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Senior Citizens में Depression - पहचान में क्यों देरी होती है?

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 23 May, 2026
  • category-iconUpdated on 23 May, 2026
  • category-iconMental Health
  • blog-view-icon5007

उम्र के आखिरी पड़ाव में जब इंसान को सबसे ज़्यादा सहारे और शांति की आवश्यकता होती है, तब अक्सर एक खामोश अंधेरा उन्हें घेर लेता है हम सोचते हैं कि बुढ़ापे में चिड़चिड़ापन या उदासी एक आम बात है, लेकिन हकीकत में यह उस गहरे अवसाद का शुरुआती संकेत हो सकता है जो अंदर ही अंदर उन्हें खोखला कर रहा है।

परिवार वाले अक्सर शारीरिक बीमारियों की जाँच तो करवा लेते हैं, लेकिन मन के उस भारीपन को समझ नहीं पाते जो बिना किसी शोर के उनकी जीवन ऊर्जा को सोख रहा है सही समय पर इन खामोश चीखों को पहचानना न केवल उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए, बल्कि उनके संपूर्ण जीवन को गरिमा देने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

बुढ़ापे में डिप्रेशन के लक्षण छुप क्यों जाते हैं?

बढ़ती उम्र के साथ शरीर में कई बदलाव आते हैं, और अक्सर हम हर मानसिक या भावनात्मक समस्या को "उम्र का तकाज़ा" मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। बुजुर्गों में डिप्रेशन (Depression) के लक्षण युवाओं की तरह साफ नहीं दिखते, बल्कि वे शारीरिक शिकायतों के पीछे छुप जाते हैं।

  • शारीरिक बीमारियों का पर्दा: अक्सर बुजुर्ग उदासी के बजाय पेट में गैस, सिरदर्द या बिना किसी कारण शरीर में दर्द की शिकायत करते हैं, जो असल में अवसाद का रूप होता है।
  • सामाजिक अलगाव (Social Isolation): रिटायरमेंट के बाद या बच्चों के दूर चले जाने पर अकेलेपन को वे अपनी नियति मान लेते हैं, जिससे सही संवाद नहीं हो पाता और मानसिक तनाव (Mental Stress) बढ़ता जाता है।
  • बात करने में हिचकिचाहट: पुरानी पीढ़ी के लोग मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने में असहज महसूस करते हैं, उन्हें लगता है कि यह कोई कमज़ोरी है जिसे छुपाना चाहिए।

बुजुर्गों में होने वाले डिप्रेशन किन प्रकार के हो सकते हैं?

जब हम अवसाद की बात करते हैं, तो यह केवल एक तरह की उदासी नहीं है, बल्कि इसके कई अलग-अलग रूप हो सकते हैं। वरिष्ठ नागरिकों में यह समस्या उनके दोषों और जीवनशैली के अनुसार अलग-अलग प्रकार से सामने आती है।

  • वात-प्रधान अवसाद (Vata-induced Depression): इसमें बुजुर्गों में डर, बेचैनी, और अनिद्रा की समस्या (Insomnia) बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है। वे हर छोटी बात पर चिंता करने लगते हैं और उनका मन कभी शांत नहीं रहता।
  • पित्त-प्रधान अवसाद (Pitta-induced Depression): इसमें उदासी से ज़्यादा गुस्सा, चिड़चिड़ापन और दूसरों पर हावी होने की प्रवृत्ति दिखती है। वे अपनी स्थिति को लेकर बहुत आक्रामक हो सकते हैं।
  • कफ-प्रधान अवसाद (Kapha-induced Depression): इस प्रकार में व्यक्ति एकदम शांत हो जाता है, बिस्तर से उठने का मन नहीं करता, और क्रोनिक फटीग (Chronic Fatigue) जैसी भयंकर सुस्ती घेर लेती है।

क्या आपके घर के बुजुर्ग भी दे रहे हैं ये संकेत?

अवसाद कभी भी अचानक से नहीं आता, यह अपने साथ कई छोटे-छोटे संकेत लेकर आता है जिन्हें हम अक्सर उनकी उम्र से जोड़कर देखने की भूल कर बैठते हैं। इन शुरुआती संकेतों को समय रहते पकड़ना बहुत ज़रूरी है।

  • बिना कारण दर्द रहना: अगर वे लगातार जोड़ों का दर्द (Joint Pain) या शरीर के अलग-अलग हिस्सों में दर्द की बात करते हैं और रिपोर्ट नॉर्मल आती है, तो यह मानसिक अवसाद का संकेत है।
  • अकारण डर और घबराहट: घर में अकेले रहने से या बाहर चलने से डर (Fear of Walking) लगना भी नर्वस सिस्टम की कमज़ोरी के लक्षण हैं।
  • भूख और वज़न में बदलाव: अचानक से खाना बिल्कुल कम कर देना या बहुत ज़्यादा मीठा खाने की इच्छा होना, जो सीधे तौर पर असंतुलित मानसिक स्थिति को दर्शाता है।
  • स्मृति में कमी और उलझन: बात करते-करते चीज़ें भूल जाना या हर वक्त कन्फ्यूज़न में रहना, जिसे हम अक्सर डिमेंशिया समझ लेते हैं, लेकिन यह गहरा अवसाद हो सकता है।

उम्र का तकाज़ा मानकर हम इस परेशानी में क्या गलतियाँ करते हैं?

परिवार के सदस्य अक्सर अनजाने में कुछ ऐसी गलतियाँ कर बैठते हैं जो बुजुर्गों की मानसिक स्थिति को सुलझाने के बजाय उसे और ज़्यादा जटिल बना देती हैं। इन गलतियों से बचना बहुत आवश्यक है।

  • लक्षणों को सामान्य मानना: "अब उम्र हो गई है, इसलिए चिड़चिड़े रहते हैं" – ऐसा सोचकर उनकी परेशानियों को नज़रअंदाज़ कर देना सबसे बड़ी भूल है, जिससे मरीज़ अंदर ही अंदर घुटता रहता है।
  • ज़बरदस्ती नींद की गोलियाँ देना: रात को नींद न आने पर डॉक्टर की सलाह के बिना तेज़ स्लीपिंग पिल्स दे देना, जो उनके दिमाग को सुन्न कर देता है और कब्ज़ की शिकायत (Constipation) को बढ़ा देता है।
  • सिर्फ शारीरिक जांच पर निर्भर रहना: बार-बार एमआरआई और ब्लड टेस्ट करवाना लेकिन पाचन और मस्तिष्क का संबंध (Brain-Gut Connection) समझने की कोशिश न करना एक बड़ी गलती है।

आयुर्वेद बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य को किस नज़रिए से देखता है?

आधुनिक विज्ञान जहां डिप्रेशन को केवल सेरोटोनिन हार्मोन की कमी मानता है, वहीं आयुर्वेद इसे दोषों के असंतुलन और ओजस (Ojas) की कमी के एक संपूर्ण विज्ञान के रूप में समझता है।

  • प्राण वात का असंतुलन: बुढ़ापा (वृद्धावस्था) स्वाभाविक रूप से वात का काल होता है। जब प्राण वात बिगड़ता है, तो यह सीधे तौर पर दिमाग की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है और नसों की कमज़ोरी (Neurological Weakness) पैदा करता है।
  • मज्जा धातु (नर्वस सिस्टम) का सूखना: उम्र बढ़ने के साथ शरीर में प्राकृतिक स्निग्धता (चिकनाई) कम हो जाती है, जिससे मज्जा धातु सूखने लगती है और दिमाग में रूखापन व तनाव बढ़ जाता है।
  • ओजस का क्षय: खराब पाचन और मानसिक आघात से शरीर की वाइटल एनर्जी (Ojas) खत्म होने लगती है, जिससे जीने की इच्छा समाप्त होने लगती है।

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण इस समस्या पर कैसे काम करता है?

जीवा आयुर्वेद में हम केवल दिमाग को सुन्न करने वाली दवाएं नहीं देते, बल्कि हम शरीर, मन और आत्मा तीनों को एक साथ संतुलित करने की गहरी प्रक्रिया अपनाते हैं।

  • मूल कारण पर प्रहार: हम सिर्फ लक्षणों को नहीं दबाते, बल्कि यह पता लगाते हैं कि अवसाद की जड़ वात है, पित्त है, या फिर कमज़ोर पाचन तंत्र (Digestive System) है।
  • मेध्य रसायनों का उपयोग: हम ऐसी प्राकृतिक औषधियों का उपयोग करते हैं जो ब्रेन सेल्स को पोषण देती हैं और बिना किसी लत (Addiction) के दिमाग को शांत करती हैं।
  • स्रोतो शोधन (डिटॉक्स): शरीर के सूक्ष्म चैनलों में जमे हुए टॉक्सिन्स (आम) को बाहर निकाला जाता है ताकि दिमाग तक सही मात्रा में ऑक्सीजन और पोषण पहुँच सके।

मस्तिष्क को शांति देने वाली आयुर्वेदिक डाइट

मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध हमारे पेट से है। जो भोजन पचने में आसान और सात्विक होता है, वह दिमाग को तुरंत शांति प्रदान करता है। इस डाइट चार्ट का पालन करना बेहद फायदेमंद है:

आहार की श्रेणी क्या खाएं (दिमाग को पोषण देने वाले) क्या न खाएं (वात भड़काने वाले ट्रिगर फूड्स)
अनाज (Grains) पुराना चावल, मूंग दाल की खिचड़ी, ओट्स, दलिया। मैदा, वाइट ब्रेड, बासी रोटियां, पैकेटबंद नूडल्स।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी (दिमाग के लिए उत्तम), बादाम रोगन। रिफाइंड ऑयल, बहुत ज़्यादा तला-भुना खाना।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, तरोई, कद्दू, पालक (घी में छौंकी हुई)। कच्चा सलाद, कटहल, बैंगन, अरबी।
फल (Fruits) पपीता, उबला हुआ सेब, रात भर भीगी हुई मुनक्का, मीठे फल। कच्चे या खट्टे फल, फ्रिज में रखे ठंडे फल।
पेय पदार्थ (Beverages) गुनगुना दूध (एक चुटकी हल्दी/जायफल के साथ), जीरे का पानी। बहुत ज़्यादा चाय या कॉफी, कोल्ड ड्रिंक्स, बर्फ का पानी।

मानसिक तनाव और अवसाद दूर करने वाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में प्रकृति द्वारा प्रदान की गई कई ऐसी चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ हैं जो नर्वस सिस्टम को रिपेयर करने और मूड को बेहतर बनाने का काम करती हैं।

  • अश्वगंधा (Ashwagandha): यह एक बेहतरीन अडैप्टोजेन है। अश्वगंधा (Ashwagandha) शरीर से कोर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) के स्तर को कम करता है और बुजुर्गों में शारीरिक व मानसिक दोनों तरह की ताकत बढ़ाता है।
  • ब्राह्मी (Brahmi): यह जड़ी-बूटी सीधे तौर पर नर्वस सिस्टम पर काम करती है। ब्राह्मी (Brahmi) का नियमित सेवन भूलने की बीमारी को दूर करता है और दिमाग की एकाग्रता व शांति बढ़ाता है।
  • गिलोय (Guduchi): दिमाग में जमे हुए टॉक्सिन्स को बाहर निकालने के लिए गिलोय (Guduchi) बहुत कारगर है। यह इम्युनिटी बढ़ाने के साथ-साथ मानसिक शांति भी प्रदान करती है।
  • जटामांसी (Jatamansi): यह भयंकर मानसिक उथल-पुथल को शांत करने और बिना किसी साइड इफेक्ट के गहरी नींद लाने में मदद करने वाली अत्यंत प्रभावी औषधि है।

नर्वस सिस्टम को आराम देने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब अवसाद बहुत गहरा हो और केवल दवाएं काम न कर रही हों, तो पंचकर्म की ये बाहरी थेरेपीज़ दिमाग की नसों को तुरंत रिलैक्स कर देती हैं:

  • शिरोधारा थेरेपी (Shirodhara Therapy): माथे पर गुनगुने औषधीय तेल या काढ़े की लगातार धार गिराई जाती है। यह शिरोधारा थेरेपी (Shirodhara Therapy) दिमाग के हाइपोथैलेमस को शांत करती है और डिप्रेशन के गहरे स्तर को खत्म करती है।
  • अभ्यंग थेरेपी (Abhyanga Therapy): शरीर में वात के रूखेपन को मिटाने के लिए गर्म तेल से पूरी बॉडी की मालिश की जाती है। अभ्यंग थेरेपी (Abhyanga Therapy) से रुकी हुई ऊर्जा का प्रवाह खुल जाता है और शरीर हल्का महसूस होता है।
  • तक्रधारा थेरेपी (Takradhara Therapy): विशेष रूप से पित्त-प्रधान अवसाद और एंग्जायटी में तक्रधारा थेरेपी (Takradhara Therapy) का उपयोग किया जाता है, जिसमें औषधीय छाछ का प्रयोग होता है, जो दिमाग को भयंकर शीतलता और आराम देता है।

जीवा आयुर्वेद में हम मरीज़ों की जाँच कैसे करते हैं?

हम केवल आपके उदास चेहरे को देखकर कोई गोली नहीं थमाते; हम आपके पूरे शारीरिक और मानसिक ढांचे की गहराई से जाँच करते हैं:

  • नाड़ी परीक्षा: सबसे पहले नाड़ी (Pulse) चेक करके यह समझना कि आपके अंदर प्राण वात और साधक पित्त का स्तर क्या है और दिमाग में कितना रूखापन है।
  • मनोवैज्ञानिक मूल्याँकन: मरीज़ से लंबी बातचीत की जाती है ताकि उनके मन में दबे हुए असली डर और प्राकृतिक एंग्जायटी रिलीफ (Natural Anxiety Relief) की संभावनाओं का गहराई से पता लगाया जा सके।
  • लाइफस्टाइल ऑडिट: आपके सोने-जागने का समय, भोजन का प्रकार और सामाजिक जुड़ाव का गहराई से विश्लेषण किया जाता है ताकि सही कारण को पकड़ा जा सके।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

हम आपको इस मानसिक संघर्ष में अकेला नहीं छोड़ते। एक स्वस्थ, आनंदमय और हल्के जीवन की ओर हर कदम पर हम आपका मार्गदर्शन करते हैं:

  • जीवा से संपर्क करें: बेझिझक होकर सीधे हमारे नंबर +919266714040 पर कॉल करें और अपने घर के बुजुर्ग की स्थिति के बारे में बात करें।
  • अपॉइंटमेंट फिक्स करें: आप हमारे 80 से भी ज़्यादा क्लिनिक में आकर आराम से डॉक्टर से आमने-सामने मिल सकते हैं।
  • ऑनलाइन वीडियो कंसल्टेशन: अगर बुजुर्ग का क्लिनिक आना मुश्किल है, तो आप अपने घर बैठे वीडियो कॉल से डॉक्टर से बात कर सकते हैं।
  • व्यक्तिगत प्लान: दोषों के अनुसार खास जड़ी-बूटियाँ, थेरेपी और एक आयुर्वेदिक जीवनशैली (Ayurvedic Lifestyle) का रूटीन तैयार किया जाता है।

मानसिक शांति और रिकवरी में कितना समय लगता है?

सालों से दबे हुए अवसाद और डैमेज हुए नर्वस सिस्टम को दोबारा प्राकृतिक अवस्था में लाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: मेध्य रसायनों के प्रभाव से दिमाग का भारीपन कम होगा और रात की अच्छी नींद (Restful Sleep) आनी शुरू हो जाएगी।
  • 3-4 महीने: लगातार उपचार से शरीर में ओजस बढ़ेगा, चिड़चिड़ापन खत्म होगा और वे वापस परिवार के साथ खुलकर बात करने लगेंगे।
  • 5-6 महीने: उनका नर्वस सिस्टम पूरी तरह पोषित हो जाएगा और वे बिना किसी कृत्रिम सहारे के एक खुशहाल और सक्रिय जीवन का आनंद लेने लगेंगे।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय जरूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएं शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग Rs.1,00,000 है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताजा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

मरीज़ जीवा आयुर्वेद पर भरोसा क्यों करते हैं?

हम आपके प्रियजनों को जीवन भर के लिए सुन्न करने वाली दवाइयों का गुलाम नहीं बनाते, बल्कि उनके दिमाग की उस ऊर्जा को जगाते हैं जो किसी भी अवसाद से प्राकृतिक रूप से लड़ सकती है:

  • जड़ से इलाज: हम सिर्फ उदासी को दबाने की गोली नहीं देते; हम वात के असंतुलन को ठीक करते हैं और पैनिक और एंग्जायटी (Panic and Anxiety) को जड़ से मिटाते हैं।
  • विशेषज्ञ डॉक्टर: हमारे पास सालों का शानदार अनुभव है। हमने हज़ारों वरिष्ठ नागरिकों को क्रोनिक डिप्रेशन के खतरनाक जाल से निकालकर वापस प्राकृतिक जीवन दिया है।
  • प्राकृतिक और सुरक्षित: बाज़ार की एंटी-डिप्रेसेंट दवाइयां नर्वस सिस्टम को सुस्त कर देती हैं, जबकि हमारे आयुर्वेदिक रसायन पूरी तरह सुरक्षित हैं और दिमाग को प्राकृतिक ताकत देते हैं।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

वरिष्ठ नागरिकों में डिप्रेशन के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है जिसे समझना ज़रूरी है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य मस्तिष्क के रसायनों (Serotonin) को कृत्रिम रूप से संतुलित करने के लिए एंटी-डिप्रेसेंट देना। वात को शांत करना, ओजस को बढ़ाना और प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से दिमाग को पोषण देना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल मस्तिष्क की एक रासायनिक गड़बड़ी मानना। इसे शरीर के दोषों, कमज़ोर पाचन और मानसिक ऊर्जा के क्षय का एक संपूर्ण परिणाम मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल डाइट पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है, केवल दवाइयों पर निर्भरता होती है। सात्विक आहार, सही दिनचर्या और योग-ध्यान पर विशेष ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर दवाइयां छोड़ने पर अक्सर लक्षण वापस आ जाते हैं और लत (Dependency) लग जाती है। शरीर और दिमाग इतने मज़बूत हो जाते हैं कि वे प्राकृतिक रूप से तनाव का सामना करना सीख जाते हैं।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद इस अवसाद को पूरी तरह रिवर्स कर सकता है, लेकिन अगर आपको बुजुर्गों के व्यवहार में ये गंभीर बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल मदद ज़रूरी हो जाती है:

  • खुद को नुकसान पहुँचाने की बातें: अगर वे बार-बार जीवन को खत्म करने या खुद को नुकसान पहुँचाने का ज़िक्र करें, तो इसे कभी हल्के में न लें।
  • अचानक से खाना-पीना पूरी तरह छोड़ देना: जिससे उनका वज़न और शरीर का हाइड्रेशन खतरनाक स्तर तक गिर जाए और कमज़ोरी जानलेवा बन जाए।
  • गंभीर मतिभ्रम (Hallucinations): अगर उन्हें ऐसी आवाज़ें सुनाई दें या चीज़ें दिखाई दें जो असल में वहां नहीं हैं। ऐसे में तुरंत तनाव से मुक्ति (Stress Relief) और विशेषज्ञ की सलाह आवश्यक है।

निष्कर्ष

बुजुर्गों का अवसाद कोई उम्र का स्वाभाविक हिस्सा नहीं है जिसे बर्दाश्त किया जाए। यह एक चीख है जो उनके कमज़ोर होते नर्वस सिस्टम और वात के बिगड़ने की गवाही दे रही है। उन्हें अकेलेपन के इस अंधेरे में मत छोड़िए। सही आयुर्वेदिक खानपान, मेध्य रसायनों और थेरेपीज़ की मदद से उनके जीवन में फिर से उल्लास लाया जा सकता है। उनके बुढ़ापे को एक बोझ न बनने दें, इससे राहत पाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

FAQs

हाँ, रिटायरमेंट के बाद अचानक दिनचर्या बदलने, सामाजिक मेलजोल कम होने और अकेलेपन की भावना के कारण उदासी या निराशा महसूस होना डिप्रेशन का शुरुआती संकेत हो सकता है।

आमतौर पर पारंपरिक आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ जैसे अश्वगंधा और ब्राह्मी को addiction पैदा करने वाला नहीं माना जाता, लेकिन किसी भी औषधि का सेवन विशेषज्ञ की सलाह से ही करना चाहिए।

हाँ, पालतू जानवरों के साथ समय बिताने से अकेलापन कम हो सकता है, मूड बेहतर हो सकता है और भावनात्मक सहारा मिलता है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ता है।

उनसे धैर्य और प्यार से बात करें। उनकी नींद, भूख या शरीर की तकलीफों के बारे में पूछते हुए धीरे-धीरे भावनात्मक स्थिति समझने की कोशिश करें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लें।

हाँ, लंबे समय तक untreated depression ध्यान, याददाश्त और सोचने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। कई बार इसके लक्षण डिमेंशिया जैसे दिखाई दे सकते हैं।

हाँ, लगातार नकारात्मक खबरें देखने से तनाव, चिंता और डर की भावना बढ़ सकती है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है।

हाँ, अनुलोम-विलोम और भ्रामरी जैसे हल्के प्राणायाम तनाव कम करने, मन शांत रखने और बेहतर मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

हाँ, लगातार तनाव और डिप्रेशन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे व्यक्ति बार-बार बीमार पड़ सकता है।

ऐसे लोगों को नरम और आसानी से निगलने वाले आहार जैसे दलिया, मूंग दाल सूप, खिचड़ी, मैश किए हुए फल और गुनगुना दूध दिया जा सकता है।

हाँ, बच्चों के साथ समय बिताने से खुशी, अपनापन और भावनात्मक जुड़ाव बढ़ता है, जिससे अकेलापन और मानसिक तनाव कम हो सकता है।

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