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Delivery के 6 महीने बाद Thyroid बढ़ी — क्या यह Permanent है?

Information By Dr. Keshav Chauhan

आजकल महिलाओं में डिलीवरी (Delivery) के बाद थायरॉइड (Thyroid) बढ़ने की समस्या तेज़ी से बढ़ रही है, और 6 महीने बाद इसका बढ़ना अक्सर महिलाओं को डरा देता है कि 'क्या अब यह परमानेंट (Permanent) हो गया है?' यह भयंकर स्थिति वज़न बढ़ने, भयंकर बाल झड़ने और कमज़ोरी का डर बढ़ाकर नई माँ के आत्मविश्वास और दिमागी शांति को पूरी तरह खत्म कर देती है। एलोपैथी में इन लक्षणों को दबाने के लिए अक्सर हार्मोन रिप्लेसमेंट (Thyroxine) की गोलियाँ दी जाती हैं। ये दवाइयाँ कुछ समय के लिए ब्लड रिपोर्ट को साफ ज़रूर करती हैं, लेकिन जड़ पर काम न करने से शरीर अंदर से कमज़ोर हो जाता है और मेटाबॉलिज़्म सुस्त पड़ जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, यह समस्या खराब पाचन, 'अग्नि' के मंद होने और डिलीवरी के बाद 'वात' दोष के भड़कने से जुड़ी है। जीवा आयुर्वेद प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से ग्रंथि (Gland) को संतुलित कर इस समस्या को जड़ से मिटाता है ताकि आपकी प्राकृतिक सेहत वापस लौट सके और आपको जीवन भर गोलियाँ न खानी पड़ें।

Delivery के 6 महीने बाद Thyroid बढ़ना असल में क्या है?

मेडिकल भाषा में इसे 'पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस' (Postpartum Thyroiditis) कहा जाता है। गर्भावस्था के दौरान बच्चे को सुरक्षित रखने के लिए महिला का इम्यून सिस्टम थोड़ा शांत हो जाता है। लेकिन डिलीवरी के बाद जब यह सिस्टम दोबारा एक्टिव होता है, तो कई बार भटक कर अपनी ही थायरॉइड ग्रंथि पर हमला कर देता है। इससे ग्रंथि में भयंकर सूजन आ जाती है। शुरुआत के 1-4 महीनों में थायरॉइड हार्मोन बहुत ज़्यादा बनता है (Hyperthyroidism), और फिर 6 महीने के आस-पास ग्रंथि कमज़ोर पड़ने से हार्मोन बनना बहुत कम हो जाता है (Hypothyroidism)। हार्मोन की गोलियों का इस्तेमाल सिर्फ बाहरी और अस्थायी इलाज है, जबकि असली गड़बड़ी शरीर के अंदर मंद पड़ी पाचन अग्नि और डिलीवरी के बाद कमज़ोर हुई इम्युनिटी में चल रही होती है।

Postpartum Thyroiditis में दिखने वाले इन हार्मोनल और शारीरिक लक्षणों के भयंकर संकेत

डिलीवरी के 6 महीने बाद जब थायरॉइड ग्रंथि सुस्त पड़ने लगती है, तो शरीर द्वारा दिए जाने वाले भयंकर लक्षण इस प्रकार हैं:

  • लगातार थकान (Chronic Fatigue): रात भर बच्चे के लिए जागने के अलावा भी शरीर में भयंकर सुस्ती रहती है, जिससे कोई भी काम करने की हिम्मत नहीं होती।
  • वज़न का तेज़ी से बढ़ना (Rapid Weight Gain): थोड़ा सा खाने पर भी वज़न बहुत तेज़ी से बढ़ता है और पेट के आस-पास भयंकर चर्बी जमा होने लगती है जो किसी भी व्यायाम से कम नहीं होती।
  • भयंकर बाल झड़ना (Severe Hair Fall): कंघी करते समय बालों का गुच्छों में टूटना और सिर के आगे के हिस्से से बालों का बहुत पतला हो जाना।
  • अवसाद और मूड स्विंग्स (Postpartum Depression): छोटी-छोटी बातों पर रोना आना, चिड़चिड़ापन और मन में भयंकर उदासी छा जाना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत अपना थायरॉइड प्रोफाइल (Thyroid Profile) टेस्ट कराएँ और चिकित्सक से परामर्श लें।

Delivery के बाद Thyroid बढ़ने के असली कारण

डिलीवरी के बाद थायरॉइड के असंतुलित होने के पीछे गहरे अंदरूनी कारण होते हैं:

  • कमज़ोर 'अग्नि' और 'आम' का संचय: गर्भावस्था और डिलीवरी के बाद पाचन तंत्र बहुत कमज़ोर हो जाता है। खराब पाचन से बना 'आम' (Toxins) रक्त को दूषित करता है और थायरॉइड ग्रंथि के स्रोत (Channels) को ब्लॉक कर देता है।
  • वात दोष का भड़कना: प्रसव (Delivery) के दौरान और बाद में शरीर में खालीपन आने से 'वात' दोष तेज़ी से बढ़ जाता है, जो पूरी ग्रंथि प्रणाली को सुखाकर कमज़ोर कर देता है।
  • नींद की कमी और मानसिक तनाव: बच्चे की देखभाल में नींद पूरी न होने से शरीर में स्ट्रेस हार्मोन बढ़ता है, जो सीधे तौर पर थायरॉइड ग्रंथि के काम को खराब कर देता है।
  • धातु क्षय (Tissue Depletion): बच्चे को जन्म देने और दूध पिलाने की प्रक्रिया में माँ के शरीर से बहुत ज़्यादा पोषण निकलता है, जिससे रस धातु कमज़ोर हो जाती है।

Postpartum Thyroiditis को अनदेखा करने के गंभीर जोखिम

इस भयंकर स्थिति को अगर सिर्फ 'डिलीवरी के बाद की आम कमज़ोरी' मानकर अनदेखा किया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • स्थायी थायरॉइड रोग (Permanent Hypothyroidism): अगर समय पर जड़ से इलाज न हो, तो कुछ महिलाओं में यह सूजन ग्रंथि को हमेशा के लिए खराब कर देती है, और उन्हें ताउम्र हार्मोन की गोलियाँ खानी पड़ती हैं।
  • भयंकर अवसाद (Severe Depression): हार्मोन्स का यह असंतुलन महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालता है, जिससे वे क्लीनिकल डिप्रेशन का शिकार हो जाती हैं।
  • दूध कम बनना (Low Breast Milk Supply): थायरॉइड हार्मोन की कमी से बच्चे के लिए पर्याप्त दूध नहीं बन पाता, जो बच्चे के विकास के लिए खराब है।

Delivery के बाद Thyroid पर आयुर्वेद का क्या नज़रिया है?

आयुर्वेद में थायरॉइड की इस समस्या को 'गलगंड' और 'धातु क्षय' के कारण वात और कफ दोष के बिगड़ने से जोड़कर देखा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, डिलीवरी के बाद जठराग्नि के सुस्त होने से जो 'आम' बनता है, वह रस धातु को दूषित कर देता है। जब यह 'आम' रक्त में मिलता है, तो वह गले की ग्रंथि (Thyroid) के काम को ब्लॉक कर देता है। जीवा आयुर्वेद के डॉक्टर नाड़ी देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं कि हार्मोन किस दोष की वजह से बिगड़े हैं। आयुर्वेद में बस कृत्रिम हार्मोन की गोलियाँ खिलाना मकसद नहीं है, बल्कि वो चाहते हैं कि बीमारी जड़ से ठीक हो, स्रोत साफ हों, और ग्रंथि खुद अपना हार्मोन प्राकृतिक रूप से बनाना सीखे।

जीवा आयुर्वेद Thyroid को संतुलित करने के लिए कैसे काम करता है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर महिला का शरीर और स्वास्थ्य (प्रकृति) अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: मरीज़ को दिख रही थकान, बाल झड़ने और वज़न बढ़ने की रफ्तार की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • पुरानी मेडिकल हिस्ट्री: गर्भावस्था के दौरान के थायरॉइड लेवल और ली जा रही दवाओं का पूरा रिकॉर्ड देखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: कुपित वात और कफ दोषों को पकड़ने के बाद ही अग्नि को तेज़ करने और ग्रंथि को ताकत देने का सबसे सटीक आयुर्वेदिक इलाज शुरू किया जाता है।

Thyroid को प्राकृतिक रूप से मिटाने वाली अचूक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में ग्रंथि को ताकत देने, सूजन कम करने और मेटाबॉलिज़्म को सुधारने के लिए ये जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • कचनार (Kanchanar): यह थायरॉइड ग्रंथि की सूजन कम करने और भयंकर ब्लॉकेज को पिघलाकर साफ करने में आयुर्वेद की सबसे अचूक जड़ी-बूटी है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): यह शरीर के वात दोष को शांत करता है, भयंकर थकान को दूर करता है और तनाव को कम करके थायरॉइड फंक्शन को मज़बूत करता है।
  • शतावरी (Shatavari): यह नई माताओं के लिए एक बेहतरीन रसायन है। यह कमज़ोर हुई रस धातु को फिर से बनाती है और दूध (Breast milk) को प्राकृतिक रूप से बढ़ाती है।
  • त्रिकटु (Trikatu): सोंठ, काली मिर्च और पिप्पली का यह मिश्रण मंद पड़ी जठराग्नि को इतना तेज़ कर देता है कि शरीर बढ़ा हुआ वज़न तेज़ी से कम करने लगता है।

रक्त और ग्रंथि को साफ करने की पंचकर्म चिकित्सा

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, हार्मोन्स को 'रीसेट' (Reset) करने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • उद्वर्तन (Udvartana): औषधीय जड़ी-बूटियों के सूखे पाउडर से मालिश की जाती है। यह शरीर में जमे ज़िद्दी कफ और फैट को पिघलाकर वज़न कम करने में मदद करता है।
  • नस्य (Nasya): नाक में औषधीय तेल की बूँदें डालना पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland) को एक्टिव करता है, जो पूरे शरीर के हार्मोन्स और थायरॉइड को कंट्रोल करने का मुख्य केंद्र है।

Thyroid के ट्रिगर्स को खत्म करने वाला शुद्ध आहार

आयुर्वेदिक वेलनेस में यह समझना बहुत ज़रूरी है कि इस बीमारी में आहार ही आपकी सबसे बड़ी दवा है:

क्या खाएँ?

  • सुपाच्य और गर्म भोजन: मूंग की दाल, लौकी और तरोई का इस्तेमाल बढ़ाएँ, यह पाचन तंत्र पर बोझ नहीं डालते और आसानी से पच जाते हैं।
  • धनिया का पानी: सुबह खाली पेट साबुत धनिया उबालकर उसका पानी पीना थायरॉइड ग्रंथि की कार्यक्षमता को तेज़ी से सुधारता है।
  • घी और नारियल तेल: शुद्ध गाय का घी और नारियल तेल खाने में शामिल करें, यह वात को शांत करते हैं और मेटाबॉलिज़्म बढ़ाते हैं।

क्या न खाएँ?

  • गोईट्रोजेंस (Goitrogens): पत्ता गोभी, फूल गोभी, ब्रोकली और सोयाबीन का सेवन बिल्कुल बंद कर दें, क्योंकि ये ग्रंथि को आयोडीन लेने से रोकते हैं।
  • मैदा और चीनी: बिस्कुट, मिठाइयाँ, और रिफाइंड आटा शरीर में भयंकर 'आम' और वज़न बढ़ाते हैं।
  • ठंडा और बासी भोजन: फ्रिज का ठंडा पानी और बाज़ार का जंक फूड वात दोष को भड़काता है, जो ग्रंथि के लिए बहुत खराब है।

जीवा आयुर्वेद में गहराई से जाँच कैसे होती है?

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच सिर्फ ब्लड रिपोर्ट देखकर नहीं, बल्कि पूरी समझ के साथ की जाती है।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी, वज़न बढ़ने और थकान की रफ्तार को आराम से सुना जाता है।
  • आपके द्वारा इस्तेमाल की गई थायरॉइड की गोलियों की हिस्ट्री के बारे में पूछा जाता है।
  • आपके आहार, नींद और पेट साफ (कब्ज़) होने की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति को जानकर 'आम' और मंद अग्नि के स्तर का पता लगाया जाता है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे 0129 4264323 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

पूरी तरह ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है:

  • हल्की समस्या में सुधार: अगर डिलीवरी के बाद थायरॉइड अभी बढ़ना शुरू हुआ है, तो आहार बदलने और दवाइयों से 6 से 8 हफ्तों में ही थकान दूर होने लगती है और बाल झड़ना कम हो जाता है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर ग्रंथि में सूजन भयंकर है, तो मेटाबॉलिज़्म को पूरी तरह 'रीसेट' होने में 6 से 9 महीने लग सकते हैं।
  • स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर जड़ी-बूटियों (कचनार, अश्वगंधा) का कड़ाई से पालन करता है, तो ग्रंथि प्राकृतिक रूप से ठीक हो जाती है और यह स्थिति हमेशा के लिए परमानेंट होने से बच जाती है।

मरीज़ों का भरोसा – Thyroid से मुक्ति का जीवन बदलने वाला अनुभव

मैं फरीदाबाद से सुनील सिंह हूँ। कुछ समय पहले मेरा वजन अचानक बढ़ने लगा, जिसके बाद जांच कराने पर पता चला कि मुझे थायरॉइड की समस्या है। मैंने एलोपैथिक दवाइयाँ लीं, लेकिन उनसे मेरे वजन और स्वास्थ्य में कोई खास सुधार नहीं हुआ।इसके बाद मेरी हालत और बिगड़ गई और दोबारा जांच में पता चला कि मुझे फैटी लिवर (ग्रेड 3) और किडनी से जुड़ी कुछ समस्याएँ भी हैं। इस दौरान मैं बहुत तनाव में रहने लगा और मेरी नींद भी प्रभावित हो गई।फिर मैंने जीवा आयुर्वेद से संपर्क किया। यहाँ डॉक्टरों ने मेरी पूरी जांच करके मेरी समस्या के मूल कारण को समझा और उसी के अनुसार इलाज शुरू किया।मुझे आयुर्वेदिक दवाइयों के साथ-साथ मेरे लिए विशेष डाइट प्लान भी दिया गया। धीरे-धीरे मेरी सेहत में सुधार हुआ और मेरा फैटी लिवर ग्रेड 3 से घटकर ग्रेड 1 हो गया।आज मैं पहले से काफी बेहतर महसूस करता हूँ और आयुर्वेदिक जीवनशैली को सभी को अपनाने की सलाह देता हूँ।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक उपचार में क्या अंतर है?

पहलू आधुनिक चिकित्सा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य कृत्रिम हार्मोन (Thyroxine) देकर खून में हार्मोन का स्तर नियंत्रित रखना जठराग्नि और मेटाबॉलिज़्म को सुधारकर ग्रंथि को प्राकृतिक रूप से संतुलित करना
नज़रिया समस्या को केवल हार्मोन की कमी तक सीमित मानना ‘अग्नि’, ‘आम’ और वात-कफ असंतुलन को साथ में देखना
उपचार तरीका सिंथेटिक हार्मोन गोलियों पर निर्भरता कचनार, अश्वगंधा जैसी जड़ी-बूटियों और दिनचर्या से अंदरूनी संतुलन सुधारना
डाइट और लाइफस्टाइल दवा पर अधिक ज़ोर, जीवनशैली सुधार सीमित संतुलित आहार, नींद, योग और ‘आम’ नाशक दिनचर्या पर विशेष ध्यान
लंबा असर कई मामलों में जीवन भर दवा की आवश्यकता पड़ सकती है मेटाबॉलिज़्म और पाचन सुधरने से लंबे समय तक प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास

Thyroid के भयंकर लक्षण दिखने पर डॉक्टर की सलाह कब लें?

ग्रंथि सुस्त पड़ने के संकेत दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए यदि:

  • डिलीवरी के बाद बिना कुछ ज़्यादा खाए वज़न लगातार और तेज़ी से बढ़ता जाए।
  • भयंकर बाल झड़ने लगें और कंघी करते समय बालों के गुच्छे हाथ में आएं।
  • लगातार भयंकर उदासी रहे, रोने का मन करे और बच्चे की देखभाल करने की हिम्मत न बचे।
  • गले के निचले हिस्से में कोई गांठ या सूजन (Goiter) महसूस होने लगे।

निष्कर्ष:

आयुर्वेद के हिसाब से डिलीवरी के 6 महीने बाद थायरॉइड का बढ़ना (Postpartum Thyroiditis) मुख्य रूप से कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए 'वात' दोष और दूषित 'आम' से जुड़ी समस्या है। प्रसव के बाद शरीर की कमज़ोरी इस बीमारी को भड़काती है। सिर्फ बाहर से हार्मोन की गोली खाने से रिपोर्ट कुछ दिन के लिए साफ दिखती है लेकिन मेटाबॉलिज़्म सुस्त ही रहता है। इलाज में शरीर की शुद्धि, कचनार और अश्वगंधा जैसी जड़ी-बूटियाँ और धनिया पानी का शुद्ध आहार सबसे ज़्यादा आवश्यक है, जिससे आपकी ग्रंथि ठीक हो सके और यह बीमारी परमानेंट (Permanent) होने से बच जाए।

FAQs

नहीं, यह ज़रूरी नहीं है। ज़्यादातर मामलों में अगर सही समय पर आयुर्वेद से जठराग्नि और वात दोष को ठीक कर लिया जाए, तो थायरॉइड ग्रंथि अपनी पुरानी अवस्था में वापस आ जाती है और यह परमानेंट नहीं होता।

हाँ, बिल्कुल सुरक्षित है। बच्चे को दूध पिलाना बंद न करें। आयुर्वेद में दी जाने वाली शतावरी जैसी जड़ी-बूटियाँ दूध को बढ़ाती हैं और माँ-बच्चे दोनों के लिए फायदेमंद हैं।

एलोपैथी में अक्सर यह गोली ताउम्र खानी पड़ती है। लेकिन आयुर्वेद में सही डाइट और कचनार के प्रयोग से ग्रंथि प्राकृतिक रूप से काम करना सीख जाती है, जिससे जीवन भर गोली खाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

बिल्कुल। कचनार ग्रंथि की सूजन को खत्म करता है और सुबह खाली पेट धनिया का पानी पीने से थायरॉइड के प्राकृतिक हार्मोन्स संतुलित होते हैं।

हाँ, डिलीवरी के बाद बाल झड़ने का एक बड़ा कारण थायरॉइड हार्मोन का असंतुलन (Hypothyroidism) होता है, जो बालों की जड़ों को भयंकर रूप से कमज़ोर कर देता है।

हाँ, तनाव के दौरान शरीर में 'कॉर्टिसोल' हार्मोन निकलता है जो सीधे तौर पर थायरॉइड ग्रंथि के काम को रोक देता है। नई माताओं में नींद की कमी इस समस्या को और खराब कर देती है।

अगर थायरॉइड का स्तर बहुत ज़्यादा बिगड़ा हुआ हो (Hypothyroidism), तो यह ओव्यूलेशन (Ovulation) को रोक सकता है जिससे गर्भधारण में परेशानी आती है। इसका जड़ से इलाज ज़रूरी है।

हाँ। पत्ता गोभी, फूल गोभी, ब्रोकली और सोयाबीन 'गोईट्रोजेंस' (Goitrogens) होते हैं, जो थायरॉइड ग्रंथि को अपना काम करने से रोकते हैं। इसलिए इनका सेवन बिल्कुल बंद कर दें।

वात दोष को शांत करने वाली अश्वगंधा जड़ी-बूटी और शुद्ध गाय का घी आहार में शामिल करने से नसों को ताकत मिलती है और शरीर की भयंकर सुस्ती पूरी तरह खत्म हो जाती है।

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