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आंतों की सूजन के साथ दर्द और थकान: IBD के लक्षण क्या दर्शाते हैं?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

क्या आपको अक्सर पेट में असहनीय मरोड़ के साथ दस्त की शिकायत रहती है? क्या हर वक़्त महसूस होने वाली थकान आपकी ज़िंदगी की रफ़्तार को धीमा कर रही है? हम अक्सर पेट की समस्याओं को 'ग़लत खान-पान' मानकर टाल देते हैं लेकिन अगर आंतों में सूजन के साथ खून और कमज़ोरी जैसे लक्षण दिखने लगें तो यह IBD (इंफ्लेमेटरी बॉवेल डिजीज) का संकेत हो सकता है।

IBD केवल एक सामान्य संक्रमण नहीं है बल्कि यह आंतों की परतों में होने वाली एक गहरी क्षति है। समय पर इसका इलाज करना इसलिए बेहद ज़रूरी है क्योंकि लापरवाही बरतने पर यह आंतों को स्थायी रूप से नुकसान पहुँचा सकता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को पूरी तरह बिगाड़ सकता है।

IBD (इंफ्लेमेटरी बॉवेल डिजीज) क्या होता है?

बिल्कुल आसान भाषा में समझें तो IBD एक ऐसी स्थिति है जहाँ आपके शरीर का रक्षा तंत्र गलती से अपनी ही आंतों पर हमला करने लगता है। इससे पाचन तंत्र के रास्तों में लंबी अवधि तक चलने वाली सूजन और घाव हो जाते हैं।

यह समस्या साधारण पेट खराब होने से अलग है क्योंकि इसमें सूजन आंतों की गहराई तक पहुँच जाती है जिससे भोजन का पचना और सोखना लगभग अवरुद्ध (Blocked) हो जाता है।

IBD के प्रकार 

IBD मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है जिन्हें समझना ज़रूरी है

अल्सरेटिव कोलाइटिस (Ulcerative Colitis) इसमें सूजन केवल बड़ी आंत और मलाशय की सबसे अंदरूनी परत तक सीमित रहती है। इसमें आंतों में छोटे-छोटे घाव हो जाते हैं।

क्रोहन्स डिजीज (Crohn's Disease) यह ज़्यादा गंभीर हो सकता है क्योंकि यह मुँह से लेकर गुदा तक पाचन तंत्र के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकता है। यह आंतों की दीवार की सभी परतों में गहराई तक फैल सकता है।

IBD के लक्षण

लगातार दस्त अक्सर दस्त के साथ चिपचिपा पदार्थ या खून का आना।

पेट में मरोड़ और दर्द यह दर्द अक्सर पेट के निचले हिस्से में ज़्यादा महसूस होता है।

अत्यधिक थकान शरीर में पोषक तत्वों की कमी और सूजन के कारण हर वक़्त थका हुआ महसूस करना।

वज़न का गिरनाभूख कम लगना और भोजन का सही से न पचना।

बुखार शरीर के भीतर चल रही सूजन के कारण हल्का या तेज़ बुखार आना।

IBD के कारण 

इम्यून सिस्टम की गड़बड़ी शरीर का अपनी ही कोशिकाओं को दुश्मन मानकर हमला करना।

जेनेटिक्स (Genetics) परिवार में किसी को IBD होने पर इसका ख़तरा (Risk) बढ़ जाता है।

पर्यावरण प्रदूषण बहुत ज़्यादा साफ-सफाई वाला माहौल या पश्चिमी खान-पान।

लाइफस्टाइल धूम्रपान और तनाव इस बीमारी को और तेज़ बना सकते हैं।

जोखिम बढ़ाने वाले कारण और जटिलताएं

जोखिम बढ़ाने वाले कारण 

उम्र यह समस्या ज़्यादातर 30 साल से कम उम्र के युवाओं में शुरू होती है।

पारिवारिक इतिहास यदि माता-पिता में से किसी को यह रोग है तो बच्चों में इसका ख़तरा अधिक होता है।

धूम्रपान सिगरेट पीने वालों में क्रोहन्स डिजीज होने की संभावना ज़्यादा रहती है।

आहार बहुत ज़्यादा वसायुक्त (Fatty) और प्रोसेस्ड फूड खाने वाले लोग इसके घेरे में जल्दी आते हैं।

जटिलताएं 

आंतों का रुकना (Bowel Obstruction) सूजन के कारण आंतों का रास्ता संकरा हो जाना।

फिस्टुला (Fistula) आंतों के बीच असामान्य रास्ते या छेद बन जाना।

गंभीर खून की कमी (Anemia) मल के साथ लगातार खून आने से शरीर में खून की भारी कमी होना।

कोलन कैंसर लंबे समय तक अल्सरेटिव कोलाइटिस रहने से बड़ी आंत के कैंसर का ख़तरा बढ़ जाता है।

IBD की जाँच कैसे होती है? 

ब्लड टेस्ट संक्रमण और खून की कमी का पता लगाने के लिए।

स्टूल टेस्ट मल में सूजन के मार्कर की जाँच के लिए।

कोलोनोस्कोपी कैमरे के ज़रिए आंतों के भीतर की सूजन और घावों को देखना।

बायोप्सी आंतों के ऊतकों का छोटा सा टुकड़ा लेकर उसकी जाँच करना।

आयुर्वेद के अनुसार IBD क्या है?

आयुर्वेद में IBD को केवल एक बीमारी नहीं बल्कि पाचन तंत्र और प्रतिरक्षा प्रणाली के बीच के गहरे असंतुलन के रूप में देखा जाता है। इसे मुख्य रूप से 'पित्तज ग्रहणी' और 'रक्तज अतिसार' के मिश्रण के रूप में समझा जाता है।

पित्त दोष का भड़कना (Aggravated Pitta)

आयुर्वेद के अनुसार IBD की जड़ में 'पित्त' का असंतुलन होता है। पित्त का स्वभाव गर्म तीक्ष्ण और द्रव (तरल) होता है। जब हम बहुत ज़्यादा मिर्च-मसालेदार खट्टा या गर्म तासीर वाला भोजन करते हैं तो यह पित्त आंतों की कोमल परत को 'जलाना' शुरू कर देता है। इसकी वजह से आंतों में घाव और लाली आ जाती है।

रक्त धातु का दूषित होना  जब पित्त बहुत तेज़ हो जाता है तो वह रक्त धातु में मिल जाता है। आयुर्वेद में इसे 'रक्तज पित्त' कहते हैं। यही कारण है कि IBD के मरीज़ों को दस्त के साथ खून और चिपचिपा पदार्थ आने की शिकायत होती है। यह इस बात का संकेत है कि शरीर के भीतर 'गर्मी' अपनी सीमा पार कर चुकी है।

ओजस का क्षय (Low Immunity)

आधुनिक विज्ञान जिसे 'ऑटोइम्यून' कहता है जहाँ शरीर खुद पर हमला करता है) आयुर्वेद उसे 'ओजस' की विकृति मानता है। जब शरीर में बहुत ज़्यादा टॉक्सिन्स (आम) जमा हो जाते हैं तो शरीर की बुद्धि भ्रमित हो जाती है और वह अपनी ही कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाने लगती है।

मुख्य कारण प्रज्ञापराध और मंदाग्नि

मंदाग्नि जब हमारी पाचन अग्नि कमज़ोर होती है तो खाना पचने के बजाय सड़ने लगता है। यह सड़ा हुआ खाना (आम) आंतों में चिपककर वहाँ की नसों को अवरुद्ध (Block) कर देता है।

विरुद्ध आहार गलत समय पर खाना या ऐसी चीज़ें एक साथ खाना जो एक-दूसरे के विपरीत हों (जैसे दूध के साथ मछली या नमक) आंतों में ज़हर पैदा करता है जो IBD को जन्म देता है।

आयुर्वेदिक थेरेपी 

IBD में पंचकर्म की प्रक्रियाएँ बहुत सावधानी से और विशेषज्ञ की देखरेख में की जाती हैं

पिचूबस्ती (Piccha Basti) यह IBD के लिए सबसे ज़्यादा प्रभावी उपचार है। इसमें औषधीय दूध या घी का एनिमा दिया जाता है जो आंतों के घावों को सुखाता है और रक्तस्राव को रोकता है।

तक्र धारा (Takra Dhara) माथे पर औषधीय छाछ की धारा गिराने से मानसिक तनाव कम होता है जो IBD के फ्लेयर्स (बढ़ाव) को रोकने में मदद करता है।

IBD में क्या खाएं और क्या न खाएं 

क्या खाएं (Dos)

चावल और मूंग दाल यह पचने में हल्का होता है और आंतों को आराम देता है।

छाछ (Buttermilk) ताज़ा छाछ में भुना जीरा डालकर लें यह आंतों के लिए 'अमृत' समान है।

अनार का रस यह खूनी दस्त को रोकने और शरीर में ताक़त बढ़ाने के लिए बहुत फ़ायदा पहुँचाता है।

उबली हुई सब्ज़ियाँ लौकी तोरई और कद्दू जैसी सब्ज़ियाँ पाचन के लिए सरल होती हैं।

क्या न खाएं (Don'ts)

मिर्च-मसाले और तला हुआ खाना ये आंतों के घावों को और ज़्यादा गहरा कर देते हैं।

दूध और चाय-कॉफी IBD में अक्सर डेयरी और कैफीन दस्त को तेज़ कर देते हैं।

कच्चा सलाद और साबुत अनाज इनमें मौजूद फाइबर आंतों की सूजन को और बढ़ा सकता है इसलिए हमेशा पका हुआ खाना ही खाएं।

शराब और धूम्रपान ये सीधे तौर पर आंतों की जलन को भड़काते हैं।

मरीज़ों का अनुभव

नमस्कार मैं कंवर जयपुर राजस्थान से बोल रही हूँ। मुझे 4 साल पहले अल्सरटिव कोलाइटिस हो गया था जिसकी वजह से मैं बहुत परेशान हो गई थी। मेरा वजन बहुत कम हो गया था और शरीर में बहुत सी प्रॉब्लम्स होने लगी थीं। 

मैंने इसके लिए एलोपैथी दवाइयां लीं लेकिन उनके साइड इफेक्ट्स होने लगे थे। साइड इफेक्ट्स की वजह से शरीर में बहुत कमजोरी आने लगी थी। फिर हमने पता किया और टीवी पर जीवा के बारे में देखा। 

उसके बाद हम जीवा क्लीनिक पर गए और वहां से दवाइयां शुरू कीं। आज मुझे दवाइयां लेते हुए समय हो गया है और मैं अब बिल्कुल ठीक हूँ। मुझे विश्वास है कि आगे भी मैं दवाइयां लेते हुए ठीक रहूँगी।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

आधुनिक (Allopathy) इलाज आयुर्वेदिक (Ayurveda) इलाज
नज़रिया मुख्य रूप से दर्द के लक्षणों (Pain) को दबाने पर ज़ोर देता है नज़रिया दर्द की जड़ 'वात दोष' और 'अग्नि' को संतुलित करने पर काम करता है
दवाइयाँ पेनकिलर्स स्टेरॉयड इंजेक्शन या मसल रिलैक्सेंट्स दवाइयाँ जड़ी-बूटियाँ (जैसे शल्लकी अश्वगंधा) जो नसों को पोषण देती हैं
प्रक्रिया गंभीर मामलों में सीधे सर्जरी (Discectomy) की सलाह दी जाती है प्रक्रिया पंचकर्म (कटि बस्ती स्नेहन) के ज़रिए बिना सर्जरी सुधार का प्रयास
दुष्प्रभाव लंबे समय तक पेनकिलर्स लेने से किडनी और पेट पर असर पड़ सकता है दुष्प्रभाव सामान्यतः प्राकृतिक उपचार जो पूरे शरीर के संतुलन पर काम करते हैं
नतीजा तुरंत राहत मिल सकती है लेकिन समस्या दोबारा होने का खतरा रहता है नतीजा सुधार में समय लगता है पर लंबे समय तक राहत मिल सकती है

डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए? 

निष्कर्ष 

IBD की समस्या को केवल दस्त की दवा से हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए पूरे शरीर के संतुलन की ज़रूरत है। आयुर्वेद न केवल आंतों की सूजन को शांत करता है बल्कि आपके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को भी दोबारा ज़िंदा करता है। सही समय पर इलाज शुरू करके आप अपनी ज़िंदगी को दोबारा रफ़्तार दे सकते हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं, IBS में आंतों की बनावट नहीं बिगड़ती, जबकि IBD में आंतों में गहरी सूजन और घाव हो जाते हैं।

ज़रूरी नहीं, लेकिन यदि गेहूँ खाने से दस्त बढ़ते हैं, तो कुछ वक़्त के लिए इससे बचना बेहतर है।

हाँ, हल्का योग और प्राणायाम तनाव कम करते हैं, जिससे सूजन कम करने में मदद  मिलती है।

आयुर्वेद के अनुसार, अगर शुरुआत में ही सही अनुशासन बरता जाए, तो इसे लंबे समय तक शांत रखा जा सकता है।

यदि समय पर आयुर्वेदिक उपचार और सही आहार का पालन न किया जाए, तो आंतों में रुकावट या फिस्टुला होने पर सर्जरी का ख़तरा बढ़ जाता है। आयुर्वेद का लक्ष्य शुरुआत में ही सूजन को रोककर सर्जरी की नौबत से बचाना है।

जी हाँ, तनाव सीधे तौर पर आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित करता है। बहुत ज़्यादा चिंता करने से शरीर में 'पित्त' बढ़ता है, जो आंतों की सूजन को और तेज़  कर सकता है।

लंबे समय तक रहने वाली आंतों की सूजन (विशेषकर अल्सरेटिव कोलाइटिस) कोलन कैंसर के जोखिम को थोड़ा बढ़ा देती है। इसलिए नियमित रूप से डॉक्टर से जाँच कराते रहना ज़रूरी है।

आयुर्वेद में 'दाह' को शांत करने के लिए औषधीय घी (जैसे दाड़िमादि घृत) की सलाह दी जाती है। यह आंतों के घावों को भरने में मदद करता है, लेकिन इसे केवल डॉक्टर की सलाह पर ही शुरू करना चाहिए।

खट्टे फल (संतरा, नींबू) सूजन बढ़ा सकते हैं। इसके बजाय पका हुआ केला या मीठा अनार लेना ज़्यादा  सुरक्षित है। फलों को कच्चा खाने के बजाय हल्का पकाकर या जूस के रूप में लेना आंतों पर ज़ोर कम डालता है।

नहीं, IBD कोई संक्रामक बीमारी (Contagious disease) नहीं है। यह आपके शरीर की अपनी आंतरिक गड़बड़ी और इम्यून सिस्टम के असंतुलन के कारण होती है, इसलिए यह छूने या साथ रहने से नहीं फैलती।

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