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30 साल से कम उम्र में Autoimmune बीमारियाँ क्यों बढ़ रही हैं? ये सवाल Doctors को भी परेशान कर रहा है

Information By Dr. Keshav Chauhan

आजकल 30 साल से कम उम्र के युवाओं में ऑटोइम्यून (Autoimmune) बीमारियाँ बहुत तेज़ी से बढ़ रही हैं। यह आँकड़ा आधुनिक विज्ञान और डॉक्टर्स को भी हैरान कर रहा है। कभी बुढ़ापे की मानी जाने वाली बीमारियाँ अब युवाओं को अपना शिकार बना रही हैं। एलोपैथी में इन बीमारियों को सिर् फ स्टेरॉयड और इम्युनिटी दबाने वाली दवाओं (Immunosuppressants) से कंट्रोल किया जाता है, जिससे शरीर और कमज़ोर हो जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, अत्यधिक तनाव, जंक फूड और खराब दिनचर्या के कारण शरीर में भयंकर 'आम' (टॉक्सिन्स) बनता है। यह गंदगी हमारी इम्युनिटी को भ्रमित कर देती है, जिससे वह अपने ही शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करने लगती है। जीवा आयुर्वेद प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से इम्युनिटी को सही दिशा देकर इस बीमारी को जड़ से खत्म करने का काम करता है।

ऑटोइम्यून (Autoimmune) बीमारी क्या है और युवाओं में इसकी ज़रूरत से ज़्यादा वृद्धि क्यों?

एक स्वस्थ शरीर की इम्युनिटी (Immune System) का काम बाहर से आने वाले वायरस और बैक्टीरिया से लड़ना होता है। लेकिन ऑटोइम्यून बीमारी में इम्युनिटी 'कन्फ्यूज़' (भ्रमित) हो जाती है और शरीर के अपने ही स्वस्थ अंगों, माँसपेशियाँ और नसों पर हमला कर देती है। युवाओं में इसके तेज़ी से बढ़ने का सबसे बड़ा कारण आज की 'अति-सक्रिय' (Hyperactive) और तनावग्रस्त जीवनशैली है। हम प्राकृतिक खाने से दूर हो गए हैं और डिब्बाबंद भोजन पर निर्भर हैं। शरीर में रसायनों और भारी तनाव का स्तर इतना बढ़ गया है कि इम्युनिटी हमेशा 'अलर्ट मोड' (Alert mode) पर रहती है और अंततः खुद को ही नुकसान पहुँचाने लगती है।

30 से कम उम्र में कौन सी ऑटोइम्यून बीमारियाँ सबसे ज़्यादा देखी जा रही हैं?

युवाओं में मुख्य रूप से इन ऑटोइम्यून बीमारियों का ट्रेंड सबसे ज़्यादा देखा जा रहा है:

  • रूमेटाइड आर्थराइटिस (Rheumatoid Arthritis): इम्युनिटी जोड़ों पर हमला करती है, जिससे 20-30 की उम्र में ही हड्डियाँ और जोड़ भयंकर दर्द और सूजन का शिकार हो जाते हैं।
  • हाशिमोटो थायरॉइडाइटिस (Hashimoto's Thyroiditis): इम्युनिटी थायरॉइड ग्रंथि को नष्ट करने लगती है, जिससे बिना ज़्यादा खाए भी वज़न तेज़ी से बढ़ने लगता है।
  • सोरायसिस और विटिलिगो (Psoriasis & Vitiligo): त्वचा की कोशिकाओं पर हमले के कारण त्वचा पर लाल, पपड़ीदार चकत्ते या स फेद दाग बन जाते हैं।
  • इन्फ्लेमेटरी बाउल डिज़ीज़ (IBD): आँतों की अंदरूनी परत पर इम्युनिटी के हमले से भयंकर सूजन, गैस और पेट की गंभीर बीमारियाँ पैदा होती हैं।

ऑटोइम्यून बीमारी शुरू होने पर शरीर द्वारा दिए जाने वाले भयंकर लक्षण

जब शरीर खुद को ही डैमेज कर रहा होता है, तो वह अंदर से कमज़ोर होने लगता है। इसके मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:

  • भयंकर थकान (Chronic Fatigue): सुबह उठने पर भी शरीर में ज़रा सी भी ऊर्जा न बचना और हमेशा थका-थका महसूस होना।
  • जोड़ों और माँसपेशियों में जकड़न: खासकर सुबह के समय हाथों-पैरों की उँगलियों में जकड़न और दर्द रहना।
  • आँखें और त्वचा का प्रभावित होना: बार-बार आँखें लाल होना, उनमें सूखापन आना और त्वचा पर अजीब चकत्ते निकलना।
  • बुखार और साँस फूलना: बिना किसी इन्फेक्शन के हल्का बुखार रहना और थोड़ा काम करने पर साँस फूलने लगना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत अपने ब्लड टेस्ट (ANA Test) कराएँ और चिकित्सक से परामर्श लें।

शरीर का अपनी ही कोशिकाओं पर हमला करने के असली कारण

रोज़ाना हेल्दी दिखने वाला युवा भी ऑटोइम्यून बीमारी का शिकार क्यों हो रहा है? इसके मुख्य अंदरूनी कारण इस प्रकार हैं:

  • लीकी गट (Leaky Gut) और खराब पाचन: आयुर्वेद मानता है कि 90% बीमारियाँ आँतों से शुरू होती हैं। जब आँतों की परत कमज़ोर हो जाती है, तो अधपचा खाना (आम) सीधे खून में मिल जाता है, जिसे इम्युनिटी बाहरी दुश्मन समझकर हमला कर देती है।
  • मानसिक तनाव का भयंकर प्रकोप: लगातार स्ट्रेस और एंग्जायटी शरीर में 'कॉर्टिसोल' (Stress hormone) बढ़ाती है, जो इम्युनिटी के सिस्टम को पूरी तरह बिगाड़ देती है।
  • विरुद्ध आहार (Incompatible Food): दूध के साथ खट्टे फल या नमक खाना, आयुर्वेद में विष के समान है। यह सीधा रक्त को दूषित कर भयंकर 'आम' पैदा करता है।
  • पर्यावरणीय टॉक्सिन्स: हमारे खाने और पानी में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक्स और पेस्टिसाइड्स शरीर के सेलुलर (Cellular) सिस्टम को भ्रमित कर देते हैं।

ऑटोइम्यून बीमारियों को अनदेखा करने के गंभीर जोखिम

शरीर के इस आंतरिक युद्ध और स्टेरॉयड के साइड इ फेक्ट्स को अगर अनदेखा किया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • अंगों का स्थायी रूप से डैमेज होना: अगर इम्युनिटी का हमला न रोका गया, तो किडनी, लिवर या फेफड़े हमेशा के लिए खराब हो सकते हैं।
  • चलने-फिरने की मोहताजी: रूमेटाइड आर्थराइटिस में हड्डियाँ इस कदर मुड़ जाती हैं कि इंसान बिस्तर पर आ जाता है।
  • दवाइयों पर भयंकर निर्भरता: एक बार स्टेरॉयड शुरू होने पर शरीर अपनी प्राकृतिक इम्युनिटी खो देता है और हर छोटी बीमारी जानलेवा बन सकती है।

भ्रमित इम्युनिटी (ओजस) पर आयुर्वेद का क्या नज़रिया है?

आयुर्वेद में ऑटोइम्यून बीमारियों को 'आमवात' या 'ओजस के क्षय' से जोड़कर देखा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, हमारे शरीर की असली ताकत 'ओजस' (Ojas) है। जब पाचक अग्नि कमज़ोर होती है और शरीर में 'आम' (Toxins) भर जाता है, तो यह 'आम' स्रोतसों (Channels) को ब्लॉक कर देता है। इससे 'ओजस' अपनी दिशा भूल जाता है और शरीर की रक्षा करने के बजाय उसी पर हमला कर देता है। डॉक्टर नाड़ी देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं कि वात, पित्त या कफ में से कौन सा दोष 'आम' के साथ मिला हुआ है। आयुर्वेद में बस इम्युनिटी को सुन्न करने वाली गोलियाँ देना मकसद नहीं है, बल्कि वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, शरीर से 'आम' की स फाई हो, और 'ओजस' को दोबारा उसकी सही दिशा मिले।

जीवा आयुर्वेद इम्युनिटी की ताकत को सही दिशा देने के लिए कैसे काम करता है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति का शरीर और स्वास्थ्य (प्रकृति) अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: मरीज़ को दिख रहे सभी लक्षणों, दर्द के समय और थकान की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: मरीज़ द्वारा ली जा रही स्टेरॉयड या भारी दर्द-निवारक दवाइयों का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: इन सभी बातों का अच्छे से विश्लेषण करने और कुपित दोषों को पकड़ने के बाद ही शरीर को डिटॉक्स (शोधन) करने का सबसे सटीक आयुर्वेदिक इलाज शुरू किया जाता है।

ऑटोइम्यून सिस्टम को शांत करने वाली अचूक आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में इम्युनिटी को वापस सही दिशा देने, सूजन कम करने और 'आम' को काटने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • गिलोय (Giloy/Guduchi): यह आयुर्वेद की सर्वश्रेष्ठ 'इम्यूनोमॉड्यूलेटर' (Immunomodulator) जड़ी-बूटी है। यह इम्युनिटी को दबाती नहीं, बल्कि उसे समझदार (Smart) बनाती है ताकि वह अपनों और परायों में  फर्क कर सके।
  • हल्दी (Curcumin/Haridra): हल्दी शरीर की भयंकर से भयंकर अंदरूनी सूजन (Inflammation) को खत्म करने में अचूक है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): यह नर्वस सिस्टम को शांत करती है, स्ट्रेस हार्मोन को घटाती है और शरीर की गहरी कमज़ोरी को दूर करती है।

नीम (Neem): यह रक्त (Blood) को पूरी तरह सा फ करता है और त्वचा से जुड़ी ऑटोइम्यून बीमारियों (जैसे सोरायसिस) में जादू सा असर करता है।

जमे हुए टॉक्सिन्स (आम) को बाहर निकालने की पंचकर्म चिकित्सा

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, इम्युनिटी को 'रीसेट' (Reset) करने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • विरेचन (Virechana): आँतों और लिवर से 'आम' को बाहर निकालने के लिए यह एक शक्तिशाली पंचकर्म है। इससे रक्त साफ होता है और पित्त दोष शांत होता है।
  • बस्ती (Basti): रूमेटाइड आर्थराइटिस जैसी वात प्रधान बीमारियों में औषधीय तेलों का एनिमा (बस्ती) दिया जाता है। यह आँतों को ताकत देता है और जोड़ों के भयंकर दर्द को जड़ से खत्म करता है।
  • नस्य (Nasya): थायरॉइड और नर्वस सिस्टम की शांति के लिए नाक में औषधीय तेल की बूँदें डालना बहुत  फायदेमंद होता है।

ऑटोइम्यूनिटी को कंट्रोल करने वाला शुद्ध और एंटी-इन्फ्लेमेटरी आहार

आयुर्वेदिक वेलनेस में यह समझना बहुत ज़रूरी है कि ऑटोइम्यून बीमारी में आहार ही आपकी सबसे बड़ी दवा है:

क्या खाएँ?

  • सुपाच्य और हल्का भोजन: मूंग की दाल, लौकी, और पुराने चावल खाएँ। यह पाचक अग्नि पर ज़ोर नहीं डालते और 'आम' नहीं बनाते।
  • शुद्ध गाय का घी: अपनी डाइट में गाय का घी ज़रूर शामिल करें। यह आँतों की परत (Gut lining) को हील करता है और वात को शांत करता है।
  • गर्म मसाले: अदरक, जीरा, और काली मिर्च का प्रयोग रोज़ाना करें, ये 'आम' को पिघलाते हैं।

क्या न खाएँ?

  • ग्लूटेन और रिफाइंड चीनी: मैदा, बेकरी उत्पाद और बहुत ज़्यादा मीठा शरीर में भयंकर सूजन (Inflammation) पैदा करते हैं, इन्हें बिल्कुल बंद कर दें।
  • विरुद्ध आहार: दूध के साथ मछली, नमक या खट्टे फल कभी न खाएँ।
  • पैकेटबंद और बासी खाना: फ्रिज में रखा बासी खाना और जंक फूड शरीर की अग्नि को खत्म कर देते हैं।

जीवा आयुर्वेद में रोगी की गहराई से जाँच कैसे होती है?

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच सिर्फ टेस्ट रिपोर्ट देखकर नहीं, बल्कि पूरी समझ के साथ की जाती है।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी, थकान के स्तर और बीमारी की शुरुआत को आराम से सुना जाता है।
  • आपके द्वारा इस्तेमाल की जा रही भारी गोलियों (Steroids) की हिस्ट्री के बारे में पूछा जाता है।
  • आपके आहार, तनाव और पेट साफ (कब्ज़) होने की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति को जानकर 'आम' के स्तर का पता लगाया जाता है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे 0129 4264323 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

पूरी तरह ठीक होने (Remission) में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में ऑटोइम्यून बीमारियों का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है:

  • हल्की समस्या में सुधार: अगर बीमारी की शुरुआत है, तो आहार बदलने और आयुर्वेदिक दवाइयों से 6 से 8 हफ्तों में ही सूजन और थकान कम होने लगती है।
  • पुरानी बीमारी का समय: चूँकि ऑटोइम्यून बीमारियाँ गहरी होती हैं, इसलिए इम्युनिटी को पूरी तरह 'रीसेट' होने में 8 महीने से 1 साल या उससे अधिक का समय लग सकता है।
  • स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर जड़ी-बूटियों और एंटी-इन्फ्लेमेटरी आहार का कड़ाई से पालन करता है, तो भविष्य में स्टेरॉयड गोलियों के बिना भी सामान्य जीवन जी सकता है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक चिकित्सा (Immunosuppressants) और आयुर्वेदिक उपचार में क्या अंतर है?

पहलू आधुनिक तरीका (Plastic Storage) आयुर्वेदिक दृष्टिकोण (Natural Storage)
इलाज का मुख्य लक्ष्य पानी को स्टोर करना, भले ही प्लास्टिक में रखा जाए पानी को सुरक्षित रखते हुए उसके प्राकृतिक गुणों को बनाए रखना
नज़रिया स्टोरेज को केवल सुविधा और पोर्टेबिलिटी के रूप में देखना पानी को ‘जीवंत’ तत्व मानकर उसके प्रभाव को शरीर पर समझना
उपचार तरीका प्लास्टिक बोतलों में स्टोर करना, फ्रिज में ठंडा रखना उबालकर/शुद्ध करके मिट्टी, कांच या तांबे के बर्तनों में संग्रह करना
डाइट और लाइफस्टाइल ठंडा पानी पीने और प्लास्टिक उपयोग की आदत प्राकृतिक, सामान्य तापमान का पानी और पारंपरिक बर्तनों का उपयोग
लंबा असर माइक्रोप्लास्टिक्स के संपर्क से स्वास्थ्य जोखिम की संभावना शुद्ध, संतुलित और रसायन-मुक्त पानी से दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ

लक्षण दिखने पर डॉक्टर की सलाह कब लें?

ऑटोइम्यून बीमारी के संकेत दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • सुबह उठने पर जोड़ों में 1 घंटे से ज़्यादा भयंकर जकड़न महसूस हो।
  • शरीर का वज़न बिना कारण तेज़ी से घटने या बढ़ने लगे।
  • त्वचा पर लगातार ऐसे चकत्ते रहें जो किसी क्रीम से ठीक न हो रहे हों।
  • आराम करने के बावजूद थकान दूर न हो रही हो और हल्का बुखार बना रहे।

निष्कर्ष: 

आयुर्वेद के हिसाब से युवाओं में तेज़ी से बढ़ती ऑटोइम्यून बीमारियाँ मुख्य रूप से खराब पाचन, तनाव और शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) के जमा होने से जुड़ी समस्या है। अप्राकृतिक जीवनशैली के कारण हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता भ्रमित होकर शरीर को ही दुश्मन समझ बैठती है। सिर् फ बाहर से स्टेरॉयड खाने से दर्द दब जाता है लेकिन बीमारी अंदर ही रहती है और शरीर कमज़ोर होता जाता है। इलाज में शरीर की शुद्धि, गिलोय व हल्दी जैसी जड़ी-बूटियाँ और आँतों को सा फ करने वाला आहार सबसे ज़्यादा आवश्यक है, जिससे आपकी इम्युनिटी वापस अपनी सही दिशा में लौट आए।

FAQs

आधुनिक विज्ञान इसे लाइलाज मानता है, लेकिन आयुर्वेद में सही डाइट, जड़ी-बूटियों और पंचकर्म के ज़रिए इसे पूरी तरह 'रेमिशन' (Remission - बीमारी का निष्क्रिय होना) में लाया जा सकता है, जिससे आप बिना दवाओं के सामान्य जीवन जी सकते हैं।

अत्यधिक जंक फूड, नींद की कमी, भारी मानसिक तनाव और पर्यावरण में फैले माइक्रोप्लास्टिक्स जैसे टॉक्सिन्स के कारण युवाओं का नर्वस सिस्टम और आँतों की सेहत खराब हो रही है, जो इस बीमारी का मुख्य कारण है।

हाँ, जब आँतों की अंदरूनी परत कमज़ोर हो जाती है, तो बिना पचे हुए भोजन के कण और बैक्टीरिया सीधे खून में चले जाते हैं। इसे देखकर इम्युनिटी भड़क जाती है और ऑटोइम्यून रिएक्शन शुरू हो जाता है।

गिलोय एक प्राकृतिक 'इम्यूनोमॉड्यूलेटर' है। यह अति-सक्रिय इम्युनिटी को शांत करती है और कमज़ोर इम्युनिटी को ताकत देती है, यानी यह शरीर की ज़रूरत के हिसाब से काम करती है।

बिल्कुल। खट्टी चीज़ें (नींबू, अचार, इमली) शरीर में वात और पित्त दोनों को बढ़ाती हैं, जिससे जोड़ों में भयंकर सूजन और दर्द पैदा होता है।

कभी नहीं। स्टेरॉयड को अचानक बंद करने से बीमारी बहुत भयंकर रूप से वापस (Flare-up) आ सकती है। आयुर्वेदिक इलाज के साथ-साथ डॉक्टर की सलाह से धीरे-धीरे एलोपैथिक डोज़ को कम (Taper) किया जाता है।

कई रिसर्च मानती हैं कि ग्लूटेन (Gluten) थायरॉइड ग्रंथि की सूजन को बढ़ाता है। आयुर्वेद भी 'आम' बनने की स्थिति में गेहूँ की जगह पचने में हल्के अनाज खाने की सलाह देता है।

हाँ, ज़्यादातर मरीज़ों में यह बीमारी किसी बड़े मानसिक आघात या लगातार तनाव (Stress) के बाद ही शुरू होती है। तनाव सीधे इम्युनिटी को भ्रमित करता है।

हाँ, पंचकर्म (खासकर बस्ती और विरेचन) शरीर की गहराई से स फाई करता है। जब शरीर से 'आम' (गंदगी) निकल जाता है, तो जोड़ों का दर्द और सूजन अपने आप खत्म होने लगते हैं।

इसमें जेनेटिक्स की भूमिका हो सकती है, लेकिन सिर् फ जीन होने से बीमारी नहीं होती। आपका खराब खान-पान और स्ट्रेस इस जीन को 'ट्रिगर' (Activate) करने का काम करता है।

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