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क्या आंतों की सूजन ‘अग्नि’ के असंतुलन का संकेत है? आयुर्वेद में इसे कैसे समझा जाता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी और बिगड़ते खान-पान का सबसे बुरा असर हमारे पाचन तंत्र पर पड़ता है। बहुत से लोग पेट में लगातार दर्द ऐंठन और दस्त जैसी समस्याओं से जूझते रहते हैं जिसे अक्सर मामूली इन्फेक्शन समझकर टाल दिया जाता है। लेकिन असल में यह आंतों की सूजन हो सकती है। आयुर्वेद के अनुसार यह समस्या तब पैदा होती है जब आपके शरीर की पाचन अग्नि बुझने लगती है या असंतुलित हो जाती है। इसे समय पर पहचानना और इलाज करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि आंतें हमारे शरीर का वह मुख्य हिस्सा हैं जहाँ से पोषण सोखा जाता है। अगर आंतों में सूजन बनी रहे तो शरीर धीरे-धीरे खोखला होने लगता है।

आंतों की सूजन क्या होती है?

आसान भाषा में कहें तो हमारी आंतों की अंदरूनी दीवारें बहुत ही कोमल होती हैं। जब हम लगातार बासी तीखा या जंक फ़ूड खाते हैं तो आंतों की सुरक्षा परत छिलने लगती है और वहाँ लालिमा या सूजन आ जाती है। इसे ही मेडिकल भाषा में इन्फ्लेमेशन कहते हैं। जब आंतों में सूजन होती है तो वे भोजन से ज़रूरी पोषक तत्वों को नहीं सोख पातीं और मल त्याग की प्रक्रिया पूरी तरह बाधित हो जाती है।

आंतों की सूजन के प्रकार 

अल्सरेटिव कोलाइटिस (Ulcerative Colitis) इसमें बड़ी आंत की परत में सूजन के साथ-साथ छोटे-छोटे घाव बन जाते हैं।

क्रोहन्स रोग (Crohn’s Disease) यह सूजन पाचन तंत्र के किसी भी हिस्से में हो सकती है और आंतों की गहराई तक पहुँच जाती है।

आईबीडी (IBD) यह एक व्यापक शब्द है जो आंतों की पुरानी और गंभीर सूजन वाली बीमारियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

आंतों की सूजन के लक्षण

पेट में मरोड़ और दर्द अक्सर भोजन के तुरंत बाद या सुबह उठते ही पेट के निचले हिस्से में तेज़ ऐंठन होना।

मल में बदलाव बार-बार दस्त होना या मल के साथ मवाद और खून का आना।

थकान और कमज़ोरी शरीर में पोषक तत्वों की कमी के कारण हर समय थका हुआ महसूस करना।

वज़न का अचानक गिरना बिना किसी कोशिश के शरीर का दुबला होते जाना।

बुखार और बेचैनी आंतों में इन्फेक्शन की वजह से शरीर का तापमान बढ़ना और घबराहट होना।

आंतों की सूजन के कारण

कमज़ोर जठराग्नि भोजन का सही से न पचना आंतों में ज़हरीले तत्वों को जमा कर देता है।

संक्रमण (Infection) दूषित पानी या बासी भोजन के ज़रिए बैक्टीरिया का आंतों में पहुँचना।

दवाओं का दुष्प्रभाव पेनकिलर्स या एंटीबायोटिक्स का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल आंतों की गुड बैक्टीरिया को ख़त्म कर देता है।

जेनेटिक कारण परिवार में किसी को पहले से यह समस्या होना।

जोखिम बढ़ाने वाले कारण और जटिलताएँ

जोखिम (Risk Factors)

उम्र 30 साल से कम उम्र के युवाओं और जिनके परिवार में आईबीडी का इतिहास है उन्हें इसका ख़तरा ज़्यादा होता है।

धूम्रपान और शराब सिगरेट के धुएँ में मौजूद टॉक्सिन्स आंतों की सूजन को कई गुना बढ़ा देते हैं।

अत्यधिक तनाव मानसिक तनाव सीधे तौर पर आंतों की नसों को प्रभावित करता है और सूजन पैदा करता है।

शहरी जीवनशैली प्रोसेस्ड फ़ूड और रिफाइंड शुगर का अधिक सेवन आंतों की परत को नुक़सान पहुँचाता है।

जटिलताएँ

आंतों में रुकावट (Bowel Obstruction) लगातार सूजन से आंतों का रास्ता संकरा हो सकता है जिससे मल बाहर निकलने में दिक़्क़त होती है।

एनीमिया (खून की कमी) मल के साथ लगातार खून बहने से शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर बहुत गिर जाता है।

कुपोषण आंतें विटामिन और मिनरल्स नहीं सोख पातीं जिससे हड्डियाँ और मांसपेशियाँ कमज़ोर हो जाती हैं।

फिस्टुला (Fistula) सूजन इतनी गहरी हो सकती है कि वह आंत की दीवार के पार एक असामान्य रास्ता बना दे जो एक गंभीर स्थिति है।

आंतों की सूजन की जाँच कैसे होती है?

रक्त जाँच (Blood Test) इन्फेक्शन और एनीमिया के स्तर को जाँचने के लिए।

मल की जाँच (Stool Test) मलाशय में खून या मवाद की उपस्थिति देखने के लिए।

कोलोनोस्कोपी एक ट्यूब के ज़रिए पूरी बड़ी आंत के अंदर की सूजन और घावों को साफ़ देखना।

सीटी स्कैन या एमआरआई आंतों की सूजन की गहराई और विस्तार को समझने के लिए।

आयुर्वेद में आंतों की सूजन और अग्नि का संबंध

आयुर्वेद मानता है कि हमारा संपूर्ण स्वास्थ्य हमारी अग्नि (पाचन अग्नि) पर निर्भर करता है। आंतों की सूजन के संदर्भ में इसे इस प्रकार समझा जाता है

मंदाग्नि और आम (Toxins) का निर्माण जब हमारी जठराग्नि कमज़ोर हो जाती है तो भोजन पूरी तरह पचने के बजाय आंतों में सड़ने लगता है जिससे आम (विषैले तत्व) बनते हैं। यह आम आंतों की परत पर जमा होकर सूजन पैदा करता है।

पित्त दोष का प्रकोप आंतों की सूजन में पित्त दोष (गर्मी) बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है। बढ़ा हुआ पित्त आंतों की कोमल झिल्ली में जलन और घाव पैदा करता है जिससे मल के साथ खून आने लगता है।

अग्नि का तीक्ष्ण होना कभी-कभी अग्नि बहुत तीक्ष्ण हो जाती है जो आंतों के प्राकृतिक म्यूकस को जला देती है जिससे वहां रूखापन और सूजन आ जाती है।

मरीज़ों का अनुभव

नमस्कार मैं कंवर जयपुर राजस्थान से बोल रही हूँ। मुझे 4 साल पहले अल्सरटिव कोलाइटिस हो गया था जिसकी वजह से मैं बहुत परेशान हो गई थी। मेरा वजन बहुत कम हो गया था और शरीर में बहुत सी प्रॉब्लम्स होने लगी थीं। 

मैंने इसके लिए एलोपैथी दवाइयां लीं लेकिन उनके साइड इफेक्ट्स होने लगे थे। साइड इफेक्ट्स की वजह से शरीर में बहुत कमजोरी आने लगी थी। फिर हमने पता किया और टीवी पर जीवा के बारे में देखा। 

उसके बाद हम जीवा क्लीनिक पर गए और वहां से दवाइयां शुरू कीं। आज मुझे दवाइयां लेते हुए समय हो गया है और मैं अब बिल्कुल ठीक हूँ। मुझे विश्वास है कि आगे भी मैं दवाइयां लेते हुए ठीक रहूँगी।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

आधुनिक इलाज (Modern Approach) आयुर्वेदिक इलाज (Ayurvedic Approach)
यह मुख्य रूप से लक्षणों (Symptoms) पर काम करता है और तुरंत राहत के लिए एसिड को दबा देता है। यह समस्या की जड़ (Root Cause) यानी मंदाग्नि और बिगड़े हुए पित्त पर काम करता है।
लंबे समय तक इस्तेमाल से शरीर दवाओं का आदी हो जाता है जिससे दवा छोड़ते ही एसिड दोबारा लौटता है। यह शरीर की प्राकृतिक पाचन शक्ति को पुनर्जीवित करता है जिससे दवाओं पर निर्भरता खत्म हो जाती है।
यह शरीर के pH संतुलन और पोषक तत्वों (B12 कैल्शियम) के अवशोषण को बिगाड़ सकता है। यह शरीर के प्राकृतिक pH को बहाल करता है और पाचन तंत्र को पोषण सोखने के लायक बनाता है।

निष्कर्ष 

आंतों की सूजन या IBD केवल पेट की समस्या नहीं है बल्कि यह शरीर के आंतरिक संतुलन और अग्नि के विकृत होने का परिणाम है। आयुर्वेद का दृष्टिकोण यहाँ होलिस्टिक हीलिंग पर आधारित है जिसका अर्थ है केवल लक्षणों को नहीं बल्कि बीमारी की जड़ को ठीक करना। जल्दी इलाज और खान-पान में अनुशासन बरतने से न केवल आंतों की सूजन कम होती है बल्कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी वापस लौटती है। संतुलित जीवनशैली और आयुर्वेदिक उपचार के माध्यम से शरीर को दोबारा स्वस्थ और ऊर्जावान बनाया जा सकता है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

आयुर्वेद के अनुसार, यदि शुरुआती अवस्था में ही जठराग्नि को संतुलित कर लिया जाए और विरुद्ध आहार (गलत खान-पान) बंद कर दिया जाए, तो इसे लंबे समय तक शांत रखा जा सकता है।

जी हाँ, आयुर्वेद में मन और पेट का गहरा संबंध माना गया है। बहुत ज़्यादा मानसिक तनाव 'पित्त' को बढ़ाता है, जिससे सूजन और दस्त की समस्या और तेज़ हो सकती है।

आमतौर पर सूजन के दौरान दूध पचाना मुश्किल होता है और यह दस्त बढ़ा सकता है। हालांकि, कुछ स्थितियों में औषधीय घी या बकरी का दूध डॉक्टर की सलाह पर दिया जा सकता है।

छाछ में 'दीपन' और 'ग्राही' गुण होते हैं। यह पाचन अग्नि को बढ़ाती है और मल को बांधने में मदद (Help) करती है, इसलिए इसे 'ग्रहणी' की सबसे अच्छी दवा माना जाता है।

हाँ, लाल मिर्च और गरम मसाले पित्त को बढ़ाते हैं और आंतों के घावों को कुरेदते हैं। इनके स्थान पर धनिया, सौंफ और हल्दी जैसे ठंडे मसालों का प्रयोग बेहतर (Better) है।

आयुर्वेद के अनुसार 'कुलज विकार' (Genetic) हो सकते हैं, लेकिन सही जीवनशैली और आहार से इन दोषों को सक्रिय होने से रोका जा सकता है।

बहुत भारी व्यायाम से बचना चाहिए क्योंकि यह शरीर में गर्मी बढ़ा सकता है। हल्के योगासन और प्राणायाम मानसिक शांति और पाचन में बहुत फ़ायदा पहुँचाते हैं।

हाँ, यह आंतों में गहरे घाव या अल्सर का संकेत हो सकता है। इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए और तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।

हाँ, विशेष रूप से 'पिच्छा बस्ती' (औषधीय एनिमा) आंतों के घावों को भरने और रक्तस्राव को रोकने में बहुत ज़्यादा प्रभावी होती है।

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