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34 साल की सुनीता (Teacher) और पैरों की उभरती नसें: क्या यह साइटिका का गंभीर संकेत है?

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 23 Apr, 2026
  • category-iconUpdated on 23 Apr, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5007

34 साल की सुनीता (Teacher) और पैरों की उभरती नसें: क्या यह साइटिका का गंभीर संकेत है?

34 वर्षीय सुनीता, जो पेशे से एक टीचर हैं, उनकी कहानी आज के समय के लाखों कामकाजी युवाओं का प्रतिनिधित्व करती है। दिन भर स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए 8-10 घंटे लगातार खड़े रहना उनकी मजबूरी है। लेकिन हाल ही में उन्होंने एक डरावना बदलाव देखा—उनके पैरों की नसें नीली होकर उभरने लगीं और कमर का धीमा दर्द अब पैरों की एड़ियों तक बिजली के झटके की तरह पहुँचने लगा है।

आखिर सुनीता जैसे युवाओं के साथ ऐसा क्यों हो रहा है? क्या आपकी जीवनशैली भी आपको साइटिका (Sciatica) की ओर धकेल रही है? आइए, इस लेख में विस्तार से समझते हैं।

युवाओं में साइटिका के मामले तेजी से बढ़ने के मुख्य कारण

पुराने समय में जिसे 'बुढ़ापे का दर्द' कहा जाता था, वह अब 30-35 की उम्र में क्यों बढ़ रहा है? इसके पीछे हमारी आधुनिक और मशीनी जीवनशैली है।

1. घंटों लगातार बैठे रहना: रीढ़ का सबसे बड़ा दुश्मन

आजकल की कॉर्पोरेट नौकरियों में दिन के 8-10 घंटे कुर्सी पर बीतते हैं। बैठने से रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से (Lumbar Region) पर खड़े होने की तुलना में 40% ज़्यादा दबाव पड़ता है। इससे कूल्हे की मांसपेशियाँ सख्त हो जाती हैं, जो साइटिक नर्व को दबा देती हैं।

2. वर्क फ्रॉम होम और गलत पोस्चर की मार

बिस्तर या सोफे पर झुककर लैपटॉप पर काम करना रीढ़ की हड्डी के प्राकृतिक 'S-Curve' को बिगाड़ देता है। यह 'स्लाउचिंग' (Slouching) डिस्क को पीछे की तरफ धकेलता है, जिससे नसें दबने लगती हैं

3. शारीरिक गतिविधि की कमी और कमज़ोर मांसपेशियाँ

व्यायाम न करने से कोर मांसपेशियाँ (Core Muscles) कमज़ोर हो जाती हैं। जब मांसपेशियाँ सहारा नहीं देतीं, तो शरीर का सारा वजन सीधे रीढ़ की हड्डी की नाजुक डिस्क पर आ जाता है।

4. तनाव (Stress) और साइटिका का संबंध

हैरानी की बात है, लेकिन आपका मानसिक तनाव पीठ दर्द से जुड़ा है। तनाव के दौरान शरीर 'फाइट या फ्लाइट' मोड में रहता है, जिससे मांसपेशियाँ हमेशा जकड़ी रहती हैं। यह जकड़न साइटिक नसों पर दबाव बढ़ाती है।

5. वजन का बढ़ना (Obesity) और अतिरिक्त दबाव

पेट के आसपास की चर्बी (Belly Fat) शरीर के 'सेंटर ऑफ ग्रेविटी' को आगे खींचती है, जिससे कमर के निचले हिस्से पर भयंकर भार पड़ता है और डिस्क खिसकने (Slip Disc) का खतरा बढ़ जाता है।

6. आधुनिक डाइट और रीढ़ की हड्डी का कुपोषण

जंक फूड शरीर में सूजन (Inflammation) बढ़ाता हैविटामिन B12, D और कैल्शियम की कमी नसों की सुरक्षा परत को कमजोर कर देती है, जिससे मामूली दबाव भी असहनीय दर्द पैदा करता है।

साइटिका के शुरुआती लक्षण: इन्हें नजरअंदाज न करें

इसे नजरअंदाज करने पर होने वाली मुख्य जटिलताएं नीचे दी गई हैं |

1. स्थायी नर्व डैमेज (Permanent Nerve Damage)

साइटिक नर्व शरीर की सबसे लंबी नस है। यदि डिस्क का दबाव महीनों या सालों तक इस पर बना रहे, तो नस की बाहरी सुरक्षा परत (Myelin Sheath) नष्ट हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप नस हमेशा के लिए कमजोर हो जाती है, जिससे पैरों में होने वाला दर्द कभी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाता।

2. फुट ड्रॉप (Foot Drop)

यह एक अत्यंत गंभीर स्थिति है। जब नस पर दबाव बहुत बढ़ जाता है, तो मस्तिष्क से पैर की मांसपेशियों को मिलने वाले संकेत कट जाते हैं। इससे पैरों की मांसपेशियाँ इतनी कमजोर हो जाती हैं कि मरीज अपना पैर ऊपर की तरफ नहीं उठा पाता और चलते समय पैर जमीन पर घिसटने लगता है।

3. मांसपेशियों का सूखना (Muscle Atrophy)

लगातार दर्द और कम सक्रियता के कारण पैर की मांसपेशियाँ धीरे-धीरे अपनी ताकत खोने लगती हैं और पतली होने लगती हैं। इसे 'मसल एट्रोफी' कहते हैं। प्रभावित पैर दूसरे पैर की तुलना में पतला दिखाई देने लगता है, जिससे चलने-फिरने का संतुलन बिगड़ जाता है।

4. सुन्नपन और संवेदना का खत्म होना (Loss of Sensation)

शुरुआत में होने वाली झुनझुनी धीरे-धीरे स्थायी सुन्नपन में बदल सकती है। कई बार मरीज को पैर पर गर्म, ठंडा या चोट लगने का अहसास भी बंद हो जाता है, जो त्वचा के संक्रमण या घाव के जोखिम को बढ़ा देता है।

5. मल-मूत्र पर नियंत्रण खोना (Cauda Equina Syndrome)

यह साइटिका की सबसे खतरनाक और 'इमरजेंसी' स्थिति है। जब रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से की सभी नसें एक साथ दब जाती हैं, तो व्यक्ति का अपने मूत्राशय (Bladder) और आंतों (Bowel) पर नियंत्रण खत्म हो जाता है। ऐसी स्थिति में स्थायी विकलांगता से बचने के लिए तुरंत सर्जरी की आवश्यकता होती है।

आयुर्वेद का दृष्टिकोण: 'गृध्रसी' को समझना

आयुर्वेद में साइटिका को 'गृध्रसी' कहा जाता है। यह मुख्य रूप से शरीर में 'वात दोष' के भयंकर असंतुलन का परिणाम है। बढ़ा हुआ वात नसों को सुखा देता है और उनमें जकड़न पैदा करता है।

जीवा आयुर्वेद का समग्र प्रबंधन 

हम केवल दर्द को नहीं दबाते, बल्कि बीमारी की जड़ तक पहुँचते हैं।

यहाँ राहत के लिए जड़ी-बूटियों, पंचकर्म थेरेपी और डाइट प्लान का विस्तृत विवरण दिया गया है, जो साइटिका के प्रबंधन में गहराई से काम करते हैं:

1. राहत के लिए बेहतरीन आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ (Herbal Science)

आयुर्वेद में जड़ी-बूटियाँ केवल लक्षणों को नहीं दबातीं, बल्कि शरीर के 'वात' दोष को संतुलित कर नसों को पुनर्जीवित करती हैं।

  • अश्वगंधा (Withania somnifera): इसे 'नर्व टॉनिक' माना जाता है। यह शरीर में कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) के स्तर को कम करती है, जिससे साइटिका के कारण होने वाली मांसपेशियों की जकड़न ढीली होती है। यह नसों के चारों ओर की सूजन को कम कर उन्हें अंदरूनी पोषण और मजबूती प्रदान करती है।
  • गुग्गुलु (Commiphora mukul): आयुर्वेद में इसे सबसे शक्तिशाली प्राकृतिक 'एंटी-इंफ्लेमेटरी' एजेंट माना गया है। यह रीढ़ की हड्डी और नसों के बीच जमा होने वाले टॉक्सिन्स (आम) को हटाता है। यह नसों के दबाव को कम करने और हड्डियों के घनत्व (Bone Density) को सुधारने में अचूक है।
  • निर्गुंडी (Vitex negundo): यह जड़ी-बूटी अपने 'शूलहर' (दर्द निवारक) गुणों के लिए प्रसिद्ध है। साइटिका में जब पैरों में बिजली के झटके जैसा तेज दर्द या खिंचाव महसूस होता है, तो निर्गुंडी का तेल या इसके पत्तों का काढ़ा नसों की सूजन को खींचकर दर्द में जादुई राहत देता है।

2. आयुर्वेदिक पंचकर्म थेरेपी (Deep Healing)

जब दवाइयां नस की गहराई तक नहीं पहुँच पातीं, तब पंचकर्म प्रक्रियाएं सीधे प्रभावित क्षेत्र (Targeted Area) पर काम करती हैं।

  • कटि बस्ती (Kati Basti): यह साइटिका के लिए आयुर्वेद की सबसे विशेष प्रक्रिया है। इसमें कमर के निचले हिस्से (L4-L5/S1) पर उड़द के आटे से एक घेरा बनाकर उसमें गुनगुना औषधीय तेल भरा जाता है। यह तेल डिस्क की गहराई तक रिसता है, जिससे सूखी हुई डिस्क दोबारा 'हाइड्रेट' होती है। यह नसों को चिकनाई देता है और डिस्क के खिसकने के कारण बने दबाव को प्राकृतिक रूप से कम करता है।
  • स्वेदन (Medicinal Steam): जड़ी-बूटियों के काढ़े से तैयार भाप पूरे शरीर या प्रभावित हिस्से को दी जाती है। यह शरीर के रोमछिद्रों को खोलती है और नसों में जमे हुए 'वात' को बाहर निकालती है। इससे मांसपेशियों का कड़ापन (Stiffness) तुरंत खत्म होता है और शरीर में हल्कापन महसूस होता है।

3. वात-शामक डाइट प्लान (Nutritional Support)

आयुर्वेद कहता है कि "जैसा अन्न, वैसा मन और तन"। साइटिका के दर्द को जड़ से खत्म करने के लिए आहार का सही होना अनिवार्य है।

क्या अपनाएँ (The 'Must-Haves'):

  • शुद्ध गाय का घी: यह नसों के लिए प्राकृतिक 'लुब्रिकेंट' है। नसों के रूखेपन को खत्म करने के लिए प्रतिदिन दाल या रोटी में घी का सेवन अनिवार्य है।
  • हल्का और गर्म भोजन: ताजा बना हुआ भोजन जो आसानी से पच जाए। मूंग की दाल, लौकी, तरोई और अदरक-लहसुन का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि ये वात को शांत करते हैं।
  • मसालों का जादू: खाने में हल्दी, मेथी दाना और हींग का उपयोग करें। ये नसों की सूजन को प्राकृतिक रूप से कम करते हैं।

क्या वर्जित करें (The 'No-Go' Zone):

  • ठंडी तासीर वाली चीज़ें: फ्रिज का ठंडा पानी, आइसक्रीम या कोल्ड ड्रिंक वात दोष को तुरंत भड़काते हैं, जिससे दर्द अचानक बढ़ सकता है।
  • भारी और बासी खाना: राजमा, छोले, उड़द की दाल और मैदा से बनी चीज़ें पेट में गैस और कब्ज पैदा करती हैं। बढ़ा हुआ पेट और गैस रीढ़ की हड्डी पर दबाव बढ़ाती हैं।
  • फास्ट फूड: अधिक नमक और रिफाइंड शुगर वाले खाद्य पदार्थ शरीर में सूजन (Inflammation) को बढ़ाते हैं, जो दबी हुई नस के दर्द को और भी भयंकर बना देते हैं।

एक छोटी सी टिप: रात को सोते समय एक गिलास गुनगुने दूध में आधा चम्मच अश्वगंधा चूर्ण मिलाकर लेने से नसों को अच्छी रिकवरी मिलती है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का सफर

जब पेनकिलर बेअसर हो जाते हैं, तब जीवा का विशेषज्ञ उपचार काम आता है।

  • जाँच प्रक्रिया: हम नाड़ी परीक्षा के जरिए दोषों के असंतुलन को समझते हैं। आपके पाचन और लाइफस्टाइल का गहन विश्लेषण किया जाता है।
  • इलाज का समय: शुरुआती आराम 2-4 हफ्तों में मिलता है। नसों को पूरी तरह रिसेट करने में आमतौर पर 3 से 6 महीने का समय लगता है।

आधुनिक बनाम आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

श्रेणी

आधुनिक चिकित्सा (Modern Medicine)

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण (Ayurvedic Perspective)

मूल अवधारणा

इसे रीढ़ की हड्डी की एक 'मैकेनिकल खराबी' या डिस्क की संरचनात्मक समस्या माना जाता है।

इसे शरीर के जैविक ऊर्जा संतुलन, विशेषकर 'वात दोष' के बिगड़ने (गृध्रसी) के रूप में देखा जाता है।

मुख्य लक्ष्य

इसका प्राथमिक लक्ष्य 'दर्द प्रबंधन' (Pain Management) और लक्षणों को तुरंत दबाना है।

इसका लक्ष्य 'जड़ से उपचार' (Holistic Healing) और नसों को पुनर्जीवित करना है।

उपचार की विधि

मुख्य रूप से पेनकिलर्स, स्टेरॉयड इंजेक्शन, फिजियोथेरेपी और गंभीर मामलों में सर्जरी

पंचकर्म (जैसे कटि बस्ती), वात-शामक जड़ी-बूटियाँ, विशेष आहार और जीवनशैली में बदलाव।

नसों पर प्रभाव

दवाएं अक्सर नसों के दर्द के संकेतों को सुन्न (Numbing) कर देती हैं ताकि दर्द महसूस न हो।

औषधियाँ और तेल नसों को अंदरूनी पोषण (Nourishment) देकर उनकी सूजन और रूखापन खत्म करते हैं।

आहार और जीवनशैली

इन्हें सहायक (Supportive) माना जाता है, लेकिन उपचार का अनिवार्य हिस्सा नहीं।

आहार (अहार) और दिनचर्या (विहार) को औषधि के समान ही महत्वपूर्ण और अनिवार्य माना जाता है।

साइड इफेक्ट्स

लंबे समय तक पेनकिलर्स लेने से किडनी, लिवर और पाचन पर दुष्प्रभाव पड़ने की संभावना रहती है।

जड़ी-बूटियाँ पूरी तरह प्राकृतिक हैं, जिनका शरीर पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि ये इम्युनिटी बढ़ाती हैं।

दीर्घकालिक प्रभाव

दवा का असर खत्म होने पर दर्द वापस लौट सकता है; सर्जरी के बाद भी रिकवरी में समय लगता है।

उपचार में थोड़ा समय लग सकता है, लेकिन यह स्थायी समाधान प्रदान करता है और दोबारा होने की संभावना कम करता है।

सर्जरी की आवश्यकता

यदि नस पर दबाव अधिक हो, तो तुरंत सर्जरी की सलाह दी जाती है।

आयुर्वेद के अनुसार, लगभग 90-95% मामलों में सही पंचकर्म और औषधियों से सर्जरी की नौबत नहीं आती।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के ख़र्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का ख़र्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक ख़र्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम ख़र्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के ख़र्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

  • प्रामाणिक पंचकर्म चिकित्सा
  • सात्विक भोजन
  • आधुनिक उपचार सेवाएँ
  • आरामदायक आवास
  • जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने वाली कई अन्य सुविधाएँ

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का ख़र्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग़ को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

ठीक होने में लगने वाला समय कितना है?

साइटिका (Sciatica) से रिकवरी का समय आपकी स्थिति की गंभीरता और अनुशासन पर निर्भर करता है। आयुर्वेद में इसे मुख्य रूप से तीन चरणों में समझा जा सकता है:

रिकवरी टाइमलाइन (अनुमानित)

  • 15 से 30 दिन (शुरुआती राहत): पाचन में सुधार होता है और कमर की भयंकर जकड़न व तीव्र दर्द में कमी आने लगती है।
  • 1 से 3 महीने (सक्रिय सुधार): नसों की सूजन कम होती है, पैरों का सुन्नपन (Numbness) खत्म होने लगता है और चलने-फिरने की क्षमता बढ़ती है।
  • 3 से 6 महीने (पूर्ण उपचार): नसें अंदर से मजबूत होती हैं और रीढ़ की हड्डी को दोबारा पोषण मिलता है, जिससे समस्या जड़ से खत्म हो जाती है।

समय कम या ज़्यादा क्यों लगता है?

  1. रोग की स्थिति: दबी हुई नस कितनी पुरानी है।
  2. उम्र: युवाओं में हीलिंग (Healing) की क्षमता बुजुर्गों से तेज़ होती है।
  3. थेरेपी: दवाओं के साथ 'कटि बस्ती' जैसी पंचकर्म थेरेपी लेने से परिणाम जल्दी मिलते हैं।
  4. परहेज: वात-शामक डाइट और सही पोस्चर का पालन करना अनिवार्य है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

हम आपके हर पल दर्द सहने की मजबूरी और लोगों के बीच होने वाली परेशानी को समझते हैं। हमारा लक्ष्य आपको एक बहुत ही सुरक्षित और प्राकृतिक इलाज का रास्ता देना है।

  • जीवा से संपर्क करें: बेझिझक होकर सीधे हमारे नंबर 0129 4264323 पर कॉल करें। हमारे स्वास्थ्य विशेषज्ञ आपसे बहुत प्यार और धैर्य से बात करेंगे।
  • अपॉइंटमेंट फिक्स करें: आप हमारे 80 से भी ज़्यादा क्लिनिक में आकर आराम से डॉक्टर से आमने-सामने मिल सकते हैं।
  • ऑनलाइन वीडियो कंसल्टेशन: दर्द के मारे हालत खराब है और बाहर जाना मुश्किल है, तो घर बैठे वीडियो कॉल से डॉक्टर से बात करें।
  • विस्तृत जाँच: आपकी साइटिका की पूरी हिस्ट्री और उन सभी दवाईयों की लिस्ट बहुत ध्यान से समझी जाती है जो आप खा चुके हैं।
  • व्यक्तिगत प्लान: आपके लिए खास वात-नाशक जड़ी-बूटियाँ, नसों को ताकत देने वाले रसायन और वात शामक डाइट का एक पूरा रूटीन तैयार किया जाता है।

डॉक्टर को तुरंत कब दिखाना चाहिए? (Red Flags)

इन Red Flags को कभी नज़रअंदाज़ न करें, क्योंकि ये गंभीर नसों की क्षति (Nerve Damage) का संकेत हैं:

  • पैर में कमजोरी: अचानक पैरों की जान निकल जाना या वजन न संभाल पाना।
  • फुट ड्रॉप (Foot Drop): चलते समय पैर का पंजा ज़मीन पर घिसटना।
  • कंट्रोल खोना: मल या मूत्र विसर्जन (Bladder/Bowels) पर नियंत्रण न रहना।
  • अचानक सुन्नपन: पैर में चोट या तापमान का अहसास खत्म हो जाना।
  • आंखों में धुंधलापन: अचानक दिखना कम होना या कालापन छाना।

https://youtu.be/77MhLFYDB_I?si=2QPqwKU5asVUIGV0 

निष्कर्ष

34 साल की सुनीता की तरह, आपकी उम्र का यह पड़ाव करियर के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन स्वास्थ्य के लिए भी। साइटिका को पेनकिलर के पीछे न छुपाएं। आयुर्वेद की गहराई को अपनाएं और जीवा आयुर्वेद के साथ एक दर्द-मुक्त, सक्रिय जीवन की शुरुआत करें।

संपर्क करें: अपनी स्वास्थ्य समस्या के समाधान के लिए आज ही जीवा के डॉक्टरों से परामर्श करें।

Contact Jiva Ayurveda:

 Call:0129-4264323

 Website: https://www.jiva.com/ 

 Online Consultation: Available across India

References

  1. NCBI (National Center for Biotechnology Information): Sciatica: Management and Diagnosis
  2. PMC (PubMed Central): Lifestyle Factors and Low Back Pain/Sciatica
  3. ScienceDirect: Clinical perspectives on Sciatic Nerve Compression
  4. Jiva Ayurveda Research: Ayurvedic approach to Gridhrasi (Sciatica)
  5. Healthline: Common Causes of Sciatica in Young Adults

FAQs

जी हाँ, आजकल की बदलती जीवनशैली, जैसे घंटों बैठकर काम करना और फिजिकल एक्टिविटी की कमी के कारण, यह समस्या युवाओं में बहुत तेजी से बढ़ रही है। पहले यह बुढ़ापे की बीमारी मानी जाती थी, लेकिन अब यह एक 'लाइफस्टाइल डिसऑर्डर' बन चुकी है।

 बिल्कुल। बिना सही तकनीक (Correct Form) के भारी वजन उठाने (Ego Lifting) से रीढ़ की हड्डी की डिस्क पर अचानक दबाव पड़ता है। इससे डिस्क अपनी जगह से खिसकर साइटिक नर्व को दबा सकती है।

हाँ, आयुर्वेद में साइटिका (गृध्रसी) का बहुत ही सफल उपचार मौजूद है। पंचकर्म की विशिष्ट थेरेपी जैसे 'कटि बस्ती' और वात-शामक जड़ी-बूटियों की मदद से बिना किसी चीर-फाड़ के नसों के दबाव को हटाया जा सकता है।

आपको हमेशा ताजा और गर्म भोजन करना चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार, शुद्ध गाय का घी नसों के रूखेपन को कम करता है। बासी भोजन, जंक फूड और ठंडी ड्रिंक्स से बचना चाहिए क्योंकि ये 'वात' बढ़ाकर दर्द को ट्रिगर करते हैं।

हाँ, तनाव के दौरान हमारा शरीर मांसपेशियों को सिकोड़ लेता है। लगातार बनी रहने वाली यह जकड़न रीढ़ की हड्डी के अलाइनमेंट को बिगाड़ देती है, जिससे साइटिक नस पर दबाव और अधिक बढ़ जाता है।

पीठ के बल सीधा सोना और घुटनों के ठीक नीचे एक पतला तकिया लगाना सबसे अच्छा माना जाता है। यदि आप करवट लेकर सोते हैं, तो दोनों घुटनों के बीच तकिया रखें ताकि रीढ़ की हड्डी सीधी रहे और नस पर दबाव न पड़े।

हल्की सैर रक्त संचार के लिए अच्छी है, लेकिन अगर दर्द बहुत तेज हो या पैरों में भयंकर सुन्नपन महसूस हो, तो उस समय आराम करना ही बेहतर है। दर्द कम होने पर डॉक्टर की सलाह से ही व्यायाम शुरू करें।

आमतौर पर शुरुआती 2 से 4 हफ्तों में दर्द और जकड़न में राहत मिलनी शुरू हो जाती है। हालांकि, नसों को अंदरूनी मजबूती देने और समस्या को जड़ से खत्म करने में 3 से 6 महीने का समय लग सकता है।

चूंकि साइटिका मुख्य रूप से 'वात दोष' का रोग है, इसलिए गर्म सिकाई (Hot Compress) या औषधीय तेल की मालिश ज्यादा फायदेमंद होती है। यह मांसपेशियों की जकड़न को खोलती है और दर्द में राहत देती है।

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