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Osteoporosis को silent disease क्यों कहा जाता है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 22 Apr, 2026
  • category-iconUpdated on 19 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5066

हम अक्सर यही सोचते हैं कि जब तक जोड़ों में या बदन में दर्द नहीं हो रहा, तब तक हमारी हड्डियां मज़बूत हैं। पर सच तो ये है कि कुछ बीमारियां दीमक की तरह अंदर ही अंदर शरीर को खराब करती रहती हैं और हमें भनक तक नहीं लगती। ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) भी एक ऐसी ही बीमारी है। यह एक ऐसा 'खामोश चोर' है जो बिना कोई दर्द दिए चुपचाप आपकी हड्डियों से कैल्शियम चुराता रहता है। हड्डियां अंदर से खराब हो जाती हैं और कई बार तो लोगों को इसका पता तब चलता है, जब हल्का सा पैर फिसलने पर ही हड्डी चटक जाती है।

ऑस्टियोपोरोसिस आखिर है क्या?

यह हड्डियों के खोखले होने की बीमारी है। नॉर्मल हालत में हमारी हड्डियां किसी मजबूत पत्थर जैसी ठोस होती हैं। लेकिन इस बीमारी के बाद वे अंदर से किसी सूखी लकड़ी या स्पंज की तरह जालीदार और कमजोर हो जाती हैं। इंसान को कानो-कान खबर नहीं होती कि उसकी हड्डियां इतनी नाजुक हो चुकी हैं कि कोई मामूली सी चोट भी उन्हें आसानी से तोड़ सकती है।

इसे “Silent Killer” क्यों कहते हैं?

इसे खामोश बीमारी सिर्फ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह शरीर में कोई शोर नहीं मचाती। शुरुआत में आपको न कोई बुखार आएगा, न सूजन दिखेगी और न ही कोई दर्द होगा। हड्डियां चुपचाप अंदर से गलती रहती हैं। इंसान सोचता है कि वो एकदम फिट है, लेकिन अचानक किसी दिन सिर्फ नीचे झुकने, जोर से छींकने या हल्का सा टकराने पर ही कूल्हे या रीढ़ की हड्डी टूट जाती है। तब जाकर इस बीमारी का असली सच सामने आता है।

हड्डियों की खामोश चेतावनी: इसके शुरुआती लक्षण 

वैसे तो शुरू में इसके कोई खास दर्द या लक्षण नहीं होते, लेकिन जब हड्डियां हद से ज्यादा कमजोर होने लगती हैं, तो शरीर कुछ ऐसे इशारे देता है:

  • हड्डी का जल्दी टूटना: मामूली सी ठोकर लगने, पैर मुड़ने या सिर्फ जोर से खांसने भर से हड्डी का आसानी से चटक जाना।
  • कमर और पीठ का दर्द: रीढ़ की हड्डियों में अंदर ही अंदर बारीक दरारें आने लगती हैं, जिसकी वजह से कमर में एक मीठा-मीठा लेकिन लगातार दर्द बना रहता है।
  • हाइट (कद) कम होना: रीढ़ की हड्डियां कमजोर होकर आपस में दबने लगती हैं, जिससे इंसान की लंबाई पहले के मुकाबले थोड़ी कम लगने लगती है।
  • झुककर चलना: जब हड्डियों में शरीर का बोझ उठाने की ताकत नहीं बचती, तो पीठ में हल्का सा कूबड़ निकल आता है और इंसान आगे की तरफ झुककर चलने लगता है।
  • हाथों की पकड़ कमजोर होना: किसी भी भारी चीज को पकड़ने में हाथ कांपना या ग्रिप ढीली पड़ना। यह इस बात का पक्का सबूत है कि हड्डियों के अंदर का घनत्व (Density) कम हो रहा है।

Osteoporosis के कारण 

Osteoporosis कई कारणों से धीरे-धीरे विकसित होता है, खासकर जब हड्डियों का पोषण और density कम होने लगते हैं। इसके मुख्य कारण हैं:

  • कैल्शियम और विटामिन D की कमी: हड्डियों को मजबूत रखने के लिए जरूरी पोषक तत्वों की कमी
  • बढ़ती उम्र: उम्र के साथ हड्डियों की density स्वाभाविक रूप से कम होने लगती है
  • हॉर्मोनल बदलाव: खासकर महिलाओं में menopause के बाद estrogen कम होने से हड्डियां कमजोर होती हैं
  • शारीरिक गतिविधि की कमी: Exercise या physical activity कम होने से हड्डियां मजबूत नहीं बन पातीं
  • खराब खानपान: संतुलित आहार की कमी और ज्यादा processed food का सेवन
  • धूम्रपान और शराब: ये आदतें हड्डियों की मजबूती को नुकसान पहुंचाती हैं
  • कुछ दवाइयों का असर: लंबे समय तक steroid जैसी दवाएं लेने से भी हड्डियां कमजोर हो सकती हैं

ऑस्टियोपोरोसिस को हल्के में लेना क्यों भारी पड़ सकता है?

अगर समय रहते हड्डियों के इस खोखलेपन पर ध्यान न दिया जाए, तो बात सिर्फ दर्द तक नहीं रुकती। यह बीमारी आगे चलकर आपकी पूरी जिंदगी को ऐसे उलझा सकती है जिसके बारे में आप सोच भी नहीं सकते:

  • बार-बार हड्डी टूटने का डर: इसमें आपकी कलाई, कूल्हे और रीढ़ की हड्डी सबसे ज्यादा खतरे में रहती हैं। हालत इतनी नाजुक हो जाती है कि बिस्तर से उठने या जरा सी ठोकर लगने पर भी हड्डी चटकने का डर सताता रहता है।
  • रीढ़ की हड्डी का पिचकना और कूबड़ निकलना: जब रीढ़ की हड्डि कमजोर होकर आपस में दबने लगती हैं, तो इंसान का कद पहले से छोटा लगने लगता है। धीरे-धीरे पीठ में हमेशा के लिए एक झुकाव (कूबड़) आ जाता है और इंसान सीधा खड़ा नहीं हो पाता।
  • कभी न जाने वाला पुराना दर्द: अंदर ही अंदर हड्डियों में जो बारीक दरारें आती हैं, उनकी वजह से पीठ और जोड़ों में एक ऐसा जिद्दी दर्द बैठ जाता है, जो भारी से भारी दर्द की गोलियों से भी पूरी तरह ठीक नहीं होता।
  • चलना-फिरना बंद हो जाना: हड्डी टूटने का डर इंसान के दिमाग में इतना बैठ जाता है कि वह अपना चलना-फिरना ही कम कर देता है। दिनभर बैठे या लेटे रहने से मांसपेशियां भी ढीली पड़कर सूखने लगती हैं और रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम करना भी पहाड़ जैसा लगने लगता है।
  • दूसरों पर निर्भर होना: बार-बार चोट लगने और शरीर के साथ न देने की वजह से इंसान अपनी हर छोटी जरूरत के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है। इस बेबसी का सीधा असर दिमाग पर पड़ता है और इंसान धीरे-धीरे डिप्रेशन (तनाव) में जाने लगता है।

आयुर्वेद में Osteoporosis को कैसे समझा जाता है?

आयुर्वेद में हड्डियों के इस तरह खोखले होने को 'अस्थि-क्षय' कहा जाता है। इसका सीधा कनेक्शन शरीर में 'वात' और रूखेपन के बढ़ने से है। जैसे-जैसे उम्र ढलती है या हमारे खान-पान में कमी आती है, तो शरीर में वात भड़क जाता है। यह बढ़ा हुआ वात हड्डियों के अंदर की सारी नमी और ताकत को स्पंज की तरह सोख लेता है। आयुर्वेद मानता है कि जब हमारा पाचन सुस्त पड़ जाता है, तो हम चाहे कितना भी अच्छा खा लें, खाने का कैल्शियम और जरूरी तत्व हड्डियों तक पहुंच ही नहीं पाते। नतीजा यह होता है कि हड्डियाँ अंदर से किसी सूखी लकड़ी की तरह बिल्कुल खोखली हो जाती हैं।

आयुर्वेद का इलाज का तरीका इलाज

आयुर्वेद में इस बीमारी को ठीक करने का मतलब सिर्फ कैल्शियम की गोलियां निगल लेना बिल्कुल नहीं है। हमारा असली फोकस तो आपकी उन सूख चुकी हड्डियों में अंदर से दोबारा ठीक करने पर होता है। इसका पूरा इलाज कुछ इस तरह काम करता है:

  • वात को शांत करना: भई सबसे पहले कुछ खास जड़ी-बूटियां देकर शरीर में भड़की हुई इस गैस और रूखेपन को खत्म किया जाता है। जैसे ही यह वात शांत होता है, हड्डियों का और ज्यादा गलना या घिसना उसी वक्त रुक जाता है।
  • हड्डियों की असली खुराक: अर्जुन, लाक्षादि गुग्गुलु और अश्वगंधा जैसी कुछ देसी दवाइयां दी जाती हैं। ये हड्डियों के एकदम अंदर तक जाकर उनका खोखलापन भरती हैं और उन्हें वापस लोहे जैसा मजबूत बना देती हैं।
  • पाचन ठीक करना: जब तक पाचन मजबूत नहीं होगा, खाना शरीर को लगेगा ही नहीं। इसलिए आपके पाचन को इतना मजबूत कर दिया जाता है कि आप डाइट में जो भी कैल्शियम लें, वो बर्बाद न हो और सीधा आपकी हड्डियों तक पहुंचे।
  • पंचकर्म का जादू: जड़ी-बूटियों वाले तेल की मालिश और बस्ती (एक खास तरह का एनीमा) के जरिए भी इलाज किया जाता है। यह तरीका हड्डियों और नसों की बहुत गहराई में जाकर उन्हें जरूरी चिकनाई और अंदरूनी पोषण देता है।
  • सही खान-पान और योग: आपको एक ऐसी डाइट बताई जाती है जिससे शरीर में फालतू गैस बने ही नहीं। साथ ही, कुछ ऐसे हल्के-फुल्के योगासन भी सिखाए जाते हैं जो आपकी कमजोर हड्डियों पर बिना कोई जोर डाले, आपके पूरे शरीर के ढांचे को फौलाद बना देते हैं।

कमजोर हड्डियों को मज़बूत बनाने वाली कुछ खास देसी औषधियाँ

आयुर्वेद का खजाना बहुत बड़ा है। इसमें कुछ ऐसी जादुई देसी चीजें मौजूद हैं जिनका काम सिर्फ शरीर में कैल्शियम भरना नहीं है। ये तो उन हड्डियों में भी नई जान डाल देती हैं जो अंदर से बिल्कुल सूख चुकी हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में:

  • अश्वगंधा: ये शरीर की गैस यानी वात को एकदम शांत कर देती है। इससे होता ये है कि हड्डियों का दर्द और वो जो हर वक्त की कमजोरी लगती है ना, वो जड़ से खत्म हो जाती है और ढांचे में गजब की ताकत आ जाती है।
  • हड़जोड़: नाम से ही साफ है, हड्डी को जोड़ने वाला। टूटी हुई हड्डियों को आपस में चिपकाने और अंदर के खोखलेपन को भरकर उन्हें बिल्कुल पत्थर जैसा ठोस बनाने में इससे बढ़िया शायद ही कुछ और हो।
  • शिलाजीत: हम कई बार बहुत अच्छा खाते हैं लेकिन वो शरीर को लगता ही नहीं। शिलाजीत इसी काम में मदद करता है। ये आपके खाने को पचाने की ताकत इतना बढ़ा देता है कि डाइट का सारा कैल्शियम सीधे आपकी हड्डियों को जाकर मिलता है।
  • गुग्गुलु: अगर हड्डियां घिस रही हैं या जरा सी चोट में चटकने का डर रहता है, तो उनकी अंदर से रिपेयरिंग के लिए हमारे पुराने वैद्य इसी मशहूर दवा का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते आए हैं।

हर आदमी का शरीर और उसकी तासीर एक जैसी नहीं होती। इसलिए कोई भी जड़ी-बूटी शुरू करने से पहले किसी अच्छे वैद्य जी या डॉक्टर की सलाह लेना बहुत जरूरी है।

सूखी और खोखली हड्डियों को मज़बूत बनाने वाली आयुर्वेदिक थेरेपी

हड्डियों को गलने से रोकने के लिए आयुर्वेद सिर्फ खाने वाली पुड़िया या गोलियों पर निर्भर नहीं है। कुछ ऐसे बाहरी तरीके भी हैं जो सीधे आपकी हड्डियों तक खुराक और जरूरी चिकनाई पहुंचाते हैं। जैसे:

  • अभ्यंग: जब खास देसी जड़ी-बूटियों वाले तेल से पूरे बदन की मालिश होती है न, तो हड्डियों का सारा सूखापन दूर हो जाता है। इससे शरीर का पूरा ढांचा फिर से मजबूत होने लगता है।
  • बस्ती: शरीर की बादी या वात को जड़ से उखाड़ने का ये सबसे अचूक तरीका माना गया है। इसमें जड़ी-बूटियों वाला एनीमा दिया जाता है, जो सीधे हड्डियों को खुराक देता है और उनका खोखलापन खत्म कर देता है।
  • स्वेदन: इसमें औषधीय भाप देकर शरीर के सारे बंद रोमछिद्र खोल दिए जाते हैं। जब शरीर के रास्ते खुलेंगे तभी तो वो दवाइयों को अच्छे से सोखेगा। इससे पुरानी से पुरानी जकड़न भी टूट जाती है।

Osteoporosis में डाइट और लाइफस्टाइल टिप्स

क्या खाएं:

  • कैल्शियम से भरपूर फूड जैसे दूध, तिल, हरी सब्जियां
  • घी और पौष्टिक आहार (हड्डियों को पोषण देने के लिए)
  • बादाम, अखरोट जैसे healthy fats
  • धूप (Vitamin D के लिए) और हल्की एक्सरसाइज
  • गुनगुना पानी और संतुलित भोजन

क्या न खाएं:

  • ज्यादा ठंडा और बासी खाना
  • processed और जंक फूड
  • ज्यादा नमक और soft drinks
  • धूम्रपान और शराब
  • लंबे समय तक inactive रहना

पेशेंट टेस्टिमोनियल 

मेरा नाम कुसुमलता है, मेरी उम्र 74 वर्ष है और मैं दिल्ली में एक शिक्षक रही हूँ। मैं लंबे समय से शरीर में दर्द से परेशान थी और मुझे ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या भी थी। मैंने एलोपैथिक इलाज करवाया, लेकिन मुझे कोई खास राहत नहीं मिली। फिर मैंने टीवी पर डॉ. प्रताप चौहान को देखा और उनसे परामर्श लिया, जिसके बाद मैं जीवाग्राम आई। यहाँ मुझे डाइट, लाइफस्टाइल, थेरेपी और आयुर्वेदिक दवाइयों के साथ उपचार दिया गया। नियमित देखभाल से अब मुझे पहले से काफी राहत है और मैं बेहतर महसूस करती हूँ।

कब डॉक्टर से सलाह लें?

अगर आपको बार-बार हड्डियों में दर्द, कमर या पीठ में तकलीफ, कद कम होना या छोटी चोट में भी fracture हो रहा है, तो इसे नजरअंदाज न करें। खासकर menopause के बाद महिलाओं और बढ़ती उम्र के लोगों को समय-समय पर जांच करानी चाहिए। जल्दी पहचान होने से हड्डियों की कमजोरी को बढ़ने से रोका जा सकता है।

निष्कर्ष

Osteoporosis एक ऐसी समस्या है जो धीरे-धीरे हड्डियों को कमजोर बनाती है और अक्सर देर से सामने आती है। सही समय पर ध्यान, संतुलित आहार और उचित उपचार से इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। आयुर्वेद और मॉडर्न दोनों तरीके मिलकर हड्डियों को मजबूत बनाने और बेहतर जीवन गुणवत्ता देने में मदद कर सकते हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं, हालांकि मेनोपॉज के बाद महिलाओं में यह अधिक होता है, लेकिन पुरुषों को भी Osteoporosis का खतरा होता है। उम्र बढ़ने के साथ पुरुषों की हड्डियाँ भी कमजोर हो सकती हैं।

 हाँ। अत्यधिक कैफीन और सोडा का सेवन शरीर में कैल्शियम के अवशोषण (Absorption) को रोकता है और हड्डियों से कैल्शियम को बाहर निकाल सकता है, जिससे वे कमजोर हो जाती हैं।

बिल्कुल नहीं। बिना विटामिन-D के शरीर कैल्शियम को सोख नहीं सकता। हड्डियों की मजबूती के लिए कैल्शियम और विटामिन-D दोनों का संतुलन होना अनिवार्य है।

 हाँ, सही आयुर्वेदिक उपचार, उचित आहार और वेट-बेयरिंग एक्सरसाइज (जैसे चलना) के जरिए हड्डियों के क्षरण को रोका जा सकता है और उनके घनत्व में सुधार किया जा सकता है।

जी हाँ। जब जबड़े की हड्डी कमजोर होती है, तो मसूड़े ढीले पड़ सकते हैं और दांत गिरने लगते हैं। यह शरीर में हड्डियों की घटती डेंसिटी का एक शुरुआती इशारा हो सकता है।

 हाँ। बहुत कम वजन वाले व्यक्तियों में हड्डियों की सघनता कम होने की संभावना अधिक होती है। हड्डियों को मजबूत रहने के लिए एक स्वस्थ बॉडी मास इंडेक्स (BMI) जरूरी है।

यह दुर्लभ है लेकिन मुमकिन है। इसे 'जुवेनाइल ऑस्टियोपोरोसिस' कहते हैं, जो आमतौर पर किसी अन्य बीमारी या दवाओं के साइड इफेक्ट के कारण होता है।

नहीं। आयुर्वेद के अनुसार, सप्लीमेंट्स तब तक काम नहीं करेंगे जब तक आपकी 'अग्नि' (पाचन) सही न हो। पाचन सुधारना जरूरी है ताकि पोषक तत्व हड्डियों तक पहुँच सकें।

हाँ, धूम्रपान हड्डियों के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को रोकता है और शराब कैल्शियम के स्तर को कम करती है, जिससे फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है।

नहीं, यह अक्सर रीढ़ की हड्डियों में सूक्ष्म फ्रैक्चर (Compression Fractures) का परिणाम होता है, जो Osteoporosis की पहचान है। इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज न करें।

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