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आप gym जाते हो, body muscular है — पर क्या अंदर से भी उतने ही strong हो?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

आज की तेज रफ्तार और सोशल मीडिया के दिखावे वाली ज़िंदगी में, हर कोई बाहर से फिट और आकर्षक दिखना चाहता है। चौड़े कंधे, बाइसेप्स और सिक्स-पैक एब्स (Six-pack abs) आज के युवाओं के लिए फिटनेस का असली पैमाना बन गए हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बाहर से फौलादी दिखने वाला शरीर अंदर से किसी गंभीर बीमारी को पाल रहा हो सकता है? आज के समय में यह देखकर बहुत हैरानी होती है कि रोज़ाना जिम जाने वाले, भारी वज़न उठाने वाले और देखने में बिल्कुल फिट लगने वाले 25 से 35 वर्ष के युवा भी डायबिटीज़ (Diabetes) जैसी गंभीर मेटाबॉलिक बीमारी का शिकार हो रहे हैं।

यह वह उम्र है जब इंसान का मेटाबॉलिज़्म (Metabolism) सबसे तेज़ होना चाहिए, लेकिन गठीले शरीर वाले ये युवा जब अपना ब्लड टेस्ट कराते हैं, तो उनका ब्लड शुगर लेवल (Blood Sugar Level) और HbA1c खतरनाक स्तर पर पहुँचा हुआ मिलता है। आखिर ऐसा क्या हो गया है कि जिस फिटनेस को स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता था, वह अब युवाओं को अंदरूनी रूप से मधुमेह का रोगी बना रही है? इसका सबसे बड़ा कारण फिटनेस के नाम पर अपनाई जा रही हमारी अप्राकृतिक डाइट और खराब जीवनशैली है। इस विस्तृत ब्लॉग में हम गहराई से समझेंगे कि असली अंदरूनी ताकत क्या है, सिर्फ मस्कुलर (Muscular) दिखने की चाहत में युवा डायबिटीज़ का शिकार क्यों हो रहे हैं, और कैसे जीवा आयुर्वेद की मदद से आप बाहर के साथ-साथ अंदर से भी रोगमुक्त और मज़बूत बन सकते हैं।

असली अंदरूनी ताकत और डायबिटीज़ का भ्रम

हम अक्सर यह मान लेते हैं कि अगर किसी व्यक्ति के शरीर पर चर्बी (Fat) नहीं है और माँसपेशियाँ (Muscles) उभरी हुई हैं, तो उसे डायबिटीज़ जैसी बीमारी नहीं हो सकती। लेकिन आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों यह मानते हैं कि फिटनेस सिर्फ मांसपेशियों के आकार का नाम नहीं है। एक स्वस्थ शरीर वह है जिसके आंतरिक अंग—विशेषकर पैंक्रियाज़ (Pancreas), लिवर और पाचन तंत्र—सही से काम कर रहे हों।

जब आप जिम जाते हैं, तो आप अपनी माँसपेशियों को तो मज़बूत कर लेते हैं, लेकिन अगर आपके शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस (Insulin Resistance) पैदा हो गया है, आपका पाचन तंत्र भारी सप्लीमेंट्स को पचाने में संघर्ष कर रहा है, तो आपका शरीर असंतुलित हो जाता है। बाहर से शरीर भले ही फिट दिखे, लेकिन खून में लगातार बढ़ता हुआ ग्लूकोज़ (Glucose) आपके शरीर को अंदर से खोखला कर रहा होता है।

25 से 35 की उम्र: शरीर में होने वाले अहम बदलाव और फिटनेस की ग़लतियाँ

25 से 35 की उम्र पार करते ही हमारे शरीर की रिकवरी और इंसुलिन सेंसिटिविटी (Insulin Sensitivity) में प्राकृतिक बदलाव होने शुरू हो जाते हैं। अगर इस उम्र में सही और प्राकृतिक आहार का ध्यान न रखा जाए, और शरीर को अप्राकृतिक 'हेल्थ फूड्स' और स्टेरॉयड्स (Steroids) से भर दिया जाए, तो ये बदलाव बहुत तेज़ी से अंदरूनी कमज़ोरी और प्री-डायबिटीज़ (Pre-diabetes) का रूप ले लेते हैं। बाहर से शरीर गठीला दिखने के बावजूद, अंदर के अंग समय से पहले थकने लगते हैं और ब्लड शुगर अनियंत्रित होने लगता है।

गठीले शरीर वाले युवाओं में डायबिटीज़ के मामले बढ़ने के मुख्य कारण

कुछ दशक पहले तक डायबिटीज़ मुख्य रूप से 50 वर्ष से अधिक उम्र के उन लोगों में देखा जाता था जिनका वज़न बहुत ज़्यादा होता था या जो शारीरिक मेहनत नहीं करते थे। लेकिन आज जिम जाने वाले युवा इसका शिकार क्यों हो रहे हैं? इसकी सबसे बड़ी वजह हमारी आधुनिक फिटनेस जीवनशैली से जुड़ी कुछ भयंकर ग़लतियाँ हैं।

कृत्रिम सप्लीमेंट्स और छिपी हुई शक्कर (Hidden Sugars)

आजकल जिम जाने वाला एक सामान्य युवा दिन भर में व्हे प्रोटीन (Whey Protein), एनर्जी ड्रिंक्स (Energy Drinks), प्रोटीन बार (Protein Bars) और प्री-वर्कआउट (Pre-workout) जैसे न जाने कितने कृत्रिम उत्पाद लेता है। इनमें से ज़्यादातर उत्पादों के स्वाद को बेहतर बनाने के लिए उनमें भारी मात्रा में कृत्रिम मिठास (Artificial Sweeteners) और छिपी हुई शक्कर (Hidden sugars) डाली जाती है। लगातार इन चीज़ों के सेवन से शरीर में बार-बार इंसुलिन स्पाइक (Insulin Spike) होता है। धीरे-धीरे शरीर की कोशिकाएँ इंसुलिन के प्रति प्रतिक्रिया देना बंद कर देती हैं, जिसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है, और यही डायबिटीज़ की शुरुआत है।

पाचन अग्नि (जठराग्नि) का कमज़ोर होना: सेहत का सबसे बड़ा दुश्मन

आयुर्वेद में 'जठराग्नि' (पाचन तंत्र) को स्वास्थ्य का राजा माना गया है। फिटनेस के जुनून में युवा अक्सर हर दो-तीन घंटे में भारी मात्रा में खाने (Frequent high-protein meals) का नियम अपनाते हैं। पिछला खाना पचा नहीं होता और ऊपर से भारी प्रोटीन शेक या डाइट डाल दी जाती है। इस ओवरईटिंग (Overeating) से हमारी जठराग्नि बुझ जाती है। जब पाचन खराब हो जाता है, तो शरीर खाने को सही ऊर्जा में बदलने के बजाय 'आम' (टॉक्सिन्स/Toxins) बनाने लगता है। यह 'आम' शरीर के स्रोतों (Channels) को ब्लॉक कर देता है, जिससे इंसुलिन का प्रवाह बाधित होता है और ब्लड शुगर बढ़ने लगता है।

तनाव (Stress) और ब्लड शुगर का सीधा संबंध

यह सुनकर आपको हैरानी हो सकती है, लेकिन आपका मानसिक तनाव सीधे तौर पर आपके ब्लड शुगर लेवल से जुड़ा है। ऑफिस के काम का दबाव और साथ ही जिम में शरीर को उसकी क्षमता से ज़्यादा थकाना, आपके शरीर को 'फाइट या फ्लाइट' (Fight or Flight) मोड में धकेल देता है। इस अवस्था में शरीर भारी मात्रा में कोर्टिसोल (Cortisol) हॉर्मोन रिलीज़ करता है। कोर्टिसोल का मुख्य काम ही रक्त में तुरंत ग्लूकोज़ पहुँचाना है ताकि शरीर आपातकाल से लड़ सके। जब यह तनाव लगातार बना रहता है, तो ब्लड शुगर हमेशा बढ़ा रहता है, जो एक गठीले शरीर वाले युवा को भी डायबिटीज़ का मरीज़ बना देता है।

अत्यधिक कैफीन (Caffeine) और नींद की कमी

जिम में भारी वज़न उठाने के लिए युवा अक्सर प्री-वर्कआउट पाउडर लेते हैं, जिनमें भारी मात्रा में कैफीन होता है। यह कैफीन नर्वस सिस्टम को उत्तेजित करता है और नींद की गुणवत्ता को लगभग शून्य कर देता है। जब आपकी नींद पूरी नहीं होती है, तो शरीर का मेटाबॉलिज़्म बिगड़ जाता है और इंसुलिन का उत्पादन प्रभावित होता है। बिना सही रिकवरी (Recovery) के सिर्फ वर्कआउट करना शरीर को अंदर से बीमार बना रहा है।

आयुर्वेद डायबिटीज़ (प्रमेह) को कैसे समझता है?

आयुर्वेद में डायबिटीज़ को 'प्रमेह' या 'मधुमेह' कहा जाता है। आयुर्वेद इसे सिर्फ ब्लड शुगर के बढ़ने की बीमारी नहीं मानता, बल्कि यह 'कफ दोष' और 'वात दोष' के भयंकर असंतुलन और ओजस (Immunity/Vitality) के क्षय होने की एक बहुत ही गहरी मेटाबॉलिक समस्या है।

अत्यधिक अप्राकृतिक आहार, भारी प्रोटीन और तनाव शरीर में कफ और 'आम' को बढ़ाते हैं, जो पैंक्रियाज़ की कार्यक्षमता को धीमा कर देते हैं। दूसरी तरफ, अत्यधिक वर्कआउट और रूखा भोजन वात को भड़काता है, जो धातुओं (Tissues) को सुखा देता है। जब तक शरीर की जठराग्नि मज़बूत नहीं होगी और यह दोष शांत नहीं होगा, आप बाहर से कितने भी फिट दिखें, अंदर से डायबिटीज़ आपको खोखला करती रहेगी।

ब्लड शुगर को नियंत्रित करने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें पैंक्रियाज़ को सुरक्षित रखने और शुगर को ऊर्जा में बदलने के लिए बहुत ही जादुई और सुरक्षित जड़ी-बूटियाँ दी हैं, जो बिना किसी दुष्प्रभाव के अपना काम करती हैं।

  • गुड़मार (Madhunashini): इसका नाम ही 'मधु' (चीनी) का 'नाश' करने वाला है। यह जड़ी-बूटी शरीर में शक्कर की लालसा (Sugar cravings) को कम करती है और पैंक्रियाज़ को इंसुलिन बनाने के लिए उत्तेजित करती है।
  • करेला (Karela): इसमें पॉलीपेप्टाइड-पी (Polypeptide-p) नामक एक तत्व होता है, जो बिल्कुल प्राकृतिक इंसुलिन की तरह काम करता है और खून से अतिरिक्त ग्लूकोज़ को कोशिकाओं तक पहुँचाता है।
  • जामुन (Jamun): जामुन की गुठली का चूर्ण आयुर्वेद में मधुमेह के लिए अचूक माना जाता है। यह स्टार्च (Starch) को तेज़ी से शक्कर में बदलने से रोकता है।
  • गिलोय (Guduchi): यह सिर्फ इम्युनिटी ही नहीं बढ़ाती, बल्कि शरीर के हर अंग (खासकर लिवर) को डिटॉक्स (Detox) करती है, जिससे शरीर का ओवरऑल मेटाबॉलिज़्म सुधरता है।

डायबिटीज़ में आयुर्वेदिक थेरेपी (पंचकर्म) कैसे काम करती है?

जब शरीर अंदर से पूरी तरह 'आम' (टॉक्सिन्स) से भर जाए और इंसुलिन काम करना बंद कर दे, तो हमारी प्राचीन पंचकर्म थेरेपी सीधे आपके शरीर की गहराई में जाकर डिटॉक्सिफिकेशन का काम करती है।

  • उद्वर्तन (Udvartana): इसमें औषधीय जड़ी-बूटियों के सूखे चूर्ण (पाउडर) से पूरे शरीर पर उल्टी दिशा में मालिश की जाती है। यह जमे हुए कफ और टॉक्सिन्स को तोड़ता है और ब्लड सर्कुलेशन को तेज़ करके इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाता है।
  • बस्ती (Basti): यह पेट और आंतों को पूरी तरह साफ करने की सबसे शक्तिशाली थेरेपी है। यह शरीर से अतिरिक्त वात और कफ को बाहर निकालकर मेटाबॉलिज़्म को रीसेट (Reset) करती है।

मधुमेह-शामक (डायबिटीज़) डाइट प्लान

ब्लड शुगर को नियंत्रित करने और फिटनेस बनाए रखने के लिए सही आयुर्वेदिक आहार लेना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि आपका भोजन ही शरीर में या तो स्वास्थ्य बनाता है या रोग।

क्या खाएँ?

  • मोटे अनाज (Complex Carbs): सफेद चावल और मैदा के स्थान पर जौ (Barley), ज्वार, रागी और बाजरा का सेवन करें। ये रक्त में ग्लूकोज धीरे-धीरे छोड़ते हैं और शुगर को स्थिर रखते हैं।
  • प्राकृतिक प्रोटीन: कृत्रिम सप्लीमेंट्स के बजाय मूंग दाल, अंकुरित अनाज और भीगे हुए बादाम लें। प्यास लगने पर ताज़ा छाछ पिएँ, यह पाचन के लिए सर्वोत्तम है।
  • फाइबर युक्त सब्ज़ियाँ: पाचन को संतुलित करने के लिए लौकी, तरोई और हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ अधिक मात्रा में खाएँ। यह शुगर के अवशोषण (Absorption) को धीमा करती हैं।
  • हर्बल पेय: प्यास बुझाने के लिए गुनगुना पानी पिएँ जिसमें मेथी दाना या दालचीनी उबाली गई हो। यह जठराग्नि को तीव्र कर शुगर मेटाबॉलिज्म सुधारता है।

क्या न खाएँ?

  • प्रोसेस्ड और पैकेट बंद उत्पाद: बाज़ार के डिब्बाबंद भोजन और 'शुगर-फ्री' (Sugar-free) लेबल वाले उत्पादों से बचें, क्योंकि इनमें हानिकारक रसायन और प्रिजर्वेटिव्स होते हैं।
  • सफेद कार्बोहाइड्रेट: मैदा, सफेद चावल और रिफाइंड चीनी से बनी चीजों का पूरी तरह त्याग करें, क्योंकि ये तुरंत ब्लड शुगर बढ़ाते हैं।
  • मीठे और ठंडे पेय: कोल्ड ड्रिंक, एनर्जी ड्रिंक और पैकेट वाले फलों के रस (Juice) का सेवन वर्जित है। ये शरीर में कफ और भारीपन बढ़ाते हैं।
  • भारी भोजन: गरिष्ठ भोजन और देर रात को खाने से बचें। घर का बना, ताज़ा और हल्का भोजन ही प्राथमिकता होनी चाहिए।

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

आयुर्वेद कोई ऐसा केमिकल नहीं है जो एक दिन में शुगर लेवल को गिरा दे और आपकी किडनी को नुकसान पहुँचाए। आपके कमज़ोर हो चुके पैंक्रियाज़ और मेटाबॉलिज़्म को पूरी तरह रिसेट होने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: आपकी पाचन शक्ति मज़बूत होगी; शरीर से टॉक्सिन्स (आम) बाहर निकलेंगे। जिम के बाद होने वाली सुस्ती और भयंकर प्यास लगने के लक्षणों में कमी आने लगेगी।
  • 1 से 3 महीने तक: फास्टिंग (Fasting) और पीपी (PP) ब्लड शुगर लेवल धीरे-धीरे सामान्य होने लगेगा। बिना किसी कृत्रिम प्री-वर्कआउट के शरीर में एक प्राकृतिक ऊर्जा महसूस होगी।
  • 3 से 6 महीने तक: आपका मेटाबॉलिज़्म पूरी तरह से सही रास्ते पर आ जाएगा। आपकी कोशिकाएँ इंसुलिन के प्रति दोबारा संवेदनशील (Sensitive) हो जाएँगी और आपका HbA1c लेवल प्राकृतिक रूप से नियंत्रित हो जाएगा।

मरीज़ों के अनुभव

"मेरा नाम विक्रम है, मेरी उम्र 32 वर्ष है और मैं दिल्ली का रहने वाला हूँ। मैं फिटनेस को लेकर बहुत गंभीर था और रोज़ाना भारी वर्कआउट करता था। बाहर से मेरी बॉडी बहुत अच्छी थी, लेकिन कुछ महीनों से मुझे जिम में बहुत जल्दी थकान होने लगी थी, बहुत प्यास लगती थी और वज़न अचानक गिरने लगा था। जब मैंने टेस्ट कराया तो मेरा फास्टिंग शुगर 210 और HbA1c 8.5 निकला। मैं पूरी तरह टूट गया था कि इतनी फिटनेस के बाद भी मुझे डायबिटीज़ कैसे हो गई। मेरी नानी जी (Nani ji) ने मुझे सप्लीमेंट्स छोड़ने और जीवा आयुर्वेद जाने की सलाह दी।

जीवा के डॉक्टर ने मेरी नाड़ी जाँची और बताया कि भारी कृत्रिम डाइट और स्ट्रेस के कारण मेरा 'आम' और 'कफ' बहुत ज़्यादा बिगड़ गया है जिससे इंसुलिन रेजिस्टेंस हो गया है। उन्होंने मुझे विशेष दवाइयाँ और सही डाइट दी। थेरेपी और आयुर्वेदिक उपचार से मुझे जादुई लाभ मिला—3 महीने के अंदर मेरा शुगर लेवल बिल्कुल सामान्य हो गया। अब मैं प्राकृतिक डाइट लेकर जिम जाता हूँ और अंदर से भी उतना ही ताकतवर महसूस करता हूँ। मैं सभी युवाओं को जीवा में उपचार लेने की सलाह देता हूँ।"

विक्रम (दिल्ली)

आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

डायबिटीज़ जैसी बीमारी में हम अक्सर जल्दबाज़ी में गलत कदम उठाते हैं। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि आप अपने शरीर के साथ कैसा बर्ताव कर रहे हैं, क्योंकि सिर्फ दवा खाकर शुगर दबाने और आयुर्वेद की गहराई को अपनाने में बहुत बड़ा अंतर है।

तुलना आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक चिकित्सा
लक्ष्य ब्लड शुगर को दवाओं से कंट्रोल करना बीमारी के मूल कारण को ठीक करना
तरीका ग्लूकोज़ को तुरंत कम करना अग्नि सुधारकर और पैंक्रियाज़ को मजबूत करना
डाइट रोल सीमित महत्व डाइट और दिनचर्या मुख्य आधार
असर दवा तक सीमित अंदर से स्थायी सुधार
परिणाम निर्भरता और अस्थायी राहत प्राकृतिक संतुलन और दीर्घकालिक लाभ

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए? 

डायबिटीज़ के हर लक्षण को सिर्फ जिम की थकान समझकर नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। कई बार यह शरीर का एक बहुत ही गंभीर संकेत होता है। अगर आपको शरीर में ये गंभीर संकेत दिखें, तो बिना देरी किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना बहुत ज़रूरी है:

  • अगर आपका ब्लड शुगर लेवल फास्टिंग में 250 mg/dL या उससे ऊपर लगातार बना रहे।
  • अगर आपको बहुत ज़्यादा प्यास लगे और बार-बार (खासकर रात में) पेशाब जाने की ज़रूरत पड़े (Polyuria)।
  • अगर जिम जाने के बावजूद और अच्छी डाइट लेने के बावजूद आपका वज़न तेज़ी से और बिना किसी कारण के गिरने लगे।
  • अगर आपको अचानक आँखों के आगे धुंधलापन (Blurred Vision) महसूस होने लगे।
  • अगर आपके शरीर पर कोई चोट या घाव लगे (जैसे जिम में खरोंच आना) और वह कई दिनों तक न भरे।
  • अगर आपको पैरों की उँगलियों में लगातार सुन्नपन (Numbness) या चींटियाँ चलने जैसा एहसास हो।

निष्कर्ष

25-35 की उम्र में शरीर गठीला होने के बावजूद डायबिटीज़ जैसी मेटाबॉलिक बीमारी का होना इस बात का सीधा संकेत है कि आपकी अप्राकृतिक फिटनेस जीवनशैली आपके असली स्वास्थ्य पर बहुत भारी पड़ रही है। कृत्रिम सप्लीमेंट्स, छिपी हुई शक्कर, क्षमता से ज़्यादा तनाव और खराब पाचन ने आपके शरीर के 'ओजस' और पैंक्रियाज़ को एक गंभीर खतरे में डाल दिया है। बाहर से अच्छी दिखने वाली बॉडी कुछ समय के लिए आत्मविश्वास ज़रूर दे सकती है, लेकिन वह अंदर से खोखले हो रहे सिस्टम को ठीक नहीं कर सकती। आयुर्वेद आपको इस दिखावे की फिटनेस से बाहर निकालकर एक स्थायी, सुरक्षित और प्राकृतिक ताकत का समाधान देता है। सही आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों, पंचकर्म थेरेपी, और सही आहार अपनाकर आप डायबिटीज़ को न केवल मात दे सकते हैं, बल्कि भविष्य में होने वाली गंभीर जटिलताओं से भी खुद को बचा सकते हैं। अपने शरीर के असली संकेतों को सुनें, और जीवा आयुर्वेद के साथ अपनी ज़िंदगी को अंदर से रोगमुक्त बनाएँ।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

जी हाँ, बिल्कुल हो सकती है। अगर आप कृत्रिम सप्लीमेंट्स लेते हैं, बहुत ज़्यादा तनाव में रहते हैं, या आपकी डाइट में 'छिपी हुई शक्कर' (Hidden sugars) है, तो आपका शरीर इंसुलिन रेजिस्टेंस का शिकार हो सकता है, भले ही आप बाहर से कितने भी मस्कुलर दिखते हों।

शुद्ध व्हे प्रोटीन सीधे तौर पर शुगर नहीं बढ़ाता, लेकिन बाज़ार में मिलने वाले ज़्यादातर प्रोटीन पाउडर के स्वाद को अच्छा बनाने के लिए उनमें कृत्रिम मिठास और केमिकल मिलाए जाते हैं, जो इंसुलिन स्पाइक का कारण बनते हैं और लिवर पर दबाव डालते हैं।

बिल्कुल। ज़्यादातर एनर्जी ड्रिंक्स में कैफीन के साथ-साथ बहुत अधिक मात्रा में शक्कर (या सिरप) होती है। रोज़ाना इनका सेवन करने से शरीर का ब्लड शुगर और इंसुलिन का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार, जठराग्नि (पाचन) का कमज़ोर होना और शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) का इकट्ठा होना इसका मुख्य कारण है। क्षमता से ज़्यादा रूखा भोजन और भारी वर्कआउट 'वात' और 'कफ' को बिगाड़ देता है, जो पैंक्रियाज़ की कार्यक्षमता को रोक देते हैं।

नहीं, व्यायाम करना बहुत ज़रूरी है। लेकिन आपको अपनी क्षमता से ज़्यादा भारी वज़न उठाने (Ego lifting) से बचना चाहिए। हल्का व्यायाम और योग (जैसे सूर्य नमस्कार और मंडूकासन) इंसुलिन सेंसिटिविटी को बढ़ाने में बहुत मदद करते हैं।

गुड़मार (Madhunashini), करेला और जामुन की गुठली का चूर्ण ब्लड शुगर को नियंत्रित करने के लिए सबसे बेहतरीन माने जाते हैं। ये प्राकृतिक रूप से पैंक्रियाज़ को सुरक्षित रखते हैं।

हाँ, लेकिन मात्रा का ध्यान रखना ज़रूरी है। आयुर्वेद हमेशा प्राकृतिक चीज़ों का समर्थन करता है। वर्कआउट से पहले प्राकृतिक ऊर्जा के लिए थोड़ी मात्रा में इन्हें लिया जा सकता है, लेकिन रिफाइंड चीनी और मैदे से पूरी तरह बचना चाहिए।

जी हाँ, जब आप जिम के साथ-साथ अपनी नौकरी या जीवन का बहुत ज़्यादा तनाव लेते हैं, तो शरीर में कोर्टिसोल (Cortisol) हॉर्मोन रिलीज़ होता है। यह हॉर्मोन आपातकाल के लिए खून में बहुत सारा ग्लूकोज़ छोड़ देता है, जिससे शुगर लेवल हाई हो जाता है।

हाँ, शुरुआत में आयुर्वेदिक और आधुनिक दवाइयाँ एक साथ ली जा सकती हैं। जीवा आयुर्वेद के डॉक्टर आपकी स्थिति के अनुसार दवाइयों का तालमेल बिठाते हैं और जैसे-जैसे आपका शरीर प्राकृतिक रूप से ठीक होने लगता है, बाहरी दवाइयों की निर्भरता कम कर दी जाती है।

आयुर्वेद बीमारी की जड़ पर काम करता है। शुरुआती कुछ ही हफ्तों में आपके पाचन और ऊर्जा के स्तर में सुधार दिखने लगता है। लेकिन ब्लड शुगर को प्राकृतिक रूप से स्थायी तौर पर नियंत्रित करने और पैंक्रियाज़ को ताकत देने में आमतौर पर 3 से 6 महीने का अनुशासित समय लग सकता है।

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