पानी भी पीकर फूल जाते हैं और कुछ लोग दिनभर खाकर भी दुबले ही रहते हैं।

वजन को दोबारा बढ़ने से रोकने के लिए आयुर्वेद का इलाज

आयुर्वेद का तरीका बहुत सीधा और असरदार है। हमारा फोकस सिर्फ आपको भूखा रखकर वजन गिराने पर नहीं होता, बल्कि हम आपके शरीर के अंदरूनी 'सॉफ्टवेयर' यानी मेटाबॉलिज्म को बिल्कुल नए सिरे से रिसेट करते हैं ताकि मोटापा लौटकर न आए:

  • पेट की अग्नि को तेज करना (अग्नि दीपन): सबसे पहले देसी दवाइयों से आपकी उस सुस्त पड़ी पाचन अग्नि को वापस भड़काया जाता है। जैसे ही ये आग तेज होती है, आपका शरीर खाने को चर्बी बनाने के बजाय सीधा एनर्जी में बदलना शुरू कर देता है।
  • अंदरूनी सफाई (डिटॉक्स): जशरीर में जमा आम ही मेटाबॉलिज्म को रोक कर रखता है। हमारे इलाज से इसको जड़ से बाहर निकालकर शरीर की ऐसी डीप-क्लीनिंग की जाती है कि दोबारा वजन बढ़ने का चांस ही खत्म हो जाए।
  • बढ़े हुए कफ को शांत करना: हमारे वैद्य कुछ खास जड़ी-बूटियों से इसी कफ को शांत करते हैं, जिससे शरीर का भारीपन और चर्बी का जमा होना हमेशा के लिए रुक जाता है।
  • आपके शरीर के हिसाब से डाइट: आपको कोई ऐसी भूखे मरने वाली क्रैश डाइट नहीं दी जाती। आपकी तासीर (वात-पित्त-कफ) देखकर एक ऐसा सीधा-सादा खाना-पीना सेट किया जाता है, जो जिंदगी भर आपके हार्मोन्स को बैलेंस रखे।
  • दिमाग की शांति: जब इंसान टेंशन में होता है, तो वो उल्टा-सीधा और बहुत ज्यादा खाता है। इसलिए टेंशन बढ़ाने वाले हार्मोन को कंट्रोल करने के लिए सही काउंसलिंग और योग का भी सहारा लिया जाता है, ताकि आप स्ट्रेस या घबराहट में आकर बेवजह खाना न खाएं।

मेटाबॉलिज्म संतुलित रखने के लिए डाइट टिप्स 

क्या खाएं 

  • हल्का अनाज: जौ (Barley), बाजरा, रागी और पुराना चावल।
  • दालें: विशेष रूप से मूंग की दाल (पचने में सबसे आसान)।
  • सब्जियां: लौकी, तोरई, करेला और परवल (शरीर को डिटॉक्स करती हैं)।
  • मसाले: अदरक, हल्दी, दालचीनी और जीरा (अग्नि को बढ़ाते हैं)।
  • गुनगुना पानी: दिनभर थोड़ा-थोड़ा पिएं ताकि टॉक्सिन्स साफ हों।

क्या न खाएं 

  • ठंडा और भारी खाना: फ्रिज का भोजन, मैदा, पनीर और अधिक मीठा।
  • विरुद्ध आहार: जैसे दूध के साथ नमक या खट्टे फल (टॉक्सिन्स बढ़ाते हैं)।
  • पैकेट बंद खाना: प्रोसेस्ड फूड और रिफाइंड ऑयल (फैट जमा करते हैं)।
  • दिन में सोना: इससे 'कफ' बढ़ता है और मेटाबॉलिज्म धीमा होता है।

कब डॉक्टर से सलाह लें?

अगर आपका वजन कम करने के बाद बार-बार वापस बढ़ रहा है, साथ ही लगातार थकान, पेट में भारीपन, पाचन की समस्या या भूख में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव हो रहा है, तो यह संकेत हो सकता है कि आपका मेटाबॉलिज्म और पाचन संतुलन बिगड़ गया है। ऐसे में खुद से बार-बार डाइट बदलने की बजाय डॉक्टर या आयुर्वेदिक विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है, ताकि सही कारण पहचानकर इलाज किया जा सके।

निष्कर्ष

वजन दोबारा बढ़ना सिर्फ डाइट की गलती नहीं, बल्कि शरीर के अंदर मेटाबॉलिज्म, पाचन शक्ति और जीवनशैली के असंतुलन का परिणाम है। अगर अग्नि मजबूत हो और लाइफस्टाइल संतुलित रहे, तो वजन को लंबे समय तक कंट्रोल में रखा जा सकता है। सही समय पर समझ और उपचार लेने से इस समस्या को जड़ से सुधारा जा सकता है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

 हाँ, पानी मेटाबॉलिज्म को गति देने का सबसे सरल तरीका है। शोध बताते हैं कि पर्याप्त पानी पीने से 'रेस्टिंग मेटाबॉलिज्म' कुछ समय के लिए बढ़ जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, दिन भर थोड़ा-थोड़ा गुनगुना पानी पीने से 'अग्नि' तीव्र रहती है और शरीर के विषैले पदार्थ (टॉक्सिन्स) बाहर निकलते रहते हैं।

सिर्फ और बहुत अधिक कार्डियो करने से कभी-कभी शरीर मांसपेशियों (Muscles) को ऊर्जा के लिए इस्तेमाल करने लगता है। चूंकि मसल्स मेटाबॉलिज्म को तेज रखती हैं, इसलिए उनकी कमी से मेटाबॉलिज्म धीमा हो सकता है। कार्डियो के साथ स्ट्रेंथ ट्रेनिंग या योग को शामिल करना सबसे बेहतर है।

उम्र के साथ मेटाबॉलिज्म प्राकृतिक रूप से थोड़ा धीमा होता है, लेकिन यह 'अनिवार्य' नहीं है। इसका मुख्य कारण बढ़ती उम्र में सक्रियता कम होना और मांसपेशियों का घटना है। अगर आप शारीरिक रूप से सक्रिय रहते हैं और प्रोटीन युक्त संतुलित आहार लेते हैं, तो आप बढ़ती उम्र में भी मेटाबॉलिज्म को स्वस्थ रख सकते हैं।

कभी-कभी ली जाने वाली चीट मील शरीर को 'भूखमरी मोड' (Starvation Mode) से बाहर निकालने में मदद कर सकती है, जिससे हार्मोन संतुलित होते हैं। हालांकि, इसे बार-बार करने से पाचन अग्नि मंद पड़ जाती है और 'आम' (टॉक्सिन्स) जमा होने लगते हैं, जो वजन बढ़ा सकते हैं।

हाँ, सूर्यास्त के बाद शरीर की पाचन अग्नि प्राकृतिक रूप से मंद हो जाती है। रात को भारी या देर से भोजन करने पर शरीर उसे ऊर्जा में बदलने के बजाय फैट के रूप में जमा करने लगता है। इसलिए आयुर्वेद में रात का खाना हल्का और जल्दी खाने की सलाह दी जाती है।

चाय या कॉफी में मौजूद कैफीन कुछ समय के लिए मेटाबॉलिज्म को थोड़ा बढ़ा सकता है, लेकिन इसका अत्यधिक सेवन वात और पित्त दोष को बिगाड़ सकता है। इससे घबराहट या नींद की कमी हो सकती है, जो अंततः मेटाबॉलिज्म को नुकसान पहुँचाती है।

बिल्कुल। तनाव के दौरान शरीर 'कोर्टिसोल' हार्मोन रिलीज करता है। यह हार्मोन शरीर को निर्देश देता है कि वह ऊर्जा बचाकर रखे, जिससे मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है और पेट के आसपास फैट जमा होने लगता है।

आयुर्वेद में 'लंघन' (उपवास) को अग्नि दीपन्न (पाचन ठीक करने) का तरीका माना गया है। लेकिन बहुत लंबा या गलत तरीके से किया गया उपवास अग्नि को पूरी तरह बुझा सकता है। छोटे अंतराल का उपवास (जैसे इंटरमिटेंट फास्टिंग) मेटाबॉलिक फ्लेक्सिबिलिटी के लिए अच्छा हो सकता है।

गहरे रंग के फल और सब्जियां (जैसे बेरीज, पालक, गाजर) एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होती हैं। ये शरीर के 'इन्फ्लेमेशन' को कम करती हैं, जिससे कोशिकाएं बेहतर तरीके से काम करती हैं और मेटाबॉलिज्म सुचारू रहता है।

जरूरी नहीं। पेट में आवाजें गैस या अपच का संकेत भी हो सकती हैं। एक अच्छा मेटाबॉलिज्म वह है जहाँ आपको समय पर प्राकृतिक भूख लगे, खाना खाने के बाद भारीपन न हो और सुबह पेट पूरी तरह साफ हो।

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