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Screen Time से Migraine - IT Workers की बढ़ती समस्या

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

आज के टाइम में स्क्रीन से दूरी बनाना लगभग नामुमकिन हो चुका है। खासकर अगर आप एक IT प्रोफेशनल हैं, तो आपका पूरा दिन कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल के सामने ही कटता है। शुरुआत में तो ये सिर्फ आँखों की थकान या मामूली सा भारीपन लगता है, जिसे हम चाय पीकर इग्नोर कर देते हैं। लेकिन लगातार काम का प्रेशर और घंटों स्क्रीन को घूरते रहने की ये आदत धीरे-धीरे रोज़-रोज़ के सिरदर्द और माइग्रेन जैसी बड़ी आफत में बदल जाती है। स्क्रीन से निकलने वाला यह डिजिटल लोड हमारे दिमाग के नेचुरल बैलेंस को पूरी तरह बिगाड़ कर रख देता है।

आखिर क्यों बढ़ रहा है हमारा स्क्रीन टाइम?

स्क्रीन टाइम का मतलब सिर्फ फोन स्क्रॉल करना या टीवी देखना नहीं है। ये वो पूरा वक्त है जब हमारा दिमाग लगातार स्क्रीन की तेज़ लाइट, काम के तनाव और दुनिया भर की जानकारियों के नीचे दबा रहता है। वर्क फ्रॉम होम हो या बैक-टू-बैक ऑनलाइन मीटिंग्स, एक आम आईटी प्रोफेशनल को कम से कम 8 से 12 घंटे स्क्रीन के सामने बैठना ही पड़ता है। जब दिमाग को शांत होने का थोड़ा भी गैप नहीं मिलेगा, तो उसका सीधा असर आपकी सेहत पर पड़ना तय है।

माइग्रेन क्या है और इसके लक्षण

माइग्रेन को सिर्फ आम सिरदर्द समझने की भूल बिल्कुल मत कीजिए। ये एक ऐसी स्थिति है जिसमें दिमाग की नसें हद से ज़्यादा सेंसिटिव हो जाती हैं और ज़रा सी चीज़ पर भी बुरी तरह रिएक्ट करती हैं। इसमें सिर के एक हिस्से में ऐसा तेज़ और धड़कता हुआ दर्द उठता है कि इंसान का चैन छिन जाता है।

इसके कुछ साफ़ लक्षण इस तरह दिखने लगते हैं:

  • सिर के किसी एक तरफ अचानक बहुत तेज़ और टीस मारने वाला दर्द होना।
  • तेज़ रोशनी या ज़रा सी आवाज़ होने पर भी चिड़चिड़ाहट और दिक़्क़त का बढ़ जाना।
  • मन का बार-बार खराब होना, जी मिचलाना या फिर उल्टी आ जाना।
  • आँखों के ठीक पीछे ऐसा लगता है जैसे कोई भारी दबाव या खिंचाव बन रहा हो।
  • हर वक्त शरीर में भारी थकावट महसूस होना और बात-बात पर गुस्सा आना।

यह दर्द कभी कुछ घंटों में ठीक हो जाता है तो कभी एक-दो दिन तक लगातार पीछा नहीं छोड़ता, जिससे आपका पूरा काम-काज ठप पड़ जाता है।

स्क्रीन का दिमाग पर सीधा असर

जब हम घंटों बिना पलक झपकाए स्क्रीन को देखते हैं, तो दिमाग को बिना रुके उस तेज़ रोशनी और डेटा को प्रोसेस करना पड़ता है। इससे दिमाग की बारीक नसों पर बहुत ज़्यादा प्रेशर आता है और वे हर वक्त 'अलर्ट मोड' में रहने की वजह से थक जाती हैं। आँखें भी लगातार अपना फोकस बदलती हैं, जिससे उनकी अंदरूनी नसें खिंचने लगती हैं। यही दिमागी थकान और नसों का लगातार सुलगना आगे चलकर माइग्रेन का रूप ले लेता है।

IT Workers में माइग्रेन क्यों ज्यादा देखने को मिलता है?

IT क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की दिनचर्या अक्सर लंबे स्क्रीन समय, लगातार मानसिक दबाव और अनियमित जीवनशैली से जुड़ी होती है। दिमाग को दिनभर तेज गति से काम करना पड़ता है, लेकिन शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता। धीरे-धीरे यह संतुलन बिगड़ जाता है और सिरदर्द या माइग्रेन जैसी समस्या के लिए अनुकूल स्थिति बन जाती है।

मुख्य कारण:

स्क्रीन से होने वाले माइग्रेन के चेतावनी संकेत

शरीर अक्सर पहले ही संकेत देने लगता है कि दिमाग और आंखों पर ज्यादा दबाव पड़ रहा है। लेकिन व्यस्त दिनचर्या में लोग इन्हें सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। धीरे-धीरे यही छोटे संकेत आगे चलकर माइग्रेन की समस्या को बढ़ा सकते हैं।

मुख्य चेतावनी संकेत:

इन संकेतों को लंबे समय तक नज़रअंदाज़ करना भविष्य में माइग्रेन के गंभीर एपिसोड की संभावना बढ़ा सकता है।

आयुर्वेद के अनुसार माइग्रेन (अर्धावभेदक) की व्याख्या 

आयुर्वेद में माइग्रेन को मुख्य रूप से वात और पित्त दोष के असंतुलन से जुड़ा माना जाता है। वात दोष नसों की संवेदनशीलता और दर्द की तीव्रता को बढ़ाता है, जबकि पित्त दोष शरीर में गर्मी, जलन और सूजन की प्रवृत्ति को बढ़ा सकता है। जब ये दोनों दोष सिर के क्षेत्र में असंतुलित हो जाते हैं, तो माइग्रेन के लक्षण और अधिक तेज़ और बार-बार होने लगते हैं।

स्क्रीन टाइम इस असंतुलन को और बढ़ा सकता है। लगातार नीली रोशनी पित्त दोष को प्रभावित कर सकती है, जिससे आंखों और दिमाग में गर्मी और तनाव बढ़ता है। वहीं लंबे समय तक काम करना, मानसिक दबाव और अनियमित दिनचर्या वात दोष को बिगाड़ सकती है, जिससे बेचैनी, थकान और सिरदर्द की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। इस तरह वात और पित्त का संयुक्त असंतुलन माइग्रेन को लंबे समय तक चलने वाली समस्या बना सकता है।

आयुर्वेद माइग्रेन को कैसे देखता है?

अगर आपको लगता है कि माइग्रेन बस एक तेज़ सिरदर्द है, तो आयुर्वेद की सोच इससे एकदम अलग है। असल में यह दर्द शरीर के 'वात' और 'पित्त' के बेकाबू होने, दिन भर की भयंकर टेंशन, उल्टे-सीधे रूटीन और सिर की कमज़ोर हो चुकी नसों का नतीजा होता है।

  • वात और पित्त को शांत करना: जब शरीर में वात (गैस) भड़कता है, तो ऐसा लगता है जैसे सिर में कोई हथौड़े मार रहा हो। वहीं अगर पित्त (गर्मी) बढ़ जाए, तो आंखों और सिर में भयंकर जलन होने लगती है। इसलिए सबसे पहले इन दोनों को काबू में लाया जाता है।
  • नसों और दिमाग को आराम देना: जब माइग्रेन का अटैक आता है, तो सिर की नसें इतनी कमज़ोर और सेंसिटिव हो जाती हैं कि ज़रा सी आवाज़ भी चुभती है। इसीलिए नसों को एकदम शांत और रिलैक्स करने पर काम होता है, ताकि दर्द बार-बार न उठे।
  • दिमागी टेंशन को कम करना: दिन-रात की टेंशन माइग्रेन की आग में घी डालने का काम करती है। इसीलिए आपके दिमाग को बिल्कुल ठंडा रखने और एक सही रूटीन बनाने पर सबसे ज़्यादा ध्यान दिया जाता है।
  • पक्का और लंबा आराम: इसका मकसद किसी गोली की तरह सिर्फ दो-चार घंटे के लिए दर्द दबाना नहीं है। कोशिश यह रहती है कि शरीर अंदर से इतना मज़बूत बन जाए कि माइग्रेन बार-बार लौट कर न आए।

माइग्रेन में सच में काम आने वाली आयुर्वेदिक औषधियाँ

हमारे आयुर्वेद में कुछ ऐसी गज़ब की बूटियां हैं, जो न सिर्फ सिर की नसों को आराम देती हैं, बल्कि टेंशन को सोखकर भड़के हुए पित्त को एकदम लाइन पर ले आती हैं:

  • ब्राह्मी: दिमाग को बिल्कुल कूल रखने और दिनभर की उलझनों को मिटाने में ब्राह्मी का सच में कोई जवाब नहीं है। इसे लेने से फोकस भी बढ़ता है और मन को पक्की शांति मिलती है।
  • शंखपुष्पी: दिनभर की भागदौड़ के बाद जब दिमाग एकदम जवाब दे देता है, तब यह सिर की नसों को ज़बरदस्त तरीके से रिलैक्स करती है और सारी थकावट खींच लेती है।
  • अश्वगंधा: भयंकर टेंशन की वजह से जब शरीर अंदर से टूट सा जाता है, तब अश्वगंधा नई जान फूंकने का काम करता है। इससे रात में नींद भी बहुत गहरी और बिना किसी रुकावट के आती है।
  • गिलोय: शरीर में जमा गर्मी और सिर की सूजन को उतारने में गिलोय सबसे बेस्ट है। यह पित्त को बिल्कुल भी भड़कने का मौका नहीं देती।
  • जटामांसी: छोटी-छोटी बातों पर होने वाली घबराहट और बेवजह की ओवरथिंकिंग को यह जड़ से खत्म कर देती है। दिमाग को एकदम रिलैक्स करने के लिए यह बहुत बढ़िया है।

माइग्रेन में आराम देने वाली आयुर्वेदिक थेरेपी

इन पुराने और आज़माए हुए देसी तरीकों का बस एक ही काम है सिर की नसों का तनाव दूर करना, आपकी सारी टेंशन सोख लेना और शरीर के सिस्टम को वापस पटरी पर लाना:

  • शिरोधारा: इसमें माथे के एकदम बीच में हल्के गुनगुने तेल की एक पतली सी धार लगातार गिराई जाती है। इसे लेते ही दिमाग की सारी टेंशन पल भर में छूमंतर हो जाती है और नर्वस सिस्टम को बहुत सुकून मिलता है।
  • अभ्यंग (तेल मालिश): जब जड़ी-बूटियों वाले गुनगुने तेल से सिर और पूरे बदन की मालिश की जाती है, तो खून का दौरा एकदम तेज़ हो जाता है। इससे सिर की नसों में होने वाला खिंचाव और जकड़न पूरी तरह खुल जाती है।
  • नस्य कर्म: इसमें नाक के ज़रिए कुछ खास दवा वाला तेल या हल्का घी डाला जाता है। माइग्रेन वालों के लिए यह किसी जादू जैसा है, क्योंकि यह सीधे सिर में बैठे वात और पित्त को खींचकर शांत कर देता है।
  • स्वेदन (हल्की भाप): मालिश के तुरंत बाद जो हल्की सी भाप दी जाती है, वह शरीर के अंदर बैठी पुरानी जकड़न को एकदम पिघला देती है। इसे लेने के बाद शरीर बहुत ही हल्का और फ्रेश लगने लगता है।

माइग्रेन में कैसा हो आपका खान-पान?

आप क्या खाते हैं, इसका सीधा असर माइग्रेन के दर्द पर पड़ता है। सही डाइट अपनाकर आप इस दर्द के बार-बार उठने की आदत को काफी हद तक बदल सकते हैं।

क्या चीज़ें थाली में शामिल करें?

  • ऐसा भोजन खाएं जो बिल्कुल हल्का हो और पेट पर भारी न पड़े (सुपाच्य खाना)।
  • ताज़ी हरी सब्ज़ियों और मौसम के हिसाब से मिलने वाले रसीले फलों को तरजीह दें।
  • दिनभर में भरपूर पानी पीते रहें, नारियल पानी भी इसके लिए एक बेहतरीन विकल्प है।
  • मूँग की दाल और खिचड़ी जैसी हल्की चीज़ें खाएं जो हाज़मे को दुरुस्त रखें।
  • शरीर को अंदरूनी ठंडक देने वाली चीज़ें जैसे खीरा, ककड़ी और तरबूज का सेवन करें।
  • खाने में सीमित मात्रा में शुद्ध देसी घी का इस्तेमाल ज़रूर करें, क्योंकि यह बढ़े हुए वात को काटता है।

किन चीज़ों से पूरी तरह दूरी बनाएं?

  • बहुत ज़्यादा तेल-मसाले वाला, तीखा या तला-भुना खाना खाने से बचें।
  • चाय, कॉफ़ी या कैफीन वाली चीज़ों का बहुत ज़्यादा सेवन करने की आदत छोड़ दें।
  • बाज़ार का प्रोसेस्ड फूड, मैदा और पैकेट बंद स्नैक्स खाने से पूरी तरह परहेज़ करें।
  • लंबे समय तक भूखे पेट रहने की गलती कभी न करें, क्योंकि इससे बनने वाली गैस सीधे सिर में चढ़ती है।
  • बहुत ज़्यादा चॉकलेट, पेस्ट्री या ज़रूरत से ज़्यादा मीठी चीज़ें खाने से बचें।
  • बिना किसी फिक्स टाइम के खाना खाना या देर रात भारी डिनर करना बंद करें।

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मैं जब 8वीं कक्षा में थी, तब मुझे अक्सर तेज़ सिर दर्द होता था और आँखों में बहुत तेज़ चुभन महसूस होती थी। मुझे समझ नहीं आता था कि यह आँखों की समस्या है या सिरदर्द की वजह। डॉक्टर से सलाह लेने पर पता चला कि यह माइग्रेन के कारण हो रहा है।

मैंने दवाइयाँ लीं, और जब तक दवा चलती रही तब तक आराम रहता था, लेकिन दवा छोड़ते ही दर्द फिर से शुरू हो जाता था। यह समस्या बार-बार होने लगी, जिससे मैं बहुत परेशान रहने लगी।

फिर मेरी एक सहेली ने मुझे जीवा आयुर्वेद के बारे में बताया। वहाँ मैंने उपचार शुरू कराया और धीरे-धीरे मेरी समस्या में सुधार आने लगा। अब मुझे पहले की तरह बार-बार सिरदर्द और आँखों में चुभन की समस्या नहीं होती। 

कब समझें कि अब डॉक्टर के पास जाना ज़रूरी है?

माइग्रेन को मामूली सिरदर्द समझकर टालते रहना भारी पड़ सकता है, खासकर तब जब यह आपकी रोज़ की ज़िंदगी और ऑफिस के काम-काज को ठप करने लगे।

  • जब सिर का दर्द बहुत अक्सर होने लगे और उसकी तेज़ी बर्दाश्त से बाहर हो जाए।
  • दर्द उठने से पहले आँखों के आगे धुंधलापन छाने लगे या अजीब सी चमक दिखने लगे।
  • ज़रा सी भी लाइट जलने या हल्की सी आवाज़ होने पर सिर फटने जैसा महसूस हो।
  • दर्द के साथ-साथ उल्टी आने लगे, चक्कर खाकर गिरने जैसी नौबत आए या बहुत कमज़ोरी लगे।
  • रात की नींद पूरी तरह उड़ जाए और आप सोने के लिए बिस्तर पर सिर्फ करवटें बदलते रहें।
  • लैपटॉप या मोबाइल की स्क्रीन की तरफ देखते ही दर्द अचानक भड़क उठे।
  • दर्द कुछ घंटों में ठीक होने के बजाय कई दिनों तक लगातार बना रहे।
  • जब आपका ऑफिस का काम और रोज़मर्रा का रूटीन इस दर्द की वजह से पूरी तरह प्रभावित होने लगे।

निष्कर्ष

IT सेक्टर में काम करने वाले लोगों में बढ़ता माइग्रेन सिर्फ एक साधारण सिरदर्द नहीं है। यह असल में घंटों लगातार स्क्रीन के सामने बैठे रहने, भयंकर मानसिक तनाव, बेपटरी हो चुकी जीवनशैली और नसों की बढ़ती संवेदनशीलता का मिला-जुला नतीजा है। मॉडर्न साइंस इसे नसों और लाइफस्टाइल से जुड़ी गड़बड़ी मानती है, वहीं आयुर्वेद का कहना है कि यह शरीर में वात और पित्त दोष के बुरी तरह बिगड़ने से होता है।

लगातार स्क्रीन को घूरना, अधूरी नींद, हर वक्त की टेंशन और पर्याप्त आराम न मिलना इस आग में घी का काम करते हैं। इसलिए सिर्फ पेनकिलर खाकर दर्द को दबाने की भूल न करें। लंबे समय तक इस आफ़त से बचना है तो तन और मन को शांत करना होगा, आँखों को आराम देना होगा और एक सही दिनचर्या अपनानी होगी।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

लगातार कई घंटों तक स्क्रीन के सामने बैठकर काम करने से आंखों और दिमाग पर दबाव बढ़ सकता है। शुरुआत में यह हल्के सिरदर्द या भारीपन के रूप में महसूस हो सकता है। अगर यह स्थिति बार-बार होने लगे, तो शरीर संकेत देने लगता है कि पर्याप्त आराम नहीं मिल रहा है।

कई बार आंखों पर लगातार दबाव और सही नंबर का चश्मा न पहनने से सिरदर्द बढ़ सकता है। स्क्रीन की तेज रोशनी और लगातार फोकस करने से आंखों की थकान बढ़ती है। इससे सिर के आसपास तनाव और भारीपन महसूस हो सकता है। धीरे-धीरे यह स्थिति माइग्रेन के एपिसोड को ट्रिगर कर सकती है। इसलिए आंखों की नियमित जांच करवाना और सही रोशनी में काम करना जरूरी माना जाता है।

लंबे समय तक खाली पेट रहने से शरीर की ऊर्जा और संतुलन प्रभावित हो सकता है। इससे कमजोरी, चिड़चिड़ापन और सिरदर्द की संभावना बढ़ सकती है। कुछ लोगों में भोजन देर से करने पर माइग्रेन के लक्षण ज्यादा महसूस हो सकते हैं। अनियमित खानपान दिमाग और नसों की संवेदनशीलता को बढ़ा सकता है। इसलिए समय पर हल्का और संतुलित भोजन करना महत्वपूर्ण माना जाता है।

शरीर में पानी की कमी होने पर थकान, भारीपन और सिरदर्द महसूस हो सकता है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने वाले लोग कई बार पर्याप्त पानी नहीं पीते, जिससे शरीर में सूखापन बढ़ सकता है। यह स्थिति नसों और दिमाग पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। कुछ लोगों में डिहाइड्रेशन माइग्रेन का ट्रिगर बन सकता है। इसलिए दिनभर पर्याप्त पानी पीना जरूरी माना जाता है।

मानसिक तनाव दिमाग को लगातार सतर्क अवस्था में रखता है। इससे शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता और नसों की संवेदनशीलता बढ़ सकती है। धीरे-धीरे सिरदर्द बार-बार होने लगता है और माइग्रेन की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। तनाव के साथ नींद खराब होना स्थिति को और गंभीर बना सकता है। इसलिए मानसिक शांति और संतुलित दिनचर्या बनाए रखना जरूरी माना जाता है।

पर्याप्त और गहरी नींद दिमाग को आराम देने के लिए बहुत जरूरी मानी जाती है। जब नींद पूरी नहीं होती, तो दिमाग की थकान बढ़ने लगती है। इससे सिरदर्द, आंखों में भारीपन और चिड़चिड़ापन महसूस हो सकता है। लगातार कई दिनों तक खराब नींद माइग्रेन के एपिसोड को बढ़ा सकती है। इसलिए नियमित समय पर सोना और पर्याप्त आराम लेना जरूरी माना जाता है।

माइग्रेन में दिमाग सामान्य से ज्यादा संवेदनशील हो सकता है। तेज रोशनी, तेज आवाज या बहुत ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर से असहजता बढ़ सकती है। कुछ लोगों में इससे सिरदर्द अचानक तेज हो जाता है। यही कारण है कि माइग्रेन के दौरान शांत और कम रोशनी वाला वातावरण आरामदायक महसूस होता है। लगातार ऐसे ट्रिगर्स के संपर्क में रहना समस्या बढ़ा सकता है।

लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठकर काम करने से गर्दन और कंधों में जकड़न बढ़ सकती है। इससे सिर की नसों और मांसपेशियों पर दबाव महसूस हो सकता है। कई लोगों में यह तनाव सिरदर्द और माइग्रेन को ट्रिगर कर सकता है। गलत बैठने की आदत और कम शारीरिक गतिविधि स्थिति को और बढ़ा सकती है। इसलिए बीच-बीच में शरीर को हिलाना और स्ट्रेच करना उपयोगी माना जाता है।

कई लोग सिरदर्द होते ही तुरंत दर्द कम करने वाली दवाओं का सेवन करने लगते हैं। लेकिन बिना कारण समझे लंबे समय तक ऐसा करना उचित नहीं माना जाता। कुछ मामलों में बार-बार दवा लेने से सिरदर्द की प्रवृत्ति और बढ़ सकती है। इसलिए लगातार माइग्रेन होने पर विशेषज्ञ सलाह लेना बेहतर माना जाता है। साथ ही जीवनशैली और ट्रिगर्स पर ध्यान देना भी जरूरी होता है।

माइग्रेन हर व्यक्ति में अलग तरीके से दिखाई दे सकता है, इसलिए इसका सुधार भी व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करता है। सही दिनचर्या, पर्याप्त नींद, तनाव नियंत्रण और संतुलित भोजन से इसके एपिसोड कम हो सकते हैं। कई लोग समय के साथ सिरदर्द की तीव्रता और आवृत्ति में सुधार महसूस करते हैं। लेकिन लगातार ट्रिगर्स बने रहने पर समस्या दोबारा बढ़ सकती है। इसलिए लंबे समय तक संतुलित जीवनशैली बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।

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