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क्या आंतों की सूजन ‘अग्नि’ के असंतुलन का संकेत है? आयुर्वेद में इसे कैसे समझा जाता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan

आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी और बिगड़ते खान-पान का सबसे बुरा असर हमारे पाचन तंत्र पर पड़ता है। बहुत से लोग पेट में लगातार दर्द, ऐंठन और दस्त जैसी समस्याओं से जूझते रहते हैं, जिसे अक्सर 'मामूली इन्फेक्शन' समझकर टाल दिया जाता है। लेकिन असल में यह आंतों की सूजन हो सकती है। आयुर्वेद के अनुसार, यह समस्या तब पैदा होती है जब आपके शरीर की 'पाचन अग्नि' बुझने लगती है या असंतुलित हो जाती है। इसे समय पर पहचानना और इलाज करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि आंतें हमारे शरीर का वह मुख्य हिस्सा हैं जहाँ से पोषण सोखा जाता है। अगर आंतों में सूजन बनी रहे, तो शरीर धीरे-धीरे खोखला होने लगता है।

आंतों की सूजन क्या होती है?

आसान भाषा में कहें तो, हमारी आंतों की अंदरूनी दीवारें बहुत ही कोमल होती हैं। जब हम लगातार बासी, तीखा या जंक फ़ूड खाते हैं, तो आंतों की सुरक्षा परत छिलने लगती है और वहाँ लालिमा या सूजन आ जाती है। इसे ही मेडिकल भाषा में 'इन्फ्लेमेशन' कहते हैं। जब आंतों में सूजन होती है, तो वे भोजन से ज़रूरी पोषक तत्वों को नहीं सोख पातीं और मल त्याग की प्रक्रिया पूरी तरह बाधित हो जाती है।

आंतों की सूजन के प्रकार 

अल्सरेटिव कोलाइटिस (Ulcerative Colitis): इसमें बड़ी आंत की परत में सूजन के साथ-साथ छोटे-छोटे घाव बन जाते हैं।

क्रोहन्स रोग (Crohn’s Disease): यह सूजन पाचन तंत्र के किसी भी हिस्से में हो सकती है और आंतों की गहराई तक पहुँच जाती है।

आईबीडी (IBD): यह एक व्यापक शब्द है जो आंतों की पुरानी और गंभीर सूजन वाली बीमारियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

आंतों की सूजन के लक्षण

पेट में मरोड़ और दर्द: अक्सर भोजन के तुरंत बाद या सुबह उठते ही पेट के निचले हिस्से में तेज़ ऐंठन होना।

मल में बदलाव: बार-बार दस्त होना या मल के साथ मवाद और खून का आना।

थकान और कमज़ोरी: शरीर में पोषक तत्वों की कमी के कारण हर समय थका हुआ महसूस करना।

वज़न का अचानक गिरना: बिना किसी कोशिश के शरीर का दुबला होते जाना।

बुखार और बेचैनी: आंतों में इन्फेक्शन की वजह से शरीर का तापमान बढ़ना और घबराहट होना।

आंतों की सूजन के कारण

कमज़ोर जठराग्नि: भोजन का सही से न पचना आंतों में ज़हरीले तत्वों को जमा कर देता है।

संक्रमण (Infection): दूषित पानी या बासी भोजन के ज़रिए बैक्टीरिया का आंतों में पहुँचना।

दवाओं का दुष्प्रभाव: पेनकिलर्स या एंटीबायोटिक्स का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल आंतों की गुड बैक्टीरिया को ख़त्म कर देता है।

जेनेटिक कारण: परिवार में किसी को पहले से यह समस्या होना।

जोखिम बढ़ाने वाले कारण और जटिलताएँ

जोखिम (Risk Factors):

उम्र: 30 साल से कम उम्र के युवाओं और जिनके परिवार में आईबीडी का इतिहास है, उन्हें इसका ख़तरा ज़्यादा होता है।

धूम्रपान और शराब: सिगरेट के धुएँ में मौजूद टॉक्सिन्स आंतों की सूजन को कई गुना बढ़ा देते हैं।

अत्यधिक तनाव: मानसिक तनाव सीधे तौर पर आंतों की नसों को प्रभावित करता है और सूजन पैदा करता है।

शहरी जीवनशैली: प्रोसेस्ड फ़ूड और रिफाइंड शुगर का अधिक सेवन आंतों की परत को नुक़सान पहुँचाता है।

जटिलताएँ :

आंतों में रुकावट (Bowel Obstruction): लगातार सूजन से आंतों का रास्ता संकरा हो सकता है, जिससे मल बाहर निकलने में दिक़्क़त होती है।

एनीमिया (खून की कमी): मल के साथ लगातार खून बहने से शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर बहुत गिर जाता है।

कुपोषण: आंतें विटामिन और मिनरल्स नहीं सोख पातीं, जिससे हड्डियाँ और मांसपेशियाँ कमज़ोर हो जाती हैं।

फिस्टुला (Fistula): सूजन इतनी गहरी हो सकती है कि वह आंत की दीवार के पार एक असामान्य रास्ता बना दे, जो एक गंभीर स्थिति है।

आंतों की सूजन की जाँच कैसे होती है?

रक्त जाँच (Blood Test): इन्फेक्शन और एनीमिया के स्तर को जाँचने के लिए।

मल की जाँच (Stool Test): मलाशय में खून या मवाद की उपस्थिति देखने के लिए।

कोलोनोस्कोपी: एक ट्यूब के ज़रिए पूरी बड़ी आंत के अंदर की सूजन और घावों को साफ़ देखना।

सीटी स्कैन या एमआरआई: आंतों की सूजन की गहराई और विस्तार को समझने के लिए।

आयुर्वेद में आंतों की सूजन और 'अग्नि' का संबंध

आयुर्वेद मानता है कि हमारा संपूर्ण स्वास्थ्य हमारी 'अग्नि' (पाचन अग्नि) पर निर्भर करता है। आंतों की सूजन के संदर्भ में इसे इस प्रकार समझा जाता है:

मंदाग्नि और 'आम' (Toxins) का निर्माण: जब हमारी जठराग्नि कमज़ोर हो जाती है, तो भोजन पूरी तरह पचने के बजाय आंतों में सड़ने लगता है, जिससे 'आम' (विषैले तत्व) बनते हैं। यह 'आम' आंतों की परत पर जमा होकर सूजन पैदा करता है।

पित्त दोष का प्रकोप: आंतों की सूजन में पित्त दोष (गर्मी) बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है। बढ़ा हुआ पित्त आंतों की कोमल झिल्ली में जलन और घाव पैदा करता है, जिससे मल के साथ खून आने लगता है।

अग्नि का तीक्ष्ण होना: कभी-कभी अग्नि बहुत 'तीक्ष्ण' हो जाती है, जो आंतों के प्राकृतिक म्यूकस को जला देती है, जिससे वहां रूखापन और सूजन आ जाती है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का तरीका

जीवा आयुर्वेद में हम केवल सूजन को कम करने की दवा नहीं देते, बल्कि आपके पाचन तंत्र की पूरी मरम्मत करते हैं। हमारा इलाज 3-स्टेप अप्रोच पर आधारित है:

संचित टॉक्सिन्स (आम) की सफ़ाई: दवाओं के ज़रिए आंतों में जमा गंदगी को साफ़ करना।

अग्नि का दीपन: पाचन शक्ति को फिर से जीवित करना ताकि भोजन सही से पचे।

कोमल परत की हीलिंग: विशेष आयुर्वेदिक योगों से आंतों के घावों को भरना और सूजन दूर करना।

आंतों की सूजन में काम आने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

बिल्व (Bael): यह आंतों की मांसपेशियों को ताक़त देता है और दस्त व सूजन को रोकने में बेजोड़ है।

कुटज (Kutaj): यह संक्रमण को ख़त्म करता है और मल के साथ आने वाले खून व मवाद को नियंत्रित करता है।

मुलेठी (Yashtimadhu): यह आंतों की परत पर एक सुरक्षात्मक लेप की तरह काम करती है और जलन को शांत करती है।

पुनर्नवा (Punarnava): जैसा कि नाम से पता चलता है, यह आंतों की सूजन को कम करके उन्हें 'नया' जीवन देती है।

आयुर्वेदिक थेरेपी 

तक्र बस्ती (Takra Basti): औषधीय छाछ (Buttermilk) के ज़रिए बस्ती देना आंतों की सूजन के लिए सबसे प्रभावी उपचार है। यह आंतों के गुड बैक्टीरिया को बढ़ाता है।

पिचू बस्ती: औषधीय तेलों और काढ़ों का प्रयोग, जो आंतों के घावों (Ulcers) को तेज़ी से भरता है।

अभ्यंग और स्वेदन: पेट के हिस्से की विशेष मालिश, जो वायु के अवरोध को दूर करके मरोड़ को कम करती है।

आंतों की सूजन में क्या खाएं और क्या न खाएं 

क्या खाएं (फ़ायदेमंद):

छाछ (Buttermilk): ताज़ी छाछ में भुना जीरा डालकर पिएं, यह आंतों के लिए अमृत है।

नारियल पानी और अनार: ये शरीर की गर्मी (पित्त) को शांत करते हैं और आंतों को ठंडक पहुँचाते हैं।

मूंग की दाल की खिचड़ी: पचने में आसान और आंतों पर दबाव नहीं डालती।

उबला हुआ पानी: हल्का गुनगुना पानी पिएं जो पाचन में सहायक हो।

क्या न खाएं (परहेज़):

दूध और डेयरी उत्पाद: सूजन के दौरान दूध पचाना मुश्किल होता है, इससे बचें।

मिर्च-मसाले और तला-भुना: लाल मिर्च, समोसे-पकोड़े और गरम मसाला सूजन को कई गुना बढ़ा सकते हैं।

मैदा और कच्चा सलाद: कच्ची सब्ज़ियाँ और मैदा आंतों की दीवारों को और भी ज़्यादा छील सकते हैं।

कैफीन और शराब: चाय, कॉफ़ी और शराब आंतों की नमी को सुखा देते हैं और जलन बढ़ाते हैं।

जीवा आयुर्वेद में मरीज़  की जाँच कैसे होती है?

जीवा आयुर्वेद में मरीज़  की जाँच सिर्फ ऊपर-ऊपर से नहीं, बल्कि पूरी समझ के साथ की जाती है। यहां कोशिश होती है कि बीमारी की असली वज़ह तक पहुंचा जाए।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी और लक्षणों को आराम से सुना जाता है
  • आपकी पुरानी बीमारी और पहले लिए गए इलाज के बारे में पूछा जाता है
  • आपके खाने-पीने और रोज की आदतों को समझा जाता है
  • आपकी नींद, तनाव और पाचन की स्थिति पर ध्यान दिया जाता है
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति को जाना जाता है
  • शरीर में जमा गंदगी (आम) के संकेत देखे जाते हैं
  • अगर कोई और बीमारी या दवा चल रही है, तो उसे भी ध्यान में रखा जाता है

इन सब चीजों को समझने के बाद आपके लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो आपके शरीर और जरूरत के अनुसार हो।

जीवा आयुर्वेद: इलाज का आसान स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक और असरदार समाधान मिल सके।

  1. अपनी जानकारी हमारे साथ साझा करें: सबसे पहले आपको अपनी सेहत से जुड़ी बुनियादी जानकारी हमें देनी होती है। इसके बाद, आप सीधे 0129 4264323 पर कॉल करके अपने इलाज के सफर की शुरुआत कर सकते हैं।
  2. डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करना: आपकी सुविधा के अनुसार, हमारे अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर से बातचीत करने का समय तय किया जाता है। आप अपनी पसंद के हिसाब से नीचे दिए गए दो तरीकों में से कोई भी चुन सकते हैं:
  • क्लिनिक पर जाकर: अगर आप आमने-सामने बैठकर बात करना चाहते हैं, तो अपने नजदीकी Jiva क्लिनिक पर जा सकते हैं।
  • वीडियो कंसल्टेशन (सिर्फ ₹49 में): अगर क्लिनिक आना मुमकिन न हो, तो आप घर बैठे ही वीडियो कॉल के जरिए डॉक्टर से जुड़ सकते हैं। यह खास सुविधा अभी सिर्फ ₹49 में उपलब्ध है।
  1. बीमारी को गहराई से समझना: हमारे डॉक्टर आपसे तसल्ली से बात करते हैं ताकि आपकी तकलीफों और शरीर की प्रकृति को अच्छे से समझ सकें। हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को ठीक करना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वज़ह तक पहुँचना है।
  2. आपके लिए खास इलाज की योजना: पूरीजाँच के बाद, डॉक्टर सिर्फ आपके लिए एक कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान तैयार करते हैं। इसमें शुद्ध जड़ी-बूटियों से बनी दवाइयाँ दी जाती हैं, जो आपके शरीर के दोषों को संतुलित करने और आपको अंदर से सेहतमंद बनाने में मदद करती हैं।

अपॉइंटमेंट के लिए अभी कॉल करें: 0129 4264323

ठीक होने में कितना समय लग सकता है? 

2 से 4 हफ़्ते: सही डाइट और इलाज से दस्त की संख्या और पेट के दर्द में तेज़ कमी आने लगती है।

3 से 6 महीने: आंतों की सूजन कम होने लगती है और शरीर पोषक तत्वों को सोखना शुरू कर देता है, जिससे थकान कम होती है।

1 साल या उससे अधिक: गंभीर मामलों में आंतों की परत को पूरी तरह ठीक होने और ओजस को वापस पाने में लंबा वक़्त लग सकता है।

इलाज से क्या फ़ायदा मिल सकता है? 

फ्लेयर्स में कमी: बार-बार बीमारी का बढ़ना रुक जाता है।

खून की कमी (Anemia) से राहत: ब्लीडिंग रुकने से शरीर में नया रक्त बनने लगता है।

स्टेरॉयड्स से आज़ादी: आयुर्वेद के ज़रिए आप लंबे समय तक चलने वाली हानिकारक दवाओं पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं।

मानसिक शांति: जब पेट ठीक रहता है, तो चिंता और चिड़चिड़ापन अपने आप कम होने लगता है।

ऊर्जा में बढ़ोतरी: भोजन का पोषण शरीर को मिलने लगता है, जिससे आप हर वक़्त ताज़गी महसूस करते हैं।

मरीज़ों का अनुभव

नमस्कार, मैं कंवर, जयपुर, राजस्थान से बोल रही हूँ। मुझे 4 साल पहले अल्सरटिव कोलाइटिस हो गया था, जिसकी वजह से मैं बहुत परेशान हो गई थी। मेरा वजन बहुत कम हो गया था और शरीर में बहुत सी प्रॉब्लम्स होने लगी थीं। 

मैंने इसके लिए एलोपैथी दवाइयां लीं, लेकिन उनके साइड इफेक्ट्स होने लगे थे। साइड इफेक्ट्स की वजह से शरीर में बहुत कमजोरी आने लगी थी। फिर हमने पता किया और टीवी पर जीवा के बारे में देखा। 

उसके बाद हम जीवा क्लीनिक पर गए और वहां से दवाइयां शुरू कीं। आज मुझे दवाइयां लेते हुए समय हो गया है और मैं अब बिल्कुल ठीक हूँ। मुझे विश्वास है कि आगे भी मैं दवाइयां लेते हुए ठीक रहूँगी।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

अपने इलाज पर कितना खर्च आएगा, यह जानना हर मरीज़ के लिए जरूरी होता है। जीवा आयुर्वेद में हम खर्च की जानकारी साफ और आसान तरीके से देते हैं, ताकि आप बिना किसी उलझन के सही फैसला ले सकें।

इलाज का सामान्य खर्च

जो लोग अपनी बीमारी के लिए नियमित इलाज शुरू करना चाहते हैं, उनके लिए दवाइयों और डॉक्टर की सलाह का महीने का खर्च लगभग ₹3,000 से ₹3,500 के बीच आता है।

यह एक औसत अंदाजा है। असल खर्च आपकी बीमारी कितनी पुरानी है और उसकी स्थिति कैसी है, इस पर निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल (स्पेशल पैकेज)

अगर आप अपनी बीमारी को जड़ से मिटाने के लिए थोड़ा ज़्यादा गहराई और विस्तार से इलाज करना चाहते हैं, तो हमारे 'विशेष पैकेज' आपके लिए सबसे अच्छे हैं। इसमें हम सिर्फ बीमारी को नहीं दबाते, बल्कि आपकी पूरी लाइफस्टाइल को सुधारने पर काम करते हैं।

 इसमें शामिल हैं:

  • खास दवाइयाँ(Customized Medicines)
  • सीनियर डॉक्टर से कंसल्टेशन
  • मन को शांत रखने के सेशन्स (Stress Management)
  • योग और मेडिटेशन की ट्रेनिंग
  • पर्सनल डाइट प्लान (जो सिर्फ आपके लिए बना हो)

इन पैकेजेस का खर्च आमतौर पर ₹15,000 से ₹40,000 के बीच होता है, जो आपके 3 से 4 महीने के पूरे इलाज को कवर करता है।

जीवाग्राम  (24x7 देखभाल वाला इलाज)

जिन लोगों को बीमारी से लड़ने के लिए ज़्यादा ध्यान, शांति और आराम के साथ इलाज चाहिए, उनके लिए हमारा जीवाग्राम  सेंटर सबसे बेहतरीन विकल्प है। यह प्रकृति के करीब बना एक ऐसा सेंटर है जहाँ आपको घर जैसा सुकून और अस्पताल जैसी केयर मिलती है।

यहाँ आपको मिलता है:

  • पंचकर्म थेरेपी (शरीर की अंदरूनी सफाई)
  • सादा और पौष्टिक 'सात्विक' खाना
  • इलाज की आधुनिक और बेहतर सुविधाएं
  • आरामदायक रहने की व्यवस्था

यहाँ 7 दिन का प्रोग्राम लगभग ₹1 लाख का होता है। इसमें आपको हर समय विशेषज्ञों की देखभाल मिलती है, ताकि आपका शरीर और मन दोनों पूरी तरह से तरोताजा हो सकें।

लोग जीवा आयुर्वेद पर भरोसा क्यों करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वज़हको जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वज़ह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • असली कारण पर आधारित इलाज: हमारा पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि बीमारी की जड़ क्या है। हम सिर्फ ऊपरी लक्षणों को कम नहीं करते, बल्कि शरीर के अंदर जाकर उस समस्या को ठीक करते हैं जिससे बीमारी शुरू हुई है।
  • हर मरीज़ के लिए एक खास प्लान: आयुर्वेद मानता है कि हर इंसान का शरीर अलग होता है। इसलिए, हम सबको एक ही दवा नहीं देते। आपका इलाज आपकी अपनी प्रकृति, खान-पान और आपकी लाइफस्टाइल के हिसाब से खास आपके लिए तैयार किया जाता है।
  • जाँच और इलाज का सही तरीका: हम एक बहुत ही व्यवस्थित प्रक्रिया का पालन करते हैं। इससे शरीर के हार्मोन्स, पाचन और मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्याओं को गहराई से समझकर उन्हें बैलेंस करने में मदद मिलती है।
  • शुद्ध और सुरक्षित दवाईयां: जीवा की सभी आयुर्वेदिक दवाइयाँ पूरी तरह से शुद्ध जड़ी-बूटियों से बनी होती हैं। इनके बनाने में सुरक्षा और क्वालिटी के कड़े मानकों का पालन किया जाता है ताकि आपको कोई नुकसान न हो।
  • अनुभवी डॉक्टरों की टीम: हमारे पास ऐसे डॉक्टरों की एक बड़ी टीम है जिन्हें आयुर्वेद का सालों का अनुभव है। ये एक्सपर्ट्स हर दिन हजारों मरीज़ों की मुश्किल समस्याओं को सुलझाने में उनकी मदद करते हैं।
  • परिणाम जो सच में दिखते हैं: हमारे 90% से ज़्यादा मरीज़ों ने अपने स्वास्थ्य में बड़ा और सकारात्मक सुधार महसूस किया है।
  • दवाइयों पर निर्भरता में कमी: हमारा लक्ष्य आपको सेहतमंद बनाना है। हमारे 88% मरीज़ धीरे-धीरे दूसरी भारी-भरकम दवाइयों पर अपनी निर्भरता कम करने में सफल रहे हैं और एक नेचुरल लाइफस्टाइल की ओर बढ़े हैं।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

आधुनिक इलाज (Modern Approach) आयुर्वेदिक इलाज (Ayurvedic Approach)
यह मुख्य रूप से लक्षणों (Symptoms) पर काम करता है और तुरंत राहत के लिए एसिड को दबा देता है। यह समस्या की जड़ (Root Cause) यानी 'मंदाग्नि' और बिगड़े हुए 'पित्त' पर काम करता है।
लंबे समय तक इस्तेमाल से शरीर दवाओं का आदी हो जाता है, जिससे दवा छोड़ते ही एसिड दोबारा लौटता है। यह शरीर की प्राकृतिक पाचन शक्ति को पुनर्जीवित करता है, जिससे दवाओं पर निर्भरता खत्म हो जाती है।
यह शरीर के pH संतुलन और पोषक तत्वों (B12, कैल्शियम) के अवशोषण को बिगाड़ सकता है। यह शरीर के प्राकृतिक pH को बहाल करता है और पाचन तंत्र को पोषण सोखने के लायक बनाता है।

निष्कर्ष 

आंतों की सूजन या IBD केवल पेट की समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर के आंतरिक संतुलन और 'अग्नि' के विकृत होने का परिणाम है। आयुर्वेद का दृष्टिकोण यहाँ 'होलिस्टिक हीलिंग' पर आधारित है, जिसका अर्थ है केवल लक्षणों को नहीं, बल्कि बीमारी की जड़ को ठीक करना। जल्दी इलाज और खान-पान में अनुशासन बरतने से न केवल आंतों की सूजन कम होती है, बल्कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी वापस लौटती है। संतुलित जीवनशैली और आयुर्वेदिक उपचार के माध्यम से शरीर को दोबारा स्वस्थ और ऊर्जावान बनाया जा सकता है।

FAQs

आयुर्वेद के अनुसार, यदि शुरुआती अवस्था में ही जठराग्नि को संतुलित कर लिया जाए और विरुद्ध आहार (गलत खान-पान) बंद कर दिया जाए, तो इसे लंबे समय तक शांत रखा जा सकता है।

जी हाँ, आयुर्वेद में मन और पेट का गहरा संबंध माना गया है। बहुत ज़्यादा मानसिक तनाव 'पित्त' को बढ़ाता है, जिससे सूजन और दस्त की समस्या और तेज़ हो सकती है।

आमतौर पर सूजन के दौरान दूध पचाना मुश्किल होता है और यह दस्त बढ़ा सकता है। हालांकि, कुछ स्थितियों में औषधीय घी या बकरी का दूध डॉक्टर की सलाह पर दिया जा सकता है।

छाछ में 'दीपन' और 'ग्राही' गुण होते हैं। यह पाचन अग्नि को बढ़ाती है और मल को बांधने में मदद (Help) करती है, इसलिए इसे 'ग्रहणी' की सबसे अच्छी दवा माना जाता है।

हाँ, लाल मिर्च और गरम मसाले पित्त को बढ़ाते हैं और आंतों के घावों को कुरेदते हैं। इनके स्थान पर धनिया, सौंफ और हल्दी जैसे ठंडे मसालों का प्रयोग बेहतर (Better) है।

आयुर्वेद के अनुसार 'कुलज विकार' (Genetic) हो सकते हैं, लेकिन सही जीवनशैली और आहार से इन दोषों को सक्रिय होने से रोका जा सकता है।

बहुत भारी व्यायाम से बचना चाहिए क्योंकि यह शरीर में गर्मी बढ़ा सकता है। हल्के योगासन और प्राणायाम मानसिक शांति और पाचन में बहुत फ़ायदा पहुँचाते हैं।

हाँ, यह आंतों में गहरे घाव या अल्सर का संकेत हो सकता है। इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए और तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।

हाँ, विशेष रूप से 'पिच्छा बस्ती' (औषधीय एनिमा) आंतों के घावों को भरने और रक्तस्राव को रोकने में बहुत ज़्यादा प्रभावी होती है।

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