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पार्शियल पैरालिसिस (Partial Paralysis) के बाद ये गलतियाँ recovery धीमी कर सकती हैं

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

ज़िंदगी में कुछ बीमारियाँ ऐसी होती हैं जो सिर्फ शरीर को ही नहीं, बल्कि इंसान के आत्मविश्वास को भी तोड़ कर रख देती हैं। पार्शियल पैरालिसिस (Partial Paralysis) या लकवा मार जाना एक ऐसी ही गंभीर स्थिति है। जब अचानक से शरीर का एक हिस्सा (जैसे एक हाथ, पैर या चेहरे का एक तरफ का हिस्सा) काम करना बंद कर देता है, तो इंसान पूरी तरह से घबरा जाता है। हॉस्पिटल से छुट्टी मिलने के बाद असली संघर्ष घर पर शुरू होता है, रिकवरी का संघर्ष। अक्सर देखा गया है कि शुरुआत में रिकवरी थोड़ी तेज़ी से होती है, लेकिन कुछ समय बाद वह एकदम रुक जाती है। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि जानकारी के अभाव में मरीज़ या उनके परिवार वाले घर पर कुछ ऐसी अनजाने में गलतियाँ कर बैठते हैं, जो नसों की रिकवरी को पूरी तरह धीमा या रोक देती हैं। जब शरीर को दोबारा उठने और चलने के लिए सही दिशा और ऊर्जा की ज़रूरत होती है, तब ये गलतियाँ नसों को और ज़्यादा सुन्न कर देती हैं। 

पार्शियल पैरालिसिस (Partial Paralysis) असल में क्या है?

पार्शियल पैरालिसिस, जिसे मेडिकल भाषा में 'पेरेसिस' (Paresis) या 'हेमिपेरेसिस' (Hemiparesis - अगर एक तरफ का आधा शरीर प्रभावित हो) कहा जाता है, कोई माँसपेशियों की बीमारी नहीं है। यह सीधे तौर पर दिमाग (Brain) और नसों की बीमारी है। जब हमारे दिमाग के किसी हिस्से में खून का थक्का (Blood clot) जमने या नस फटने (Hemorrhage) के कारण ब्लड सर्कुलेशन रुक जाता है, तो उस हिस्से की ब्रेन सेल्स मरने लगती हैं। दिमाग का वह हिस्सा शरीर के जिस अंग को कंट्रोल करता है, उस अंग तक सिग्नल पहुँचना बंद हो जाते हैं। सिग्नल न मिलने के कारण वह हाथ, पैर या चेहरा कमज़ोर पड़ जाता है या काम करना बंद कर देता है। इसे ही पार्शियल पैरालिसिस कहते हैं। इसमें अंग पूरी तरह से मृत नहीं होता, बल्कि उसमें भयंकर कमज़ोरी और सुन्नपन आ जाता है।

रिकवरी का गोल्डन पीरियड: जब हर दिन कीमती होता है

पैरालिसिस का अटैक आने के बाद के शुरुआती 3 से 6 महीने 'गोल्डन पीरियड' कहलाते हैं। इस दौरान हमारा दिमाग 'न्यूरोप्लास्टिसिटी' (Neuroplasticity) के ज़रिए खुद को दोबारा 'री-वायर' (Rewire) करने की कोशिश कर रहा होता है। यानी दिमाग का जो हिस्सा डैमेज हो गया है, उसके आस-पास के स्वस्थ हिस्से उस काम को सीखने की कोशिश करते हैं ताकि आपका हाथ या पैर दोबारा चल सके। अगर इस गोल्डन पीरियड में सही पोषण, सही व्यायाम और सही आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का सहारा न लिया जाए, तो दिमाग यह कोशिश करना बंद कर देता है और कमज़ोरी स्थायी (Permanent) हो जाती है। आइए जानते हैं वे कौन सी गलतियाँ हैं जो इस रिकवरी को रोक देती हैं।

रिकवरी के दौरान लोग कौन सी बड़ी गलतियाँ करते हैं?

रिकवरी के दौरान लोग कुछ बड़ी गलतियाँ करते हैं जो हीलिंग प्रोसेस को रोक देती हैं, और आयुर्वेद की मदद से आप अपनी मृत प्राय नसों में दोबारा जान फूँक कर एक स्वतंत्र और स्वस्थ जीवन की ओर लौट सकते हैं।

फिजियोथेरेपी (Physiotherapy) को बीच में छोड़ देना

हॉस्पिटल से आने के बाद शुरुआत में मरीज़ बड़े उत्साह से फिजियोथेरेपी करते हैं। लेकिन जब कुछ हफ्तों बाद उन्हें कोई बड़ा चमत्कार होता नहीं दिखता, तो वे निराश होकर कसरत करना छोड़ देते हैं या बहुत कम कर देते हैं। यह रिकवरी रोकने की सबसे बड़ी गलती है। जब आप कमज़ोर पड़े हाथ या पैर की कसरत नहीं करते, तो दिमाग को लगता है कि आपको उस अंग की ज़रूरत ही नहीं है और वह वहाँ सिग्नल भेजना पूरी तरह बंद कर देता है। इसके अलावा, कसरत न करने से वह अंग अकड़ जाता है (Spasticity) और उसकी माँसपेशीयाँ सिकुड़ कर सूखने लगती हैं, जिसे ठीक करना बाद में लगभग नामुमकिन हो जाता है।

मानसिक अवसाद (Depression) और हार मान लेना

पार्शियल पैरालिसिस सिर्फ शरीर पर नहीं, बल्कि इंसान की मानसिकता पर बहुत गहरा प्रहार करता है। जो इंसान कल तक दौड़ता-भागता था, जब उसे एक गिलास पानी के लिए भी दूसरों का मोहताज होना पड़ता है, तो वह गहरे डिप्रेशन में चला जाता है। मरीज़ अंदर ही अंदर हार मान लेता है। यह मानसिक तनाव और हारने की भावना रिकवरी का सबसे बड़ा दुश्मन है। जब आप डिप्रेशन में होते हैं, तो आपका दिमाग स्ट्रेस हार्मोन (Cortisol) रिलीज़ करता है, जो दिमाग की 'न्यूरोप्लास्टिसिटी' यानी नई नसें बनाने की प्रक्रिया को पूरी तरह ब्लॉक कर देता है। अगर मरीज़ अंदर से ठीक होना ही नहीं चाहता, तो कोई भी दवा असर नहीं कर सकती।

डाइट को नज़रअंदाज़ करना और गलत खान-पान

ज़्यादातर लोगों को लगता है कि लकवा सिर्फ नसों की बीमारी है, इसमें खाने-पीने से क्या फर्क पड़ेगा। यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। आपकी नसों को दोबारा जुड़ने और दिमाग को नई कोशिकाएं बनाने के लिए भारी मात्रा में सही पोषण की ज़रूरत होती है। अगर मरीज़ को वही रूखा-सूखा खाना, बासी भोजन या बाहर का जंक फूड दिया जा रहा है, तो नसों को ताकत कहाँ से मिलेगी? इसके अलावा, कब्ज (Constipation) करने वाला भारी भोजन शरीर में गैस और टॉक्सिन्स बनाता है। आयुर्वेद के अनुसार, पेट की गैस और कब्ज शरीर में 'वात' को तुरंत भड़काते हैं, जो लकवे के मरीज़ के लिए सीधा ज़हर है।

जल्दबाज़ी करना और शरीर पर अत्यधिक दबाव डालना (Overexertion)

एक तरफ कसरत न करना नुकसानदायक है, तो दूसरी तरफ जल्दी ठीक होने की चाहत में शरीर पर क्षमता से ज़्यादा दबाव डालना (Overexertion) भी एक बहुत बड़ी गलती है। कुछ मरीज़ कमज़ोर अंगों से ज़बरदस्ती भारी काम करने की कोशिश करते हैं। चूंकि माँसपेशीयाँ अभी कमज़ोर हैं, इसलिए अत्यधिक ज़ोर लगाने से वे बुरी तरह थक जाती हैं (Muscle Fatigue) और उनमें भयंकर ऐंठन (Cramps) या दर्द शुरू हो जाता है। यह दर्द नसों को और ज़्यादा डैमेज कर सकता है। रिकवरी एक मैराथन है, कोई सौ मीटर की दौड़ नहीं; इसमें धैर्य की बहुत ज़रूरत होती है।

आयुर्वेद पार्शियल पैरालिसिस को कैसे समझता है? (पक्षाघात)

आधुनिक विज्ञान जिसे पैरालिसिस या स्ट्रोक कहता है, आयुर्वेद ने हज़ारों साल पहले उसे 'पक्षाघात' (Pakshaghata) के रूप में बहुत ही गहराई से समझा था। 'पक्ष' का अर्थ है शरीर का आधा हिस्सा और 'घात' का अर्थ है नष्ट होना या रुक जाना। आयुर्वेद के अनुसार, शरीर के सभी मूवमेंट्स और नसों के सिग्नल्स को 'वात दोष' (Vata Dosha) कंट्रोल करता है। जब गलत खान-पान, बहुत ज़्यादा मानसिक तनाव या हाई बीपी के कारण वात भयंकर रूप से कुपित हो जाता है, तो वह दिमाग और नसों (स्रोतों) के रास्तों को पूरी तरह ब्लॉक कर देता है। खून और ऊर्जा का संचार रुक जाने से वह हिस्सा सूखने लगता है और काम करना बंद कर देता है। आयुर्वेद का लक्ष्य इस भड़के हुए वात को शांत करना और ब्लॉक हो चुकी नसों (स्रोतों) को दोबारा खोलना है।

नसों के लिए जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें ऐसी जादुई और सुरक्षित जड़ी-बूटियाँ दी हैं, जो मृत प्राय नसों को दोबारा हील (Heal) करने और माँसपेशियों में ताकत लौटाने की क्षमता रखती हैं।

  • अश्वगंधा: यह आयुर्वेद की सबसे शक्तिशाली जड़ी-बूटी है। यह कमज़ोर पड़ी माँसपेशियों में भारी ताकत भरती है, नसों की कमज़ोरी दूर करती है और डिप्रेशन को खत्म करके मरीज़ को मानसिक रूप से मज़बूत बनाती है।
  • बला: जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह शरीर को 'बल' यानी ताकत देती है। लकवे के कारण सूख रही माँसपेशियों को दोबारा पुष्ट करने के लिए बला का उपयोग बहुत कारगर है।
  • ब्राह्मी: यह सीधे तौर पर दिमाग (Brain) पर काम करती है। यह डैमेज हुई ब्रेन सेल्स को हील करने में मदद करती है और दिमाग की नई कोशिकाएं बनाने (Neuroplasticity) की प्रक्रिया को बहुत तेज़ कर देती है।
  • गुग्गुलु: यह नसों में मौजूद किसी भी तरह के कोलेस्ट्रॉल या खून के थक्के (Clot) को पिघलाकर ब्लॉकेज को प्राकृतिक रूप से खोलता है।

आयुर्वेदिक पंचकर्म थेरेपी पैरालिसिस रिकवरी में कैसे काम करती है?

जब सिर्फ गोलियाँ खाने से लकवे वाले अंग में कोई हरकत न हो रही हो, तो हमारी प्राचीन पंचकर्म थेरेपी सीधे उस अंग और दिमाग की गहराई में जाकर काम करती है।

  • अभ्यंग और स्वेदन: इसमें 'महानारायण तेल' या 'क्षीरबला तेल' जैसे खास औषधीय गर्म तेलों से लकवाग्रस्त अंग की विशेष मालिश की जाती है और उसके बाद भाप (Steam) दी जाती है। यह सूखी हुई नसों को तुरंत नमी देता है, कड़क हो चुकी माँसपेशियों की जकड़न खोलता है और वहाँ ताज़ा खून का संचार शुरू करता है।
  • नस्य: आयुर्वेद में नाक को दिमाग का दरवाज़ा माना गया है। नस्य थेरेपी में औषधीय तेल की कुछ बूँदें नाक में डाली जाती हैं। यह तेल सीधा दिमाग की नसों तक पहुँचता है, वहाँ के ब्लॉकेज खोलता है और ब्रेन सेल्स को सीधा पोषण देता है।
  • बस्ती: यह वात रोगों की सबसे बड़ी चिकित्सा है। इसमें औषधीय काढ़े या तेल को एनिमा के रूप में दिया जाता है, जो पेट से वात को जड़ से खत्म करता है और पूरे शरीर की नसों को गहराई से ताकत देता है।

रिकवरी तेज़ करने के लिए वात-शामक डाइट प्लान क्या हो?

आप जो खाते हैं, वही आपकी नसों को या तो दोबारा बनाता है या सुखाता है। पैरालिसिस रिकवरी के लिए एक वात-शामक और सुपाच्य डाइट लेना बहुत ज़्यादा ज़रूरी है।

श्रेणी क्या अपनाएँ (अनुशंसित) किनसे परहेज़ करें (वर्जित)
आहार का सिद्धांत हल्का, गर्म और ताज़ा भोजन जो गैस व कब्ज न बनाए सूखा, ठंडा और बासी भोजन जो वात को भड़काए
पोषक तत्व गाय का शुद्ध घी, दूध, बादाम, अखरोट, मूंग दाल सूप: नसों और दिमाग को पोषण देते हैं मिर्च-मसाले, फास्ट फूड और मैदा: पाचन बिगाड़कर वात बढ़ाते हैं
पाचन संतुलन त्रिफला का सेवन: कब्ज रोककर गैस बनने से बचाता है कब्ज पैदा करने वाली आदतें और भारी भोजन
दैनिक पेय गुनगुना पानी: नसों को शांत रखकर शरीर संतुलित करता है कोल्ड ड्रिंक, बर्फ और फ्रिज का ठंडा पानी: नसों को सिकोड़कर वात बढ़ाते हैं
जीवनशैली सहयोग नियमित समय पर भोजन और भरपूर नींद: नसों की रिपेयरिंग में सहायक अनियमित दिनचर्या और नींद की कमी: रिकवरी को धीमा करती है

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

पैरालिसिस की रिकवरी कोई बुखार नहीं है जो दो दिन में उतर जाए। आपके डैमेज हो चुके दिमाग और मृत पड़ी नसों को दोबारा रिसेट होने में थोड़ा अनुशासित और लंबा समय लगता है। इसमें मरीज़ और परिवार दोनों के धैर्य की ज़रूरत होती है।

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: मरीज़ का पाचन सुधरेगा, पेट साफ होने लगेगा और सबसे ज़रूरी बात, मरीज़ का डिप्रेशन कम होगा और उसमें एक नई ऊर्जा और ताकत महसूस होने लगेगी।
  • 1 से 3 महीने तक: भड़का हुआ वात शांत होने से कड़क हो चुके अंगों में थोड़ा लचीलापन आएगा। उँगलियों या हाथ-पैर में बहुत हल्की सी हरकत (Movement) या सेंसेशन महसूस होनी शुरू हो सकती है।
  • 3 से 6 महीने और उससे अधिक: लगातार आयुर्वेदिक दवाइयाँ, पंचकर्म और सही फिजियोथेरेपी के संगम से नसों का रास्ता साफ होगा। माँसपेशीयाँ दोबारा ताकतवर बनेंगी और मरीज़ धीरे-धीरे बिना सहारे के अपने रोज़मर्रा के काम करने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।

मरीज़ों के अनुभव

मेरा नाम रमेश तिवारी है, मेरी उम्र 55 वर्ष है और मैं भोपाल का रहने वाला हूँ। लगभग एक साल पहले मुझे हाई बीपी के कारण माइनर स्ट्रोक आया था, जिससे मेरे शरीर का दाहिना हिस्सा (Right side) कमज़ोर पड़ गया था और मैं बिस्तर पर आ गया था। शुरुआत में मैंने फिजियोथेरेपी की, लेकिन कुछ समय बाद कोई प्रोग्रेस नहीं दिखी और मेरा दाहिना हाथ बिल्कुल अकड़ गया। मैं बहुत निराश हो गया था। फिर मेरे बेटे ने मुझे जीवाग्राम में भर्ती कराया। वहाँ के डॉक्टरों ने मेरी सारी दवाइयाँ देखीं और पंचकर्म (खासकर नस्य और अभ्यंग) शुरू किया। साथ ही मुझे अश्वगंधा और ब्राह्मी जैसी दवाइयाँ दीं। तीन महीने के लगातार इलाज से मेरे अकड़े हुए हाथ में मूवमेंट वापस आ गया और अब मैं छड़ी के सहारे खुद टॉयलेट जा सकता हूँ। जीवा आयुर्वेद ने मुझे मेरी आज़ादी वापस दी है।

रमेश तिवारी

भोपाल

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

पैरालिसिस के बाद रिकवरी एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि आधुनिक चिकित्सा कहाँ तक काम करती है और उसके बाद आयुर्वेद की गहराई क्यों ज़रूरी है:

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेद
इलाज का मुख्य लक्ष्य इमरजेंसी में जान बचाना और खून पतला कर भविष्य के स्ट्रोक से बचाव रसायन चिकित्सा से नसों को पोषण देकर पुनर्जीवित करना और वात को शांत करना
शरीर को देखने का नज़रिया प्रभावित हिस्से पर फोकस कर फिजियोथेरेपी पर ज़ोर स्रोतो अवरोध खोलकर पंचकर्म (नस्य, अभ्यंग) से अंदरूनी हीलिंग को बढ़ावा
डाइट और जीवनशैली की भूमिका डाइट पर सीमित ध्यान वात-शामक डाइट, गाय का घी और संतुलित दिनचर्या को रिकवरी का आधार
समग्र रिकवरी मानसिक स्वास्थ्य (डिप्रेशन) पर अपेक्षाकृत कम ध्यान अश्वगंधा, ब्राह्मी जैसी जड़ी-बूटियों से नसों के साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी मजबूत करना

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए? (Red Flags of Paralysis)

लकवे के मरीज़ की रिकवरी के दौरान घर वालों को बहुत सतर्क रहना चाहिए। अगर रिकवरी के बीच अचानक से आपको मरीज़ में ये गंभीर संकेत दिखें, तो यह दोबारा स्ट्रोक (Second Stroke) आने की चेतावनी हो सकती है और आपको बिना देरी किए तुरंत इमरजेंसी में ले जाना चाहिए:

  • अगर मरीज़ की बात करने की क्षमता अचानक पूरी तरह लड़खड़ा जाए या वह बिल्कुल बोलना बंद कर दे (Slurred speech)।
  • अगर मरीज़ का चेहरा अचानक एक तरफ लटक जाए (Facial drooping) या उसे पानी पीने में गले में भयंकर फंदा लगने लगे।
  • अगर हाथ या पैर में अचानक से बहुत ज़्यादा कमज़ोरी आ जाए और वह बिल्कुल बेजान होकर गिर जाए।
  • अगर मरीज़ को अचानक बहुत भयंकर सिरदर्द शुरू हो जाए जिसके साथ उल्टी भी हो।
  • अगर मरीज़ को अचानक आँखों से दिखना बंद हो जाए या धुंधला दिखने लगे (Vision loss)।

निष्कर्ष

पार्शियल पैरालिसिस (Partial Paralysis) जीवन का अंत नहीं है, बल्कि यह आपके शरीर का एक ऐसा ब्रेकडाउन है जिसे सही दिशा में प्रयास करके दोबारा खड़ा किया जा सकता है। घर पर आकर फिजियोथेरेपी छोड़ देना, डिप्रेशन में चले जाना, गलत खान-पान रखना और शरीर पर क्षमता से ज़्यादा दबाव डालना, ये वो गलतियाँ हैं जो आपकी ठीक हो रही नसों को हमेशा के लिए सुन्न कर सकती हैं। सिर्फ खून पतला करने वाली दवाइयाँ खाकर यह सोचना कि लकवा ठीक हो जाएगा, एक बहुत बड़ा धोखा है। जब तक आपके शरीर में भड़का हुआ वात शांत नहीं होगा और डैमेज नसों को सही आयुर्वेदिक पोषण नहीं मिलेगा, तब तक स्थायी रिकवरी संभव नहीं है। आयुर्वेद आपको इस लाचारी से बाहर निकलने का एक सुरक्षित और प्राकृतिक समाधान देता है। सही आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों (अश्वगंधा, ब्राह्मी), पंचकर्म थेरेपी (नस्य, अभ्यंग) और वात-शामक जीवनशैली को अपनाकर आप अपने ब्लॉक हो चुके दिमाग और नसों को दोबारा जोड़ सकते हैं। अपनी गलतियों को पहचानें, धैर्य न खोएं, और जीवा आयुर्वेद के साथ एक स्वतंत्र और गरिमापूर्ण जीवन की ओर कदम बढ़ाएं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

जी हाँ, अगर स्ट्रोक के तुरंत बाद (गोल्डन पीरियड में) सही फिजियोथेरेपी और आयुर्वेदिक इलाज (पंचकर्म और नसों को ताकत देने वाली दवाइयाँ) शुरू कर दिया जाए, तो मरीज़ काफी हद तक एक सामान्य और स्वतंत्र जीवन जीने लायक रिकवर हो सकता है।

दिमाग लगातार कसरत के ज़रिए ही डैमेज हिस्से की 'री-वायरिंग' (Neuroplasticity) करता है। अगर आप कसरत छोड़ देते हैं, तो दिमाग सिग्नल भेजना बंद कर देता है, जिससे कमज़ोर अंग में अकड़न (Spasticity) आ जाती है और नसें सूखने लगती हैं।

बिल्कुल। जब मरीज़ डिप्रेशन में होता है, तो स्ट्रेस हार्मोन ब्रेन की हीलिंग प्रोसेस को ब्लॉक कर देते हैं। अगर मरीज़ अंदर से ठीक होने की इच्छा ही छोड़ दे, तो दवा और कसरत दोनों का असर लगभग शून्य हो जाता है।

मरीज़ को हल्का, सुपाच्य और 'वात-शामक' भोजन देना चाहिए। डाइट में गाय का शुद्ध घी, मूंग की दाल, दूध, बादाम और अखरोट शामिल करें। रूखा, ठंडा और कब्ज करने वाला बासी खाना नसों के लिए बहुत नुकसानदायक होता है।

नहीं, यह एक बहुत बड़ी गलती है। कमज़ोर माँसपेशियों पर अचानक ज़्यादा दबाव डालने से वे बुरी तरह थक जाती हैं और उनमें भयंकर ऐंठन या दर्द शुरू हो जाता है। रिकवरी के लिए कसरत नियमित होनी चाहिए, लेकिन क्षमता से ज़्यादा नहीं।

खून पतला करने वाली दवाइयाँ भविष्य में आने वाले स्ट्रोक से बचाती हैं, जो कि ज़रूरी है। लेकिन ये दवाइयाँ मृत या डैमेज हो चुकी नसों में दोबारा जान नहीं फूँकतीं। नसों को हील करने के लिए आयुर्वेदिक पोषण की ज़रूरत होती है।

आयुर्वेद के अनुसार, लकवा (पक्षाघात) शरीर में 'वात दोष' के भयंकर रूप से भड़कने के कारण होता है। यह बढ़ा हुआ वात दिमाग और शरीर की नसों (स्रोतों) को ब्लॉक कर देता है, जिससे अंगों तक ऊर्जा का संचार रुक जाता है।

आयुर्वेद में नाक को दिमाग का दरवाज़ा माना गया है। नस्य थेरेपी में औषधीय तेल नाक में डाला जाता है, जो सीधे दिमाग की नसों तक पहुँचकर उनके ब्लॉकेज खोलता है और डैमेज ब्रेन सेल्स को सीधा पोषण देता है।

औषधीय गर्म तेलों (जैसे महानारायण तेल) से मालिश करने से रूखी और सिकुड़ी हुई नसों को नमी मिलती है। इससे माँसपेशियों की जकड़न खुलती है और कमज़ोर अंग में ब्लड सर्कुलेशन तेज़ी से सुधरता है।

यह एक बहुत बड़ा 'रेड फ्लैग' है। अगर चेहरे का लटकना, आवाज़ का लड़खड़ाना या अचानक भयंकर कमज़ोरी जैसे लक्षण दिखें, तो यह दूसरे स्ट्रोक (Second Stroke) का संकेत हो सकता है। ऐसे में बिना एक पल की देरी किए तुरंत डॉक्टर या इमरजेंसी में जाएँ।

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