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Chemotherapy के बाद नसों की कमज़ोरी — आयुर्वेद से रिकवरी संभव है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

कैंसर से जंग जीतना किसी बड़े चमत्कार और भारी संघर्ष से कम नहीं है, लेकिन इस लड़ाई के बाद शरीर अक्सर एक गहरी खामोशी और टूटती हुई कमज़ोरी में चला जाता है। कीमोथेरेपी के तेज़ रसायनों के प्रभाव से हाथों और पैरों में एक अजीब सा सुन्नपन और दर्द रहने लगता है, जो धीरे-धीरे जीवन की गुणवत्ता को छीन लेता है।

यह कोई सामान्य थकावट नहीं है, बल्कि यह उन नाज़ुक नसों की चीख है जो भारी रसायनों के कारण अपनी प्राकृतिक शक्ति खो चुकी हैं। जब शरीर अंदर से पूरी तरह सूखने लगता है, तो उसे केवल आराम की नहीं, बल्कि अपनी खोई हुई असली धातु और ऊर्जा को वापस पाने की सख्त ज़रूरत होती है।

कीमोथेरेपी के बाद नसों में यह भयंकर कमज़ोरी और सुन्नपन क्यों आता है?

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में जो दवाइयाँ इस्तेमाल की जाती हैं, वे सचमुच बहुत ज़्यादा तेज और भारी होती हैं। उनका असली मकसद तो शरीर के भीतर मौजूद उन खराब और जानलेवा कोशिकाओं को चुन-चुनकर मारना होता है। पर दिक्कत यह है कि इस पूरी मार-काट के चक्कर में, हमारे शरीर का जो पूरा का पूरा नर्वस सिस्टम है और जो अच्छी-भली स्वस्थ कोशिकाएं हैं, उन्हें भी बहुत ज़्यादा नुकसान झेलना पड़ जाता है।

  • नसों का आवरण नष्ट होना: कीमोथेरेपी के जो कड़े केमिकल्स होते हैं, वे नसों के ऊपर चढ़ी हुई उस पतली सी सुरक्षा परत को एक तरह से झुलसा देते हैं। अब जब वह परत ही नहीं रहेगी, तो हमारे दिमाग और शरीर के बाकी अंगों के बीच जो सिग्नल्स या संदेश चलते हैं, वे बीच में ही टूटने लगते हैं।
  • टॉक्सिन्स का भारी संचय: इलाज के दौरान शरीर में भयंकर आम Toxins जमा हो जाते हैं, जो एंडोक्राइन सिस्टम और नसों के स्रोतस को ब्लॉक कर देते हैं।
  • ओजस का पूरी तरह खत्म होना: आयुर्वेद के अनुसार, भारी रसायनों से शरीर की असली ताकत ओजस खत्म हो जाती है, जिससे इंसान हमेशा क्रोनिक फटीग में रहता है।
  • पाचन और अग्नि की विफलता: कीमोथेरेपी सीधे आपके पाचन तंत्र को डैमेज करती है। जब जठराग्नि काम नहीं करती, तो शरीर नई स्वस्थ कोशिकाओं का निर्माण नहीं कर पाता।

कीमोथेरेपी से होने वाला नर्व डैमेज किन प्रकारों में सामने आता है?

यह जो कीमोथेरेपी की वजह से होने वाली न्यूरोपैथी की दिक्कत है, जिसे डॉक्टर CIPN भी कहते हैं, यह परेशानी हर एक मरीज को बिल्कुल एक ही तरह से तंग नहीं करती है। हर किसी के शरीर पर इसका असर एकदम अलग होता है। असल में हमारे शरीर के भीतर जो दोष फैले होते हैं, उन्हीं के उतार-चढ़ाव के हिसाब से इसके लक्षण भी अलग-अलग इंसानों में अलग-अलग रूपों में बाहर निकलकर सामने आते हैं।

  • वात-प्रधान न्यूरोपैथी: इसमें हाथों और पैरों में सुई चुभने जैसा दर्द और झुनझुनी होती है। स्पर्श महसूस करने की क्षमता लगभग खत्म हो जाती है। इसके लिए वात दोष कम करने के उपाय बहुत ज़रूरी होते हैं।
  • पित्त-प्रधान न्यूरोपैथी: इसमें नसों की गर्मी के कारण ब्लड प्रेशर अचानक गिर जाता है। पैरों के तलवों में भयंकर जलन होती है और त्वचा संबंधी समस्याओं की तरह लालिमा आ जाती है।
  • कफ-प्रधान न्यूरोपैथी: इसमें मांसपेशियों में भारी जकड़न आ जाती है। इंसान अपने हाथों से एक चम्मच भी नहीं पकड़ पाता और वज़न नियंत्रण बिगड़ने के साथ शरीर में भयंकर सुस्ती रहती है।

क्या आपके शरीर में भी नसों के डैमेज होने के ये शुरुआती लक्षण दिख रहे हैं?

एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि कीमोथेरेपी का जो यह बुरा असर होता है, वह सिर्फ इलाज चलने के दिनों तक ही नहीं रहता। कई बार तो इलाज पूरा खत्म होने के महीनों बाद, और यहाँ तक कि सालों बाद भी शरीर में इसके साइड-इफेक्ट्स वैसे के वैसे ही बने रहते हैं।

  • पैरों में दस्ताने और जुराबों जैसा सुन्नपन: मरीज को हर वक्त अपने अंगों में ऐसा महसूस होता रहता है कि जैसे उसने अपने हाथों या पैरों में हमेशा बहुत ज़्यादा टाइट मोज़े या दस्ताने पहन रखे हैं। अजीब बात तो यह है कि जब वह जमीन पर पैर रखता भी है, तो उसे नीचे फर्श या जमीन को छूने का बिल्कुल भी अहसास नहीं होता है। पैर एकदम बेजान और सुन्न महसूस होते हैं।
  • गहरी और लगातार रहने वाली थकावट: रात भर सोने के बाद भी शरीर में भयंकर टूटन महसूस होना और हर समय मानसिक तनाव और उदासी से घिरे रहना।
  • चलने में संतुलन बिगड़ना: चलते समय बार-बार लड़खड़ाना या ऐसा महसूस होना कि आपके घुटनों में जान नहीं है, जो चलते समय घुटने का दर्द और भारी कमज़ोरी का संकेत है।
  • लगातार कब्ज़ और पेट की खराबी: आंतों की नसों के कमज़ोर होने से लगातार रहने वाली कब्ज़ बन जाती है जो किसी भी चूर्ण से ठीक नहीं होती।

नसों को ठीक करने के चक्कर में मरीज़ क्या गलतियाँ करते हैं और उनकी जटिलताएँ?

कैंसर जैसी बड़ी जंग को जीतने के बाद, मरीज जब नसों के उस असहनीय दर्द से जूझता है, तो वह उससे किसी भी तरह तुरंत छुटकारा पाना चाहता है। और इसी हड़बड़ी के चक्कर में, लोग अक्सर कुछ ऐसे शॉर्टकट्स या गलत रास्ते चुन बैठते हैं, जो शरीर के खुद को अंदर से ठीक करने की जो एक कुदरती ताकत होती है, उसे पूरी तरह से ब्लॉक कर देते हैं।

  • तेज़ पेनकिलर्स और स्टेरॉयड का सेवन: लोग नसों के उस भयंकर दर्द को थोड़ी देर के लिए सुन्न करने के चक्कर में बहुत भारी दवाइयाँ खाना शुरू कर देते हैं। पर वे इस बात को भूल जाते हैं कि ये कड़क दवाइयाँ हमारे लिवर और किडनी को और भी ज़्यादा कमज़ोर बना देती हैं।
  • कृत्रिम विटामिन्स पर निर्भरता: बिना जठराग्नि सुधारे केवल विटामिन B12 की कृत्रिम गोलियाँ खाना सीधा आंतों में गर्मी और भयंकर पाचन संबंधी समस्याएं पैदा करता है।
  • शारीरिक हलचल बिल्कुल बंद कर देना: दर्द के डर से बिस्तर पर पड़े रहने से शरीर का वात दोष और अधिक भड़क जाता है, जिससे सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस और जकड़न का खतरा बढ़ जाता है।
  • भविष्य की जटिलताएँ: अगर इन कमज़ोर नसों को रिपेयर न किया जाए, तो यह पैरालिसिस Paralysis जैसी स्थिति और जोड़ों के स्थायी डैमेज का कारण बन सकता है।

आयुर्वेद कीमोथेरेपी से हुए नर्व डैमेज और मूल कारण को कैसे देखता है?

आधुनिक चिकित्सा इसे केवल नसों का डैमेज Neuropathy मानती है, लेकिन आयुर्वेद इसे मज्जा धातु के क्षय और भयंकर वात प्रकोप के विज्ञान से गहराई से समझता है:

  • मज्जा धातु का पूरी तरह सूखना: कीमोथेरेपी के तेज़ रसायन शरीर की सबसे गहरी धातुओं मज्जा और शुक्र को जला देते हैं। मज्जा धातु के सूखने से नसें अंदर से खोखली हो जाती हैं।
  • भयंकर वात का प्रकोप: शरीर में जैसे ही भारी रसायन जाते हैं, वे भयंकर गर्मी पित्त और रूखापन वात पैदा करते हैं। यही वात नसों में खाली जगह बनाकर सुन्नपन और दर्द लाता है।
  • जठराग्नि का नाश: कैंसर की दवाइयाँ जठराग्नि Digestive fire को बुझा देती हैं। इसके कारण पाचन और मस्तिष्क का संबंध पूरी तरह टूट जाता है और नया खून बनना रुक जाता है।

नसों को दोबारा ताक़त देने वाली और वात शांत करने वाली आयुर्वेदिक डाइट

कीमोथेरेपी के बाद रिकवरी आपकी रसोई से शुरू होती है। नसों का रूखापन खत्म करने के लिए इस आयुर्वेदिक डाइट को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - मज्जा पोषक और वात शामक) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - रूखापन और कमज़ोरी बढ़ाने वाले)
अनाज (Grains) पुराना चावल, दलिया, ओट्स, रागी, मूंग दाल की पतली खिचड़ी। मैदा, वाइट ब्रेड, पैकेटबंद नूडल्स, रूखे बिस्कुट, नया चावल।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी (नसों के लिए अमृत), कच्ची घानी तिल का तेल। किसी भी प्रकार का रिफाइंड तेल, डालडा, बहुत अधिक मेयोनेज़।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, कद्दू, परवल, शकरकंद (सभी अच्छी तरह पकी हुई)। कच्चा सलाद, फूलगोभी, पत्तागोभी, अत्यधिक बैंगन और कटहल।
फल और मेवे (Fruits & Nuts) रात भर भीगे हुए बादाम, अखरोट, अंजीर, मुनक्का, पपीता। ठंडे और बिना मौसम के फल, बाज़ार के रोस्टेड नमकीन नट्स।
पेय पदार्थ (Beverages) हल्दी और केसर वाला हल्का गर्म दूध, अस्थिशृंखला का काढ़ा। बर्फ का ठंडा पानी, कोल्ड ड्रिंक्स, बहुत ज़्यादा चाय या कॉफी।

कीमोथेरेपी के बाद रिकवरी करने वाली जड़ी-बूटियाँ

हमारी इस प्रकृति के पास कुछ ऐसे बहुत ही असरदार तत्व मौजूद हैं, जो शरीर के अंदर पहुंचे उन जहरीले रसायनों के बुरे असर को बिल्कुल काट देते हैं। ये तत्व हमारी कमजोर नसों को अंदर से लोहे जैसी मजबूती देने का दम रखते हैं।

  • अश्वगंधा: भयंकर शारीरिक कमज़ोरी दूर करने और नसों को मज़बूत बनाने के लिए अश्वगंधा एक अद्भुत रसायन है। यह शरीर की ऊर्जा को बढ़ाता है और स्ट्रेस को कम करता है।
  • ब्राह्मी: कीमोथेरेपी के कारण होने वाले ब्रेन फॉग और नर्वस सिस्टम के डैमेज को रिपेयर करने के लिए ब्राह्मी दिमाग की नसों को जादुई शांति और ठंडक प्रदान करती है।
  • गिलोय: शरीर से कीमो के ज़हरीले टॉक्सिन्स को बाहर निकालने और इम्यूनिटी को वापस बूस्ट करने में गिलोय एक संजीवनी की तरह काम करती है।
  • बला:यह शरीर के भीतर बढ़े हुए वात दोष को पूरी तरह से शांत कर देती है। और जो हमारी मांसपेशियों में एक अजीब सी अकड़न आ जाती है, उसे भी यह बिल्कुल जड़ से खत्म करके पूरी तरह खोल देती है।
  • शतावरी: शरीर के सूखते हुए तरल पदार्थों और धातुओं को दोबारा हाइड्रेट करने और जीवन शक्ति ओजस लौटाने के लिए शतावरी एक बेहतरीन और सौम्य टॉनिक है।

नसों की कमज़ोरी और सुन्नपन दूर करने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है जब नसों को पहुंचा नुकसान बहुत ज़्यादा गहरा हो चुका होता है। तब सिर्फ मुंह से खाई जाने वाली गोलियां या दवाइयां अकेले पूरा काम नहीं कर पाती हैं। ऐसे मुश्किल वक्त में बाहर से की जाने वाली जो पंचकर्म की थेरेपीज होती हैं, वे हमारे शरीर को एक नया जीवन देने या उसे तुरंत रीबूट करने का एक पक्का और अचूक जरिया बनती हैं।

  • अभ्यंग मालिश: गुनगुने वात-शामक तेलों जैसे बला तैल या क्षीरबला से की जाने वाली यह संपूर्ण शारीरिक अभ्यंग मालिश सूखी हुई नसों को गहराई से पोषण देती है और सुन्नपन खत्म करती है।
  • षष्टिक शाली पिंड स्वेद: यह कुछ खास दवाओं वाले चावल और दूध को मिलाकर तैयार की गई एक पोटली की मालिश होती है। यह मालिश हमारी बेजान और कमजोर हो चुकी मांसपेशियों और नसों के अंदर एक नई जान फूंक देती है।
  • शिरोधारा: माथे पर औषधीय तेल की लगातार धारा गिराने की यह जादुई शिरोधारा प्रक्रिया भयंकर तनाव को खत्म करती है और पूरे नर्वस सिस्टम को शांत करती है।
  • बस्ती: वात दोष को जड़ से खत्म करने के लिए मेडिकेटेड ऑयल और काढ़े की बस्ती दी जाती है। यह आंतों से वात को निकालकर शरीर के निचले हिस्से पैरों की न्यूरोपैथी को ठीक करती है।

नसों को पूरी तरह रिपेयर होने और ताक़त आने में कितना समय लगता है?

उन बेहद कड़े और भारी केमिकल्स की वजह से जो नसें अंदर से एक तरह से झुलस गई हैं और शरीर की धातुएं कमजोर हो चुकी हैं, उन्हें दोबारा अपनी पुरानी बनावट, मोटाई और ताकत पाने में थोड़ा वक्त तो लगता ही है। इसके लिए आपको थोड़ा नियम से चलना होगा और लगातार सब्र रखना होगा।

  • शुरुआती 1-2 महीने: इस शुरुआती समय में सबसे पहले आपके पेट की जो पाचन अग्नि है, वो धीरे-धीरे मजबूत होने लगेगी। पेट में जो गैस बनती थी, वो भी लगभग खत्म हो जाएगी। आपको अपने पूरे शरीर के भीतर एक बिल्कुल नई और हल्की सी ऊर्जा महसूस होने लगेगी। और सबसे बड़ी बात, सुबह सोकर उठते ही जो एक बहुत भारी थकावट शरीर को तोड़े रखती थी, उसमें भी काफी ज़्यादा कमी आने लगेगी।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म और रसायनों के प्रभाव से नसों का रूखापन खत्म होने लगेगा। हाथों और पैरों की झुनझुनी व सुन्नपन कम होगा और आप अपनी ग्रिप Grip वापस पा लेंगे।
  • 5-6 महीने: मज्जा धातु पूरी तरह से पोषित हो जाएगी। आपका वात दोष शांत हो जाएगा और नर्वस सिस्टम प्राकृतिक रूप से बिना किसी कमज़ोरी के काम करने लगेगा।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

कीमोथेरेपी के बाद नसों के डैमेज के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य दर्द के सिग्नल्स को ब्लॉक करने के लिए पेनकिलर्स और नसों को सुन्न करने वाली दवाइयाँ देना। वात को शांत करना, ओजस को बढ़ाना और मज्जा धातु को अंदर से चिकनाई व पोषण देना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल रसायनों से हुआ एक स्थानीय नर्व डैमेज (Neuropathy) मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए वात और धातुओं के सूखने का एक संपूर्ण सिंड्रोम मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल डाइट पर बहुत अधिक ज़ोर नहीं दिया जाता, केवल आराम करने की सलाह दी जाती है। वात-शामक डाइट, कब्ज़ दूर करना और औषधीय तेल की मालिश को ही इलाज का सबसे बड़ा आधार माना जाता है।
लंबा असर दवाइयाँ छोड़ने पर दर्द और सुन्नपन तुरंत वापस आ जाता है। शरीर अंदर से मज़बूत होता है और नर्वस सिस्टम खुद को हील कर लेता है, जिससे इंसान स्थायी रूप से ताक़तवर रहता है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

वैसे तो आयुर्वेद में इतनी ताकत है कि वह कीमोथेरेपी के बाद शरीर में आई इस भयंकर कमजोरी को प्राकृतिक तरीके से बिल्कुल उलट सकता है और उसे ठीक कर सकता है। लेकिन इन सब बातों के बीच एक बात का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। अगर आपको अपने शरीर के अंदर कुछ बहुत ज्यादा गंभीर या डराने वाले लक्षण दिखाई देने लगें, तो फिर बिना कोई देर किए तुरंत डॉक्टरों से मिलकर अपनी जांच करवानी चाहिए।

  • अचानक संतुलन खो देना और गिरना: अगर पैरों में बिल्कुल जान न रहे और आप खड़े होने या चलने में अचानक संतुलन खोकर बार-बार गिरने लगें।
  • अत्यधिक सुन्नपन और चोट का अहसास न होना: अगर हाथों या पैरों में सुन्नपन इतना बढ़ जाए कि जलने, कटने या भारी चोट लगने पर भी आपको बिल्कुल महसूस न हो।
  • भयंकर पेट दर्द और कब्ज़: अगर आंतों की नसें इतनी कमज़ोर हो जाएं कि कई दिनों तक मल पास न हो और पेट में असहनीय ऐंठन शुरू हो जाए।
  • हाथ-पैरों में लकवे Paralysis जैसी स्थिति: अगर शरीर का कोई भी हिस्सा अचानक काम करना बिल्कुल बंद कर दे और हिलना-डुलना असंभव हो जाए।

निष्कर्ष

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जीतने के बाद शरीर को एक नई और ऊर्जावान शुरुआत की ज़रूरत होती है, लेकिन कीमोथेरेपी के रसायनों से झुलसी हुई नसें आपको चैन से जीने नहीं देतीं। हाथ-पैरों में चींटियाँ चलना, सुन्नपन और भयंकर थकावट यह चीख-चीख कर बता रहे हैं कि आपके शरीर की वात ऊर्जा भड़क चुकी है और मज्जा धातु पूरी तरह सूख चुकी है। जब आप इस दर्द और कमज़ोरी को केवल भारी पेनकिलर्स और नींद की गोलियों से सुन्न करने की कोशिश करते हैं, तो आप शरीर की बची-खुची रिकवरी पावर को भी खत्म कर रहे होते हैं। इस दर्दनाक चक्र से बाहर निकलें। आयुर्वेद आपको बिना किसी खतरनाक केमिकल के अपने नर्वस सिस्टम को दोबारा ज़िंदा करने का विज्ञान देता है। अपने बिगड़े हुए पाचन को सुधारें, डाइट में शुद्ध गाय का घी और अखरोट शामिल करें। अश्वगंधा, ब्राह्मी और बला जैसी जादुई जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और अभ्यंग मालिश व शिरोधारा थेरेपी से अपनी सूखी हुई नसों को नया जीवन दें। कीमोथेरेपी के साइड-इफेक्ट्स को अपनी नियति न बनने दें, और अपने शरीर व दिमाग को वापस फौलादी बनाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

यह हर मरीज़ के शरीर और कीमोथेरेपी की डोज़ पर निर्भर करता है। कुछ लोगों में यह इलाज खत्म होने के कुछ महीनों बाद अपने आप कम होने लगता है, लेकिन अगर धातुओं का क्षय गहरा है, तो बिना आयुर्वेदिक रसायन चिकित्सा के यह सालों तक या जीवन भर भी रह सकता है।

बिल्कुल। आयुर्वेद के अनुसार कीमोथेरेपी के रसायनों से शरीर में भयंकर रूखापन (वात) आ जाता है। शुद्ध देसी गाय का घी मज्जा धातु (नसों) को अंदर से चिकनाई देने और ओजस (इम्यूनिटी) को बढ़ाने का सबसे बेहतरीन और सुरक्षित तरीका है।

हाँ, इसे कीमो ब्रेन (Chemo Brain) या ब्रेन फॉग कहा जाता है। जब कीमोथेरेपी के रसायन दिमाग की सूक्ष्म नसों (मनोवह स्रोतस) को डैमेज करते हैं, तो फोकस करने में दिक्कत और चीज़ें भूलने की समस्या आम हो जाती है। इसके लिए ब्राह्मी एक जादुई औषधि है।

नहीं। कीमोथेरेपी के बाद ज़्यादातर दर्द वात (रूखापन और ठंडक) के कारण होता है। बर्फ लगाने से नसें और ज़्यादा सिकुड़ जाती हैं जिससे सुन्नपन बढ़ जाता है। ऐसे में हमेशा गुनगुने औषधीय तेल से मालिश और हल्की गर्म सिकाई (भाप) ही करनी चाहिए।

रोज़ रात को सोने से पहले पैरों के तलवों में गुनगुने तिल के तेल या सरसों के तेल की 10-15 मिनट मालिश करें। इससे ब्लड सर्कुलेशन तुरंत बढ़ता है और नसों के अंतिम सिरों (Nerve endings) को सीधा पोषण मिलता है, जिससे सुन्नपन में भारी कमी आती है।

अश्वगंधा एक एडाप्टोजेन है जो कीमोथेरेपी के साइड-इफेक्ट्स (जैसे कमज़ोरी और स्ट्रेस) को कम करने में बहुत कारगर है। हालांकि, कैंसर के इतिहास को देखते हुए, इसे हमेशा अपने आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह और सही डोज़ के अनुसार ही लेना चाहिए।

शत-प्रतिशत। आंतों की गति (Peristalsis) भी नसों द्वारा ही नियंत्रित होती है। जब कीमोथेरेपी से नसें डैमेज होती हैं, तो आंतें सुस्त पड़ जाती हैं, जिससे भयंकर कब्ज़ होती है। इसके लिए त्रिफला का सेवन बहुत लाभकारी है।

हल्का और सौम्य व्यायाम (जैसे योगासन, हल्की स्ट्रेचिंग और टहलना) नसों में रक्त प्रवाह को बढ़ाता है और रिकवरी को तेज़ करता है। लेकिन भारी एक्सरसाइज़ से बचना चाहिए क्योंकि इससे थकावट (क्रोनिक फटीग) और ज़्यादा बढ़ सकती है।

अगर आपकी जठराग्नि (पाचन) मज़बूत है, तो हल्दी और केसर वाला दूध रात को पीना ओजस बढ़ाने के लिए बेहतरीन है। लेकिन अगर आपको कब्ज़ या गैस की समस्या है, तो पहले पेट को ठीक करें, क्योंकि अनपचा दूध आम (Toxins) बना सकता है।

यह एक खास आयुर्वेदिक थेरेपी है जिसमें औषधीय चावलों (षष्टिक शाली) को दूध और जड़ी-बूटियों के काढ़े में पकाकर पोटली बनाई जाती है। जब इस गर्म पोटली से मालिश होती है, तो यह सीधे कमज़ोर नसों और मांसपेशियों को भारी पोषण (Nutrition) देती है और डैमेज को रिपेयर करती है।

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