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RO Water Purifier से पानी ज़रूर साफ हो रहा है, लेकिन शरीर के ज़रूरी Minerals भी निकल रहे हैं

Information By Dr. Keshav Chauhan

आजकल हर घर में साफ पानी पीने के लिए RO (Reverse Osmosis) वाटर प्यूरीफायर का इस्तेमाल बहुत तेज़ी से बढ़ गया है। लोग पानी की गंदगी और घुले हुए रसायनों से बचने के लिए इसे लगाते हैं। यह सच है कि RO पानी को बिल्कुल साफ कर देता है, लेकिन इस प्रक्रिया में वह शरीर के लिए बेहद ज़रूरी  Minerals (जैसे कैल्शियम और मैग्नीशियम) को भी पूरी तरह खत्म कर देता है। आधुनिक विज्ञान मानता है कि ऐसा 'असंतुलित' पानी हड्डियों को कमज़ोर कर रहा है। वहीं, आयुर्वेद के अनुसार बिना  Minerals का यह पानी 'मृत' (Dead) और प्रकृति में अम्लीय (Acidic) हो जाता है। इसका रोज़ाना सेवन शरीर में भयंकर 'वात' और 'पित्त' दोष बढ़ाता है, जिससे जोड़ों का दर्द और पाचन की समस्याएँ जन्म लेती हैं। जीवा आयुर्वेद प्राकृतिक जड़ी-बूटियों और सही जीवनशैली से शरीर में इन  Minerals की कमी को पूरा करता है।

RO वाटर प्यूरीफायर की ज़रूरत क्यों पड़ी? पानी का बदलता रूप

आधुनिक समय में बढ़ते प्रदूषण, फैक्ट्रियों के कचरे और ज़मीन के खारे पानी (High TDS) के कारण प्राकृतिक जल स्रोत पीने लायक नहीं बचे हैं। पानी में घुले भारी धातु (Heavy Metals) और बैक्टीरिया से बचने के लिए RO तकनीक को अपनाया गया। RO मशीन एक बहुत ही बारीक झिल्ली (Membrane) के ज़रिए पानी को छानती है। यह गंदगी को तो बाहर निकाल देती है, लेकिन मशीन यह फर्क नहीं कर पाती कि शरीर के लिए क्या खराब है और क्या ज़रूरी। इस चक्कर में वह पानी में मौजूद प्राकृतिक कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटेशियम और ज़िंक जैसे उन तत्वों को भी साफ कर देती है, जो हमारी माँसपेशियाँ और हड्डियाँ मज़बूत बनाने के लिए ज़रूरी होते हैं।

पानी से  Minerals निकलने पर शरीर में कितनी तरह की बीमारियाँ हो सकती हैं?

लगातार बिना  Minerals (Demineralized) का पानी पीने से शरीर में मुख्य रूप से ये बीमारियाँ पैदा होती हैं:

  • ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis): पानी में कैल्शियम न होने और पानी के एसिडिक (अम्लीय) होने के कारण शरीर हड्डियों से कैल्शियम सोखने लगता है, जिससे हड्डियाँ भुरभुरी और कमज़ोर हो जाती हैं।
  • हृदय रोग (Cardiovascular Issues): मैग्नीशियम की कमी से हृदय की माँसपेशियाँ कमज़ोर पड़ने लगती हैं, जिससे ब्लड प्रेशर और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।
  • गैस्ट्रिक और एसिडिटी (Acidity): RO का पानी अक्सर एसिडिक (pH 7 से कम) होता है। इसे पीने से आँतों में जलन और भयंकर एसिडिटी की समस्या होती है।
  • क्रोनिक फटीग (Chronic Fatigue): इलेक्ट्रोलाइट्स (पोटेशियम/सोडियम) की कमी से नसों और माँसपेशियों में हमेशा थकावट रहती है और शरीर की प्राकृतिक ऊर्जा खत्म हो जाती है।

 Minerals की कमी होने पर शरीर द्वारा दिए जाने वाले भयंकर लक्षण

जब आप रोज़ाना मृत और एसिडिक पानी पीते हैं, तो शरीर अंदर से कमज़ोर होने लगता है। इसके मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:

  • जोड़ों और घुटनों में दर्द: कम उम्र में ही उठते-बैठते घुटनों से कट-कट की आवाज़ आना और भयंकर दर्द होना।
  • पिंडलियों में ऐंठन (Muscle Cramps): मैग्नीशियम की कमी से रात को सोते समय पैरों की नसों का चढ़ जाना और माँसपेशियों में ज़ोर का खिंचाव होना।
  • बालों का तेज़ी से झड़ना: ज़रूरी खनिजों के अभाव में सिर की त्वचा रूखी हो जाती है और बाल गुच्छों में टूटकर गिरने लगते हैं।
  • दाँतों का कमज़ोर होना: दाँतों की ऊपरी परत (Enamel) का घिसना और ठंडी या गर्म चीज़ें खाने पर भयंकर झनझनाहट होना।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत अपने पीने के पानी की जाँच कराएँ और चिकित्सक से परामर्श लें।

RO से शरीर और हड्डियाँ कमज़ोर होने के असली कारण

रोज़ाना RO का पानी पीने से शरीर अंदर से कमज़ोर क्यों हो जाता है? इसके मुख्य अंदरूनी कारण इस प्रकार हैं:

  • शरीर में वात का भयंकर प्रकोप: आयुर्वेद के अनुसार,  Minerals के बिना पानी 'रुक्ष' (रूखा) हो जाता है। यह रूखा पानी शरीर में वायु (वात दोष) को बहुत तेज़ी से बढ़ाता है, जो जोड़ों की चिकनाई को सुखा देता है।
  • अम्लीय (Acidic) जल का प्रभाव: जब पानी से खनिज निकल जाते हैं, तो उसका pH लेवल गिर जाता है। यह अम्लीय पानी रक्त को दूषित करता है और पित्त दोष को भड़काकर अल्सर व एसिडिटी पैदा करता है।
  • पाचक अग्नि का मंद होना: आयुर्वेद में जल को जीवन कहा गया है, लेकिन मृत पानी में 'प्राण' (Life force) नहीं होता। यह शरीर की मेटाबॉलिज़्म और पाचक अग्नि को कमज़ोर कर देता है।

कमज़ोर हड्डियों और  Minerals की कमी को अनदेखा करने के गंभीर जोखिम

RO के साइड इफेक्ट्स और  Minerals की कमी को अगर अनदेखा किया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • बार-बार फ्रैक्चर होना: हड्डियाँ इतनी कमज़ोर हो जाती हैं कि हल्की सी चोट लगने या मुड़ने पर ही टूट (Fracture) जाती हैं।
  • नर्वस सिस्टम का डैमेज: इलेक्ट्रोलाइट्स की लगातार कमी से दिमाग और नसों के बीच का तालमेल बिगड़ जाता है, जिससे हाथों में कंपन (Tremors) शुरू हो सकता है।
  • बच्चों के विकास में रुकावट: बढ़ते बच्चों को अगर ज़रूरी कैल्शियम और  Minerals पानी से न मिलें, तो उनकी शारीरिक और मानसिक ग्रोथ रुक जाती है।

मृत (Dead) पानी और  Minerals पर आयुर्वेद का क्या नज़रिया है?

आयुर्वेद में जल को 'अमृत' माना गया है, बशर्ते उसमें 'पृथ्वी' (Earth) तत्व मौजूद हो। प्राकृतिक पानी जब पहाड़ों, मिट्टी और चट्टानों से होकर गुज़रता है, तो उसमें प्राकृतिक खनिज घुल जाते हैं। यही खनिज पानी को 'जीवंत' (Living Water) बनाते हैं। आयुर्वेद मानता है कि RO मशीन पानी से इसी 'पृथ्वी तत्व' को खत्म कर देती है। डॉक्टर नाड़ी देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं कि वात या पित्त किस कारण से कुपित हुआ है। आयुर्वेद में बस कैल्शियम की कृत्रिम गोलियाँ (Tablets) देना मकसद नहीं है, बल्कि वो चाहते हैं कि शरीर की 'अग्नि' इतनी मज़बूत हो कि वह प्राकृतिक आहार से सारे  Minerals खुद सोख सके और शरीर की 'अस्थि धातु' (Bones) मज़बूत बने।

जीवा आयुर्वेद शरीर की ताकत वापस लाने के लिए कैसे काम करता है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति का शरीर और स्वास्थ्य (प्रकृति) अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: मरीज़ को दिख रहे सभी लक्षणों, दर्द के समय, और कमज़ोरी की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • जीवनशैली का विश्लेषण: मरीज़ के घर के पानी का स्रोत, पीने का तरीका और रोज़ाना का आहार परखा जाता है।

सटीक इलाज की रूपरेखा: इन सभी बातों का अच्छे से विश्लेषण करने और कुपित वात-पित्त को पकड़ने के बाद ही हड्डियों को ताकत देने का सबसे सटीक आयुर्वेदिक इलाज शुरू किया जाता है।

हड्डियों और पाचन को प्राकृतिक रूप से मज़बूत बनाने वाली अचूक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में मृत पानी के असर को काटने और शरीर में खनिजों की कमी पूरी करने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • शिलाजीत (Shilajit): आयुर्वेद में इसे खनिजों (Minerals) का पावरहाउस माना गया है। इसमें 84 से ज़्यादा प्राकृतिक  Minerals होते हैं जो कमज़ोर हड्डियों और माँसपेशियाँ में तुरंत नई जान डाल देते हैं।
  • प्रवाल पिष्टी (Praval Pishti): यह समुद्र के प्राकृतिक मूँगे (Coral) से बना होता है, जो शरीर को सबसे शुद्ध और आसानी से पचने वाला कैल्शियम प्रदान करता है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): यह थकी हुई माँसपेशियों को प्राकृतिक ताकत देती है और नसों के भयंकर दर्द व वात को शांत करती है।
  • अर्जुन (Arjuna): यह हृदय की माँसपेशियों को मज़बूत बनाता है और शरीर में मैग्नीशियम व पोटेशियम की कमी से होने वाले नुकसान को रोकता है।

जमे हुए टॉक्सिन्स को बाहर निकालने की पंचकर्म चिकित्सा

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, वात दोष को बाहर निकालकर संपूर्ण स्वास्थ्य पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • अभ्यंग (Abhyanga): पूरे शरीर पर महानारायण या तिल के तेल की मालिश करने से रूखी हो चुकी नसों और जोड़ों को बाहरी पोषण (नमी) मिलता है और भयंकर जकड़न खुलती है।
  • बस्ती कर्म (Basti): इसे आयुर्वेद में वात रोगों की 'आधी चिकित्सा' कहा गया है। यह आँतों से गंदगी साफ कर शरीर की अवशोषण (Absorption) क्षमता को बढ़ाती है, ताकि शरीर खाने से  Minerals सोख सके।

पानी को 'जीवंत' (Living) बनाने और वात शांत करने वाला शुद्ध आहार

आयुर्वेदिक वेलनेस में यह समझना बहुत ज़रूरी है कि पानी को सही तरीके से पीना और भोजन से  Minerals लेना शरीर के लिए कैसे काम करता है:

क्या खाएँ और पानी को कैसे सुधारें?

  • तांबे या मिट्टी के बर्तन का प्रयोग: RO के पानी को पीने से पहले रात भर मिट्टी के घड़े या तांबे के बर्तन में रखें। इससे पानी में प्राकृतिक पृथ्वी तत्व वापस आ जाते हैं और पानी अल्कलाइन (Alkaline) बन जाता है।
  • सेंधा नमक (Pink Salt) का चुटकी भर प्रयोग: 1 लीटर RO पानी में 1 चुटकी सेंधा नमक मिलाने से उसमें इलेक्ट्रोलाइट्स वापस आ जाते हैं।
  • कैल्शियम युक्त आहार: रोज़ाना सफेद तिल, रागी, मखाने, और गाय का दूध अपनी डाइट में शामिल करें।

क्या न खाएँ?

  • प्लास्टिक की बोतलों का पानी: प्लास्टिक में रखा RO पानी और भी ज़्यादा खराब और अम्लीय हो जाता है, इसका इस्तेमाल बिल्कुल बंद कर दें।
  • पैकेटबंद जूस और कोल्ड ड्रिंक: ये हड्डियाँ गलाने का काम करते हैं और शरीर से बचे-खुचे  Minerals को भी यूरिन के रास्ते बाहर निकाल देते हैं।
  • खट्टी चीज़ें: इमली और अचार जैसी अत्यधिक खट्टी चीज़ें पित्त भड़काती हैं और कैल्शियम को नष्ट करती हैं।

जीवा आयुर्वेद में रोगी की गहराई से जाँच कैसे होती है?

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच सिर्फ ऊपर-ऊपर से दर्द पूछकर नहीं, बल्कि पूरी समझ के साथ की जाती है।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी, हड्डियों के दर्द और थकावट को आराम से सुना जाता है।
  • आपके द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे कैल्शियम या विटामिन की गोलियों की हिस्ट्री के बारे में पूछा जाता है।
  • आपके पानी पीने के तरीके (RO/Filter) और आहार को गहराई से समझा जाता है।
  • आपकी नींद, मानसिक तनाव और पेट साफ (कब्ज़) होने की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति (विशेषकर वात प्रकृति) को जाना जाता है।

इलाज के लिए जीवा आयुर्वेद से कैसे जुड़ें?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे 0129 4264323 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

मरीज़ को ठीक होने में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में  Minerals की कमी का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है:

  • हल्की समस्या में सुधार: अगर घुटनों में दर्द और थकान की अभी शुरुआत है, तो आहार बदलने और आयुर्वेदिक दवाइयों से 4 से 6 हफ्तों में ही सूजन और थकान कम होने लगती है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर हड्डियाँ पूरी तरह भुरभुरी हो चुकी हैं, तो अस्थि धातु को पूरी तरह ताकतवर (Regenerate) होने में 4 से 8 महीने लग सकते हैं।
  • स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर जड़ी-बूटियों (शिलाजीत/प्रवाल) का कड़ाई से पालन करता है, तो भविष्य में कैल्शियम की सिंथेटिक गोलियों के बिना भी हड्डियाँ मज़बूत रहती हैं।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक मशीन (RO) और आयुर्वेदिक जल शोधन में क्या अंतर है?

पहलू आधुनिक मशीन (RO) आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
इलाज का मुख्य लक्ष्य पानी को अत्यधिक फ़िल्टर करके अधिकतम शुद्ध बनाना पानी को शुद्ध करते हुए उसके प्राकृतिक गुण (मिनरल्स) को सुरक्षित रखना
नज़रिया पानी को केवल अशुद्धियों और TDS के आधार पर देखना पानी को ‘जीवनदायी तत्व’ मानकर उसके संतुलन को बनाए रखना
उपचार तरीका RO तकनीक से मिनरल्स सहित अधिकांश तत्वों को हटा देना उबालना, फिटकरी या तांबे/मिट्टी के बर्तन में रखकर प्राकृतिक शोधन
डाइट और लाइफस्टाइल पानी की गुणवत्ता पर सीमित समग्र दृष्टि पानी को दिनचर्या और स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण हिस्सा मानना
लंबा असर अत्यधिक फ़िल्टर पानी से मिनरल की कमी और असंतुलन का जोखिम संतुलित, जीवंत पानी से शरीर को दीर्घकालिक पोषण और संतुलन

 Minerals की भयंकर कमी होने पर डॉक्टर की सलाह कब लें?

लगातार RO का पानी पीने के दौरान अगर ये लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए:

  • हड्डियों या पीठ में बिना ज़्यादा काम किए भयंकर दर्द रहने लगे।
  • नाखूनों का सफेद पड़ना, कमज़ोर होकर टूटना शुरू हो जाए।
  • सुबह उठने पर पिंडलियों में ज़ोर की ऐंठन (Cramps) हो जो काफी देर तक ठीक न हो।
  • आराम करने के बावजूद माँसपेशियों की थकावट दूर न हो रही हो और धड़कन अनियमित महसूस हो।

निष्कर्ष: 

आयुर्वेद के हिसाब से शरीर में खनिजों की कमी और हड्डियों का भुरभुरा होना मुख्य रूप से RO के मृत (Demineralized) और अम्लीय पानी से जुड़ी समस्या है। अप्राकृतिक तरीके से साफ किया गया पानी शरीर में वात दोष बढ़ाता है और पाचक अग्नि को कमज़ोर करता है। सिर्फ बाहर से कृत्रिम गोलियाँ खा लेने से हड्डियाँ मज़बूत नहीं होतीं। इलाज में वात की शुद्धि, शिलाजीत व प्रवाल पिष्टी जैसी जड़ी-बूटियाँ और पानी को तांबे के बर्तन में रखने का नियम सबसे ज़्यादा आवश्यक है, जिससे आपके शरीर की असली ताकत जीवन भर बनी रहे।

FAQs

FAQs

हाँ, क्योंकि RO पानी से लगभग 90-95% प्राकृतिक कैल्शियम और मैग्नीशियम निकाल देता है। इसके बिना पानी एसिडिक हो जाता है, जो शरीर के अंदर की हड्डियों से कैल्शियम सोखने लगता है।

पानी को पीने से पहले तांबे या मिट्टी के घड़े में रखें। आप 1 लीटर पानी में एक चुटकी सेंधा नमक (Himalayan Pink Salt) भी मिला सकते हैं, जिससे पानी में ज़रूरी इलेक्ट्रोलाइट्स वापस आ जाते हैं।

बिल्कुल, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार पीने के पानी का TDS (Total Dissolved Solids) 100 से 300 के बीच होना चाहिए। 50 से कम TDS वाला पानी शरीर के लिए ज़हर (अम्लीय) के समान है।

हाँ, अल्कलाइन फिल्टर RO से निकले हुए एसिडिक पानी के pH को वापस 7 से ऊपर लाता है और उसमें कृत्रिम रूप से कुछ  Minerals जोड़ता है, लेकिन प्राकृतिक तांबे का बर्तन हमेशा बेहतर विकल्प है।

हाँ, जब शरीर को पानी से ज़िंक, मैग्नीशियम और कैल्शियम नहीं मिलता, तो सिर की त्वचा (Scalp) रूखी हो जाती है और बाल तेज़ी से झड़ने (Hair fall) लगते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार पानी को उबालकर (उष्ण जल) पीना सबसे श्रेष्ठ है। उबालने से पानी के कीटाणु मर जाते हैं, पानी पचने में हल्का हो जाता है और उसके  Minerals भी खत्म नहीं होते।

हड्डियों के दर्द में महानारायण तेल की मालिश सबसे ज़्यादा असरदार मानी गई है, क्योंकि यह वात को तुरंत शांत करता है।

सिंथेटिक कैल्शियम की गोलियाँ लंबे समय तक खाने से वे किडनी में पथरी (Kidney Stones) बना सकती हैं। आयुर्वेद में 'प्रवाल पिष्टी' इसका सबसे सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्प है।

यह सिर्फ पानी नहीं, बल्कि पानी में मौजूद 'मैग्नीशियम' की कमी का संकेत है, जो नस को रिलैक्स करने का काम करता है।

हाँ, जीवा आयुर्वेद में सही जड़ी-बूटियों (शिलाजीत, अश्वगंधा) और आहार के नियमों का पालन करके वात दोष को जड़ से संतुलित किया जा सकता है और हड्डियों का दर्द पूरी तरह खत्म हो सकता है।

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