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रात को सोते समय कौन-सी पोज़िशन साइटिका में Best है?

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 04 Jun, 2026
  • category-iconUpdated on 04 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5008

रात को दिनभर की थकान मिटाने के लिए जब हम बिस्तर पर जाते हैं, तो एक अच्छी और गहरी नींद की उम्मीद होती है। लेकिन अगर आपको साइटिका (Sciatica) का दर्द है, तो रात का समय किसी सज़ा से कम नहीं लगता। कमर के निचले हिस्से से शुरू होकर कूल्हों से होते हुए पैरों तक जाने वाला यह तेज़ दर्द करवटें बदलने पर मजबूर कर देता है। आप चाहे दाएँ लेटें या बाएँ, यह दर्द आसानी से पीछा नहीं छोड़ता। असल में, सोते समय हमारी पोज़िशन का हमारी रीढ़ की हड्डी और नसों पर सीधा असर पड़ता है। अगर आपके सोने का तरीका गलत है, तो साइटिका की नस पर दबाव और बढ़ जाता है, जिससे दर्द तेज़ हो जाता है। वहीं, अगर आप सही पोज़िशन में सोते हैं, तो नस को आराम मिलता है और आप चैन की नींद सो पाते हैं। इस लेख में हम यही समझेंगे कि साइटिका के दर्द में रात को सोते समय कौन सी पोज़िशन आपके लिए सबसे बेहतरीन है और किन गलतियों से बचना ज़रूरी है।

साइटिका आखिर है क्या?

साइटिका कोई अपने आप में अलग बीमारी नहीं है, बल्कि यह एक लक्षण है जो बताता है कि आपकी साइटिक नस में कहीं कोई दिक्कत आ गई है। यह हमारे शरीर की सबसे लंबी और मोटी नस होती है, जो हमारी पीठ के निचले हिस्से से शुरू होकर कूल्हों से होते हुए पैरों के तलवों तक जाती है। जब रीढ़ की हड्डी में कोई डिस्क खिसक जाती है (Slip disc) या हड्डियों के बीच का गैप कम हो जाता है, तो इस नस पर सीधा दबाव पड़ने लगता है। इसी दबाव की वजह से कमर, कूल्हे और पैरों में झनझनाहट, सुन्नपन या तेज़ करंट जैसा दर्द महसूस होता है। कई बार यह दर्द इतना तेज़ होता है कि इंसान के लिए सीधा खड़ा होना या दो कदम चलना भी मुश्किल हो जाता है। रात के समय जब हमारा शरीर एक ही पोज़िशन में लंबे समय तक रहता है, तो यह दर्द और भी ज़्यादा परेशान करने लगता है।

रात के समय साइटिका का दर्द ज़्यादा क्यों महसूस होता है?

अक्सर लोगों की शिकायत होती है कि दिन भर तो वे फिर भी किसी तरह काम कर लेते हैं, लेकिन रात को बिस्तर पर जाते ही दर्द भयंकर हो जाता है। इसके कुछ मुख्य कारण हैं:

  • ध्यान भटकने का न होना: दिन के समय हम काम में व्यस्त रहते हैं, जिससे हमारा ध्यान दर्द से हटा रहता है। रात को जब चारों तरफ शांति होती है, तो दिमाग का सारा फोकस सीधे दर्द पर चला जाता है।
  • शरीर का सीधा लेटना: जब हम पीठ के बल बिल्कुल सीधे लेटते हैं, तो हमारी रीढ़ की हड्डी का नेचुरल कर्व (घुमाव) बिगड़ सकता है, जिससे नस पर सीधा दबाव पड़ता है।
  • इन्फ्लेमेशन (सूजन) का बढ़ना: रात के समय शरीर का तापमान थोड़ा गिरता है और हिलना-डुलना कम हो जाता है, जिससे जोड़ों और नसों में सूजन ज़्यादा महसूस होने लगती है।
  • गद्दे का गलत सपोर्ट: अगर आपका गद्दा बहुत ज़्यादा नर्म है, तो शरीर उसमें धँस जाता है, जो रीढ़ की हड्डी और नसों के लिए बहुत नुकसानदायक है।

साइटिका में सोने की सबसे अच्छी पोज़िशन्स

साइटिका के दर्द में सही पोज़िशन में सोना किसी कारगर इलाज से कम नहीं है। आप आराम पाने के लिए इन पोज़िशन्स को आज़मा सकते हैं:

  • घुटनों के नीचे तकिया लगाकर पीठ के बल सोना: यह सबसे बेहतरीन पोज़िशन मानी जाती है। सीधे लेटकर अपने घुटनों के ठीक नीचे एक मोटा और मुलायम तकिया रख लें। इससे आपकी रीढ़ की हड्डी पर पड़ने वाला दबाव काफी कम हो जाता है और साइटिक नस को पूरा आराम मिलता है।
  • पैरों के बीच तकिया रखकर करवट से सोना: अगर आपको करवट लेकर सोने की आदत है, तो दर्द वाले हिस्से (पैर) को ऊपर की तरफ रखें। अपने दोनों घुटनों को हल्का सा मोड़ें और उनके बीच में एक तकिया फँसा लें। इससे आपके कूल्हे और रीढ़ की हड्डी एक सीध में रहते हैं।
  • भ्रूण मुद्रा (Fetal Position) में सोना: अगर आपको हर्नियेटेड डिस्क की वजह से साइटिका है, तो एक तरफ करवट लेकर अपने घुटनों को छाती की तरफ मोड़ कर सोएँ (जैसे पेट में बच्चा सिकुड़ कर रहता है)। इससे रीढ़ की हड्डियों के बीच जगह बनती है और नस पर से दबाव हट जाता है।

साइटिका में कौन सी पोज़िशन में बिल्कुल नहीं सोना चाहिए?

कुछ पोज़िशन्स आपके दर्द को रात भर में कई गुना बढ़ा सकती हैं। इनसे बचना बेहद ज़रूरी है:

  • पेट के बल सोना: साइटिका के मरीज़ों के लिए पेट के बल सोना सबसे खतरनाक माना जाता है। इस पोज़िशन में आपकी गर्दन मुड़ी रहती है और कमर पर बहुत ज़्यादा खिंचाव पड़ता है, जिससे नस पर सीधा दबाव आता है।
  • एक पैर को बहुत ऊपर मोड़कर सोना: कई लोग करवट लेकर सोते समय ऊपर वाले पैर को पेट तक खींच लेते हैं। इससे कूल्हे की माँसपेशियाँ तन जाती हैं और नस खिंचने से दर्द बढ़ सकता है।
  • बिना सपोर्ट के सीधे लेटना: अगर आप पीठ के बल सो रहे हैं और घुटनों या कमर के नीचे कोई सपोर्ट नहीं है, तो आपकी कमर का निचला हिस्सा हवा में रह जाता है, जो सोते समय दर्द को ट्रिगर करता है।

साइटिका के रोगी के लिए आहार योजना 

साइटिका के दर्द में नसों की सूजन कम करने वाली डाइट लेनी चाहिए। यहाँ आपके लिए एक आसान डाइट प्लान है:

  • सुबह खाली पेट: एक गिलास गुनगुने पानी में थोड़ा सा अदरक या हल्दी उबालकर पिएं।
  • नाश्ता: ओट्स, दलिया या मूंग दाल का चीला लें। साथ में सेब या पपीता खाएं।
  • दोपहर का खाना: हरी पत्तेदार सब्जियां (जैसे पालक), एक-दो रोटियाँ, और दाल खाएँ। दाल में थोड़ा देसी घी ज़रूर डालें।
  • शाम का स्नैक: भुने हुए मखाने या मुट्ठी भर अखरोट और बादाम खाएं। ये नसों को ताकत देते हैं।
  • रात का खाना: बिल्कुल हल्का रखें, जैसे लौकी की सब्जी या मूंग की खिचड़ी।

दर्द से राहत के लिए गद्दे (Mattress) का क्या रोल है?

आप किस तरह के गद्दे पर सोते हैं, यह साइटिका में बहुत मायने रखता है:

  • बहुत नर्म गद्दा: यह आपके शरीर के भारी हिस्सों (जैसे कूल्हे और कंधे) को नीचे धँसा देता है, जिससे रीढ़ की हड्डी टेढ़ी हो जाती है और दर्द बढ़ता है।
  • बहुत कठोर गद्दा: एकदम सख्त सतह भी हड्डियों और नसों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।
  • सही गद्दा चुनें: मीडियम फर्म (Medium Firm) गद्दा साइटिका के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। यह आपके शरीर को सही सपोर्ट देता है और रीढ़ को पूरी रात सीधा रखता है।

सोने से पहले दर्द भगाने के उपाय

रात को सोने से पहले अगर आप इन कुछ आसान तरीकों को अपनाते हैं, तो दर्द में बहुत राहत मिलेगी और नींद भी सुकून की आएगी:

  • बिस्तर पर ही हल्की स्ट्रेचिंग: सोने से ठीक पहले बिस्तर पर लेटे-लेटे ही कुछ हल्के-फुल्के स्ट्रेच करें। जैसे पीठ के बल सीधे लेट जाएं और दोनों घुटनों को धीरे-धीरे मोड़कर छाती की तरफ लाएं। इससे दिनभर की थकी हुई नसों का खिंचाव दूर होता है और बदन एकदम रिलैक्स हो जाता है।
  • ​गर्म सिकाई करें: सोने से करीब 15-20 मिनट पहले अपनी कमर के निचले हिस्से पर हीटिंग पैड या गर्म पानी की बोतल से सिकाई करें। इससे शरीर में खून का दौरा बेहतर होता है और उठने-बैठने में होने वाली अकड़न गायब हो जाती है।
  • ​बिस्तर पर लेटने का तरीका बदलें: बिस्तर पर कभी भी झटके से सीधे मत लेटें और न ही झटके से उठें। लेटने के लिए सबसे पहले बिस्तर के किनारे आराम से बैठें, फिर एक करवट होकर पैरों को ऊपर लाएं और धीरे से लेट जाएं। सुबह सोकर उठते समय भी इसी तरीके का ध्यान रखें।

आयुर्वेद साइटिका को कैसे देखता है?

आयुर्वेद में साइटिका को 'गृध्रसी' (Gridhrasi) कहा जाता है। इसका नाम गिद्ध पक्षी पर रखा गया है, क्योंकि इस बीमारी में इंसान गिद्ध की तरह थोड़ा लंगड़ाकर या झुककर चलने लगता है। आयुर्वेद मानता है कि यह शरीर में 'वात दोष' के बहुत ज़्यादा बढ़ जाने और असंतुलित हो जाने के कारण होता है। जब शरीर में वात बढ़ता है, तो वह नसों में रुखापन और अकड़न पैदा करता है। पैरों का सुन्न होना, झनझनाहट और खिंचाव वात के ही लक्षण हैं। आयुर्वेद में वात को शांत करने वाले आहार और जड़ी-बूटियों (जैसे अश्वगंधा, गुग्गुल) के साथ औषधीय तेलों (महानारायण तेल) से मालिश करने की सलाह दी जाती है।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर 

पहलू साइटिका के लिए विशेष आयुर्वेदिक उपचार सामान्य आयुर्वेदिक उपचार
मुख्य उद्देश्य साइटिका से जुड़े दर्द, जकड़न और चलने-फिरने में होने वाली परेशानी को कम करना समग्र स्वास्थ्य, संतुलित जीवनशैली और रोग-निवारण को बढ़ावा देना
फोकस कमर से पैर तक जाने वाले दर्द और संबंधित लक्षणों पर केंद्रित पूरे शरीर, पाचन, दिनचर्या और स्वास्थ्य संतुलन पर ध्यान
उपचार तरीका साइटिका के लक्षणों और व्यक्ति की स्थिति के अनुसार चुने गए आयुर्वेदिक उपाय आहार-विहार, जड़ी-बूटियाँ, योग, पंचकर्म और अन्य आयुर्वेदिक सिद्धांत
थेरेपी आवश्यकता के अनुसार कटि बस्ती, अभ्यंग, स्वेदन जैसी पारंपरिक प्रक्रियाएँ सुझाई जा सकती हैं विभिन्न रोगों और स्वास्थ्य लक्ष्यों के अनुसार अलग-अलग आयुर्वेदिक प्रक्रियाएँ
डाइट और लाइफस्टाइल दर्द और गतिशीलता को ध्यान में रखकर विशेष सलाह दी जा सकती है दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए व्यापक जीवनशैली और आहार संबंधी सुझाव
उपयोग का क्षेत्र मुख्य रूप से साइटिका या उससे मिलते-जुलते लक्षणों के प्रबंधन के लिए स्वास्थ्य संरक्षण, रोग प्रबंधन और समग्र कल्याण के लिए

साइटिका के दर्द में कब डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी है?

अगर कुछ हफ्तों के बाद भी दर्द ठीक नहीं हो रहा है, तो इसे बिल्कुल नज़रअंदाज़ न करें। तुरंत डॉक्टर के पास जाएँ अगर:

  • आपके पैर या पंजों में लगातार सुन्नपन या कमज़ोरी महसूस हो रही हो।
  • दर्द इतना ज़्यादा तेज़ हो कि आप बिस्तर से उठ ही न पा रहे हों या खड़े होने में भी चीख निकल जाए।
  • यूरिन (पेशाब) या मल त्याग पर आपका कंट्रोल खत्म होने लगे (यह एक सीरियस मेडिकल इमरजेंसी है)।
  • दर्द के साथ तेज़ बुखार आ जाए या अचानक से बहुत ज़्यादा वज़न कम होने लगे।

निष्कर्ष

साइटिका का दर्द यकीनन बहुत परेशान करने वाला और थका देने वाला होता है, लेकिन सही जानकारी और थोड़ी सी सावधानी से आप इसे अच्छे से कंट्रोल कर सकते हैं। रात को सही पोज़िशन में सोना, घुटनों या पैरों के बीच तकिये का इस्तेमाल करना और एक सही गद्दे का चुनाव आपकी नींद में बहुत बड़ा सुधार ला सकता है। पेनकिलर्स या दवाइयाँ कुछ समय के लिए दर्द को ज़रूर दबा सकती हैं, लेकिन अपनी जीवनशैली और सोने के तरीके को ठीक करके ही आप इस दर्द को जड़ से मिटा सकते हैं। अपने शरीर की ज़रूरतों को समझें, उसे आराम दें और अगर दर्द हद से बाहर हो रहा हो, तो किसी विशेषज्ञ से सलाह लेने में ज़रा भी देरी न करें।

FAQs

ज़मीन पर सोना कुछ लोगों को आराम दे सकता है, लेकिन अगर सतह बहुत ज़्यादा सख्त है, तो दर्द बढ़ भी सकता है। हमेशा एक हल्की दरी या योग मैट बिछाकर ही ज़मीन पर लेटें।

हल्का साइटिका का दर्द सही आराम, स्ट्रेचिंग और सिकाई से 4 से 6 हफ्तों में अपने आप ठीक हो सकता है। अगर दर्द बना रहे, तो डॉक्टर से इलाज की ज़रूरत होती है।

हाँ, करवट लेते समय पैरों के बीच या सीधे लेटते समय घुटनों के नीचे तकिया लगाकर सोने से रीढ़ की हड्डी अलाइन (सीधी) रहती है और नस पर दबाव कम होता है।

आयुर्वेद के अनुसार, महानारायण तेल, सहचरादि तेल या साधारण तिल के तेल को हल्का गर्म करके हल्के हाथों से मालिश करना वात दोष को कम करता है और दर्द खींचता है।

हाँ, हल्की सैर (Walking) बहुत अच्छी होती है। इससे ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है और नसों की अकड़न दूर होती है, लेकिन दर्द ज़्यादा होने पर टहलने से बचें और आराम करें।

पेट के बल सोने से कमर के निचले हिस्से में जो नेचुरल घुमाव होता है, उस पर बुरा असर पड़ता है और साइटिक नस पर सीधा तनाव आ जाता है।

हाँ, अगर दर्द नया है या कोई चोट लगी है, तो शुरुआती 2-3 दिन बर्फ (Ice pack) की सिकाई सूजन कम करती है। इसके बाद गर्म सिकाई ज़्यादा बेहतर काम करती है।

बहुत ज़्यादा सीढ़ियाँ चढ़ने से पैरों और कमर की नसों पर दबाव पड़ता है जिससे दर्द बढ़ सकता है। जब तक दर्द ज़्यादा हो, तब तक सीढ़ियाँ चढ़ने से बचना ही समझदारी है।

बिल्कुल। लगातार एक ही जगह पर घंटों बैठे रहने से कमर और कूल्हों पर बहुत दबाव पड़ता है। ऑफिस में हर 45 मिनट में उठकर थोड़ी स्ट्रेचिंग ज़रूर करें।

ऐसी कुर्सी चुनें जो आपकी कमर के निचले हिस्से को अच्छा सपोर्ट दे। कुर्सी पर बैठते समय आपके दोनों पैर हवा में झूलने नहीं चाहिए, बल्कि ज़मीन पर पूरी तरह टिके होने चाहिए।

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