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माइग्रेन सिर्फ एक तरफ क्यों होता है? आयुर्वेदिक नज़रिया

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

पेनकिलर (Painkillers) और तंत्रिका तंत्र को सुन्न करने वाली भारी दवाओं का इस्तेमाल माइग्रेन और भयंकर सिरदर्द जैसी बीमारियों में काफी आम है। ये दवाएँ मस्तिष्क की नसों में होने वाली सूजन को कुछ समय के लिए कम कर देती हैं या दर्द के सिग्नल को दिमाग तक पहुँचने से रोक देती हैं, जिससे मरीज़ को लगता है कि वह पूरी तरह ठीक हो गया है और उसकी परेशानी ख़त्म हो गई है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि तनाव बढ़ने, तेज़ धूप में जाने या दवा का असर ख़त्म होने के तुरंत बाद फिर से भयंकर धड़कने वाला सिरदर्द, उल्टी और चक्कर की समस्या होने लगती है और माइग्रेन पहले से भी भयंकर रूप में वापस आ जाता है।

इसके कारण कई हो सकते हैं जैसे लगातार दर्द-निवारक दवाओं के इस्तेमाल से नसों का कमज़ोर होना (Medication Overuse Headache), बीमारी कितनी गंभीर है, दवाओं पर शरीर की निर्भरता, या सबसे महत्वपूर्ण शरीर के अंदर मौजूद अतिरिक्त वात-पित्त दोष और टॉक्सिन्स जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं। इस बात को समझना ज़रूरी है, ताकि वक्त रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सके और मस्तिष्क व नसों की सेहत बनी रहे।

माइग्रेन की समस्या क्या है और यह एक तरफ क्यों होता है?

माइग्रेन (Migraine) एक न्यूरोलॉजिकल (Neurological) स्थिति है, जहाँ सिर के एक हिस्से में बहुत तेज़, धड़कने वाला (Throbbing) दर्द होता है। एक सामान्य इंसान में सिर का दर्द पूरे सिर में भारीपन के रूप में होता है, लेकिन माइग्रेन के मरीज़ में दर्द सिर्फ आधे सिर में ही भयंकर टीस मारता है।

यह सिर्फ एक तरफ क्यों होता है?

आधुनिक विज्ञान के अनुसार, जब मस्तिष्क में ट्राइजेमिनल नस (Trigeminal Nerve) अधिक संवेदनशील हो जाती है, तो यह सिर के किसी एक हिस्से की रक्त वाहिकाओं (Blood Vessels) में सूजन और फैलाव पैदा कर देती है, जिससे एक तरफ भयंकर दर्द होता है।

वहीं आयुर्वेदिक नज़रिए से इसे 'अर्धावभेदक' (Ardhavabhedaka) कहा जाता है (अर्ध = आधा, भेदक = फाड़ने वाला दर्द)। 

आयुर्वेद मानता है कि जब वात और कफ दोष बुरी तरह कुपित होकर सिर (शिर) के आधे हिस्से की नसों और शिराओं में जाकर बैठ जाते हैं, तो वे एक हिस्से के रक्त संचार को बाधित करते हैं। यही कारण है कि माइग्रेन का दर्द सिर्फ दाएँ या बाएँ हिस्से में ही 'भेदक' (तीर चुभने जैसा) दर्द पैदा करता है। ठंड के मौसम में या तेज़ धूप में यह वात-पित्त दोष और भड़क जाता है, जिससे दर्द तेज़ हो जाता है। आमतौर पर लोग इसका शिकार तनाव, कमज़ोर पाचन, नींद की कमी, आनुवांशिकी या गलत खानपान के कारण होते हैं। पेनकिलर लेने पर कुछ समय के लिए आराम मिल जाता है, लेकिन ये दवाएँ शरीर के अंदर मौजूद उस वात दोष को ठीक नहीं करतीं जिसके कारण दर्द बार-बार उठता है।

सिरदर्द और माइग्रेन कितने प्रकार के होते हैं?

सिरदर्द की तकलीफ से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ देखी जाती हैं:

  • क्लासिक माइग्रेन (Migraine with Aura): इसमें दर्द शुरू होने से पहले ही मरीज़ को आँखों के सामने चमकती रोशनी, धुँधलापन या ज़िग-ज़ैग लाइनें दिखाई देने लगती हैं (जिसे Aura कहते हैं)।
  • कॉमन माइग्रेन (Migraine without Aura): यह सबसे आम है। इसमें बिना किसी पूर्व चेतावनी के सिर के एक हिस्से में भयंकर धड़कने वाला दर्द शुरू हो जाता है।
  • क्रोनिक माइग्रेन (Chronic Migraine): जब किसी व्यक्ति को महीने में 15 या उससे ज़्यादा दिन माइग्रेन का दर्द रहे, तो उसे क्रोनिक श्रेणी में रखा जाता है।
  • टेंशन सिरदर्द (Tension Headache): यह माइग्रेन से अलग है। इसमें पूरे सिर और माथे पर एक भारी बैंड या पट्टी बँधे होने जैसा दबाव महसूस होता है।

माइग्रेन के लक्षण और संकेत

पेनकिलर से आराम मिलने के बाद बीमारी का बार-बार लौट आना कई आंतरिक स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • आधे सिर में टीस (Throbbing Pain): सिर के एक हिस्से (दाएँ या बाएँ) में हथौड़े बजने या नस धड़कने जैसा तेज़ दर्द।
  • रोशनी और आवाज़ से चिड़चिड़ापन (Photophobia/Phonophobia): दर्द के समय थोड़ी सी भी तेज़ रोशनी या आवाज़ बर्दाश्त न होना और अंधेरे शांत कमरे में लेटने का मन करना।
  • उल्टी और जी मिचलाना (Nausea/Vomiting): भयंकर दर्द के साथ पेट में अजीब सी हलचल होना और उल्टी महसूस होना।
  • गर्दन और कंधों में जकड़न: दर्द सिर से शुरू होकर गर्दन और कंधों की माँसपेशियों तक फैल जाना।
  • दवा का असर ख़त्म होते ही वापसी: पेनकिलर का असर ख़त्म होते ही कुछ ही घंटों के भीतर आधा सिर फिर से फटने लगना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

बार-बार माइग्रेन लौटने के मुख्य कारण क्या हैं?

माइग्रेन के बार-बार ट्रिगर होने के पीछे सिर्फ बाहरी कारण नहीं, बल्कि कई गहरे अंदरूनी कारण हो सकते हैं। मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

  • वात और पित्त का संचय: गलत खान-पान जैसे बहुत ज़्यादा खट्टी, तीखी और रूखी चीज़ें खाने से शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) बनता है। यह वात और पित्त दोष को बढ़ाकर सिर की नसों (मज्जा धातु) में दबाव पैदा कर देता है।
  • ख़राब पाचन और गैस (Acidity): पेट साफ न होना, गैस और एसिडिटी माइग्रेन का सबसे बड़ा कारण है। आयुर्वेद में इसे 'ऊर्ध्वग अम्लपित्त' कहते हैं जहाँ पेट की गैस सिर की तरफ चढ़कर नसें फाड़ने लगती है।
  • तनाव और नींद की कमी: लगातार मानसिक तनाव लेना और रात में नींद पूरी न होना (अनिद्रा) दिमाग की नसों को थका देता है।
  • मौसम का प्रभाव: अचानक तेज़ धूप में निकलना (पित्त वर्धक) या ठंडी और शुष्क हवा (वात वर्धक) का सिर पर लगना।
  • हार्मोनल बदलाव: महिलाओं में पीरियड्स (Menstruation) के दौरान वात और पित्त के असंतुलन से माइग्रेन का दर्द अक्सर बढ़ जाता है।

माइग्रेन की समस्या के जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

माइग्रेन को अगर अनदेखा किया जाए या सही समय पर इसका अंदरूनी इलाज न मिले, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • दवाओं के कारण होने वाला सिरदर्द (MOH): रोज़ाना पेनकिलर खाने से शरीर दर्द के प्रति और ज़्यादा संवेदनशील हो जाता है और सिरदर्द की बीमारी स्थायी बन जाती है।
  • पेट और लिवर का ख़राब होना: सालों तक भारी दर्द-निवारक दवाइयाँ खाने से पेट में अल्सर (Ulcers), एसिडिटी और लिवर पर भारी नुकसान पहुँचता है।
  • मानसिक तनाव और डिप्रेशन: लगातार दर्द के डर से इंसान का काम पर जाना या सामान्य जीवन जीना मुश्किल हो जाता है, जिससे वह डिप्रेशन का शिकार हो जाता है।
  • स्ट्रोक का ख़तरा: कुछ स्टडीज़ के अनुसार, 'Aura' वाले माइग्रेन के मरीज़ों में भविष्य में ब्रेन स्ट्रोक का ख़तरा सामान्य लोगों से थोड़ा ज़्यादा होता है।
  • समय पर डॉक्टर से परामर्श और उचित आयुर्वेदिक इलाज लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से माइग्रेन सिर्फ सिरदर्द की दिक्कत नहीं है। आयुर्वेद में इसे 'अर्धावभेदक' (आधे सिर का दर्द), 'अनंतवात' या 'सूर्यावर्त' की श्रेणी में रखा जाता है। यहाँ यह माना जाता है कि जब शरीर में वात और पित्त दोष बुरी तरह बिगड़ जाते हैं और दिमाग की 'प्राणवह' और 'मज्जा वह' नाड़ियों में रुकावट पैदा करते हैं, तब ऐसी परेशानी आती है। 

डॉक्टर नाड़ी देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। वे ढूँढते हैं कि कहीं पेट में 'आम' यानी टॉक्सिन्स और एसिडिटी तो नहीं जमा हो गई है, जिसने पित्त को भड़का दिया है। जब तक यह गैस और बढ़ा हुआ पित्त नसों में रहेगा, दर्द बार-बार लौटकर आता रहेगा। आयुर्वेद में बस नसों को सुन्न करना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, पेट की गैस और एसिडिटी ख़त्म हो, दिमाग की नसों को शीतलता (ठंडक) और पोषण मिले, और तंत्रिका तंत्र प्राकृतिक रूप से मज़बूत बने।

माइग्रेन के लिए जड़ी-बूटियाँ

  • ब्राह्मी : आयुर्वेद में इसे मस्तिष्क के लिए सबसे बेहतरीन औषधि माना गया है। यह दिमाग की नसों को ठंडक देती है और तनाव को ख़त्म करती है।
  • शंखपुष्पी : यह नर्वस सिस्टम को रिलैक्स करती है और माइग्रेन के दर्द व चिड़चिड़ेपन में तुरंत आराम पहुँचाती है।
  • गोदन्ती भस्म : यह पित्त को शांत करने और सिरदर्द विशेषकर जो धूप से बढ़ता हो को तोड़ने में अचूक है।
  • जटामांसी : यह वात दोष को कंट्रोल करती है और गहरी नींद लाने में मदद करती है, जिससे माइग्रेन का अटैक रुक जाता है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म: शरीर की अंदरूनी सफाई

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, जमे हुए टॉक्सिन्स और दोषों को बाहर निकालकर संपूर्ण स्वास्थ्य और मज़बूत तंत्रिका तंत्र पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • गहरी सफाई और नाड़ी शोधन: जब माइग्रेन सालों पुराना हो, बार-बार लौट रहा हो और व्यक्ति रोज़ाना पेनकिलर पर निर्भर हो चुका हो, तो जीवा आयुर्वेद में शिरोधारा और नस्य जैसी पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय: यह 7 से 21 दिनों तक चलने वाली सिर की नसों और अंदरूनी अंगों की गहरी सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • शिरोधारा : इसमें माथे के बीच आज्ञा चक्र पर औषधीय तेल, छाछ या दूध की एक लगातार धार गिराई जाती है। यह दिमाग की नसों को तुरंत शांत करती है और भयंकर माइग्रेन को रोक देती है।
  • दोषों को बाहर निकालने के लिए नस्य : आयुर्वेद में 'नासा हि शिरसो द्वारम्' कहा गया है नाक सिर का दरवाज़ा है। इसमें नाक में औषधीय तेल या घी की बूँदें डाली जाती हैं, जो सीधे दिमाग तक पहुँचकर जमा हुए दोषों को बाहर निकालती हैं और नसों को चिकनाई देती हैं।

माइग्रेन के रोगी के लिए शुद्ध आहार

जीवा आयुर्वेद और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार, माइग्रेन की समस्या को दूर करने के लिए हल्का, शीतल और वात-पित्त दोष को शांत करने वाला आहार चुनना महत्वपूर्ण है:

क्या खाएँ?

  • ताज़ा और सुपाच्य भोजन: घी, मूंग की दाल, लौकी और दलिया का इस्तेमाल बढ़ाएँ, यह पाचन को दुरुस्त रखते हैं और गैस नहीं बनने देते।
  • बादाम और अखरोट: रात को भिगोकर रखे हुए बादाम सुबह खाने से दिमाग को ताक़त मिलती है।
  • हाइड्रेशन (पानी): दिन भर पर्याप्त मात्रा में पानी पिएँ। नारियल पानी और सौंफ का पानी शरीर की गर्मी (पित्त) को शांत रखता है।

क्या न खाएँ?

  • चाय, कॉफी और कैफीन: ज़्यादा चाय या कॉफी पीने से नसों में उत्तेजना आती है और वात बढ़ता है, जो माइग्रेन को ट्रिगर करता है।
  • खट्टी और फर्मेंटेड चीज़ें: इडली, डोसा, अचार, नींबू और पुरानी चीज़ या पनीर का सेवन बिल्कुल बंद कर दें, ये पित्त को भड़काते हैं।
  • मैदा और जंक फूड: पिज़्ज़ा, बर्गर, और रिफाइंड चीज़ों का सेवन बिल्कुल बंद कर दें, क्योंकि ये शरीर में एसिडिटी और 'आम' बढ़ाते हैं जिससे सिर फटने लगता है।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में माइग्रेन की समस्या का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करता है:

  • बीमारी और शरीर की स्थिति: ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे माइग्रेन कितना पुराना है, अटैक की फ्रीक्वेंसी क्या है, और मरीज़ की पेनकिलर पर निर्भरता कितनी ज़्यादा है।
  • हल्की समस्या में सुधार: अगर सिरदर्द की शुरुआत है, तो आमतौर पर 4 से 6 हफ्तों में ही गैस बननी कम हो जाती है और दर्द की तीव्रता घटने लगती है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर बीमारी सालों पुरानी है और व्यक्ति रोज़ दवाइयाँ लेता है, तो नसों को पूरी तरह शांत होने और दोषों को संतुलित होने में 6 महीने से 1 साल भी लग सकता है।
  • उपचार का तरीका: इस प्राकृतिक इलाज में मुख्य रूप से पित्त-शामक जड़ी-बूटियाँ, पंचकर्म (शिरोधारा, नस्य), सही खानपान और प्राणायाम शामिल होता है।
  • स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर अपनी डाइट का कड़ाई से पालन करता है, तो पाचन और नसें मज़बूत हो जाती हैं और भविष्य में भारी दवाओं के बिना भी माइग्रेन का अटैक आने की संभावना ख़त्म हो जाती है।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

नमस्ते, मुझे माइग्रेन की बहुत गंभीर समस्या थी। मैंने जब डॉक्टर से सलाह ली, तो उन्होंने मुझे कुछ समय के लिए दवाइयां लेने को कहा। मैंने दवाइयां लीं और जब तक मैं उन्हें लेती थी, मुझे काफी आराम रहता था। लेकिन जैसे ही मैं दवाइयां छोड़ती थी, मेरी समस्या पहले से भी ज्यादा बढ़ जाती थी। तभी मेरी एक सहेली ने मुझे जीवा आयुर्वेद के बारे में बताया। उसकी माताजी का इलाज भी वहीं से चल रहा था और उन्हें बहुत अच्छा आराम मिला था। इसके बाद मैंने जीवा के डॉक्टर से संपर्क किया और उन्हें अपनी पूरी मेडिकल हिस्ट्री बताई।

डॉक्टर ने मेरी हिस्ट्री के आधार पर मुझे ऑथेंटिक आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट दिया। मुझे इसका बहुत ही अच्छा रिजल्ट मिला है। अब अगर मुझे कभी स्ट्रेस (तनाव) भी होता है, तो उसका असर मेरे दिमाग पर नहीं पड़ता। इसका मतलब है कि जीवा की दवाइयां बीमारी को जड़  से ठीक कर रही हैं।जीवा आयुर्वेद के साथ मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा है। मैं यही कहूँगी कि अगर कोई भी पेशेंट किसी बीमारी से जूझ रहा है, तो उसे तुरंत जीवा आयुर्वेद में संपर्क करना चाहिए ताकि उसे अपनी बीमारी के अनुसार सही और प्रॉपर ट्रीटमेंट मिल सके।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

माइग्रेन की बीमारी में आधुनिक और आयुर्वेदिक इलाज का नज़रिया बिल्कुल अलग है:

  • आधुनिक चिकित्सा: यह ट्रिप्टान और पेनकिलर के ज़रिए दर्द के सिग्नल को तुरंत रोकने पर काम करती है। ये दवाइयाँ तुरंत राहत देती हैं, जो कुछ समय के लिए अच्छा लगता है। लेकिन यह बीमारी की जड़ यानी ख़राब पाचन, तनाव और पित्त दोष को ख़त्म नहीं करता। दवा का असर ख़त्म होते ही माइग्रेन फिर से लौट आता है और शरीर दवाओं का आदी हो जाता है।
  • आयुर्वेदिक चिकित्सा: आयुर्वेद बीमारी की असली वजह यानी वात-पित्त का असंतुलन, टॉक्सिन्स और कब्ज़/एसिडिटी को ख़त्म करता है। इसमें जड़ी-बूटियों, नस्य और सही डाइट के ज़रिए नर्वस सिस्टम को भीतर से शांत किया जाता है। इसमें थोड़ा समय लगता है, लेकिन दिमाग की ताक़त प्राकृतिक रूप से ऐसी बन जाती है कि ट्रिगर्स धूप/आवाज़ से दर्द नहीं उभरता और स्थायी आराम मिलता है।

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

सिरदर्द की समस्या होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • सिरदर्द इतना भयंकर हो जैसा आपने ज़िंदगी में पहले कभी महसूस न किया हो ।
  • सिरदर्द के साथ बोलने में लड़खड़ाहट, धुँधलापन या शरीर का कोई हिस्सा सुन्न होने लगे।
  • बुखार, गर्दन में भारी जकड़न और उल्टियाँ न रुक रही हों।
  • हफ्तों तक दर्द लगातार बना रहे और पेनकिलर खाने के बाद भी कोई आराम न मिल रहा हो।
  • 50 वर्ष की उम्र के बाद पहली बार ऐसा नया सिरदर्द शुरू हुआ हो।

समय पर सलाह लेने से रोग का सही निदान होता है और शरीर को ब्रेन स्ट्रोक जैसी बड़ी जटिलताओं से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से बार-बार होने वाला माइग्रेन अर्धावभेदक मुख्य रूप से वात और पित्त दोष के बिगड़ने तथा नसों में वायु व गैस के दबाव से जुड़ी बीमारी है। गलत खान-पान, बहुत ज़्यादा चाय-कॉफी पीना, खट्टी चीज़ें खाना, तनाव और ख़राब पाचन से शरीर में टॉक्सिन्स बनते हैं जो नसों को संवेदनशील कर देते हैं। यही पित्त और वात आधे सिर की नसों में जाकर भयंकर दर्द पैदा कर देता है। सिर्फ पेनकिलर खाने से दर्द कुछ देर के लिए सुन्न हो जाता है लेकिन बीमारी अंदर ही रहती है। इलाज में दोषों का संतुलन और पाचन शुद्धि सबसे ज़्यादा आवश्यक है। इसमें गैस को ख़त्म करना, ताज़ा और हल्का खाना खाना, ब्राह्मी और शंखपुष्पी जैसी जड़ी-बूटियाँ इस्तेमाल करना, और पंचकर्म शिरोधारा, नस्य युक्त दिनचर्या अपनाना शामिल है जिससे बीमारी को जड़ से ठीक किया जा सके।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, आयुर्वेद के अनुसार तेज़ धूप शरीर में पित्त दोष (गर्मी) को तुरंत बढ़ाती है, जो मस्तिष्क की नसों में फैलकर माइग्रेन के दर्द को भड़का देता है।

बिल्कुल, आयुर्वेद मानता है कि जब पेट की वायु (गैस) और पित्त (एसिड) ऊपर की तरफ (सिर की ओर) चढ़ता है, तो यह भयंकर सिरदर्द का कारण बनता है।

हाँ, ठंडे पानी या बर्फ की पट्टी सिर और गर्दन पर रखने से रक्त वाहिकाएं सिकुड़ती हैं और पित्त की गर्मी शांत होती है, जिससे दर्द में तुरंत आराम मिलता है।

अनुवांशिकी एक कारण हो सकता है, लेकिन माइग्रेन का ट्रिगर होना पूरी तरह से आपके खान-पान, तनाव और पाचन तंत्र पर निर्भर करता है।

थोड़ी सी मात्रा में कैफीन दर्द कम कर सकता है, लेकिन ज़्यादा चाय-कॉफी पीने से शरीर में वात बढ़ता है और जब आप इसे छोड़ते हैं, तो यह भयंकर सिरदर्द (Caffeine Withdrawal) पैदा करता है।

हाँ, रात को सोते समय दोनों नासिका (नाक) में 2-2 बूँदें हल्का गर्म शुद्ध गाय का घी डालने (नस्य) से वात शांत होता है और माइग्रेन जड़ से ख़त्म होने में मदद मिलती है।

हाँ, अनिद्रा (नींद न आना) नर्वस सिस्टम को थका देती है और वात दोष को बढ़ाती है, जो अगले ही दिन माइग्रेन अटैक का एक बड़ा कारण बनता है।

हाँ, हार्मोनल बदलावों (विशेषकर पीरियड्स के दौरान एस्ट्रोजन लेवल में गिरावट) के कारण महिलाओं में पुरुषों की तुलना में माइग्रेन ज़्यादा देखा जाता है।

नहीं, सामान्य सिरदर्द पूरे माथे या सिर में एक दबाव जैसा होता है जो आराम से ठीक हो जाता है, जबकि माइग्रेन एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जिसमें आधे सिर में भयंकर टीस और उल्टियाँ आती हैं।

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