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आंतों की सूजन के साथ दर्द और थकान: IBD के लक्षण क्या दर्शाते हैं?

Information By Dr. Keshav Chauhan

क्या आपको अक्सर पेट में असहनीय मरोड़ के साथ दस्त की शिकायत रहती है? क्या हर वक़्त महसूस होने वाली थकान आपकी ज़िंदगी की रफ़्तार को धीमा कर रही है? हम अक्सर पेट की समस्याओं को 'ग़लत खान-पान' मानकर टाल देते हैं, लेकिन अगर आंतों में सूजन के साथ खून और कमज़ोरी जैसे लक्षण दिखने लगें, तो यह IBD (इंफ्लेमेटरी बॉवेल डिजीज) का संकेत हो सकता है।

IBD केवल एक सामान्य संक्रमण नहीं है, बल्कि यह आंतों की परतों में होने वाली एक गहरी क्षति है। समय पर इसका इलाज करना इसलिए बेहद ज़रूरी है क्योंकि लापरवाही बरतने पर यह आंतों को स्थायी रूप से नुकसान पहुँचा सकता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को पूरी तरह बिगाड़ सकता है।

IBD (इंफ्लेमेटरी बॉवेल डिजीज) क्या होता है?

बिल्कुल आसान भाषा में समझें तो, IBD एक ऐसी स्थिति है जहाँ आपके शरीर का रक्षा तंत्र गलती से अपनी ही आंतों पर हमला करने लगता है। इससे पाचन तंत्र के रास्तों में लंबी अवधि तक चलने वाली सूजन और घाव हो जाते हैं।

यह समस्या साधारण पेट खराब होने से अलग है क्योंकि इसमें सूजन आंतों की गहराई तक पहुँच जाती है, जिससे भोजन का पचना और सोखना लगभग अवरुद्ध (Blocked) हो जाता है।

IBD के प्रकार 

IBD मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है, जिन्हें समझना ज़रूरी है:

अल्सरेटिव कोलाइटिस (Ulcerative Colitis): इसमें सूजन केवल बड़ी आंत और मलाशय की सबसे अंदरूनी परत तक सीमित रहती है। इसमें आंतों में छोटे-छोटे घाव हो जाते हैं।

क्रोहन्स डिजीज (Crohn's Disease): यह ज़्यादा गंभीर हो सकता है क्योंकि यह मुँह से लेकर गुदा तक पाचन तंत्र के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकता है। यह आंतों की दीवार की सभी परतों में गहराई तक फैल सकता है।

IBD के लक्षण

लगातार दस्त: अक्सर दस्त के साथ चिपचिपा पदार्थ या खून का आना।

पेट में मरोड़ और दर्द: यह दर्द अक्सर पेट के निचले हिस्से में ज़्यादा महसूस होता है।

अत्यधिक थकान: शरीर में पोषक तत्वों की कमी और सूजन के कारण हर वक़्त थका हुआ महसूस करना।

वज़न का गिरना: भूख कम लगना और भोजन का सही से न पचना।

बुखार: शरीर के भीतर चल रही सूजन के कारण हल्का या तेज़ बुखार आना।

IBD के कारण 

इम्यून सिस्टम की गड़बड़ी: शरीर का अपनी ही कोशिकाओं को दुश्मन मानकर हमला करना।

जेनेटिक्स (Genetics): परिवार में किसी को IBD होने पर इसका ख़तरा (Risk) बढ़ जाता है।

पर्यावरण: प्रदूषण, बहुत ज़्यादा साफ-सफाई वाला माहौल या पश्चिमी खान-पान।

लाइफस्टाइल: धूम्रपान और तनाव इस बीमारी को और तेज़ बना सकते हैं।

जोखिम बढ़ाने वाले कारण और जटिलताएं

जोखिम बढ़ाने वाले कारण 

उम्र: यह समस्या ज़्यादातर 30 साल से कम उम्र के युवाओं में शुरू होती है।

पारिवारिक इतिहास: यदि माता-पिता में से किसी को यह रोग है, तो बच्चों में इसका ख़तरा अधिक होता है।

धूम्रपान: सिगरेट पीने वालों में क्रोहन्स डिजीज होने की संभावना ज़्यादा रहती है।

आहार: बहुत ज़्यादा वसायुक्त (Fatty) और प्रोसेस्ड फूड खाने वाले लोग इसके घेरे में जल्दी आते हैं।

जटिलताएं 

आंतों का रुकना (Bowel Obstruction): सूजन के कारण आंतों का रास्ता संकरा हो जाना।

फिस्टुला (Fistula): आंतों के बीच असामान्य रास्ते या छेद बन जाना।

गंभीर खून की कमी (Anemia): मल के साथ लगातार खून आने से शरीर में खून की भारी कमी होना।

कोलन कैंसर: लंबे समय तक अल्सरेटिव कोलाइटिस रहने से बड़ी आंत के कैंसर का ख़तरा बढ़ जाता है।

IBD की जाँच कैसे होती है? 

ब्लड टेस्ट: संक्रमण और खून की कमी का पता लगाने के लिए।

स्टूल टेस्ट: मल में सूजन के मार्कर की जाँच के लिए।

कोलोनोस्कोपी: कैमरे के ज़रिए आंतों के भीतर की सूजन और घावों को देखना।

बायोप्सी: आंतों के ऊतकों का छोटा सा टुकड़ा लेकर उसकी जाँच करना।

आयुर्वेद के अनुसार IBD क्या है?

आयुर्वेद में IBD को केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि पाचन तंत्र और प्रतिरक्षा प्रणाली के बीच के गहरे असंतुलन के रूप में देखा जाता है। इसे मुख्य रूप से 'पित्तज ग्रहणी' और 'रक्तज अतिसार' के मिश्रण के रूप में समझा जाता है।

पित्त दोष का भड़कना (Aggravated Pitta):

आयुर्वेद के अनुसार, IBD की जड़ में 'पित्त' का असंतुलन होता है। पित्त का स्वभाव गर्म, तीक्ष्ण और द्रव (तरल) होता है। जब हम बहुत ज़्यादा मिर्च-मसालेदार, खट्टा, या गर्म तासीर वाला भोजन करते हैं, तो यह पित्त आंतों की कोमल परत को 'जलाना' शुरू कर देता है। इसकी वजह से आंतों में घाव और लाली आ जाती है।

रक्त धातु का दूषित होना:  जब पित्त बहुत तेज़ हो जाता है, तो वह रक्त धातु में मिल जाता है। आयुर्वेद में इसे 'रक्तज पित्त' कहते हैं। यही कारण है कि IBD के मरीज़ों को दस्त के साथ खून और चिपचिपा पदार्थ आने की शिकायत होती है। यह इस बात का संकेत है कि शरीर के भीतर 'गर्मी' अपनी सीमा पार कर चुकी है।

ओजस का क्षय (Low Immunity):

आधुनिक विज्ञान जिसे 'ऑटोइम्यून' कहता है जहाँ शरीर खुद पर हमला करता है), आयुर्वेद उसे 'ओजस' की विकृति मानता है। जब शरीर में बहुत ज़्यादा टॉक्सिन्स (आम) जमा हो जाते हैं, तो शरीर की बुद्धि भ्रमित हो जाती है और वह अपनी ही कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाने लगती है।

मुख्य कारण: प्रज्ञापराध और मंदाग्नि:

मंदाग्नि: जब हमारी पाचन अग्नि कमज़ोर होती है, तो खाना पचने के बजाय सड़ने लगता है। यह सड़ा हुआ खाना (आम) आंतों में चिपककर वहाँ की नसों को अवरुद्ध (Block) कर देता है।

विरुद्ध आहार: गलत समय पर खाना या ऐसी चीज़ें एक साथ खाना जो एक-दूसरे के विपरीत हों (जैसे दूध के साथ मछली या नमक), आंतों में ज़हर पैदा करता है, जो IBD को जन्म देता है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का तरीका?

  • वात शमन: ऐसी दवाइयाँ जो शरीर के बढ़े हुए वात को संतुलित करती हैं।
  • स्नेहन (Lubrication): घुटनों के बीच के 'साइनोवियल फ्लूइड' को दोबारा बनाने पर जोर।
  • पाचन शक्ति बढ़ाना : पाचन सुधारना ताकि हड्डियों को पूरा पोषण मिल सके।
  • जड़ से सफाई: शरीर में जमा 'आम' (Toxins) को निकालना जो जोड़ों में फंसकर दर्द बढ़ाते हैं।

IBD (इंफ्लेमेटरी बॉवेल डिजीज) में काम आने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

IBD में आंतों के घावों को भरने और पित्त को शांत करने के लिए ये औषधियाँ रामबाण हैं:

कुटज (Kutaj): यह आंतों के संक्रमण को रोकने और खूनी दस्त को बंद करने की सबसे तेज़ औषधि है। यह आंतों की परतों को दोबारा मज़बूत बनाती है।

बिल्व (Bael): बेल का फल पाचन तंत्र को ठंडा रखता है और दस्त में होने वाली मरोड़ को कम करने में मदद (Help) करता है।

मुलेठी (Licorice): यह आंतों के भीतर की सूजन और अल्सर (घावों) को भरने के लिए एक प्राकृतिक लेप की तरह काम करती है।

शंखपुष्पी और ब्राह्मी: चूँकि IBD का संबंध तनाव से भी है, ये जड़ी-बूटियाँ मन को शांत कर 'ब्रेन-गट एक्सिस' को सुधारती हैं।

आयुर्वेदिक थेरेपी 

IBD में पंचकर्म की प्रक्रियाएँ बहुत सावधानी से और विशेषज्ञ की देखरेख में की जाती हैं:

पिचूबस्ती (Piccha Basti): यह IBD के लिए सबसे ज़्यादा प्रभावी उपचार है। इसमें औषधीय दूध या घी का एनिमा दिया जाता है, जो आंतों के घावों को सुखाता है और रक्तस्राव को रोकता है।

तक्र धारा (Takra Dhara): माथे पर औषधीय छाछ की धारा गिराने से मानसिक तनाव कम होता है, जो IBD के फ्लेयर्स (बढ़ाव) को रोकने में मदद करता है।

IBD में क्या खाएं और क्या न खाएं 

क्या खाएं (Dos):

चावल और मूंग दाल: यह पचने में हल्का होता है और आंतों को आराम देता है।

छाछ (Buttermilk): ताज़ा छाछ में भुना जीरा डालकर लें, यह आंतों के लिए 'अमृत' समान है।

अनार का रस: यह खूनी दस्त को रोकने और शरीर में ताक़त बढ़ाने के लिए बहुत फ़ायदा पहुँचाता है।

उबली हुई सब्ज़ियाँ: लौकी, तोरई और कद्दू जैसी सब्ज़ियाँ पाचन के लिए सरल होती हैं।

क्या न खाएं (Don'ts):

मिर्च-मसाले और तला हुआ खाना: ये आंतों के घावों को और ज़्यादा गहरा कर देते हैं।

दूध और चाय-कॉफी: IBD में अक्सर डेयरी और कैफीन दस्त को तेज़ कर देते हैं।

कच्चा सलाद और साबुत अनाज: इनमें मौजूद फाइबर आंतों की सूजन को और बढ़ा सकता है, इसलिए हमेशा पका हुआ खाना ही खाएं।

शराब और धूम्रपान: ये सीधे तौर पर आंतों की जलन को भड़काते हैं।

जीवा आयुर्वेद में मरीज़  की जाँच कैसे होती है?

जीवा आयुर्वेद में मरीज़  की जाँच सिर्फ ऊपर-ऊपर से नहीं, बल्कि पूरी समझ के साथ की जाती है। यहां कोशिश होती है कि बीमारी की असली वज़ह तक पहुंचा जाए।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी और लक्षणों को आराम से सुना जाता है
  • आपकी पुरानी बीमारी और पहले लिए गए इलाज के बारे में पूछा जाता है
  • आपके खाने-पीने और रोज की आदतों को समझा जाता है
  • आपकी नींद, तनाव और पाचन की स्थिति पर ध्यान दिया जाता है
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति को जाना जाता है
  • शरीर में जमा गंदगी (आम) के संकेत देखे जाते हैं
  • अगर कोई और बीमारी या दवा चल रही है, तो उसे भी ध्यान में रखा जाता है

इन सब चीजों को समझने के बाद आपके लिए एक ऐसा इलाज प्लान बनाया जाता है, जो आपके शरीर और जरूरत के अनुसार हो।

जीवा आयुर्वेद: इलाज का आसान स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक और असरदार समाधान मिल सके।

  1. अपनी जानकारी हमारे साथ साझा करें: सबसे पहले आपको अपनी सेहत से जुड़ी बुनियादी जानकारी हमें देनी होती है। इसके बाद, आप सीधे 0129 4264323 पर कॉल करके अपने इलाज के सफर की शुरुआत कर सकते हैं।
  2. डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करना: आपकी सुविधा के अनुसार, हमारे अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर से बातचीत करने का समय तय किया जाता है। आप अपनी पसंद के हिसाब से नीचे दिए गए दो तरीकों में से कोई भी चुन सकते हैं:
  • क्लिनिक पर जाकर: अगर आप आमने-सामने बैठकर बात करना चाहते हैं, तो अपने नजदीकी Jiva क्लिनिक पर जा सकते हैं।
  • वीडियो कंसल्टेशन (सिर्फ ₹49 में): अगर क्लिनिक आना मुमकिन न हो, तो आप घर बैठे ही वीडियो कॉल के जरिए डॉक्टर से जुड़ सकते हैं। यह खास सुविधा अभी सिर्फ ₹49 में उपलब्ध है।
  1. बीमारी को गहराई से समझना: हमारे डॉक्टर आपसे तसल्ली से बात करते हैं ताकि आपकी तकलीफों और शरीर की प्रकृति को अच्छे से समझ सकें। हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को ठीक करना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वज़ह तक पहुँचना है।
  2. आपके लिए खास इलाज की योजना: पूरीजाँच के बाद, डॉक्टर सिर्फ आपके लिए एक कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान तैयार करते हैं। इसमें शुद्ध जड़ी-बूटियों से बनी दवाइयाँ दी जाती हैं, जो आपके शरीर के दोषों को संतुलित करने और आपको अंदर से सेहतमंद बनाने में मदद करती हैं।

अपॉइंटमेंट के लिए अभी कॉल करें: 0129 4264323

ठीक होने में कितना समय लग सकता है? 

2 से 4 हफ़्ते: सही डाइट और इलाज से दस्त की संख्या और पेट के दर्द में तेज़ कमी आने लगती है।

3 से 6 महीने: आंतों की सूजन कम होने लगती है और शरीर पोषक तत्वों को सोखना शुरू कर देता है, जिससे थकान कम होती है।

1 साल या उससे अधिक: गंभीर मामलों में आंतों की परत को पूरी तरह ठीक होने और ओजस को वापस पाने में लंबा वक़्त लग सकता है।

इलाज से क्या फ़ायदा मिल सकता है? 

फ्लेयर्स में कमी: बार-बार बीमारी का बढ़ना रुक जाता है।

खून की कमी (Anemia) से राहत: ब्लीडिंग रुकने से शरीर में नया रक्त बनने लगता है।

स्टेरॉयड्स से आज़ादी: आयुर्वेद के ज़रिए आप लंबे समय तक चलने वाली हानिकारक दवाओं पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं।

मानसिक शांति: जब पेट ठीक रहता है, तो चिंता और चिड़चिड़ापन अपने आप कम होने लगता है।

ऊर्जा में बढ़ोतरी: भोजन का पोषण शरीर को मिलने लगता है, जिससे आप हर वक़्त ताज़गी महसूस करते हैं।

मरीज़ों का अनुभव

नमस्कार, मैं कंवर, जयपुर, राजस्थान से बोल रही हूँ। मुझे 4 साल पहले अल्सरटिव कोलाइटिस हो गया था, जिसकी वजह से मैं बहुत परेशान हो गई थी। मेरा वजन बहुत कम हो गया था और शरीर में बहुत सी प्रॉब्लम्स होने लगी थीं। 

मैंने इसके लिए एलोपैथी दवाइयां लीं, लेकिन उनके साइड इफेक्ट्स होने लगे थे। साइड इफेक्ट्स की वजह से शरीर में बहुत कमजोरी आने लगी थी। फिर हमने पता किया और टीवी पर जीवा के बारे में देखा। 

उसके बाद हम जीवा क्लीनिक पर गए और वहां से दवाइयां शुरू कीं। आज मुझे दवाइयां लेते हुए समय हो गया है और मैं अब बिल्कुल ठीक हूँ। मुझे विश्वास है कि आगे भी मैं दवाइयां लेते हुए ठीक रहूँगी।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

अपने इलाज पर कितना खर्च आएगा, यह जानना हर मरीज़ के लिए जरूरी होता है। जीवा आयुर्वेद में हम खर्च की जानकारी साफ और आसान तरीके से देते हैं, ताकि आप बिना किसी उलझन के सही फैसला ले सकें।

इलाज का सामान्य खर्च

जो लोग अपनी बीमारी के लिए नियमित इलाज शुरू करना चाहते हैं, उनके लिए दवाइयों और डॉक्टर की सलाह का महीने का खर्च लगभग ₹3,000 से ₹3,500 के बीच आता है।

यह एक औसत अंदाजा है। असल खर्च आपकी बीमारी कितनी पुरानी है और उसकी स्थिति कैसी है, इस पर निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल (स्पेशल पैकेज)

अगर आप अपनी बीमारी को जड़ से मिटाने के लिए थोड़ा ज़्यादा गहराई और विस्तार से इलाज करना चाहते हैं, तो हमारे 'विशेष पैकेज' आपके लिए सबसे अच्छे हैं। इसमें हम सिर्फ बीमारी को नहीं दबाते, बल्कि आपकी पूरी लाइफस्टाइल को सुधारने पर काम करते हैं।

 इसमें शामिल हैं:

  • खास दवाइयाँ(Customized Medicines)
  • सीनियर डॉक्टर से कंसल्टेशन
  • मन को शांत रखने के सेशन्स (Stress Management)
  • योग और मेडिटेशन की ट्रेनिंग
  • पर्सनल डाइट प्लान (जो सिर्फ आपके लिए बना हो)

इन पैकेजेस का खर्च आमतौर पर ₹15,000 से ₹40,000 के बीच होता है, जो आपके 3 से 4 महीने के पूरे इलाज को कवर करता है।

जीवाग्राम  (24x7 देखभाल वाला इलाज)

जिन लोगों को बीमारी से लड़ने के लिए ज़्यादा ध्यान, शांति और आराम के साथ इलाज चाहिए, उनके लिए हमारा जीवाग्राम  सेंटर सबसे बेहतरीन विकल्प है। यह प्रकृति के करीब बना एक ऐसा सेंटर है जहाँ आपको घर जैसा सुकून और अस्पताल जैसी केयर मिलती है।

यहाँ आपको मिलता है:

  • पंचकर्म थेरेपी (शरीर की अंदरूनी सफाई)
  • सादा और पौष्टिक 'सात्विक' खाना
  • इलाज की आधुनिक और बेहतर सुविधाएं
  • आरामदायक रहने की व्यवस्था

यहाँ 7 दिन का प्रोग्राम लगभग ₹1 लाख का होता है। इसमें आपको हर समय विशेषज्ञों की देखभाल मिलती है, ताकि आपका शरीर और मन दोनों पूरी तरह से तरोताजा हो सकें।

लोग जीवा आयुर्वेद पर भरोसा क्यों करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वज़हको जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वज़ह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • असली कारण पर आधारित इलाज: हमारा पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि बीमारी की जड़ क्या है। हम सिर्फ ऊपरी लक्षणों को कम नहीं करते, बल्कि शरीर के अंदर जाकर उस समस्या को ठीक करते हैं जिससे बीमारी शुरू हुई है।
  • हर मरीज़ के लिए एक खास प्लान: आयुर्वेद मानता है कि हर इंसान का शरीर अलग होता है। इसलिए, हम सबको एक ही दवा नहीं देते। आपका इलाज आपकी अपनी प्रकृति, खान-पान और आपकी लाइफस्टाइल के हिसाब से खास आपके लिए तैयार किया जाता है।
  • जाँच और इलाज का सही तरीका: हम एक बहुत ही व्यवस्थित प्रक्रिया का पालन करते हैं। इससे शरीर के हार्मोन्स, पाचन और मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्याओं को गहराई से समझकर उन्हें बैलेंस करने में मदद मिलती है।
  • शुद्ध और सुरक्षित दवाईयां: जीवा की सभी आयुर्वेदिक दवाइयाँ पूरी तरह से शुद्ध जड़ी-बूटियों से बनी होती हैं। इनके बनाने में सुरक्षा और क्वालिटी के कड़े मानकों का पालन किया जाता है ताकि आपको कोई नुकसान न हो।
  • अनुभवी डॉक्टरों की टीम: हमारे पास ऐसे डॉक्टरों की एक बड़ी टीम है जिन्हें आयुर्वेद का सालों का अनुभव है। ये एक्सपर्ट्स हर दिन हजारों मरीज़ों की मुश्किल समस्याओं को सुलझाने में उनकी मदद करते हैं।
  • परिणाम जो सच में दिखते हैं: हमारे 90% से ज़्यादा मरीज़ों ने अपने स्वास्थ्य में बड़ा और सकारात्मक सुधार महसूस किया है।
  • दवाइयों पर निर्भरता में कमी: हमारा लक्ष्य आपको सेहतमंद बनाना है। हमारे 88% मरीज़ धीरे-धीरे दूसरी भारी-भरकम दवाइयों पर अपनी निर्भरता कम करने में सफल रहे हैं और एक नेचुरल लाइफस्टाइल की ओर बढ़े हैं।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

आधुनिक (Allopathy) इलाज आयुर्वेदिक (Ayurveda) इलाज
नज़रिया: मुख्य रूप से दर्द के लक्षणों (Pain) को दबाने पर ज़ोर देता है नज़रिया: दर्द की जड़ 'वात दोष' और 'अग्नि' को संतुलित करने पर काम करता है
दवाइयाँ: पेनकिलर्स, स्टेरॉयड इंजेक्शन या मसल रिलैक्सेंट्स दवाइयाँ: जड़ी-बूटियाँ (जैसे शल्लकी, अश्वगंधा) जो नसों को पोषण देती हैं
प्रक्रिया: गंभीर मामलों में सीधे सर्जरी (Discectomy) की सलाह दी जाती है प्रक्रिया: पंचकर्म (कटि बस्ती, स्नेहन) के ज़रिए बिना सर्जरी सुधार का प्रयास
दुष्प्रभाव: लंबे समय तक पेनकिलर्स लेने से किडनी और पेट पर असर पड़ सकता है दुष्प्रभाव: सामान्यतः प्राकृतिक उपचार, जो पूरे शरीर के संतुलन पर काम करते हैं
नतीजा: तुरंत राहत मिल सकती है, लेकिन समस्या दोबारा होने का खतरा रहता है नतीजा: सुधार में समय लगता है, पर लंबे समय तक राहत मिल सकती है

डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए? 

निष्कर्ष 

IBD की समस्या को केवल दस्त की दवा से हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए पूरे शरीर के संतुलन की ज़रूरत है। आयुर्वेद न केवल आंतों की सूजन को शांत करता है, बल्कि आपके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को भी दोबारा ज़िंदा करता है। सही समय पर इलाज शुरू करके आप अपनी ज़िंदगी को दोबारा रफ़्तार दे सकते हैं।

FAQs

नहीं, IBS में आंतों की बनावट नहीं बिगड़ती, जबकि IBD में आंतों में गहरी सूजन और घाव हो जाते हैं।

ज़रूरी नहीं, लेकिन यदि गेहूँ खाने से दस्त बढ़ते हैं, तो कुछ वक़्त के लिए इससे बचना बेहतर है।

हाँ, हल्का योग और प्राणायाम तनाव कम करते हैं, जिससे सूजन कम करने में मदद  मिलती है।

आयुर्वेद के अनुसार, अगर शुरुआत में ही सही अनुशासन बरता जाए, तो इसे लंबे समय तक शांत रखा जा सकता है।

यदि समय पर आयुर्वेदिक उपचार और सही आहार का पालन न किया जाए, तो आंतों में रुकावट या फिस्टुला होने पर सर्जरी का ख़तरा बढ़ जाता है। आयुर्वेद का लक्ष्य शुरुआत में ही सूजन को रोककर सर्जरी की नौबत से बचाना है।

जी हाँ, तनाव सीधे तौर पर आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित करता है। बहुत ज़्यादा चिंता करने से शरीर में 'पित्त' बढ़ता है, जो आंतों की सूजन को और तेज़  कर सकता है।

लंबे समय तक रहने वाली आंतों की सूजन (विशेषकर अल्सरेटिव कोलाइटिस) कोलन कैंसर के जोखिम को थोड़ा बढ़ा देती है। इसलिए नियमित रूप से डॉक्टर से जाँच कराते रहना ज़रूरी है।

आयुर्वेद में 'दाह' को शांत करने के लिए औषधीय घी (जैसे दाड़िमादि घृत) की सलाह दी जाती है। यह आंतों के घावों को भरने में मदद करता है, लेकिन इसे केवल डॉक्टर की सलाह पर ही शुरू करना चाहिए।

खट्टे फल (संतरा, नींबू) सूजन बढ़ा सकते हैं। इसके बजाय पका हुआ केला या मीठा अनार लेना ज़्यादा  सुरक्षित है। फलों को कच्चा खाने के बजाय हल्का पकाकर या जूस के रूप में लेना आंतों पर ज़ोर कम डालता है।

नहीं, IBD कोई संक्रामक बीमारी (Contagious disease) नहीं है। यह आपके शरीर की अपनी आंतरिक गड़बड़ी और इम्यून सिस्टम के असंतुलन के कारण होती है, इसलिए यह छूने या साथ रहने से नहीं फैलती।

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