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बच्चे की Skin पर बार-बार Eczema — Steroid Cream से बचने का रास्ता

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

बच्चों की स्किन कुदरती तौर पर बहुत ही नाजुक और सेंसिटिव होती है। मौसम या आसपास के माहौल में जरा सा भी बदलाव आए, तो इसका सीधा असर उनकी त्वचा पर दिखने लगता है। आजकल हम अक्सर देखते हैं कि बच्चों में खुजली, लालपन (रैशेज), स्किन का रूखा होना और जलन जैसी दिक्कतें आम हो गई हैं।

कई बार ऐसा लगता है कि समस्या कुछ दिन के लिए दब गई है, लेकिन फिर अचानक से यह दोबारा लौट आती है। ऐसे में माता-पिता का परेशान होना लाजमी है। यह परेशानी सिर्फ स्किन तक ही सीमित नहीं रहती; इससे बच्चे की नींद, उसका आराम और पूरे दिन का रूटीन भी खराब हो जाता है। इसीलिए, सिर्फ ऊपर से इलाज करने के बजाय इसके असली कारण को समझना और बच्चे के शरीर की संवेदनशीलता पर ध्यान देना बहुत जरूरी हो जाता है।

एक्जिमा क्या है?

एक्जिमा स्किन की एक ऐसी परेशानी है जिसमें त्वचा के अंदर सूजन आ जाती है और वह हद से ज्यादा सेंसिटिव हो जाती है। इसमें स्किन पर तेज खुजली, चकत्ते, सूखापन और जलन होने लगती है। कई बार स्किन पर सूखी पपड़ी भी जम जाती है। जब बच्चा खुजली बर्दाश्त नहीं कर पाता और उसे बार-बार खुजलाता है, तो वहां छोटे-छोटे घाव बन जाते हैं और हालत और बिगड़ जाती है।

राहत की बात बस यह है कि यह छूत की बीमारी नहीं है (यानी एक इंसान से दूसरे में नहीं फैलती)। लेकिन क्योंकि यह बार-बार पलटकर आती है, इसलिए बच्चा लंबे समय तक परेशान रहता है और ठीक से सो भी नहीं पाता।

बच्चों में एक्जिमा बार-बार क्यों लौट आता है?

एक्जिमा के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ही यही है कि यह कुछ दिन के लिए शांत तो हो जाता है, और फिर अचानक से उभर आता है। असल में ऐसा तब होता है जब बीमारी की जड़ पूरी तरह खत्म नहीं होती।

  • स्किन की कमजोर सेफ्टी लेयर: जब त्वचा का नेचुरल बैरियर (सुरक्षा परत) कमजोर पड़ जाता है, तो बाहर की चीजें उस पर बहुत जल्दी असर करती हैं।
  • एलर्जी वाले फैक्टर्स: घर की धूल, पसीना, ज्यादा गर्मी या कुछ खास तरह की चीजें स्किन को बार-बार ट्रिगर कर सकती हैं।
  • पेट और पाचन की गड़बड़ी: अगर शरीर के अंदर का सिस्टम ठीक नहीं है, तो उसका सीधा असर बाहर स्किन पर नजर आता है।
  • जेनेटिक्स (आनुवंशिक कारण): कुछ बच्चों में यह समस्या उन्हें अपने परिवार या माता-पिता से मिलती है।
  • पर्यावरण का असर: बदलता मौसम, प्रदूषण और आसपास का रहन-सहन स्किन को और ज्यादा सेंसिटिव बना देता है।
  • कमजोर इम्यूनिटी: जब शरीर के अंदर रोगों से लड़ने की ताकत कमजोर होती है, तो स्किन बहुत जल्दी रिएक्ट कर देती है।
  • सिर्फ लक्षणों को दबाना: अगर हम सिर्फ ऊपरी तौर पर क्रीम लगाकर खुजली शांत कर देते हैं और असली कारण को छोड़ देते हैं, तो यह समस्या दोबारा लौट आती है।

एक्जिमा के शुरुआती संकेत क्या होते हैं?

एक्जिमा के पूरी तरह से उभरने से पहले शरीर कुछ छोटे-छोटे इशारे देता है। अगर आप इन्हें समय पर पकड़ लें, तो बचाव करना आसान हो जाता है:

  • स्किन का बहुत ज्यादा ड्राई होना: बच्चे की स्किन बार-बार रूखी और खिंची-खिंची सी लगने लगती है।
  • लगातार खुजली: बच्चा बार-बार खुजलाता है और इससे उसे काफी बेचैनी महसूस होती है।
  • लालपन (रैशेज) आना: शरीर के कुछ हिस्सों पर हल्का या गहरा लालपन दिखने लगता है।
  • दाने या चकत्ते उभरना: स्किन पर अचानक से छोटे-छोटे दाने या पैचेस नज़र आने लगते हैं।
  • जलन महसूस होना: खुजलाने के बाद बच्चे को उस जगह पर तेज जलन और दर्द हो सकता है।
  • त्वचा का फटना: कुछ खास हिस्सों पर स्किन फटने लगती है और उसमें हल्का दर्द बना रहता है।
  • पपड़ी (परत) बनना: अगर सूखापन ज्यादा बढ़ जाए, तो स्किन पर एक सूखी परत या पपड़ी जमने लगती है।

स्टेरॉयड क्रीम कैसे काम करती है?

डॉक्टर अक्सर जो स्टेरॉयड क्रीम देते हैं, वह स्किन की सूजन को एकदम से कम करने का काम करती है। यह शरीर के उस रिएक्शन को 'ब्लॉक' कर देती है जिसकी वजह से लालपन और खुजली पैदा होती है।

  • लालपन गायब करती है: इसे लगाते ही स्किन पर दिखने वाले रैशेज तेजी से शांत हो जाते हैं।
  • खुजली में तुरंत आराम: खुजली की बेचैनी कम हो जाती है और बच्चे को तुरंत राहत मिलती है।
  • सूजन घटाती है: प्रभावित जगह पर आई हुई सूजन धीरे-धीरे बैठ जाती है।
  • टेम्परेरी (अस्थायी) आराम: इसके इस्तेमाल से कुछ समय के लिए लक्षण छुप जाते हैं और रिलैक्स महसूस होता है।
  • सिर्फ ऊपर से असर करती है: यह बीमारी की जड़ को खत्म नहीं करती, बस कुछ समय के लिए लक्षणों को दबा देती है।
  • दवा रोकते ही वापसी: जैसे ही आप क्रीम लगाना बंद करते हैं, बहुत मुमकिन है कि समस्या फिर से उभर आए।

स्टेरॉयड क्रीम के लंबे समय तक उपयोग के जोखिम

अगर स्टेरॉयड क्रीम को बिना सही डॉक्टरी सलाह के बहुत ज्यादा या लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाए, तो स्किन पर इसके काफी नुकसान देखने को मिल सकते हैं:

  • स्किन का पतला पड़ जाना: लगातार इसके इस्तेमाल से त्वचा कमजोर और कागज की तरह पतली होने लगती है।
  • स्किन को लत लगना: त्वचा को इस क्रीम की आदत पड़ जाती है। इसके बिना खुजली और ज्यादा महसूस होती है।
  • लक्षणों का और बुरी तरह लौटना: क्रीम बंद करते ही खुजली और रैशेज पहले से भी ज्यादा भयानक रूप में वापस आ सकते हैं।
  • रंग में बदलाव: उस हिस्से की स्किन का रंग आसपास की स्किन से हल्का या गहरा दिखने लगता है।
  • खुद को हील करने की ताकत कम होना: स्किन की जो अपनी नेचुरल 'रिपेयरिंग पावर' होती है, वह धीरे-धीरे खत्म होने लगती है।
  • बच्चों पर ज्यादा असर: बच्चों की स्किन पहले ही बहुत नाजुक होती है, इसलिए उन पर इन क्रीम्स का साइड इफेक्ट बहुत जल्दी और गहराई से पड़ता है।

आयुर्वेद में एक्जिमा को कैसे समझा जाता है?

आयुर्वेद कभी भी एक्जिमा को सिर्फ ऊपर की चमड़ी की बीमारी नहीं मानता। यह शरीर के अंदर फैले असंतुलन का एक अलार्म है। आयुर्वेद में इसे 'विचर्चिका' और कई बार 'शीतपित्त' से जोड़कर देखा जाता है। यह तब उभरता है जब शरीर का खून अशुद्ध हो जाए, पित्त (गर्मी) बढ़ जाए और त्वचा की अपनी सुरक्षा कम हो जाए। 'शीतपित्त' में स्किन पर एकदम से खुजली और लालपन आ जाता है, जबकि 'विचर्चिका' में त्वचा बहुत रूखी, खुरदरी हो जाती है और यह दिक्कत लंबे समय तक चलती है।

बच्चों में वात (हवा) और पित्त (गर्मी) का बैलेंस बिगड़ने पर इसका सीधा असर लालपन, रूखेपन और जलन के रूप में दिखता है। आयुर्वेद का साफ मानना है कि हमारा पेट और हमारी त्वचा एक-दूसरे से सीधे जुड़े हुए हैं। अगर पाचन कमजोर है, तो पेट की वह गड़बड़ी शरीर के अंदर असंतुलन पैदा करेगी और सीधा स्किन पर दिखाई देगी। गैस बनना, पेट फूलना, भूख कम लगना और बार-बार एलर्जी होना ये सब उसी के लक्षण हैं। इसीलिए, आयुर्वेद में एक्जिमा को सिर्फ स्किन की समस्या मानकर नहीं, बल्कि पूरे शरीर और पेट के संतुलन को ठीक करने वाली बीमारी के तौर पर ठीक किया जाता है।

आयुर्वेद में एक्जिमा के इलाज का सही तरीका

आयुर्वेद के नजरिए से, यह शरीर के अंदर (खासकर आपके पेट और पाचन में) चल रही किसी बड़ी गड़बड़ी का अलार्म है। इसीलिए आयुर्वेद में सिर्फ ऊपर से क्रीम या लोशन लगाने पर जोर नहीं दिया जाता। इसके बजाय, सीधा बीमारी की जड़ पर काम किया जाता है जिससे आपका पूरा सिस्टम वापस अपनी पुरानी और सही लय में लौट सके।

  • बीमारी की असली जड़ पकड़ना: सिर्फ स्किन पर पड़े दाग या खुजली देखने से काम नहीं चलता। एक सही आयुर्वेदिक इलाज में आपकी पूरी डाइट, सोने-जागने का रूटीन और पेट की हालत को गहराई से खंगाला जाता है।
  • अंदरूनी सिस्टम को दुरुस्त करना: बाहर से कोई महंगी क्रीम थोप लेने से कहीं ज्यादा जरूरी है शरीर के अंदरूनी ढांचे को सुधारना, ताकि नेचुरल बैलेंस अपने आप वापस आ जाए।
  • पाचन (डाइजेशन) सुधारने पर फोकस: ये तो आपने सुना ही होगा कि सारी बीमारियों की जड़ पेट है। जब पेट साफ और पाचन मजबूत रहेगा, तो खून में गंदगी (टॉक्सिन्स) इकट्ठी ही नहीं होगी।
  • लाइफस्टाइल में सुधार: आप दिन भर में क्या खाते हैं, कैसी नींद लेते हैं और दिमाग पर कितना स्ट्रेस हावी है इन छोटी-छोटी आदतों को बदले बिना एक्जिमा से पीछा छुड़ाना मुश्किल है।
  • स्किन को अंदर से पोषण: चेहरे और स्किन की असली चमक दवाइयों या कॉस्मेटिक से नहीं, बल्कि आपकी अंदरूनी सेहत से बाहर आती है।

एक्जिमा ठीक करने वाली असरदार आयुर्वेदिक औषधियां (जड़ी-बूटियां)

होता क्या है कि जब हमारे शरीर में वात और पित्त का बैलेंस बुरी तरह बिगड़ जाता है और खून में अशुद्धियां (गंदगी) मिलने लगती हैं, तब वो एक्जिमा बनकर स्किन पर फूटता है। ऐसे में नीचे दी गई आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां सिर्फ खुजली नहीं दबातीं, बल्कि शरीर को अंदर से 'डिटॉक्स' करने का भारी काम भी करती हैं:

  • नीम: नीम के फायदों से तो हम सब वाकिफ हैं। स्किन की डीप क्लीनिंग से लेकर खुजली और इन्फेक्शन को जड़ से मिटाने में इसका कोई सानी नहीं है।
  • खदिर: शायद आपने इसका नाम कम सुना हो, लेकिन खून को साफ (ब्लड प्यूरीफाई) करने और स्किन की आग जैसी जलन को शांत करने में यह जड़ी-बूटी कमाल का असर दिखाती है।
  • गिलोय: इम्युनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) बढ़ाने की बात हो तो गिलोय सबसे ऊपर आती है। यह शरीर की अंदरूनी सूजन को खींच लेती है और रोगों से लड़ने की ताकत भर देती है।
  • हल्दी: हमारी रसोई की ये आम सी चीज असल में एक तगड़ी औषधि है। यह एक्जिमा वाले लाल चकत्तों और किसी भी तरह की सूजन को बड़ी तेजी से कम कर देती है।
  • मंजिष्ठा: खून साफ करने वाली जड़ी-बूटियों में मंजिष्ठा बहुत मशहूर है। एक्जिमा ठीक होने के बाद जो जिद्दी काले दाग-धब्बे छूट जाते हैं, उन्हें मिटाने में यह गजब का काम करती है।
  • एलोवेरा: खुजलाते-खुजलाते जब स्किन एकदम रूखी, कटी-फटी और बेजान हो जाए, तो एलोवेरा उसे अंदर तक नमी देता है। लगाते ही जो ठंडक मिलती है, उससे जलन में तुरंत राहत आ जाती है।

एक्जिमा से राहत दिलाने वाली खास आयुर्वेदिक थेरेपी

आयुर्वेदिक पंचकर्म या थेरेपीज़ का टारगेट सिर्फ ऊपर की चमड़ी का लालपन हटाना नहीं होता। इनका असली काम तो शरीर के कोने-कोने में जमे हुए टॉक्सिन्स (गंदगी) को खींचकर बाहर फेंकना और आपकी स्किन की उस नेचुरल 'प्रोटेक्शन लेयर' को वापस बनाना है जो कमजोर पड़ चुकी थी।

  • त्वचा शोधन थेरेपी: जैसा कि नाम से ही साफ है, इसमें कुछ खास तरीकों से शरीर और स्किन के अंदर छुपी सारी गंदगी और विषैले तत्वों की सफाई की जाती है।
  • तेल चिकित्सा: इसमें जड़ी-बूटियों से पके हुए खास तेलों का इस्तेमाल होता है। यह तेल स्किन के इतने अंदर तक जाकर पोषण देता है कि रूखापन और खुजली की परेशानी अपने आप जड़ से खत्म होने लगती है।
  • शीतल (ठंडा) लेप थेरेपी: एक्जिमा में कई बार असहनीय जलन होती है। ऐसे में जड़ी-बूटियों को पीसकर तैयार किया गया यह खास ठंडा लेप लगाते ही रैशेज और जलन में गजब की ठंडक और सुकून मिलता है।
  • भाप (स्टीम) चिकित्सा: इसमें औषधियों (दवाइयों) वाले पानी से भाप दी जाती है। इससे शरीर के बंद रोमछिद्र खुलते हैं, जकड़न टूटती है और अंदरूनी सिस्टम दोबारा पटरी पर लौटने लगता है।

एक्जिमा के मरीजों के लिए कैसा हो खानपान? (आहार)

सच कहूँ तो इस बीमारी में आपकी डाइट ही आपकी आधी दवा है। आप क्या खाते हैं, उससे शरीर की गर्मी घट या बढ़ सकती है। अगर खाने-पीने का सही ध्यान रखा जाए, तो खुजली और रूखेपन से जल्दी छुटकारा पाया जा सकता है।

  • हल्का और सादा खाना: कोशिश करें कि खाना ऐसा हो जो आसानी से पच जाए। खिचड़ी, दलिया या उबली हुई चीजें पेट पर भारी नहीं पड़तीं।
  • ताजे फल और हरी सब्जियां: ये दोनों चीजें शरीर को नेचुरल ठंडक देती हैं और स्किन को अंदर से जरूरी पोषण पहुंचाती हैं।
  • खूब सारा पानी पीना: पर्याप्त पानी पीने से स्किन अंदर से हाइड्रेट रहती है, जिससे खुजलाने की इच्छा अपने आप कम हो जाती है।
  • दही और छाछ (सही मात्रा में): दिन के समय दही या छाछ लेने से पेट की गर्मी शांत रहती है और डाइजेशन बढ़िया रहता है।
  • तले-भुने और मसालेदार खाने से दूरी: ज्यादा मिर्च-मसाला शरीर का पित्त (गर्मी) बढ़ा देता है, जिससे आपकी खुजली और रैशेज भड़क सकते हैं। इसलिए इनसे जितनी दूरी रहे, उतना अच्छा है।

डॉक्टर से कब मिलें?

एक्जिमा को लंबे समय तक इग्नोर करना भारी पड़ सकता है। अगर ये दिक्कतें दिखें, तो तुरंत आयुर्वेदिक एक्सपर्ट के पास जाएं:

  • खुजली और जलन बर्दाश्त से बाहर हो जाए।
  • स्किन फट जाए या उसमें से खून/पानी निकलने लगे।
  • रैशेज तेजी से शरीर पर फैलने लगें।
  • रातों की नींद उड़ जाए और रोजमर्रा के काम मुश्किल हो जाएं।
  • घरेलू नुस्खे बेअसर हो जाएं।
  • पस या कोई गंभीर इन्फेक्शन नज़र आने लगे।

निष्कर्ष

एक्जिमा सिर्फ चमड़ी की कोई ऊपरी बीमारी नहीं है; यह आपकी बिगड़ी हुई लाइफस्टाइल और शरीर के अंदर की गड़बड़ी का अलार्म है। जहां एलोपैथी इसे सिर्फ एलर्जी मानती है, वहीं आयुर्वेद इसे वात, पित्त और खून की गंदगी से जोड़कर जड़ से खत्म करता है। लंबे समय तक गलत खानपान और हद से ज्यादा स्ट्रेस आपकी स्किन का बुरा हाल कर सकता है। इसलिए, सिर्फ बाहर से क्रीम थोपने के बजाय अपनी डाइट सुधारने और शरीर को अंदर से फिट रखने पर ध्यान दें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

एक्जिमा में जलन हर समय एक जैसी नहीं रहती। कभी यह हल्की होती है और कभी अचानक बढ़ सकती है। यह स्थिति त्वचा की संवेदनशीलता और बाहरी वातावरण पर निर्भर करती है। सही देखभाल से इसकी तीव्रता कम की जा सकती है।

नहीं, एक्जिमा किसी भी उम्र में हो सकता है। हालांकि, बच्चों में यह अधिक देखा जाता है क्योंकि उनकी त्वचा अधिक नाजुक होती है। बड़े लोगों में भी यह स्थिति बनी रह सकती है। यह शरीर की अंदरूनी स्थिति से जुड़ा होता है।

कई लोगों में रात के समय खुजली बढ़ सकती है। इसका कारण त्वचा की संवेदनशीलता और शरीर की स्थिति में बदलाव हो सकता है। गर्मी और पसीना भी इसे बढ़ा सकते हैं। ठंडी और शांत स्थिति में कभी-कभी राहत मिलती है।

यदि बार बार खुजली या घाव हो जाए तो त्वचा पर निशान रह सकते हैं। यह हर व्यक्ति में अलग होता है। समय पर देखभाल से दाग कम किए जा सकते हैं। त्वचा को सुरक्षित रखना इसमें मदद करता है।

हां, कुछ साबुन त्वचा को और अधिक सूखा बना सकते हैं। इससे खुजली और बढ़ सकती है। हल्के और सौम्य उत्पाद बेहतर माने जाते हैं। त्वचा को नमी देना भी जरूरी होता है।

पसीना कुछ लोगों में खुजली और जलन बढ़ा सकता है। इससे त्वचा में असहजता महसूस हो सकती है। साफ सफाई का ध्यान रखना जरूरी होता है। त्वचा को सूखा रखना मदद कर सकता है।

नहाना नुकसानदायक नहीं है, लेकिन तरीका महत्वपूर्ण होता है। बहुत गर्म पानी से समस्या बढ़ सकती है। हल्का और संतुलित पानी बेहतर माना जाता है। बाद में त्वचा को मॉइस्चर देना मदद करता है।

हां, यह स्थिति कई बार दोबारा दिखाई दे सकती है। इसका कारण शरीर का अंदरूनी असंतुलन हो सकता है। बाहरी कारण भी इसे प्रभावित कर सकते हैं। सही देखभाल से इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

धूप का असर हर व्यक्ति पर अलग हो सकता है। कुछ लोगों में यह आराम दे सकती है और कुछ में परेशानी बढ़ा सकती है। त्वचा की संवेदनशीलता इसमें भूमिका निभाती है। संतुलित धूप लेना बेहतर माना जाता है।

यह स्थिति बिना देखभाल के अक्सर लंबे समय तक बनी रह सकती है। लक्षण समय के साथ बढ़ भी सकते हैं। इसलिए त्वचा और जीवनशैली दोनों पर ध्यान देना जरूरी होता है। नियमित देखभाल से सुधार में मदद मिलती है।

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