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Anxiety की दवा लेने पर सुस्ती, छोड़ने पर घबराहट — Middle Path क्या है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 11 May, 2026
  • category-iconUpdated on 13 Jun, 2026
  • category-iconMental Health
  • blog-view-icon5060

महानगरों की दमघोंटू भागदौड़, काम का अंतहीन प्रेशर और भविष्य को सुरक्षित करने की जद्दोजहद के बीच, कभी-कभी दिमाग एक ऐसे 'ओवरलोड' मोड में चला जाता है जहाँ सांसें उखड़ने लगती हैं और दिल सीने से बाहर आने को करता है। इस भयंकर एंग्जायटी और पैनिक से बचने के लिए जब हम डॉक्टर के पास जाते हैं, तो हमें कुछ ऐसी गोलियाँ (Anti-anxiety pills / SSRIs) थमा दी जाती हैं जो तुरंत एक जादुई शांति दे देती हैं।

लेकिन कुछ ही महीनों में इस 'शांति' की भारी कीमत चुकानी पड़ती है। इन गोलियों को खाने के बाद दिमाग पर एक ऐसा भारी पर्दा गिर जाता है कि इंसान खुद को 'ज़ॉम्बी' (Zombie) जैसा महसूस करने लगता है, न खुशी महसूस होती है, न दुख, बस हर वक्त एक भयंकर सुस्ती (Lethargy) छाई रहती है। और अगर इस सुस्ती से घबराकर आप एक दिन भी दवा छोड़ दें, तो एंग्जायटी दोगुने तूफान के साथ वापस लौटती है (Rebound Anxiety)। दवा लें तो शरीर सुन्न, छोड़ें तो धड़कनें बेकाबू। आखिर इस दर्दनाक दुष्चक्र (Vicious Cycle) से बाहर निकलने का वह 'मिडिल पाथ' (Middle Path) क्या है, जहाँ दिमाग शांत भी रहे और सुस्त भी न पड़े?

एंग्जायटी की दवाओं का यह दुष्चक्र और 'रिबाउंड पैनिक' कैसे काम करता है?

आधुनिक एंटी-एंग्जायटी दवाइयाँ आपके दिमाग को हील (Heal) नहीं करतीं; वे केवल आपके नर्वस सिस्टम के अलार्म को 'म्यूट' (Mute) कर देती हैं। जब अलार्म सिस्टम ही बंद हो जाएगा, तो शरीर सुन्न पड़ेगा ही।

  • इमोशनल ब्लंटिंग (Emotional Blunting): दवाइयाँ दिमाग के केमिकल्स (जैसे Serotonin) को कृत्रिम रूप से रोकती हैं। इससे डर तो खत्म होता है, लेकिन इसके साथ ही खुशी, उत्साह और फोकस भी सुन्न पड़ जाता है, जिसे हम भयंकर सुस्ती कहते हैं।
  • रिबाउंड एंग्जायटी (Rebound Anxiety): जब आप अचानक दवा छोड़ते हैं, तो आपका दिमाग, जो इतने समय से कृत्रिम शांति का आदी हो चुका था, अचानक हुए इस बदलाव को बर्दाश्त नहीं कर पाता। ब्रेन के रिसेप्टर्स (Receptors) में आग लग जाती है और पैनिक अटैक पहले से 10 गुना ज़्यादा भयंकर आता है।
  • गट-ब्रेन एक्सिस का डैमेज होना: लगातार सेडेटिव्स (Sedatives) खाने से आपके पाचन तंत्र की गति धीमी हो जाती है। जब पेट साफ नहीं होता, तो असली खुशी के हॉर्मोन्स (जो 90% आंतों में बनते हैं) बनना बंद हो जाते हैं।

दोषों के अनुसार एंग्जायटी और दवाओं का असर

हर इंसान का दिमाग स्ट्रेस पर अलग तरह से प्रतिक्रिया देता है। आयुर्वेद के अनुसार, शरीर के बिगड़े हुए दोषों के आधार पर यह एंग्जायटी और दवाओं का साइड-इफेक्ट तीन मुख्य रूपों में सामने आता है:

  • वात-प्रधान एंग्जायटी (भयंकर घबराहट): ऐसे लोग हमेशा भविष्य की चिंता में रहते हैं। महानगरों का शोर छोड़कर किसी शांत जगह बसने की उनकी तीव्र इच्छा लगातार अधूरी रहने पर एक मानसिक तनाव बन जाती है। दवा छोड़ने पर इन्हें सबसे भयंकर पैनिक अटैक और हार्ट पेलपिटेशन (Palpitations) होते हैं।
  • पित्त-प्रधान एंग्जायटी (गुस्सा और बर्नआउट): इनमें स्ट्रेस के कारण खून में गर्मी बढ़ती है। ये परफेक्शनिस्ट होते हैं। दवाइयाँ खाने पर इनकी ऊर्जा दब जाती है, जिससे इन्हें अपने ही अंदर भारी घुटन और चिड़चिड़ापन महसूस होता है।
  • कफ-प्रधान एंग्जायटी (सुस्ती और डिप्रेशन): इनमें एंग्जायटी एक गहरे अवसाद का रूप ले लेती है। जब ये एंटी-एंग्जायटी दवाइयाँ खाते हैं, तो इनका मेटाबॉलिज़्म और धीमा हो जाता है। इनमें हमेशा क्रोनिक फटीग (Chronic fatigue) रहती है और बिस्तर से उठने का मन नहीं करता।

क्या आपका शरीर भी इस 'केमिकल ट्रैप' (Chemical Trap) के अलार्म बजा रहा है?

अगर आप कुछ समय से ये दवाइयाँ ले रहे हैं, तो शरीर की इन खामोश चीखों को पहचानें जो बता रही हैं कि आपका नर्वस सिस्टम अपनी प्राकृतिक शक्ति खो रहा है:

  • दिमाग पर हमेशा धुंध (Brain Fog): काम करते समय फोकस न कर पाना, छोटी-छोटी बातें भूल जाना और फिक्शन (Fiction) या वास्तविक दुनिया के बीच तालमेल बिठाने में दिक्कत महसूस होना।
  • कृत्रिम नींद पर निर्भरता: बिना गोली खाए रात भर करवटें बदलना और गोली खाने के बाद भी सुबह पीठ में जकड़न व भारी सिर के साथ उठना।
  • वज़न का तेज़ी से बढ़ना: थायरॉइड या डाइट ठीक होने के बावजूद शरीर का फूलते जाना, क्योंकि सेडेटिव्स आपका पूरा मेटाबॉलिज़्म सुला चुके हैं।
  • सोशल विड्रॉल (Social Withdrawal): किसी से बात करने का मन न करना और अपनी ही भावनाओं से कट जाना (Numbness)।

दवा छोड़ने के चक्कर में लोग क्या भयंकर गलतियाँ करते हैं?

सुस्ती से तंग आकर या खुद को 'ठीक' मानकर लोग अक्सर ऐसे शॉर्टकट्स अपना लेते हैं, जो उन्हें इमरजेंसी रूम तक पहुँचा देते हैं:

  • कोल्ड टर्की (Cold Turkey) छोड़ना: एक ही दिन में अचानक दवा डस्टबिन में फेंक देना। यह नर्वस सिस्टम को सीधा शॉक (Shock) देता है, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है और भयंकर सीज़र्स (Seizures) आ सकते हैं।
  • केवल सप्लीमेंट्स पर निर्भर हो जाना: दवा छोड़कर केवल कुछ विटामिन्स खा लेना और अपनी सुविधाजनक जीवनशैली व जंक फूड को न बदलना।
  • अल्कोहल या कैफीन का सहारा: सुस्ती भगाने के लिए 5-6 कप डार्क कॉफी पीना या घबराहट मिटाने के लिए शराब (Alcohol) का सहारा लेना। यह वात को भड़काकर नसों को पूरी तरह सुखा देता है।
  • भविष्य की गंभीर जटिलताएं: अगर इस ट्रैप से निकलने का 'मिडिल पाथ' न अपनाया जाए, तो यह नसों की कमज़ोरी और स्थायी न्यूरोलॉजिकल डैमेज का रूप ले लेता है।

आयुर्वेद 'मिडिल पाथ' (Middle Path) और एंग्जायटी की जड़ को कैसे समझता है?

आयुर्वेद का 'मिडिल पाथ' अचानक दवा छोड़ने की वकालत नहीं करता। यह एक ऐसा ब्रिज (Bridge) है जहाँ हम पहले शरीर की नींव (Foundation) मज़बूत करते हैं, ताकि जब कृत्रिम बैसाखी (दवा) हटे, तो शरीर अपने पैरों पर खड़ा हो सके।

  • प्राण वात का संतुलन: एंग्जायटी दिमाग में 'प्राण वात' के तूफ़ान का नाम है। दवा इस तूफ़ान को सुन्न करती है, आयुर्वेद इसे शांत करता है।
  • मज्जा धातु (Nervous Tissue) का पोषण: जब नसें अंदर से खोखली और रूखी होती हैं, तो एंग्जायटी भड़कती है। 'मिडिल पाथ' में हम मज्जा धातु को स्निग्धता (Lubrication) देते हैं ताकि वह पैनिक के झटके सह सके।
  • 'सोशल जिजुत्सु' (Social Jujitsu) का सिद्धांत: एंग्जायटी से भागने के बजाय, दिमाग को 'सोशल जिजुत्सु' सिखाया जाता है, यानी पैनिक की ऊर्जा और ट्रिगर्स को अपने खिलाफ इस्तेमाल होने देने के बजाय, उसे प्राकृतिक ध्यान (Focus) और रचनात्मकता में मोड़ देना।
  • पाचन और ओजस: जब तक पाचन और मस्तिष्क का संबंध ठीक होकर शुद्ध 'ओजस' (जीवन ऊर्जा) नहीं बनेगा, तब तक दिमाग दवा के बिना रिलैक्स नहीं कर सकता।

नर्वस सिस्टम को फौलादी बनाने वाली और वात-शामक 'क्लीन ईटिंग' डाइट

जब आपका नर्वस सिस्टम ट्रांज़िशन (Transition) में हो, तो आपका भोजन शुद्ध शाकाहारी, सात्विक और ओजस बढ़ाने वाला होना चाहिए। इस आयुर्वेदिक डाइट को अपनाएं।

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - ओजस बढ़ाने और वात शांत करने वाले) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - घबराहट और सुस्ती बढ़ाने वाले)
अनाज (Grains) पुराना चावल, रागी, दलिया, ओट्स, मूंग दाल की खिचड़ी। वाइट ब्रेड, मैदा, पैकेटबंद नूडल्स, बासी और गरिष्ठ खाना।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी (नसों के लिए अमृत), कच्ची घानी नारियल का तेल। रिफाइंड ऑयल, डालडा, बहुत ज़्यादा मेयोनेज़, बाज़ार का तला-भुना।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, कद्दू, पालक, शकरकंद (सभी अच्छी तरह पकी हुई)। कच्चा सलाद (विशेषकर रात में), भारी बैंगन, कटहल, फ्रोज़न सब्ज़ियाँ।
फल और मेवे (Fruits & Nuts) रात भर भीगे हुए बादाम, अखरोट, चिया सीड्स, सेब, ताज़ा पपीता। डिब्बाबंद जूस, आर्टिफिशियल स्वीटनर्स वाले फ्रूट स्नैक्स।
पेय पदार्थ (Beverages) हल्दी और अश्वगंधा वाला दूध (रात में), ताज़ा मट्ठा, धनिए का पानी। डार्क कॉफी (कैफीन एंग्जायटी बढ़ाता है), एनर्जी ड्रिंक्स, शराब।

दिमाग के साथ 'सोशल जिजुत्सु' खेलने के लिए जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें ऐसे कई जादुई रसायन दिए हैं, जो बिना किसी सुन्नपन (Lethargy) के दिमाग को शांत करते हैं और फोकस बढ़ाते हैं:

  • ब्राह्मी (Brahmi): यह आयुर्वेद की सबसे शक्तिशाली जड़ी-बूटी है। यह एंग्जायटी को शांत करती है, लेकिन सेडेटिव्स की तरह सुलाती नहीं है। ब्राह्मी (Brahmi) दिमाग को फौलादी ठंडक और लेज़र जैसा फोकस देती है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): दवा छोड़ने पर आने वाली भयंकर शारीरिक थकावट को दूर करने और स्ट्रेस हॉर्मोन्स (कॉर्टिसोल) को गिराने के लिए अश्वगंधा (Ashwagandha) नर्वस सिस्टम को भारी ताकत देता है।
  • जटामांसी (Jatamansi): जब पैनिक अटैक के कारण दिल तेज़ी से धड़के और विचार आउट ऑफ कंट्रोल हो जाएं, तो जटामांसी विचारों के इस तूफान को तुरंत रोक देती है।
  • शंखपुष्पी (Shankhpushpi): यह एक अचूक मेध्य रसायन है जो दवाओं के कारण खोई हुई याददाश्त (Memory loss) और ब्रेन फॉग को रिपेयर करने का काम करता है।
  • गिलोय (Giloy): शरीर की इम्यूनिटी को रीबूट करने और अंदरूनी सूजन (Inflammation) को काटने के लिए गिलोय (Giloy) एक बेहतरीन ब्लड प्यूरीफायर है।

एंग्जायटी को जड़ से मिटाने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब स्ट्रेस और सुस्ती बहुत गहराई तक नसों में जम चुकी हो, तो पंचकर्म की ये बाहरी थेरेपीज़ शरीर को तुरंत रीबूट कर देती हैं:

  • शिरोधारा (Shirodhara): माथे के मध्य (थर्ड आई) पर गुनगुने औषधीय तेल की लगातार धारा गिराने की यह जादुई शिरोधारा (Shirodhara) प्रक्रिया नर्वस सिस्टम के सारे ओवरलोड को शांत कर देती है। यह दवा छोड़ने के दौरान आने वाले विड्रॉल (Withdrawal) को रोकती है।
  • नस्य थेरेपी (Nasya): नाक के ज़रिए अणु तैल या गाय के घी की बूँदें डालने की यह नस्य थेरेपी (Nasya therapy) सीधे दिमाग की ब्लॉक हुई नसों को खोलती है और सिर का भारीपन खींच लेती है।
  • अभ्यंग (Abhyanga): शुद्ध वात-शामक तेलों से की जाने वाली यह संपूर्ण शारीरिक अभ्यंग मालिश (Abhyanga massage) शरीर की जकड़न को खत्म करती है और नसों का रूखापन मिटाती है।

दवाओं से पूरी तरह आज़ाद होने में कितना समय लगता है?

बरसों की दवाओं की निर्भरता और थके हुए नर्वस सिस्टम को दोबारा प्राकृतिक अवस्था में लाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: आयुर्वेदिक रसायनों के सपोर्ट से आपकी एलोपैथिक दवा की डोज़ धीरे-धीरे कम की जाएगी। दवाओं से आने वाली भारी सुस्ती कम होने लगेगी और जठराग्नि सुधरेगी।
  • 3-4 महीने: मेध्य रसायनों के प्रभाव से ब्रेन फॉग (धुंध) छंटना शुरू हो जाएगा। आपका फोकस बढ़ने लगेगा और आप बिना भारी दवाओं के भी पैनिक को कंट्रोल करना सीख जाएंगे।
  • 5-6 महीने: आपका ओजस (Ojas) पूरी तरह पोषित हो जाएगा और नर्वस सिस्टम रीबूट हो जाएगा। आप प्राकृतिक रूप से अपनी एंग्जायटी को 'सोशल जिजुत्सु' के ज़रिए संतुलित कर पाएंगे और दवाओं से पूरी तरह मुक्त एक ऊर्जावान जीवन जी सकेंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

एंग्जायटी और दवाओं की निर्भरता के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care - The Middle Path)
इलाज का मुख्य लक्ष्य लक्षणों को सुन्न करने के लिए एंटी-डिप्रेसेंट्स (SSRIs) या बेंज़ोडायज़ेपींस देना। प्राण वात को शांत करना, जठराग्नि को बढ़ाना और 'ओजस' का निर्माण करके नर्वस सिस्टम को फौलादी बनाना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल दिमाग के केमिकल्स (Brain chemicals) का असंतुलन मानना जिसे बाहर से मैनेज किया जाए। इसे अशुद्ध रक्त, कमज़ोर पाचन (गट-ब्रेन एक्सिस) और प्राण वात के भयंकर प्रकोप का संपूर्ण सिंड्रोम मानना।
दवा छोड़ने का तरीका अक्सर डोज़ कम करने पर भयंकर 'रिबाउंड पैनिक' होता है, जिससे वापस दवा खानी पड़ती है। मिडिल पाथ' अपनाते हुए आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का सपोर्ट देकर एलोपैथिक दवा सुरक्षित रूप से छुड़वाना।
लंबा असर गोलियाँ जीवन भर खानी पड़ती हैं, जो भावनाओं को सुन्न (Emotional blunting) कर देती हैं। दिमाग अंदर से इतना मज़बूत होता है कि वह खुद ट्रिगर्स से लड़ना (Social Jujitsu) सीख जाता है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालाँकि आयुर्वेद इस 'मिडिल पाथ' से आपको पूरी तरह स्वस्थ कर सकता है, लेकिन दवा छोड़ने के दौरान अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर संकेत दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • सुसाइडल थॉट्स या गंभीर डिप्रेशन: अगर जीवन के प्रति भारी निराशा, भयंकर उदासी और खुद को नुकसान पहुँचाने के खतरनाक विचार आने लगें।
  • भयंकर सीज़र्स (Seizures) या दौरे पड़ना: अगर दवा छोड़ने के कारण अचानक शरीर में झटके आने लगें या बेहोशी छा जाए (यह सीवियर विड्रॉल का संकेत है)।
  • अचानक दिल की धड़कन का अनियंत्रित होना: अगर बैठे-बैठे सीने में भारी दबाव महसूस हो, साँस फूल जाए और धड़कन इतनी तेज़ हो जाए कि सीने में दर्द होने लगे।
  • लगातार कई रातों तक बिल्कुल नींद न आना: अगर 3-4 दिन लगातार बिस्तर पर लेटने के बावजूद एक सेकंड के लिए भी आँख न लगे और दिमाग सुन्न पड़ने लगे।

निष्कर्ष

एंग्जायटी कोई ऐसी बीमारी नहीं है जिसे जीवन भर सुलाने वाली गोलियों से दबाकर रखा जाए। जब आप अपनी घबराहट को केवल एंटी-डिप्रेसेंट्स (Anti-depressants) या बेंज़ो से सुन्न करने की कोशिश करते हैं, तो आप अपनी भावनाओं, खुशी और प्राकृतिक ऊर्जा को भी हमेशा के लिए म्यूट (Mute) कर रहे होते हैं। और जैसे ही आप इस 'केमिकल जेल' से बाहर आने की कोशिश करते हैं, रिबाउंड एंग्जायटी आपको वापस वहीं धकेल देती है। इस दर्दनाक दुष्चक्र से बाहर निकलने का रास्ता अचानक सब कुछ छोड़ देना नहीं है, बल्कि एक सुरक्षित 'मिडिल पाथ' (Middle Path) अपनाना है। अपनी जठराग्नि को सुधारें, जंक फूड को कूड़ेदान में डालें और अपनी डाइट में शुद्ध गाय का घी और अखरोट शामिल करें। ब्राह्मी, जटामांसी और अश्वगंधा जैसी जादुई जड़ी-बूटियों को अपना रक्षक बनाएं, और पंचकर्म की शिरोधारा थेरेपी से अपने उबलते हुए दिमाग को बर्फ जैसी शांति दें। अपने नर्वस सिस्टम को वापस फौलादी और प्राकृतिक रूप से मज़बूत बनाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

बिल्कुल नहीं! एलोपैथिक एंटी-एंग्जायटी दवाओं को कभी भी कोल्ड टर्की (अचानक) नहीं छोड़ना चाहिए। इससे भयंकर रिबाउंड पैनिक अटैक, सीज़र्स और विड्रॉल सिंड्रोम (Withdrawal syndrome) हो सकता है। इसे हमेशा आयुर्वेदिक मिडिल पाथ के सपोर्ट के साथ धीरे-धीरे (Tapering) कम करना चाहिए।

एंटी-एंग्जायटी दवाइयाँ आपके सेंट्रल नर्वस सिस्टम (CNS) को धीमा (Depress) कर देती हैं। वे केवल डर को नहीं, बल्कि आपके उत्साह, फोकस और खुशी वाले केमिकल्स को भी सुन्न कर देती हैं (Emotional blunting), जिससे आप दिन भर ज़ॉम्बी की तरह थका हुआ महसूस करते हैं।

यह एक मानसिक तकनीक है। जब पैनिक या एंग्जायटी का विचार आए, तो उससे डरकर भागने (Fight) के बजाय, उस ऊर्जा को स्वीकार करें और उसे अपने काम, फोकस या रचनात्मकता की ओर मोड़ दें। आयुर्वेद की मेध्य जड़ी-बूटियाँ दिमाग को यह कंट्रोल सीखने में मदद करती हैं।

नहीं। ब्राह्मी की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह नॉन-सेडेटिव (Non-sedative) है। यह एंग्जायटी को शांत करती है, लेकिन दिमाग को सुलाती नहीं है। इसके सेवन से आप रिलैक्स भी रहते हैं और आपका फोकस (Focus) भी 100% बना रहता है।

शत-प्रतिशत। 90% सेरोटोनिन (खुशी का हॉर्मोन) आपके पेट में बनता है। अगर आपको कब्ज़ है, गैस बनती है या जठराग्नि कमज़ोर है, तो ज़हरीला आम (Toxins) दिमाग तक पहुँचकर भयंकर ब्रेन फॉग और पैनिक ट्रिगर करता है। पेट ठीक किए बिना एंग्जायटी ठीक नहीं हो सकती।

सुस्ती भगाने के लिए कैफीन (Caffeine) पीना सबसे बड़ी गलती है। कैफीन नर्वस सिस्टम को ट्रिगर करता है और कॉर्टिसोल (स्ट्रेस हॉर्मोन) बढ़ाता है। यह आपकी एंग्जायटी को अंदर ही अंदर 10 गुना भड़का देता है, जिससे पैनिक अटैक आने का खतरा बढ़ जाता है।

बिल्कुल। जब आप दवा की डोज़ कम करते हैं, तो नर्वस सिस्टम बौखला जाता है। शिरोधारा में माथे पर लगातार गिरता हुआ गर्म तेल ओवर-एक्टिव नर्वस सिस्टम को तुरंत शांत (Parasympathetic mode) कर देता है, जिससे विड्रॉल (Withdrawal) के झटके नहीं लगते।

हाँ। वात-प्रधान एंग्जायटी वाले लोगों का दिमाग कल्पना और हकीकत में फर्क जल्दी भूल जाता है। फिक्शन, थ्रिलर या डरावनी कहानियाँ दिमाग में कृत्रिम डर (Fake threat) पैदा करती हैं, जिससे कॉर्टिसोल रिलीज़ होता है और पैनिक अटैक ट्रिगर हो जाता है। यथार्थ (Reality) से जुड़े रहना बेहतर है।

अश्वगंधा एक एडाप्टोजेन (Adaptogen) है जो स्ट्रेस हॉर्मोन्स को कम करता है और ब्लड प्रेशर को संतुलित करता है। यह बीपी नहीं बढ़ाता, बल्कि स्ट्रेस से बढ़े हुए बीपी को शांत करता है। लेकिन इसे हमेशा आयुर्वेदिक डॉक्टर की बताई गई डोज़ में ही लेना चाहिए।

अगर आपने केवल दवा छोड़ी है और लाइफस्टाइल (जंक फूड, रात भर जागना) नहीं बदली है, तो पैनिक वापस आ सकता है। लेकिन अगर आपने आयुर्वेद के ज़रिए अपना ओजस बढ़ा लिया है, जठराग्नि सुधार ली है और स्ट्रेस मैनेजमेंट सीख लिया है, तो आप स्थायी रूप से एंग्जायटी-मुक्त रह सकते हैं।

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