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मल त्याग के दौरान खून आना लेकिन दर्द कम होना: क्या यह इंटरनल पाइल्स का संकेत है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

मल त्याग के समय अचानक ताज़ा लाल खून देखना किसी के लिए भी डरावना हो सकता है। अक्सर लोग इसे यह सोचकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि "दर्द तो हो ही नहीं रहा, शायद मामूली गर्मी होगी। लेकिन बिना दर्द के खून आना इंटरनल पाइल्स या अंदरूनी बवासीर का एक बड़ा लक्षण हो सकता है। इसे समय पर पहचानना और इलाज करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि अनदेखी करने पर यह शरीर में खून की कमी और गंभीर इन्फेक्शन का कारण बन सकता है।

इंटरनल पाइल्स क्या होता है?

आसान भाषा में कहें तो, हमारे मलाशय के अंदरूनी हिस्से में कुछ रक्त वाहिकाएं होती हैं। जब किन्हीं कारणों से इन नसों पर दबाव बढ़ता है, तो ये सूज जाती हैं और मसे का रूप ले लेती हैं। चूंकि ये मसे मलाशय के अंदरूनी हिस्से में होते हैं जहाँ दर्द महसूस करने वाली नसें कम होती हैं, इसलिए इनमें दर्द नहीं होता, लेकिन मल के घर्षण से इनसे खून निकलने लगता है।

इंटरनल पाइल्स के प्रकार और स्टेज

इंटरनल पाइल्स को उनकी गंभीरता के आधार पर चार चरणों में बाँटा गया है

स्टेज 1 मसे मलाशय के अंदर ही रहते हैं। इनसे केवल खून आता है, बाहर कुछ महसूस नहीं होता।

स्टेज 2 मल त्याग के दौरान मसे बाहर आते हैं, लेकिन क्रिया के बाद अपने आप अंदर चले जाते हैं।

स्टेज 3 मसे बाहर आते हैं और उन्हें हाथ से अंदर धकेलना पड़ता है।

स्टेज 4 मसे स्थायी रूप से बाहर ही रहते हैं और उन्हें अंदर नहीं धकेला जा सकता। इस स्टेज में दर्द और तकलीफ़ बढ़ जाती है।

इंटरनल पाइल्स के लक्षण

  •  मल त्याग के दौरान चमकदार लाल खून की बूंदें गिरना या टॉयलेट पेपर पर खून दिखना।
  •  मलाशय के हिस्से में भारीपन या ऐसा महसूस होना कि पेट पूरी तरह साफ़ नहीं हुआ है।
  •  बिना किसी कारण के गुदा मार्ग से चिपचिपा पदार्थ निकलना।
  •  गंभीर स्थिति में मसों का बाहर निकलना और हल्की खुजली होना।
  • आमतौर पर शुरुआत में दर्द का बिल्कुल न होना।

इंटरनल पाइल्स के मुख्य कारण

 क्रॉनिक कब्ज़ लंबे समय तक कब्ज़ रहना और मल त्याग के लिए घंटों ज़ोर लगाना।

ग़लत खान-पान भोजन में फ़ाइबर की कमी और बहुत ज़्यादा मिर्च-मसाले वाला खाना।

गर्भावस्था (Pregnancy) प्रेगनेंसी के दौरान पेट के निचले हिस्से पर दबाव बढ़ने से नसों में सूजन आ सकती है।

भारी सामान उठाना अचानक बहुत ज़्यादा वज़न उठाने से पेट के अंदरुनी दबाव का बढ़ना।

मोटापाअधिक वज़न नसों पर अतिरिक्त दबाव डालता है।

जोखिम और जटिलताएँ 

इंटरनल पाइल्स को नज़रअंदाज़ करना 'समय बम' जैसा हो सकता है। यहाँ इसके जोखिम और भविष्य की दिक़्क़तें दी गई हैं

किन लोगों को इसका 'ज़्यादा' ख़तरा है?

लंबे वक़्त तक बैठने वाले जो लोग दफ़्तर में घंटों एक ही जगह बैठकर काम करते हैं, उनके पेल्विक हिस्से में रक्त संचार धीमा पड़ जाता है, जिससे नसों पर दबाव बढ़ जाता है।

पुराने कब्ज़ के मरीज़ जिनका पेट 3-4 दिन तक साफ़ नहीं होता, वे मल त्याग के लिए जो 'स्ट्रेन' लगाते हैं, वह सीधा अंदरूनी नसों को चोट पहुँचाता है।

अत्यधिक जिम और वज़न उठाना बिना सही तकनीक के भारी वज़नउठाने से पेट के अंदरुनी हिस्से पर दबाव बहुत बढ़ जाता है।

इलाज न मिलने पर होने वाली जटिलताएँ (Complications)

एनीमिया (खून की कमी) रोज़ाना मल के साथ थोड़ा-थोड़ा खून बहना शरीर को अंदर से खोखला कर देता है। मरीज़ को चक्कर आना, कमज़ोरी और पीलापन महसूस होने लगता है।

स्ट्रैंगुलेटेड पाइल्स (Strangulated Piles) यह एक मेडिकल इमरजेंसी है। इसमें अंदरूनी मसे बाहर निकल आते हैं और गुदा मार्ग की मांसपेशियाँ उन्हें कस लेती हैं। इससे मसों की ब्लड सप्लाई रुक जाती है, जिससे भयंकर दर्द, सूजन और इन्फेक्शन (Sepsis) का ख़तरा हो जाता है।

 फिस्टुला और एब्सेस अगर बवासीर में इन्फेक्शन हो जाए, तो वहां मवाद बन सकता है, जो आगे चलकर फिस्टुला जैसी और भी जटिल बीमारी का रूप ले सकता है।

इंटरनल पाइल्स की जाँच कैसे होती है? 

डिजिटल रेक्टल एग्ज़ामिनेशन डॉक्टर उंगली की मदद से मलाशय के अंदर मसों की मौजूदगी की जाँच करते हैं।

एनोस्कोपी (Anoscopy) एक छोटे उपकरण की मदद से मलाशय के अंदरूनी हिस्से को साफ़ देखा जाता है।

सिग्मोइडोस्कोपी यदि ब्लीडिंग का कारण संदिग्ध हो, तो आंतों के थोड़े गहरे हिस्से की जाँच की जाती है।

आयुर्वेद में इंटरनल पाइल्स ?

आयुर्वेद इस बीमारी को केवल मलाशय की सूजन नहीं, बल्कि पूरे पाचन तंत्र की 'बग़ावत' के रूप में देखता है।

 मंदाग्नि और 'आम' (Toxins) आयुर्वेद के अनुसार, बवासीर की जननी 'मंदाग्नि' (कमज़ोर पाचन शक्ति) है। जब जठराग्नि भोजन को सही से नहीं पचा पाती, तो शरीर में अधपका ज़हरीला तत्व बनता है जिसे 'आम' कहते हैं। यह चिपचिपा 'आम' मलाशय की नसों में जाकर फंस जाता है, जिससे वहाँ का रास्ता संकरा हो जाता है और दबाव बढ़ता है।

 अपान वायु की विकृति मल त्याग की क्रिया को 'अपान वायु' नियंत्रित करती है। जब वात दोष कुपित हो जाता है, तो यह मलाशय के मार्ग में रूखापन और कड़ापन पैदा करता है। यही कारण है कि मल त्याग के समय नसों पर भयंकर ज़ोर पड़ता है और वे सूजकर मसे बन जाती हैं।

 रक्त-पित्त का असंतुलन बिना दर्द के खून आने वाली बवासीर को आयुर्वेद में 'रक्तार्श' कहा जाता है। इसमें शरीर में 'पित्त' की गर्मी इतनी बढ़ जाती है कि वह रक्त को दूषित कर देती है। यही वज़ह है कि बिना किसी चीरे या तेज़ दर्द के ताज़ा लाल खून निकलने लगता है।

आयुर्वेदिक थेरेपी 

जीवा आयुर्वेद में इंटरनल पाइल्स के लिए विशेष बाहरी और आंतरिक उपचार किए जाते हैं

अवगाह स्वेद (Sitz Bath) इसमें मरीज़ को गुनगुने औषधीय काढ़े या पानी के टब में बैठने की सलाह दी जाती है। यह मलाशय के हिस्से की सूजन कम करता है और दर्द व भारीपन में तुरंत राहत देता है।

बस्ती चिकित्सा (Basti Karma) यह पंचकर्म का एक हिस्सा है। इसमें औषधीय तेलों का प्रयोग किया जाता है, जो अंदरूनी मसों के घाव भरता है और मलाशय के मार्ग को चिकना बनाता है।

 लेप और पिचू (Lepa & Pichu) औषधीय तेल में भीगे हुए रुई के फाहे का इस्तेमाल मलाशय के अंदरूनी हिस्से को आराम देने और ब्लीडिंग रोकने के लिए किया जाता है।

क्या खाएं और क्या न खाएं? 

क्या खाएं (फ़ायदेमंद)

भरपूर पानी और नारियल पानी।

अदरक, गिलोय और लहसुन का काढ़ा।

पुराना चावल, मूंग की दाल और लौकी-तोरई।

ताज़ा और हल्का सुपाच्य भोजन।

क्या न खाएं (परहेज़)

लाल मांस (Red Meat) और शराब।

उड़द की दाल, राजमा और बहुत ज़्यादा पनीर।

मैदा, सफ़ेद चीनी और ज़्यादा नमक।

खट्टी चीज़ें (दही, अचार, इमली)।

मरीज़ो का अनुभव 

मेरा नाम श्रवण है और मैं ब्लीडिंग पाइल्स से बहुत अधिक पीड़ित था। मैं एक बार इसका ऑपरेशन करा चुका था और दोबारा भी ऑपरेशन के लिए जा रहा था, लेकिन कुछ कारणों से ऑपरेशन हुआ नहीं।

तभी मुझे किसी ने डॉक्टर आदर्श जी के बारे में बताया और मैं उनके पास आया। उनकी दवाई लगभग 4-5 महीने चली, लेकिन 15 दिन के इलाज के बाद से ही मेरी ब्लीडिंग बिल्कुल बंद हो गई थी। 

अभी मैं खुद को बिल्कुल रोग मुक्त महसूस करता हूँ। इसके लिए डॉक्टर साहब को बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं दूसरों से भी यही निवेदन करूँगा कि यदि कोई इस रोग से पीड़ित हो, तो एक बार डॉक्टर साहब से आकर अवश्य मिले।

आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार में अंतर

विशेषता आधुनिक इलाज (Allopathy) आयुर्वेदिक इलाज (Ayurveda)
मुख्य उद्देश्य लैक्सेटिव्स (Laxatives) के ज़रिए मल को तुरंत बाहर निकालना। पाचन अग्नि (Agni) को बढ़ाकर कब्ज की जड़ को खत्म करना।
कार्यप्रणाली यह आंतों में पानी खींचकर या उन्हें उत्तेजित कर अस्थायी राहत देता है। यह 'वात दोष' को संतुलित करता है और आंतों के रूखेपन को गहराई से ठीक करता है।
दवाइयों का असर लंबे समय तक इस्तेमाल से आंतें 'सुस्त' हो सकती हैं और दवा की आदत पड़ सकती है। प्राकृतिक जड़ी-बूटियाँ आंतों की मांसपेशियों को मज़बूत बनाती हैं, न कि उन्हें कमज़ोर।
नतीजा तुरंत राहत मिलती है, लेकिन समस्या अक्सर दोबारा लौट आती है। सुधार में थोड़ा वक़्त लगता है, लेकिन नतीजे स्थायी और सुरक्षित होते हैं।

डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए? 

इंटरनल पाइल्स में अक्सर दर्द नहीं होता, इसलिए लोग इसे टालते रहते हैं। लेकिन अगर आपको नीचे दिए गए संकेत मिल रहे हैं, तो तुरंत डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है

लगातार ब्लीडिंग यदि मल त्याग के दौरान हर बार खून की बूंदें गिर रही हों या टॉयलेट पॉट में खून साफ़ नज़र आ रहा हो।

मसों का बाहर आना (Prolapse) मल त्याग के दौरान यदि मलाशय के अंदर से मांस के टुकड़े (Masses) बाहर महसूस होने लगें।

अत्यधिक कमज़ोरी ब्लीडिंग की वजह से अगर आपको बार-बार चक्कर आ रहे हों, आँखों के आगे अंधेरा छा रहा हो या चेहरा पीला पड़ गया हो (एनीमिया के लक्षण)।

अचानक तेज़ दर्द इंटरनल पाइल्स में आमतौर पर दर्द नहीं होता, लेकिन अगर अचानक तेज़ चुभन या दर्द शुरू हो जाए, तो यह इन्फेक्शन या नस के दबने (Strangulation) का संकेत हो सकता है।

चिपचिपा पदार्थ निकलना यदि गुदा मार्ग से लगातार म्यूकस (Mucus) या चिपचिपा पानी निकल रहा हो, जो कपड़ों को गंदा कर रहा हो।

निष्कर्ष 

बिना दर्द के खून आना शरीर का एक ऐसा 'अलार्म'  है जिसे नज़रअंदाज़ करना भारी पड़ सकता है। इंटरनल पाइल्स केवल मलाशय की सूजन नहीं है, बल्कि यह आपके कमज़ोर मेटाबॉलिज़्म और दूषित पित्त का इशारा है। केवल मसों को सुखाने वाली दवाएँ लेना काफ़ी नहीं है, बल्कि होल्स्टिक हीलिंग  यानी पूरे शरीर के संतुलन पर ध्यान देना ही असली समाधान है। आयुर्वेद न केवल ब्लीडिंग रोकता है, बल्कि पाचन अग्नि  को मज़बूत कर बीमारी को जड़ से ख़त्म करता है। सही समय पर किया गया आयुर्वेदिक उपचार आपको न केवल ऑपरेशन की तकलीफ़ से बचाता है, बल्कि जीवन को दोबारा ऊर्जावान  बनाता है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

शुरुआती स्टेज (स्टेज 1) में सही डाइट और जीवनशैली से इसे सुधारा जा सकता है, लेकिन पुरानी बवासीर के लिए विशेषज्ञ की सलाह ज़रूरी है।

अक्सर यह पाइल्स ही होता है, लेकिन 40 की उम्र के बाद बिना दर्द की ब्लीडिंग की जाँच विशेषज्ञ से करवाना हमेशा सुरक्षित रहता है।

भारी वज़न उठाना (Heavy Weightlifting) पेट पर दबाव बढ़ाता है, जिससे मसे बाहर आ सकते हैं। इसलिए इलाज के दौरान भारी कसरत से बचना चाहिए।

नहीं, नॉन-वेज और गर्म तासीर वाली चीज़ें पित्त बढ़ाती हैं, जिससे ब्लीडिंग (रक्तार्श) की समस्या और भी गंभीर हो सकती है।

शारीरिक कमज़ोरी और लगातार ब्लीडिंग से होने वाला मानसिक तनाव (Stress) ऊर्जा कम कर सकता है, लेकिन इलाज के बाद सब सामान्य हो जाता है।

हाँ, गुनगुना दूध और उसमें एक चम्मच देसी घी डालना कब्ज़ को दूर करता है और मलाशय को चिकना बनाता है।

अगर आप इलाज के बाद भी पुराने ग़लत खान-पान (मैदा, मिर्च) पर लौट जाते हैं, तो इसके दोबारा होने की संभावना बढ़ जाती है।

हाँ, गर्भाशय का दबाव बढ़ने से नसों में सूजन आ जाती है। ज़्यादातर मामलों में डिलीवरी के बाद यह समस्या धीरे-धीरे ठीक हो जाती है।

बिल्कुल, दिन में कम से कम 3-4 लीटर पानी मल को नरम रखने और आंतों की सफ़ाई के लिए अनिवार्य है।

जी हाँ, आयुर्वेद में विशेष जड़ी-बूटियों और पंचकर्म थेरेपी से 90% से ज़्यादा मामलों में बिना सर्जरी के बवासीर का सफल इलाज किया जाता है।

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