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इंसुलिन शुरू करने के बाद वज़न क्यों बढ़ता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

अक्सर लोग जब पहली बार इंसुलिन लेना शुरू करते हैं, तो उन्हें एक नई दिक्कत झेलनी पड़ती है वज़न का बढ़ना। शुरू में तो लगता है कि शायद शरीर दवा के हिसाब से खुद को ढाल रहा है, लेकिन धीरे-धीरे जब कपड़े टाइट होने लगते हैं और शरीर भारी-भारी सा लगने लगता है, तो टेंशन होने लगती है। मन में आता है कि कहीं इलाज ही तो बीमारी नहीं बढ़ा रहा है?

आयुर्वेद के नज़रिए से समझें तो, बाहर से लिया गया इंसुलिन शरीर में 'कफ' और 'मेद' (चर्बी) को बढ़ाता है। इंसुलिन खून की शुगर को खींचकर शरीर में इकट्ठा करने लगता है। अब अगर आपका पाचन (अग्नि) सुस्त है, तो यह शुगर ताक़त देने के बजाय शरीर में फालतू चर्बी और भारीपन बनकर जमा होने लगती है।

इंसुलिन असल में है क्या और शरीर में इसका क्या काम है?

इंसुलिन हमारे शरीर की एक 'चाबी' की तरह है, जिसे हमारा ही एक अंग (पैनक्रियाज) बनाता है। इसका सीधा सा काम है खून में बह रही शुगर (ग्लूकोज) को शरीर की कोशिकाओं (सेल्स) के अंदर पहुँचाना, ताकि हमें काम करने की ताक़त मिल सके। जब तक यह चाबी सही से काम करती है, शरीर चुस्त रहता है और शुगर लेवल भी कंट्रोल में रहता है।

लेकिन जब शरीर अपना खुद का इंसुलिन नहीं बना पाता या उसका इस्तेमाल नहीं कर पाता, तब बाहर से इंसुलिन लेना मजबूरी बन जाती है। यह बाहरी इंसुलिन शरीर के ठप पड़े सिस्टम को दोबारा चालू करता है और बाकी अंगों को खराब होने से बचाता है।

इंसुलिन लेने के बाद आखिर वज़न क्यों बढ़ने लगता है?

इसके पीछे शरीर की कुछ बहुत ही बेसिक साइंस और हमारी अपनी आदतें काम करती हैं:

  • शुगर का शरीर में रुकना: इंसुलिन लेने से पहले, आपके खून की शुगर यूरिन (पेशाब) के रास्ते बाहर निकल जाती थी। लेकिन इंसुलिन आते ही उस शुगर को वापस कोशिकाओं में धकेल देता है। अब अगर आप कोई फिजिकल एक्टिविटी नहीं कर रहे हैं, तो यह शुगर इस्तेमाल होने के बजाय वज़न बढ़ाने लगती है।
  • भूख का तेज़ होना: इंसुलिन खून से शुगर को तेज़ी से कम करता है। इस चक्कर में कई बार शरीर को लगता है कि उसे तुरंत एनर्जी की ज़रूरत है, जिससे आपको अचानक बहुत ज़ोरों की भूख लगने लगती है। ज़्यादा खाएंगे, तो ज़ाहिर है वज़न भी बढ़ेगा।
  • शुगर लो होने का डर (Hypoglycemia): कई बार लोग इस डर से भी बार-बार कुछ न कुछ खाते रहते हैं कि कहीं उनकी शुगर अचानक से बहुत नीचे न गिर जाए। इसी 'एक्स्ट्रा' खाने की आदत की वजह से धीरे-धीरे शरीर में चर्बी जमा होने लगती है।
  • फैट जमा करने का सिग्नल: इंसुलिन का तो काम ही है एनर्जी को बचाकर रखना। जब आप इंसुलिन लेते हैं, तो यह शरीर को सिग्नल देता है कि पुरानी चर्बी को मत जलाओ, बल्कि आगे के लिए और चर्बी जमा करके रखो। इसी वजह से वज़न घटाना बहुत मुश्किल हो जाता है।

क्या वज़न बढ़ना हमेशा खतरे की घंटी है?

इंसुलिन लेने पर वज़न बढ़ने से लोग तुरंत घबरा जाते हैं, लेकिन हर बार यह नुकसानदेह नहीं होता:

  • अच्छी रिकवरी का इशारा: अगर बीमारी के दौरान आपका बहुत ज़्यादा वज़न गिर गया था और शरीर सूखने लगा था, तो इंसुलिन शुरू करने के बाद उस खोए हुए वज़न का वापस आना एक अच्छा संकेत है। इसका मतलब है कि शरीर को वापस पोषण मिल रहा है और वो अंदर से ठीक हो रहा है।
  • गलत संकेत कब है: अगर वज़न बहुत तेज़ी से भाग रहा है और चर्बी सिर्फ आपके पेट या कमर के आस-पास ही जमा हो रही है, तो यह गलत है। यह साफ बताता है कि आपका मेटाबॉलिज़्म बहुत सुस्त पड़ा है और इंसुलिन से मिली एनर्जी काम आने के बजाय सिर्फ मोटापे में बदल रही है।

इंसुलिन और हमारे मेटाबॉलिज़्म का आपस में क्या कनेक्शन है?

इंसुलिन सिर्फ शुगर कम करने वाली दवा नहीं है। यह आपके शरीर की पूरी मशीनरी (मेटाबॉलिज़्म) का बॉस है:

  • स्टोरेज मोड चालू होना: इंसुलिन का काम ही है खाने को एनर्जी बनाकर स्टोर करना। जब आप इसे बाहर से लेते हैं, तो शरीर तुरंत "स्टोरेज मोड" में चला जाता है। मतलब, वो एनर्जी खर्च करने के बजाय उसे चर्बी के तौर पर जमा करने को अपनी पहली ड्यूटी मान लेता है।
  • फैट बर्निंग पर ब्रेक: जब तक शरीर में इंसुलिन का लेवल हाई रहता है, शरीर अपनी पुरानी चर्बी को गलाना बिल्कुल बंद कर देता है। इंसुलिन शरीर को बताता है कि हमारे पास पहले से बहुत शुगर है, इसलिए पुरानी चर्बी को खर्च करने की कोई ज़रूरत नहीं है।

लक्षण जो बताते हैं कि वज़न बढ़ना असंतुलन है?

जब इंसुलिन शुरू करने के बाद वजन बढ़ता है, तो यह पहचानना बहुत ज़रूरी है कि यह शरीर की रिकवरी है या सेहत का बिगड़ता हुआ संतुलन।

  • लगातार भारीपन: सुबह सोकर उठने के बाद भी शरीर में हल्कापन महसूस न होना और हाथ-पैरों में भारीपन लगना।
  • अत्यधिक सुस्ती और थकान: पर्याप्त नींद लेने के बावजूद दिन भर आलस बना रहना और छोटी-मोटी शारीरिक मेहनत के बाद भी बुरी तरह थक जाना।
  • पेट के आसपास चर्बी बढ़ना: वजन का समान रूप से न बढ़कर केवल पेट (Midsection) के आसपास जमा होना, जो धीमे मेटाबॉलिज्म और बढ़ते हुए 'आम' (टॉक्सिन्स) का संकेत है।
  • भूख का असामान्य बढ़ना: भोजन के तुरंत बाद फिर से कुछ मीठा या भारी खाने की तीव्र इच्छा होना।
  • जोड़ों में जकड़न: वजन बढ़ने के साथ-साथ घुटनों या टखनों में हल्का दर्द या जकड़न महसूस होना।

इंसुलिन थेरेपी कब और क्यों दी जाती है?

इंसुलिन थेरेपी का निर्णय तब लिया जाता है जब शरीर की अपनी शुगर नियंत्रण प्रणाली पूरी तरह काम करना बंद कर देती है। इसे निम्नलिखित स्थितियों में दिया जाता है: 

  • प्राकृतिक विकल्प की कमी: जब पैनक्रियाज (अग्न्याशय) इंसुलिन बनाना बिल्कुल बंद कर देता है (टाइप-1 डायबिटीज) या बहुत कम बनाता है, तो जीवित रहने और ऊर्जा के लिए बाहरी इंसुलिन अनिवार्य हो जाता है।
  • दवाइयों की सीमा: कई बार सही खान-पान और गोलियों के बावजूद ब्लड शुगर का स्तर बहुत अधिक बना रहता है। ऐसी स्थिति में अंगों (जैसे कि किडनी और आँखें) को सुरक्षित रखने के लिए इंसुलिन का सहारा लिया जाता है।
  • तुरंत राहत: जब शुगर लेवल खतरनाक स्तर तक पहुँच जाता है, तब इंसुलिन शरीर को तुरंत संतुलन में लाने का सबसे तेज़ और प्रभावी तरीका है।

आयुर्वेद की नज़र में: कफ, पाचन और चर्बी का बिगड़ता तालमेल

आयुर्वेद मानता है कि इंसुलिन लेने के बाद वज़न का बढ़ना सिर्फ हार्मोन का कोई मामूली बदलाव नहीं है। यह असल में आपके शरीर के 'कफ', कमज़ोर पाचन (अग्नि) और चर्बी (मेद धातु) के बीच बिगड़े हुए बैलेंस का नतीजा है।

होता ये है कि जब आपके पेट की आग (मेटाबॉलिज़्म) सुस्त पड़ जाती है, तो शरीर आपके खाने और इंसुलिन से मिलने वाले पोषण को पूरी तरह से ताक़त में नहीं बदल पाता। इसकी वजह से शरीर के अंदर 'आम' (टॉक्सिन्स) इकट्ठा होने लगता है। यह टॉक्सिन्स आपके पूरे सिस्टम को और भी धीमा कर देता है।

शरीर में कफ तेज़ी से बढ़ने लगता है, जिससे आपको हर वक्त भारीपन, सुस्ती और आलस महसूस होता है। यही सुस्ती शरीर में चर्बी को जमा करने का रास्ता खोल देती है। अगर आपका पाचन कमज़ोर है, तो इंसुलिन से मिलने वाली ताक़त शरीर में एनर्जी बनने के बजाय सिर्फ मोटापा बनकर जमा होने लगती है।

आयुर्वेदिक इलाज का तरीका

आयुर्वेद का टारगेट सिर्फ किसी भी तरह से आपका वज़न कम करना नहीं है। इसका असली काम आपकी उसी ठंडी पड़ चुकी 'अग्नि' (पाचन) को फिर से तेज़ करना है। इंसुलिन की वजह से जो मेटाबॉलिज़्म एकदम सुस्त हो गया है, आयुर्वेदिक इलाज शरीर को अंदर से इतना मजबूत कर देता है कि वो खून की शुगर को चर्बी बनाने के बजाय ताक़त (एनर्जी) में बदलने लगता है:

  • पाचन ठीक करना: इंसुलिन की वजह से शरीर में कफ बढ़ता है और पाचन बिल्कुल धीमा पड़ जाता है। इलाज में कुछ ऐसी देसी औषधियाँ दी जाती हैं, जो पेट की इसी बुझी हुई आग को फिर से जलाती हैं। 
  • कफ और चर्बी को बैलेंस करना: आपका ये जो वज़न बढ़ा है ना, वो असल में शरीर में भरा हुआ 'कफ' और चर्बी ही है। आयुर्वेद में ऐसे तरीके इस्तेमाल होते हैं जो शरीर के ब्लॉक हो चुके बारीक रास्तों को पूरी तरह खोल देते हैं।।
  • अंदरूनी गंदगी (Toxins) की सफाई: इंसुलिन लेने के साथ-साथ अगर आपका रूटीन भी दिन भर बस बैठे रहने का है, तो शरीर में 'आम' (एक तरह का कचरा) जमा होने लगता है। ये कचरा पूरे सिस्टम को जाम कर देता है। आयुर्वेदिक दवाइयां शरीर के अंदर से इसी गंदगी को धोकर साफ कर देती हैं, जिससे वज़न घटाना आपके लिए काफी आसान हो जाता है।
  • आपकी तासीर के हिसाब से डाइट: हर किसी के शरीर की बनावट और ज़रूरतें अलग होती हैं। इसलिए आयुर्वेद में आपकी बॉडी टाइप (वात, पित्त या कफ) को अच्छे से समझकर एक ऐसा सादा डाइट चार्ट और रूटीन सेट किया जाता है, जो इंसुलिन लेने के बाद भी आपके वज़न को किसी भी कीमत पर बढ़ने नहीं देता।

वज़न कंट्रोल करने वाली असरदार आयुर्वेदिक औषधियाँ

आयुर्वेद में वज़न घटाने का मतलब सिर्फ शरीर से चर्बी कम करना नहीं है। इसका असली फोकस आपके मेटाबॉलिज़्म को अंदर से ठीक करना है। इसके लिए ऐसी देसी औषधियाँ दी जाती हैं जो पेट की आग (अग्नि) को तेज़ करें, कफ को बैलेंस में लाएं और शरीर में जमे ज़हरीले कचरे ('आम') को बाहर निकाल फेंकें:

  • त्रिफला चूर्ण: यह पेट की एकदम बढ़िया सफाई करता है। इसे रोज़ लेने से आपका सुस्त मेटाबॉलिज़्म फिर से एक्टिव हो जाता है और वज़न धीरे-धीरे अपनी सही जगह पर आने लगता है।
  • गुग्गुलु: यह सीधे तौर पर आपके शरीर की ज़िद्दी चर्बी (मेद) पर वार करता है। 
  • मेथी दाना: यह भूख को कंट्रोल करने का नुस्खा है। यह ब्लड शुगर को भी बैलेंस रखता है, जिससे बिना बात के कुछ न कुछ खाने की तलब नहीं उठती।
  • करेला: यह शरीर में शुगर पचने के तरीके को सुधारता है और नई चर्बी को जमा होने से रोकता है। रोज़ाना इसका इस्तेमाल वज़न कंट्रोल करने में बहुत मदद करता है।

वज़न घटाने में मददगार आयुर्वेदिक थेरेपी

आयुर्वेद में मोटापा कम करना सिर्फ सही डाइट या गोलियां खाने तक सीमित नहीं है। शरीर में बरसों से जमे कफ, चर्बी और गंदगी को जड़ से मिटाने के लिए कुछ खास आयुर्वेदिक थेरेपी भी दी जाती हैं। ये थेरेपी आपके शरीर को एकदम हल्का और फुर्तीला बना देती हैं:

  • उद्वर्तन (सूखे हर्बल पाउडर की मालिश): इसमें कुछ खास जड़ी-बूटियों के चूर्ण से पूरे शरीर की सूखी मालिश की जाती है। यह स्किन के ठीक नीचे जमा फैट को तेज़ी से काटती है। इससे शरीर का भारीपन दूर होता है और आपकी बॉडी एकदम 'टोन' लगने लगती है।
  • स्वेदन (हर्बल भाप): मालिश के बाद शरीर को एक खास हर्बल भाप दी जाती है। इससे स्किन के सारे पोर्स खुल जाते हैं और शरीर की सारी अंदरूनी गंदगी पसीने के रास्ते बाहर आ जाती है। यह जकड़न और मोटापे को कम करने का बेहतरीन तरीका है।
  • बस्ती (आयुर्वेदिक एनिमा): इसे आयुर्वेद में अंदरूनी सफाई का सबसे बड़ा तरीका माना गया है। यह आंतों की पूरी तरह सफाई कर देती है। इससे वात और कफ बैलेंस होते हैं, हाज़मा सुधरता है और वज़न बड़ी आसानी से कंट्रोल होने लगता है।

वज़न नियंत्रण के लिए आहार योजना (डाइट चार्ट)

श्रेणी क्या खाएं (शामिल करें) क्या न खाएं (परहेज करें)
अनाज और दालें पुराने चावल, मूंग दाल, दलिया, ओट्स और रागी। मैदा, सफेद ब्रेड, नूडल्स और भारी उड़द की दाल।
सब्जियां लौकी, तोरई, कद्दू, परवल और मौसमी हरी सब्जियां। कच्ची सब्जियां (ज्यादा सलाद), फूलगोभी और भारी तली सब्जियां।
डेयरी और वसा शुद्ध A2 गाय का घी, गुनगुना दूध (हल्दी के साथ) और ताजा छाछ। ठंडा दूध, पनीर (रात में), और रिफाइंड तेल।
मसाले अदरक, हल्दी, जीरा, धनिया, सोंठ और अजवाइन। बहुत ज्यादा लाल मिर्च, गरम मसाला और अत्यधिक नमक।
पेय पदार्थ गुनगुना पानी, हर्बल टी और ताजे फलों का जूस (बिना चीनी)। कोल्ड ड्रिंक्स, ज्यादा चाय/कॉफी और शराब।
मीठा और स्नैक्स गुड़, खजूर, शहद और भुने हुए मखाने। सफेद चीनी, पेस्ट्री, चॉकलेट और डिब्बाबंद स्नैक्स।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम ध्रुव दत्ता है और मैं फरीदाबाद का रहने वाला हूँ। लगभग 6 महीने पहले मुझे डायबिटीज डायग्नोज हुई थी, जिससे मैं काफी चिंतित हो गया था। तभी मुझे डॉ. प्रताप चौहान के बारे में ऑनलाइन जानकारी मिली और मैंने जीवा आयुर्वेद से संपर्क किया। क्लिनिक विजिट के दौरान मेरी मुलाकात डॉ. जयश्री से हुई, जिन्होंने मुझे डायबिटीज मैनेजमेंट प्रोग्राम के बारे में बताया। इस प्रोग्राम में डाइट, योग, हेल्थ कोचिंग और नियमित मॉनिटरिंग शामिल थी। मैंने पूरी तरह से इसे फॉलो किया और सिर्फ 6 महीनों में मेरा HbA1c 10.6 से घटकर 6.2 हो गया। इस दौरान मेरा वजन भी लगभग 10 किलो कम हुआ और मैं पहले से ज्यादा स्वस्थ और एनर्जेटिक महसूस करता हूँ।

कब डॉक्टर से सलाह लें?

अगर इंसुलिन शुरू करने के बाद शरीर में तेज़ बदलाव दिखने लगें, खासकर वजन और शारीरिक असुविधा से जुड़े, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर विशेषज्ञ की सलाह लेने से स्थिति को सही तरीके से मैनेज किया जा सकता है।

  • इंसुलिन शुरू करने के बाद हर महीने 2-3 किलो से ज्यादा वजन बढ़ना
  • पेट के हिस्से में अचानक बहुत ज्यादा भारीपन महसूस होना
  • वजन बढ़ने के साथ घुटनों में दर्द शुरू होना
  • हल्की गतिविधि में भी सांस फूलना या थकान होना
  • सुबह उठते ही तलवों में जकड़न या अकड़न महसूस होना
  • शरीर में असामान्य सूजन या भारीपन बढ़ते जाना

निष्कर्ष

इंसुलिन के बाद बढ़ने वाला वज़न केवल 'एक्स्ट्रा फैट' नहीं है, बल्कि यह आपके मेटाबॉलिज्म का शरीर को दिया गया एक संदेश है। जहाँ मॉडर्न अप्रोच आपको डाइट और वर्कआउट के सख्त नियमों में बांधता है, वहीं आयुर्वेद आपकी 'अग्नि' और 'ओजस' को सुधारकर आपके शरीर को इस काबिल बनाता है कि वह इंसुलिन के साथ भी हल्का और फिट रह सके। सही आयुर्वेदिक दवाओं और संतुलित जीवनशैली से आप वज़न को बढ़ने से न केवल रोक सकते हैं, बल्कि उसे स्थायी रूप से घटा भी सकते हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

इंसुलिन की डोज़ को बिना डॉक्टर की सलाह के कम करना खतरनाक हो सकता है क्योंकि इससे शुगर अनियंत्रित हो जाएगी। वज़न घटाने के लिए डोज़ कम करने के बजाय मेटाबॉलिज्म को आयुर्वेदिक औषधियों और व्यायाम से सुधारना बेहतर विकल्प है।

कार्ब को पूरी तरह छोड़ना शरीर में कमजोरी पैदा कर सकता है। इसके बजाय रिफाइंड कार्ब जैसे सफेद चावल और मैदा छोड़कर जौ और चने जैसे जटिल कार्ब चुनें जो पचने में धीमे होते हैं और चर्बी नहीं जमा होने देते।

आयुर्वेद के अनुसार सूर्यास्त के बाद फल खाने से कफ दोष बढ़ता है और पाचन अग्नि मंद होती है। इससे इंसुलिन के कारण जमा होने वाली कैलोरी सीधे पेट के फैट में बदल सकती है, इसलिए फल केवल दिन में खाएं।

इंसुलिन लेने वालों के लिए भोजन के बाद 15 मिनट की सैर और सुबह 30 मिनट का तेज चलना सबसे प्रभावी है। यह शरीर की मांसपेशियों को ग्लूकोज का उपयोग करने के लिए सक्रिय करता है जिससे फैट स्टोरेज की प्रक्रिया धीमी हो जाती है।

 भोजन के दौरान बहुत अधिक ठंडा पानी पीना पाचन अग्नि को बुझा देता है। वज़न पर नियंत्रण पाने के लिए दिन भर थोड़ा-थोड़ा गुनगुना पानी पिएं क्योंकि यह शरीर के चैनल्स को साफ करता है और मेटाबॉलिज्म को तेज रखता है।

इंसुलिन के कारण शुगर लेवल में उतार-चढ़ाव होने से दिमाग को भूख के गलत संकेत मिलते हैं। इसे संतुलित करने के लिए भोजन में फाइबर और प्रोटीन की मात्रा बढ़ाएं ताकि पेट लंबे समय तक भरा रहे और बार-बार खाने की आदत छूटे।

शुरुआत में वज़न पेट और कमर के आसपास बढ़ता है क्योंकि यहाँ कफ और मेद धातु आसानी से जमा होते हैं। यदि इसे समय पर न रोका जाए तो यह पूरे शरीर में भारीपन और सूजन के रूप में दिखने लगता है।

हाँ, रात में देर तक जागने से वात और कफ दोष बिगड़ते हैं जिससे मेटाबॉलिज्म सुस्त हो जाता है। पर्याप्त नींद न लेने से शरीर में स्ट्रेस हार्मोन बढ़ते हैं जो इंसुलिन के असर को प्रभावित कर वज़न बढ़ाते हैं।

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