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Belly Fat और Diabetes — एक का इलाज दूसरा खुद ठीक करता है

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

शीशे के सामने खड़े होकर जब हम अपने बढ़ते हुए पेट (Belly Fat) को देखते हैं, तो अक्सर उसे केवल एक कॉस्मेटिक (Cosmetic) समस्या या खराब फिटिंग वाले कपड़ों का कारण मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। हम सोचते हैं कि थोड़ा कम खा लेंगे या कल से टहलना शुरू कर देंगे, तो यह टायर (Tyre) अंदर चला जाएगा। लेकिन जब रूटीन चेकअप में डॉक्टर कहता है कि आपका ब्लड शुगर बॉर्डरलाइन पर है या आपको टाइप-2 डायबिटीज़ (Type-2 Diabetes) हो गई है, तो हम घबरा जाते हैं और इन दोनों समस्याओं को अलग-अलग बीमारियों की तरह देखने लगते हैं।

सच्चाई यह है कि आपके पेट के आस-पास जमा हुई वह ज़िद्दी चर्बी और आपके खून में दौड़ती हुई अतिरिक्त शुगर, ये दोनों अलग-अलग बीमारियाँ नहीं हैं। ये एक ही भयंकर मेटाबॉलिक चक्रव्यूह के दो दरवाज़े हैं। आपका बढ़ता हुआ पेट ही आपकी डायबिटीज़ को जन्म दे रहा है, और आपकी बिगड़ी हुई शुगर आपके पेट पर और ज़्यादा फैट जमा कर रही है। सबसे अच्छी खबर यह है कि अगर आप इनमें से किसी एक की भी जड़ पर कुल्हाड़ी मार दें, तो दूसरी बीमारी ताश के पत्तों की तरह अपने आप ढह जाएगी।

पेट की चर्बी (Visceral Fat) और डायबिटीज़ का यह जानलेवा कनेक्शन क्या है?

पेट की चर्बी त्वचा के नीचे का कोई साधारण मांस नहीं है। विज्ञान इसे विसरल फैट (Visceral Fat) कहता है, जो आपके लिवर और पैंक्रियाज़ जैसे अंदरूनी अंगों को पूरी तरह जकड़ लेता है:

  • इंसुलिन रेजिस्टेंस (Insulin Resistance) का जन्म: पेट की यह चर्बी एक ज़िंदा ग्रंथि (Endocrine organ) की तरह काम करती है, जो शरीर में ज़हरीले केमिकल्स (Inflammatory cytokines) छोड़ती है। ये केमिकल्स आपकी कोशिकाओं (Cells) को इंसुलिन पहचानने से रोक देते हैं। इसी स्थिति को इंसुलिन रेजिस्टेंस (Insulin Resistance) कहते हैं।
  • फैट स्टोरिंग लूप (Fat Storing Loop): जब कोशिकाएं इंसुलिन का उपयोग नहीं कर पातीं, तो खून में शुगर बढ़ जाती है। इसे कंट्रोल करने के लिए पैंक्रियाज़ और ज़्यादा इंसुलिन बनाता है। हाई इंसुलिन शरीर को सीधा फैट-स्टोरिंग (Fat-storing) मोड में डाल देता है, जिससे पेट की चर्बी और ज़्यादा बढ़ती है।
  • लिवर का चोक (Choke) होना: खून में तैरती हुई अतिरिक्त शुगर को लिवर फैट में बदल देता है (Fatty Liver)। जब लिवर खुद फैट से घिर जाता है, तो वह शुगर मेटाबॉलिज़्म को पूरी तरह ब्लॉक कर देता है।
  • यह एक दुष्चक्र (Vicious Cycle) है: पेट का फैट शुगर बढ़ाता है -> शुगर इंसुलिन बढ़ाती है -> इंसुलिन फिर से पेट पर नया फैट जमा करता है।

दोषों के अनुसार पेट की चर्बी और ब्लड शुगर के प्रकार

हर इंसान का शरीर अलग होता है। आयुर्वेद के अनुसार, शरीर के बिगड़े हुए दोषों के आधार पर यह मेटाबॉलिक सिंड्रोम तीन मुख्य रूपों में हावी होता है:

  • कफ-प्रधान (भारीपन और सुस्ती): यह सबसे आम स्थिति है। इसमें इंसान का वज़न नियंत्रण पूरी तरह बिगड़ जाता है। पेट पर थुलथुला फैट जमा होता है, मेटाबॉलिज़्म सो जाता है और इंसान हमेशा गहरी सुस्ती में रहता है।
  • पित्त-प्रधान (इमोशनल ईटिंग और स्ट्रेस): काम के भयंकर तनाव के कारण जब इंसान स्ट्रेस ईटिंग (Stress eating) करता है, तो खून में गर्मी बढ़ती है। इसमें पेट के ऊपरी हिस्से में फैट जमता है और मरीज़ को भयंकर एसिडिटी व पोस्ट मील स्पाइक्स (Post-meal spikes) का सामना करना पड़ता है।
  • वात-प्रधान (स्किनी फैट / Skinny Fat): हाथ-पैर पतले होते हैं, लेकिन केवल पेट बाहर निकला होता है। इसमें भयंकर एंग्जायटी होती है और ब्लड शुगर बहुत तेज़ी से ऊपर-नीचे होता है (Fluctuations)। ऐसे लोगों को वात दोष कम करने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है।

क्या आपका शरीर भी इस मेटाबॉलिक बम के फटने का अलार्म बजा रहा है?

फैट और शुगर का यह कॉकटेल शरीर में साइलेंट किलर की तरह पनपता है। इन शुरुआती खामोश संकेतों को कभी नज़रअंदाज़ न करें:

  • गर्दन और बगलों का काला पड़ना (Acanthosis Nigricans): अगर आपकी गर्दन के पीछे की त्वचा अचानक मोटी और मखमली काली पड़ने लगी है, तो यह मैल नहीं, बल्कि हाई इंसुलिन का सबसे बड़ा और पुख्ता संकेत है।
  • खाना खाने के तुरंत बाद गहरी नींद आना: लंच करने के बाद अगर आपको भयंकर सुस्ती और नींद आती है (Sugar Crash), तो इसका मतलब है कि आपकी कोशिकाएं ऊर्जा नहीं सोख पा रही हैं।
  • मीठा खाने की तीव्र लालसा (Sugar Cravings): पेट भरा होने के बावजूद हर मील (Meal) के बाद कुछ मीठा ढूंढना।
  • पेट का टायर सख्त (Hard) होना: अगर आपके पेट की चर्बी छूने में ढीली नहीं, बल्कि ड्रम की तरह सख्त और टाइट है, तो यह खतरनाक विसरल फैट है जो अंगों को जकड़ चुका है।

वज़न और शुगर कम करने के चक्कर में लोग क्या भयंकर गलतियाँ करते हैं?

घबराहट में आकर लोग इंटरनेट से ऐसे शॉर्टकट्स अपना लेते हैं जो उनके मेटाबॉलिज़्म को हमेशा के लिए अपाहिज कर देते हैं:

  • क्रैश डाइटिंग (Crash Dieting) या भूखे रहना: रोटी-चावल पूरी तरह छोड़कर केवल सूप-सलाद पर ज़िंदा रहना। इससे शरीर सर्वाइवल मोड में चला जाता है और मेटाबॉलिज़्म इतना धीमा हो जाता है कि पानी पीने से भी वज़न बढ़ने लगता है।
  • आर्टिफिशियल स्वीटनर्स (Artificial Sweeteners) का उपयोग: चीनी छोड़कर शुगर-फ्री गोलियाँ या डाइट ड्रिंक्स पीना। ये केमिकल्स आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को मार देते हैं और इंसुलिन रेजिस्टेंस को दोगुना कर देते हैं।
  • अत्यधिक कार्डियो (Heavy Cardio) और स्ट्रेस: बिना डाइट सुधारे जिम में घंटों पसीना बहाना, जिससे शरीर में कॉर्टिसोल (स्ट्रेस हॉर्मोन) बढ़ता है और पेट की चर्बी और ज़िद्दी हो जाती है।
  • भविष्य की गंभीर जटिलताएं: अगर इस पेट की चर्बी और शुगर के कनेक्शन को न तोड़ा जाए, तो यह हृदय रोगों, स्ट्रोक और नसों के स्थायी डैमेज (Neuropathy) का रूप ले लेता है।

आयुर्वेद इस मेटाबॉलिक सिंड्रोम की जड़ को कैसे समझता है?

आधुनिक विज्ञान जिसे टाइप-2 डायबिटीज़ और ओबेसिटी (Obesity) कहता है, आयुर्वेद उसे प्रमेह (Prameha) और मेद धातु (Fat Tissue) की भयंकर विकृति के विज्ञान से समझता है।

  • जठराग्नि की विफलता (Agni Mandya): आज की सुविधाजनक जीवनशैली और गलत खानपान के कारण पाचन की आग (जठराग्नि) बुझ जाती है। जब खाना पचता नहीं है, तो वह सीधा आम (Toxins) और खराब फैट (मेद) में बदल जाता है।
  • स्रोतस (Channels) में रुकावट: बढ़ा हुआ खराब फैट (मेद) और कफ दोष शरीर के सूक्ष्म चैनल्स को ब्लॉक कर देता है। इससे इंसुलिन अपनी मंज़िल तक नहीं पहुँच पाता।
  • क्लेद (Moisture) का बढ़ना: शरीर में अनपचे भोजन से बना अतिरिक्त तरल (क्लेद) जब पैंक्रियाज़ और किडनी पर दबाव डालता है, तो प्रमेह (डायबिटीज़) जन्म लेता है।

बेली फैट और शुगर को एक साथ काटने वाली आयुर्वेदिक डाइट

अपने पैंक्रियाज़ को आराम देने और ज़िद्दी चर्बी को पिघलाने के लिए इस आयुर्वेदिक डाइट को अपनी रूटीन का हिस्सा बनाएं।

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - लो ग्लाइसेमिक और फैट बर्नर) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - शुगर स्पाइक और फैट बढ़ाने वाले)
अनाज (Grains) पुराना जौ (Barley सबसे श्रेष्ठ फैट कटर है), रागी, ज्वार, दलिया। मैदा, वाइट ब्रेड, सफेद चावल, पैकेटबंद नूडल्स।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) करेला, परवल, लौकी, पालक, मेथी, सहजन (Drumsticks)। अत्यधिक आलू, शकरकंद, अरबी, डिब्बाबंद और फ्रोज़न सब्ज़ियाँ।
फल (Fruits) आंवला, जामुन, पपीता, अमरूद, सेब। बहुत ज़्यादा पके हुए आम, केले, पैकेटबंद मीठे जूस, ठंडे फल।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी (सीमित मात्रा में), कच्ची घानी सरसों का तेल। रिफाइंड ऑयल, डालडा, मेयोनेज़, बाज़ार का बार-बार जलाया हुआ तेल।
पेय पदार्थ (Beverages) मेथी और दालचीनी का पानी, ताज़ा मट्ठा (छाछ), गिलोय का काढ़ा। पैकेटबंद एनर्जी ड्रिंक्स, डाइट सोडा, बर्फ का पानी।

फैट बर्न और शुगर कंट्रोल करने के लिए जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें ऐसे शक्तिशाली रसायन दिए हैं, जो एक ही समय में आपके पेट की चर्बी को पिघलाते हैं और ब्लड शुगर को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करते हैं:

  • मेथी दाना (Fenugreek): फैट और शुगर दोनों के लिए यह एक जादुई औषधि है। मेथी दाना (Fenugreek seeds) का पानी इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाता है और पेट की चर्बी को तेज़ी से गलाता है।
  • गुड़मार (Gurmar): यह जड़ी-बूटी आंतों में शुगर के अवशोषण (Absorption) को रोकती है और मीठा खाने की लालसा (Cravings) को जड़ से खत्म करती है।
  • त्रिफला (Triphala): आंतों से कचरा बाहर निकालने, मेटाबॉलिज़्म को तेज़ करने और वज़न घटाने के लिए रोज़ रात को त्रिफला (Triphala) का सेवन करना एक अचूक उपाय है।
  • गिलोय (Giloy): शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाने और फैट के कारण होने वाली अंदरूनी सूजन को काटने के लिए गिलोय (Giloy) एक बेहतरीन ब्लड प्यूरीफायर है।
  • विजयसार (Vijaysar): विजयसार की लकड़ी के गिलास में रात भर रखा हुआ पानी सुबह खाली पेट पीने से पैंक्रियाज़ को भारी ताकत मिलती है और डायबिटीज़ और ब्लड शुगर कंट्रोल में रहता है।

ज़िद्दी चर्बी को पिघलाने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब शरीर में फैट और कफ बहुत गहराई तक जम चुका हो और वज़न कम न हो रहा हो, तो पंचकर्म की ये बाहरी थेरेपीज़ शरीर को तुरंत रीबूट कर देती हैं:

  • उद्वर्तन (Udvartana): सूखे और गर्म हर्बल पाउडर से की जाने वाली यह तेज़ मालिश त्वचा के नीचे जमे हुए ज़िद्दी कफ और फैट को तेज़ी से पिघलाती है। बेली फैट के लिए उद्वर्तन (Udvartana) एक सबसे जादुई और असरदार थेरेपी है।
  • विरेचन (Virechana): लिवर और आंतों की डीप-क्लीनिंग के लिए की जाने वाली यह विरेचन थेरेपी (Virechana therapy) शरीर से अत्यधिक पित्त और अशुद्ध रक्त को बाहर निकालती है, जिससे फैटी लिवर साफ होता है।
  • अभ्यंग (Abhyanga): शुद्ध औषधीय तेलों से की जाने वाली यह मालिश ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाती है और डायबिटिक न्यूरोपैथी (पैरों की सुन्नता) को रोकती है।

बेली फैट और डायबिटीज़ के पूरी तरह रिवर्स होने में कितना समय लगता है?

लगातार गलत खानपान से थके हुए पैंक्रियाज़ और जमे हुए फैट को दोबारा प्राकृतिक अवस्था में लाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: आपकी जठराग्नि सुधरेगी। मीठा खाने की क्रेविंग खत्म होगी और खाना खाने के बाद आने वाली भयंकर सुस्ती दूर हो जाएगी।
  • 3-4 महीने: उद्वर्तन और आयुर्वेदिक रसायनों के प्रभाव से आपके पेट की ज़िद्दी चर्बी (इंच) प्राकृतिक रूप से कम होने लगेगी। कोशिकाएं इंसुलिन को सोखना शुरू कर देंगी।
  • 5-6 महीने: आपका मेटाबॉलिज़्म पूरी तरह रीबूट हो जाएगा। आपका फास्टिंग शुगर नॉर्मल हो जाएगा, वज़न नियंत्रित होगा और आप दोनों बीमारियों के जाल से एक साथ बाहर आ जाएंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

इस मेटाबॉलिक सिंड्रोम के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य शुगर के लिए मेटफॉर्मिन (Metformin) और वज़न के लिए लाइपोसेक्शन (Liposuction) या कृत्रिम सप्लीमेंट्स देना। जठराग्नि को बढ़ाना, 'आम' को पचाना और उद्वर्तन जैसी थेरेपी से प्राकृतिक रूप से फैट पिघलाना।
बीमारी को देखने का नज़रिया डायबिटीज़ और मोटापे को दो अलग-अलग बीमारियों के रूप में देखना और अलग-अलग इलाज करना। इसे कमज़ोर पाचन, 'आम' का संचय और कफ-मेद धातु की विकृति का एक ही संपूर्ण सिंड्रोम मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल केवल कैलोरी काउंट करने और भूखे रहने (Starving) की आम सलाह दी जाती है। क्लीन ईटिंग, शाकाहारी होल-फूड्स, सही कुकिंग मेथड्स और शरीर के दोषों के अनुसार आहार को आधार माना जाता है।
लंबा असर गोलियाँ उम्र भर खानी पड़ती हैं और वज़न वापस (Rebound) बढ़ जाता है। शरीर अंदर से इतना मज़बूत हो जाता है कि वह प्राकृतिक रूप से शुगर को पचाना और फैट बर्न करना सीख जाता है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद इस मेटाबॉलिक सिंड्रोम को पूरी तरह रिवर्स कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर संकेत दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • बिना वजह अचानक तेज़ी से वज़न गिरना: अगर आपका वज़न ज़्यादा है, लेकिन अचानक बिना कुछ किए 10-15 किलो वज़न गिर जाए (यह फुल-ब्लोन टाइप-1 या गंभीर टाइप-2 डायबिटीज़ का संकेत है)।
  • सांसों से फलों जैसी तेज़ महक आना: अगर सांसों से नेल-पॉलिश रिमूवर (Acetone) या मीठे फलों जैसी बदबू आए (यह Diabetic Ketoacidosis का अलार्म है जो एक इमरजेंसी है)।
  • घाव का जल्दी न भरना: अगर शरीर पर कोई छोटा सा कट या घाव लग जाए और वह हफ्तों तक बिल्कुल भी न सूखे और मवाद भर जाए।
  • हाथ-पैरों में भयंकर सुन्नपन (Neuropathy): अगर उँगलियों या पैरों के तलवों में लगातार चींटियाँ चलने जैसा अहसास (Tingling) हो या वे बिल्कुल सुन्न रहने लगें।

निष्कर्ष

अपने पेट के आस-पास जमे हुए ज़िद्दी टायर को देखकर केवल इसलिए परेशान होना कि कपड़े अच्छे नहीं लग रहे, खतरे को बहुत कम आंकना है। यह बेली फैट (Belly Fat) केवल एक बाहरी मांस नहीं है; यह एक ज़हरीली फैक्ट्री है जो 24 घंटे आपके खून में ऐसे रसायन छोड़ रही है जो आपको तेज़ी से डायबिटीज़ की तरफ धकेल रहे हैं। और दूसरी तरफ, बढ़ा हुआ ब्लड शुगर आपके शरीर को एक फैट-स्टोरिंग मशीन बना रहा है। जब आप इन दोनों को अलग-अलग बीमारियाँ मानकर एक के लिए डाइटिंग और दूसरे के लिए गोलियाँ खाते हैं, तो आप बीमारी की जड़ को जस का तस छोड़ रहे होते हैं। इस खतरनाक चक्रव्यूह से बाहर निकलें। अपने मेटाबॉलिज़्म को रीबूट करें। क्लीन ईटिंग अपनाएं, रात का खाना हल्का लें और अपनी डाइट में जौ, लौकी और शुद्ध गाय का घी शामिल करें। मेथी दाना, गुड़मार और त्रिफला जैसी जादुई जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और पंचकर्म की उद्वर्तन थेरेपी से अपनी त्वचा के नीचे जमे हुए कफ और फैट को बाहर निकालें। उम्र भर गोलियों के सहारे जीने से बचें, और अपने शरीर को फैट-बर्निंग मशीन बनाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, बिल्कुल। हाथ या जांघों पर जमा फैट सबक्यूटेनियस फैट (Subcutaneous fat) होता है जो केवल त्वचा के नीचे होता है। लेकिन पेट का फैट विसरल फैट (Visceral fat) होता है, जो लिवर और पैंक्रियाज़ के अंदर तक घुसा होता है। यह इंसुलिन रेजिस्टेंस का सबसे बड़ा कारण है।

शत-प्रतिशत। स्किनी फैट (Skinny Fat) होना सबसे खतरनाक स्थितियों में से एक है। इसका मतलब है कि आपके अंगों के आस-पास (विसरल एरिया में) खतरनाक चर्बी जम चुकी है, भले ही आपका BMI नॉर्मल हो। यह सीधा इंसुलिन रेजिस्टेंस को जन्म देता है।

हल्की वॉक (विशेषकर खाने के बाद शतपावली) ब्लड शुगर को स्पाइक (Spike) होने से रोकती है। लेकिन ज़िद्दी बेली फैट को कम करने के लिए आपको स्ट्रेचिंग, योगासन (जैसे सूर्य नमस्कार) और आहार (जौ/रागी) में बदलाव करना ही होगा।

हाँ, कुछ एलोपैथिक डायबिटीज़ की दवाइयाँ (जैसे Insulin या Sulfonylureas) शरीर में इंसुलिन का स्तर बढ़ाती हैं। चूँकि इंसुलिन एक फैट-स्टोरिंग हॉर्मोन है, इसलिए कई मरीज़ों का वज़न दवा शुरू करने के बाद तेज़ी से बढ़ने लगता है।

ग्रीन टी मेटाबॉलिज़्म को हल्का सा बूस्ट करती है, लेकिन अगर आपका पेट खराब (कब्ज़) है और आप जंक फूड खा रहे हैं, तो केवल ग्रीन टी पीने से कोई जादू नहीं होगा। मेथी या गिलोय का काढ़ा आयुर्वेद में कहीं ज़्यादा शक्तिशाली फैट और शुगर कटर है।

जब आपको इंसुलिन रेजिस्टेंस होता है, तो आपके खून में बहुत सारी शुगर होती है, लेकिन वह कोशिकाओं (Cells) के अंदर नहीं जा पाती। आपकी कोशिकाएं ऊर्जा के लिए भूखी (Starving) रहती हैं, इसलिए दिमाग बार-बार कुछ मीठा खाने का सिग्नल देता है।

खाना पूरी तरह छोड़ना (Starving) आयुर्वेद में वर्जित है। इससे वात भड़कता है और शरीर फैट स्टोर करने लगता है। रात का खाना सोने से 3 घंटे पहले खाएं और उसे बहुत हल्का (जैसे मूंग दाल की खिचड़ी या सूप) रखें। यह सबसे असरदार तरीका है।

उद्वर्तन में त्रिफला या चने के आटे जैसे सूखे और गर्म जड़ी-बूटियों के पाउडर से शरीर की उल्टी दिशा (नीचे से ऊपर) में तेज़ मालिश की जाती है। यह ঘर्षण (Friction) त्वचा के नीचे जमे हुए मेद (Fat) और कफ को तोड़ता है और ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाकर उसे शरीर से बाहर निकालता है।

आयुर्वेद कीटो (अत्यधिक फैट और प्रोटीन) डाइट का समर्थन नहीं करता। यह डाइट शुरुआत में वज़न गिराती है लेकिन लंबे समय में यह लिवर (Fatty Liver), किडनी और हार्ट पर भयंकर दबाव डालती है। संतुलित शाकाहारी (Carbs, Protein, Fat का मिश्रण) आहार ही सबसे सुरक्षित है।

जौ आयुर्वेद में सबसे बेहतरीन लेखन (Scraping) अनाज है। यह पचने में भारी होता है, जिससे ब्लड शुगर अचानक नहीं बढ़ती। इसके अलावा, यह शरीर से फालतू पानी (Water retention) और खराब फैट को सोखकर यूरिन के रास्ते बाहर फ्लश (Flush) कर देता है।

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