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फैटी लिवर और डायबिटीज का कनेक्शन कितना खतरनाक हो सकता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

शुगर कम करने वाली गोलियों और लिवर की दवाओं का इस्तेमाल फैटी लिवर और डायबिटीज जैसी बीमारियों में काफी आम है। ये दवाएँ कुछ समय के लिए ब्लड शुगर को नियंत्रित कर देती हैं या लिवर की सूजन को फौरी तौर पर कम कर देती हैं, जिससे मरीज़ को लगता है कि वह पूरी तरह ठीक हो गया है और उसकी परेशानी खत्म हो गई है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि मरीज़ को दवा छोड़ने के तुरंत बाद फिर से कमजोरी महसूस होने लगती है और ब्लड शुगर पहले से भी ज्यादा बढ़कर वापस आ जाता है। इसके कारण कई हो सकते हैं जैसे लगातार दवाओं पर शरीर की निर्भरता, इंसुलिन रेजिस्टेंस, बीमारी कितनी गंभीर है, या सबसे महत्वपूर्ण-पाचन तंत्र की खराबी और शरीर के अंदर जमा टॉक्सिन्स जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं। इस बात को समझना ज़रूरी है, ताकि वक्त रहते डॉक्टर से सलाह ली जा सके और लिवर तथा पैंक्रियाज की सेहत बनी रहे।

फैटी लिवर और डायबिटीज क्या है?

फैटी लिवर और डायबिटीज एक ऐसी स्थिति है, जहाँ हमारा मेटाबॉलिज्म पूरी तरह बिगड़ जाता है। जब लिवर में अतिरिक्त चर्बी जमा होने लगती है (फैटी लिवर), तो वह इंसुलिन हार्मोन पर ठीक से प्रतिक्रिया करना बंद कर देता है। इसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहते हैं। आमतौर पर लोग इसका शिकार गलत खानपान, जंक फूड, बहुत ज्यादा मीठा खाने, या शारीरिक मेहनत न करने के कारण होते हैं। जब लिवर कमजोर पड़ता है, तो वह खून में मौजूद शुगर को ऊर्जा में नहीं बदल पाता, जिससे शुगर लेवल तेजी से बढ़ने लगता है। अंग्रेजी दवाएँ खाने पर कुछ समय के लिए आराम मिल जाता है, लेकिन ये दवाएँ सिर्फ लक्षणों को दबाती हैं, शरीर के अंदर मौजूद उस खराब माहौल को ठीक नहीं करतीं जिसमें यह मेटाबॉलिक बीमारी बार-बार पनपती है। दवा को बिना डॉक्टर की सलाह के लगातार इस्तेमाल करना किडनी और हृदय पर बुरा असर डालता है।

फैटी लिवर और डायबिटीज की बीमारियाँ कितने प्रकार की होती हैं?

मेटाबॉलिज्म की तकलीफ से जुड़ी आधुनिक चिकित्सा में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ देखी जाती हैं

  • नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर (NAFLD) यह सबसे आम है। यह बिना शराब पिए लिवर में चर्बी जमा होने से उभरता है।
  • नॉन-अल्कोहलिक स्टीटोहेपेटाइटिस (NASH) यह फैटी लिवर का बिगड़ा हुआ रूप है, जहाँ लिवर में सूजन आ जाती है और कोशिकाएँ कटने-फटने लगती हैं।
  • टाइप 2 डायबिटीज यह जीवनशैली से जुड़ी बीमारी है जहाँ शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या उसका सही इस्तेमाल नहीं कर पाता।
  • प्री-डायबिटीज यह वह स्थिति है जब ब्लड शुगर सामान्य से ज्यादा होता है, लेकिन इतना नहीं कि उसे डायबिटीज कहा जाए।
  • सिरोसिस यह लिवर के लंबे समय तक खराब रहने के कारण होता है, जो अक्सर जानलेवा हो सकता है।

फैटी लिवर और डायबिटीज के लक्षण और संकेत

बार-बार शुगर का बढ़ना या लगातार थकान कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसके मुख्य लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं

  • लगातार थकान और कमजोरी विशेषकर खाना खाने के बाद या रात के समय असहनीय सुस्ती आना।
  • वज़न बढ़ना पेट के आसपास चर्बी जमा होना और लाख कोशिशों के बाद भी वज़न कम न होना।
  • बार-बार पेशाब आना और प्यास लगना खून में शुगर बढ़ने से गुर्दों पर दबाव पड़ना।
  • त्वचा का रंग बदलना गर्दन या अंडरआर्म्स के आसपास की त्वचा का काला या मोटा पड़ जाना
  • दवा का असर खत्म होते ही वापसी गोलियाँ बंद करते ही कुछ ही दिनों के भीतर शुगर का फिर से खतरनाक स्तर पर पहुँच जाना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

बार-बार शुगर बढ़ने और फैटी लिवर के मुख्य कारण क्या हैं?

लिवर खराब होने और शुगर बढ़ने के पीछे सिर्फ मीठा खाना नहीं, बल्कि कई अंदरूनी कारण हो सकते हैं। मुख्य कारण इस प्रकार हैं

  • पाचन की अशुद्धि गलत खान-पान जैसे मैदा, जंक फूड या भारी भोजन से शरीर में टॉक्सिन्स (आम) बनते हैं। यह गंदगी पाचन को दूषित कर देती है और बीमारियों को पनपने के लिए अनुकूल माहौल प्रदान करती है।
  • इंसुलिन रेजिस्टेंस जब लिवर और कोशिकाएँ इंसुलिन को पहचानने से इनकार कर देती हैं, तो खून में शुगर तैरता रहता है।
  • गोलियों पर निर्भरता तुरंत राहत के लिए लंबे समय तक भारी दवाएँ खाने से शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता नष्ट हो जाती है।
  • मोटापा और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल खून में ज्यादा कोलेस्ट्रॉल और फैट लिवर के लिए सबसे बड़ा खतरा होता है।
  • खराब जीवनशैली दिन भर बैठे रहना, शारीरिक मेहनत न करना और देर रात तक जागना।

इसके जोखिम और जटिलताएँ क्या हैं?

फैटी लिवर और डायबिटीज को अगर अनदेखा किया जाए या सही समय पर इलाज न मिले, तो यह कई जटिलताओं का कारण बन सकता है। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं

  • हृदय रोग का खतरा यह नसों में ब्लॉकेज पैदा कर सकता है, जिससे हार्ट अटैक का जोखिम तेजी से बढ़ता है।
  • किडनी फेलियर (नेफ्रोपैथी) लगातार बढ़ा हुआ ब्लड शुगर किडनी के फिल्टर करने की क्षमता को नष्ट कर देता है।
  • लिवर सिरोसिस लंबे समय तक फैटी लिवर रहने से लिवर सिकुड़ जाता है और काम करना बंद कर देता है।
  • मानसिक तनाव और चिंता जीवन भर की बीमारी के डर से डिप्रेशन और नींद की समस्या हो सकती है।
  • नसों का डैमेज (न्यूरोपैथी) पैरों और हाथों में सुन्नपन या झुनझुनी होना, जो आगे चलकर गंभीर घाव में बदल सकता है।

समय पर डॉक्टर से परामर्श और उचित इलाज लेने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण क्या है?

आयुर्वेद के हिसाब से फैटी लिवर और डायबिटीज सिर्फ ब्लड शुगर की दिक्कत नहीं है। यहाँ यह माना जाता है कि जब शरीर में कफ और पित्त दोष बिगड़ जाते हैं तथा जठराग्नि (पाचन अग्नि) कमज़ोर हो जाती है, तब ऐसी परेशानी आती है। डॉक्टर नाड़ी, जीभ और पेट की स्थिति देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं। वे ढूँढते हैं कि कहीं शरीर में टॉक्सिन्स (आम) तो नहीं जमा हो गए हैं, जिसने मेद धातु (फैट टिश्यू) को पूरी तरह दूषित कर दिया है। जब तक यह दूषित वसा शरीर में जमा रहेगी, इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या हमेशा बनी रहेगी। आयुर्वेद में बस लक्षण मिटाना और गोलियाँ बढ़ाना मकसद नहीं है, वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, मेटाबॉलिज्म की शुद्धि हो और लिवर प्राकृतिक रूप से स्वस्थ बने।

फैटी लिवर और डायबिटीज के लिए महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में लिवर को स्वस्थ बनाने और ब्लड शुगर को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने के लिए ये जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं

  • कुटकी यह प्रकृति का सबसे बेहतरीन लिवर टॉनिक है। इसका कड़वा स्वाद फैट को गलाता है और लिवर की सूजन को मिटाता है।
  • गिलोय आयुर्वेद में इसे बहुत शक्तिशाली माना गया है। यह शरीर की इम्युनिटी बढ़ाती है और ब्लड शुगर को प्राकृतिक रूप से कम करती है।
  • भूमि आंवला लिवर रोगों के लिए यह बहुत ताकतवर है। यह गहराई में जाकर लिवर सेल्स को नया जीवन देती है और डैमेज को खत्म करती है।
  • करेला और जामुन यह खून से शुगर को कम करने और पैंक्रियाज को ताकत देने का एक बहुत ही लाभकारी उपाय है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म शरीर की अंदरूनी सफाई

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, दूषित फैट और दोषों को बाहर निकालकर संपूर्ण स्वास्थ्य पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया

  • गहरी सफाई और मेटाबॉलिक शुद्धि जब फैटी लिवर सालों पुराना हो और किसी दवा से ठीक न हो रहा हो, तो जीवा आयुर्वेद में 'विरेचन' और 'बस्ती' जैसी पंचकर्म चिकित्सा की जाती है।
  • इलाज का समय यह 7 से 15 दिनों तक चलने वाली शरीर के अंदरूनी अंगों और पेट की गहरी सफाई की प्राकृतिक प्रक्रिया है।
  • टॉक्सिन्स बाहर निकालना विरेचन प्रक्रिया में मरीज़ को औषधीय घी पिलाकर विशेष जड़ी-बूटियों के माध्यम से मल त्याग कराया जाता है। इससे लिवर और आंतों में जमा पुरानी गंदगी बाहर निकल जाती है।
  • आंतरिक राहत अंदरूनी सफाई के साथ पेट के अंगों की मालिश और भाप दी जाती है। इससे शरीर का भारीपन दूर होता है और इंसुलिन रेजिस्टेंस जड़ से खत्म होने लगता है।

फैटी लिवर और शुगर के मरीजों के लिए सही खान-पान

अगर किसी को फैटी लिवर या शुगर की परेशानी है, तो उन्हें अपने खाने-पीने का बहुत ख्याल रखना पड़ता है। आयुर्वेद कहता है कि अगर आप हल्का और आसानी से पचने वाला खाना खाएंगे, तो आप जल्दी ठीक होंगे। 

क्या खाएँ?

  • कड़वी और हल्की सब्जियाँ करेला, परवल, लौकी और हरी सब्जियां खूब खाएं। कड़वी चीजें लिवर को अंदर से साफ रखने में मदद करती हैं। 
  • पुराना अनाज और मूंग दाल जौ, रागी और छिलके वाली हरी मूंग की दाल खाएं। ये चीजें पचने में आसान होती हैं और पेट को हल्का रखती हैं। 
  • मेथी और दालचीनी का प्रयोग सुबह खाली पेट मेथी का पानी पिएं और खाने में दालचीनी का इस्तेमाल करें। ये शुगर को कंट्रोल में रखने में बहुत काम आते हैं। 

क्या न खाएँ?

  • मीठा और प्रोसेस्ड फूड चीनी, मिठाई, डिब्बाबंद जूस और मैदे से बनी चीजें बिल्कुल बंद कर दें। ये लिवर और शुगर दोनों के लिए बहुत नुकसानदेह हैं। 
  • विरुद्ध आहार दूध के साथ नमकीन चीज़ें या बेमेल भोजन कभी न खाएँ, यह पाचन को सबसे ज्यादा दूषित करता है।
  • तला-भुना और भारी भोजन पूरी, पराठे, जंक फूड और ज्यादा तेल वाली चीज़ें लिवर पर बोझ डालती हैं और चर्बी बढ़ाती हैं।

ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में मेटाबॉलिक रोगों का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है, इसलिए ठीक होने का समय मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करता है

  • बीमारी और शरीर की स्थिति ठीक होने का वक्त कई बातों से तय होता है जैसे शुगर कितनी पुरानी है, इंसुलिन रेजिस्टेंस कितना ज्यादा है, और मरीज़ का लिवर कितना कमज़ोर है।
  • हल्की समस्या में सुधार अगर फैटी लिवर नया है और शुगर अभी बॉर्डरलाइन पर है, तो आमतौर पर 1 से 2 महीनों में ही आपका शरीर हल्का होने लगता है और रिपोर्ट्स सुधर जाती हैं।
  • पुरानी बीमारी का समय अगर डायबिटीज बहुत पुरानी है और दवाइयों की डोज़ काफी ज्यादा है, तो लिवर को पूरी तरह ठीक होने और दवाइयाँ कम होने में 3 से 6 महीने या उससे ज्यादा भी लग सकते हैं।
  • उपचार का तरीका इस प्राकृतिक इलाज में मुख्य रूप से पाचन सुधारने वाली जड़ी-बूटियाँ, सही खानपान और योग शामिल होता है।
  • स्थायी परिणाम मरीज़ अगर अपनी डाइट और लाइफस्टाइल का कड़ाई से पालन करता है, तो पाचन दुरुस्त हो जाता है और भविष्य में बीमारी के वापस लौटने की संभावना खत्म हो जाती है।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मुझे लिवर में बहुत परेशानी थी, जिसकी वजह से पेट में काफी दर्द रहता था। साथ ही, मुझे भूख न लगने की भी समस्या थी, जिसके कारण मैं ठीक से खा-पी भी नहीं पा रही थी। जब मैंने अल्ट्रासाउंड करवाया, तो पता चला कि मेरे लिवर का साइज काफी बढ़ा हुआ है। इस समस्या के लिए मैंने जीवा आयुर्वेद से अपना इलाज शुरू किया।जीवा की दवाओं और डॉक्टरों के मार्गदर्शन के बाद, अब मैं बहुत बेहतर महसूस कर रही हूँ। मेरा पेट दर्द और गैस की समस्या पूरी तरह ठीक हो गई है। हाल ही में कराए गए अल्ट्रासाउंड में मेरे लिवर का साइज भी अब बिल्कुल नॉर्मल आया है।"मैं अब 100% ठीक महसूस कर रही हूँ और बहुत खुश हूँ। इसके लिए मैं जीवा आयुर्वेद की टीम को बहुत धन्यवाद देना चाहती हूँ।     

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

इस बीमारी में आधुनिक और आयुर्वेदिक इलाज का नज़रिया बिल्कुल अलग है

तुलना का आधार आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक चिकित्सा
उपचार का दृष्टिकोण लक्षणों (ब्लड शुगर) को नियंत्रित करना बीमारी की जड़ पर काम करना
कार्य करने का तरीका दवाओं से ब्लड शुगर को तुरंत कम करना शरीर को अंदर से संतुलित कर शुगर मेटाबॉलिज़्म सुधारना
मूल कारण पर प्रभाव लिवर की कमज़ोरी और इंसुलिन रेजिस्टेंस को ठीक नहीं करता कफ दोष और दूषित पाचन को संतुलित करता है
उपचार विधियाँ शुगर कंट्रोल दवाइयाँ जड़ी-बूटियाँ और संतुलित आहार
दुष्प्रभाव दवा छोड़ते ही शुगर बढ़ना, किडनी पर असर सामान्यतः सुरक्षित, प्राकृतिक सुधार
परिणाम अस्थायी नियंत्रण इंसुलिन रेजिस्टेंस में सुधार, स्थायी लाभ
समय जल्दी असर थोड़ा समय लगता है, लेकिन दीर्घकालिक लाभ

डॉक्टर की सलाह कब लेनी चाहिए?

फैटी लिवर और डायबिटीज होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि

  • ब्लड शुगर का स्तर अचानक बहुत ज्यादा बढ़ या घट जाए।
  • लगातार पेट के दाहिने हिस्से के ऊपरी भाग में दर्द बना रहे।
  • पैरों में भारी सूजन आ जाए या कोई घाव लंबे समय तक न भरे।
  • आँखों की रोशनी में धुंधलापन महसूस होने लगे।
  • घरेलू उपचार या परहेज करने के बाद भी वज़न और शुगर दोनों बढ़ते ही जा रहे हों।

समय पर सलाह लेने से रोग का सही निदान होता है और अंगों को स्थायी रूप से खराब होने से बचाया जा सकता है।

निष्कर्ष

आयुर्वेद के हिसाब से फैटी लिवर और डायबिटीज का कनेक्शन मुख्य रूप से कफ दोष के बिगड़ने तथा जठराग्नि के कमज़ोर होने से जुड़ा होता है। गलत खान-पान, बैठे रहने वाली जीवनशैली और कमज़ोर पाचन से शरीर में टॉक्सिन्स (आम) बनते हैं जो लिवर को कमज़ोर कर देते हैं। यही कमज़ोर लिवर इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता, जिससे शुगर बढ़ती है। सिर्फ बाहरी गोलियाँ खाने से शुगर छिप जाती है लेकिन बीमारी मरती नहीं है। इलाज में पाचन की शुद्धि और लिवर को ताकत देना सबसे ज्यादा आवश्यक है। इसमें कफ को संतुलित करना, हल्का खाना खाना, कुटकी-गिलोय जैसी जड़ी-बूटियाँ इस्तेमाल करना और शारीरिक मेहनत वाली दिनचर्या अपनाना शामिल है जिससे बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सके।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

हाँ, अगर पाचन और लिवर शुद्धि के लिए सही आयुर्वेदिक औषधियाँ खाई जाएँ और डाइट का कड़ाई से पालन किया जाए, तो इसे रिवर्स किया जा सकता है।

नहीं, गोली सिर्फ खून से शुगर के स्तर को कम करती है। अंदरूनी तौर पर लिवर और पैंक्रियाज को ताकत दिए बिना यह बीमारी बनी रहती है।

हाँ, नया और पॉलिश किया हुआ सफेद चावल शरीर में तेजी से शुगर और फैट बढ़ाता है। आयुर्वेद में पुराना अनाज खाने की सलाह दी जाती है।

हाँ, कुटकी सबसे अच्छी प्राकृतिक जड़ी-बूटी है जो लिवर की सूजन कम करती है और जमे हुए फैट को पिघलाती है।

हाँ, मैदे और केमिकल वाले जंक फूड लिवर का प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ देते हैं जिससे शरीर में टॉक्सिन्स और चर्बी तेजी से बढ़ती है।

हाँ, आयुर्वेद के अनुसार रात में देर तक जागने से शरीर का वात और पित्त बिगड़ता है, जो लिवर की प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया को रोक देता है।

बिल्कुल, शारीरिक मेहनत न करने से शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ जाता है जो फैट और शुगर जमा होने के लिए अनुकूल माहौल देता है।

हाँ, मेथी दाना पाचन तंत्र को ठीक करता है और शरीर में इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाकर शुगर को कम करता है।

हाँ, लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड शुगर गुर्दों की नसों पर भारी दबाव डालता है, जिससे किडनी फेलियर का खतरा बढ़ जाता है।

हाँ, पेट साफ न होने और कब्ज से शरीर में गंदगी जमा होती है, जो लिवर के काम को भारी कर देती है और मेटाबॉलिज्म बिगाड़ देती है।

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