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Disk Bulge से चलना बंद हो गया था – 58 वर्ष की कमला सिंह को आयुर्वेद से मिली राहत

Information By Dr. Keshav Chauhan
  • category-iconPublished on 27 May, 2026
  • category-iconUpdated on 27 May, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5009

भारत में कमर और पीठ का दर्द आज एक बड़ी समस्या बन चुका है। 2025 के एक अध्ययन के अनुसार देश में लगभग 48 प्रतिशत लोग कभी न कभी कमर या पीठ के दर्द से परेशान रहते हैं। यह दर्द कई बार सामान्य नहीं होता, बल्कि डिस्क बल्ज या डिस्क हर्निएशन जैसी गंभीर स्थिति बन जाता है जो नसों पर दबाव डालकर पैरों में दर्द, सुन्नपन और कमज़ोरी तक पहुँचा देता है।

58 साल की कमला सिंह जी भी इसी तकलीफ से गुज़र रही थीं। कमर से पैरों तक दर्द, खड़े रहने में परेशानी और सीढ़ियाँ चढ़ना तक मुश्किल हो गया था। जाँच में पता चला कि L4-L5 और L5-S1 डिस्क में बल्ज था जो नसों पर दबाव बना रहा था।

58 वर्ष की कमला सिंह का जीवन बदल देने वाली समस्या

58 साल की उम्र में कमला जी की ज़िंदगी बाहर से सामान्य दिखती थी लेकिन अंदर से वो एक बड़ी तकलीफ से गुज़र रही थीं। कमर से शुरू होने वाला दर्द धीरे-धीरे दोनों पैरों तक फैल गया था। सुबह उठना मुश्किल, खड़े रहना मुश्किल और सीढ़ियाँ चढ़ना तो जैसे किसी बड़ी चुनौती जैसा हो गया था।

जब जाँच हुई तो पता चला कि L4-L5 और L5-S1 डिस्क में बल्ज है जो नसों पर दबाव बना रहा था। यही उनके दर्द और कमज़ोरी की असली वजह थी। डॉक्टरों ने ऑपरेशन की सलाह दी, लेकिन कमला जी इससे बचना चाहती थीं। 

डिस्क बल्ज क्या होता है और चलना-फिरना मुश्किल क्यों हो जाता है?

रीढ़ की हड्डी के बीच में नरम गद्दियाँ होती हैं जो रीढ़ को सहारा देती हैं। जब इनमें से कोई गद्दी अपनी जगह से बाहर उभर आती है तो उसे डिस्क बल्ज कहते हैं। यह उभरी हुई डिस्क पास की नसों पर दबाव डालती है जिससे कमर और पैरों में दर्द, जलन और सुन्नपन शुरू हो जाता है। 

कमला जी के साथ भी यही हुआ। शुरू में लगा कि सामान्य कमर दर्द है, लेकिन जब खड़े रहना तक मुश्किल हो गया तब समझ आया कि बात गहरी है। डिस्क बल्ज सिर्फ दर्द की समस्या नहीं है, यह धीरे-धीरे इंसान की आज़ादी छीन लेती है। चाहकर भी रोज़ के काम नहीं हो पाते और मन में यह डर बैठ जाता है कि कहीं हालत और न बिगड़ जाए।

L4-L5 और L5-S1 क्या हैं और इनका शरीर पर क्या असर पड़ता है?

रीढ़ की हड्डी में सबसे नीचे के हिस्से में L4-L5 और L5-S1 दो अहम जोड़ होते हैं। यही वो हिस्से हैं जो हमारी कमर, कूल्हों, पैरों और पंजों तक जाने वाली नसों को नियंत्रित करते हैं। जब इन जोड़ों की डिस्क में बल्ज आ जाता है तो यह नसों पर सीधा दबाव डालता है।

इसका असर सिर्फ कमर तक नहीं रहता, बल्कि यह दर्द कमर से शुरू होकर कूल्हे, जाँघ, पिंडली और कभी-कभी पंजों तक फैल जाता है। इसके साथ-साथ पैरों में सुन्नपन, झनझनाहट और कमज़ोरी भी महसूस होने लगती है।

तकलीफें जो कमला जी को हर रोज़ झेलनी पड़ती थीं

कमला जी का दर्द सिर्फ कमर तक सीमित नहीं था। यह धीरे-धीरे उनकी पूरी दिनचर्या को प्रभावित कर रहा था। हर सुबह उठना एक चुनौती बन गई थी और दिन के हर काम में तकलीफ साथ रहती थी।

  • कमर से पैरों तक तेज़ दर्द: दर्द कमर से शुरू होकर कूल्हे, जाँघ और पिंडली तक फैल जाता था। कभी-कभी यह दर्द इतना तेज़ होता था कि वो हिल भी नहीं पाती थीं।
  • खड़े रहने में तकलीफ: ज़्यादा देर खड़े रहना मुश्किल हो गया था। रसोई में काम करना हो या कहीं लाइन में खड़ा होना हो, कुछ मिनट बाद ही दर्द असहनीय हो जाता था।
  • सीढ़ियाँ चढ़ना बंद हो गया था: घर में सीढ़ियाँ चढ़ना जैसे किसी पहाड़ पर चढ़ने जैसा लगने लगा था। धीरे-धीरे उन्होंने सीढ़ियों से बचना शुरू कर दिया।
  • पैरों में सुन्नपन और झनझनाहट: पैरों में अक्सर सुन्नपन और झनझनाहट रहती थी जिससे पैर ठीक से काम नहीं कर पाते थे और चलने में लड़खड़ाहट होती थी।
  • रात को नींद नहीं आती थी: लेटने पर भी दर्द कम नहीं होता था। करवट बदलना भी तकलीफदेह था जिससे रात भर नींद ठीक से नहीं आती थी।
  • रोज़मर्रा के काम के लिए दूसरों पर निर्भरता: घर के छोटे-छोटे काम जैसे झुककर कुछ उठाना, बाज़ार जाना या घर की सफाई करना अब अकेले संभव नहीं रहा था।

जब एलोपैथी से स्थायी राहत न मिले तो आगे क्या?

दर्द शुरू होते ही सबसे पहला सहारा दवाइयाँ बनती हैं। शुरुआत में कुछ राहत मिलती है लेकिन जैसे ही दवा का असर कम होता है दर्द फिर लौट आता है। धीरे-धीरे दवाओं पर निर्भरता बढ़ती जाती है और मन में सवाल उठता है कि क्या पूरी ज़िंदगी इसी तरह चलेगी।

कमला जी के साथ भी यही हुआ। दवाओं से कुछ समय की राहत मिली लेकिन खड़े रहने की तकलीफ और पैरों की कमज़ोरी जस की तस बनी रही। तब समझ आया कि सिर्फ दर्द दबाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उस जड़ को ठीक करना होगा जहाँ से यह समस्या शुरू हुई है।

जीवा आयुर्वेद के साथ कमला जी का पहला संपर्क

एलोपैथी से बार-बार राहत मिलती और दर्द फिर लौट आता, इस चक्र से थककर कमला जी ने आयुर्वेद की तरफ देखना शुरू किया। किसी जानने वाले ने जीवा आयुर्वेद का नाम बताया। शुरुआत में मन में संदेह था कि क्या आयुर्वेद से डिस्क बल्ज जैसी गंभीर समस्या में सच में फर्क पड़ सकता है, लेकिन जब दर्द रोज़मर्रा की ज़िंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर रहा था तो एक बार कोशिश करने का फैसला किया।

उन्होंने +91 9266714040 पर कॉल करके घर बैठे परामर्श लिया। जीवा के डॉक्टरों ने उनकी पूरी बात ध्यान से सुनी। सिर्फ रिपोर्ट नहीं देखी बल्कि दर्द कब बढ़ता है, चलने-फिरने की स्थिति कैसी है और दिनचर्या कैसी है, यह सब विस्तार से समझा। इसी आधार पर सही इलाज की दिशा तय की गई।

जीवा आयुर्वेद डिस्क बल्ज को शरीर के अंदर असंतुलन कैसे समझता है?

आयुर्वेद के अनुसार शरीर के भीतर सब कुछ संतुलन पर टिका होता है। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तब समस्याएँ पैदा होती हैं। डिस्क बल्ज जैसी स्थिति को आयुर्वेद मुख्य रूप से वात दोष के असंतुलन से जोड़कर देखता है। वात दोष शरीर में गति, नसों और संवेदनाओं से जुड़ा होता है। जब वात असंतुलित हो जाता है, तो नसों में कमज़ोरी आने लगती है। शरीर का पोषण सही तरीके से नहीं पहुँच पाता और जोड़ों तथा रीढ़ के आसपास सूखापन बढ़ने लगता है। यही सूखापन और कमज़ोरी धीरे-धीरे दर्द, जकड़न और चलने में परेशानी का कारण बनती हैं।

आयुर्वेद यह भी मानता है कि समस्या केवल कमर तक सीमित नहीं होती। पूरे शरीर की स्थिति, पाचन, दिनचर्या और मानसिक तनाव, सब कुछ इसमें भूमिका निभाता है। इसलिए इलाज भी केवल एक हिस्से तक सीमित नहीं रहता। आप जब आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से देखते हैं, तो यह समझ आता है कि क्यों नसों पर दबाव पड़ रहा है और उसे कैसे धीरे-धीरे कम किया जा सकता है।

जीवा आयुर्वेद में कमला जी की जाँच कैसे की गई?

डिस्क बल्ज और पुराने कमर दर्द के मामले में कमला जी की स्थिति को सिर्फ रिपोर्ट के आधार पर नहीं देखा गया, बल्कि शरीर के अंदर चल रहे असंतुलन को गहराई से समझा गया। 

  • कमर और पैरों में दर्द के पैटर्न, उसकी तीव्रता और किन हिस्सों में ज़्यादा तकलीफ है, इसका विश्लेषण किया गया
  • खड़े रहने, चलने और सीढ़ियाँ चढ़ने की क्षमता तथा दिनभर में दर्द कब बढ़ता है, यह ध्यान से समझा गया
  • पिछले कई सालों में लिए गए इलाज, दवाइयों और उनके असर का पूरा विश्लेषण किया गया
  • रोज़ की दिनचर्या, शारीरिक गतिविधि और बैठने-उठने की आदतों को विस्तार से जाना गया
  • पाचन शक्ति और शरीर में पोषण की स्थिति का मूल्यांकन किया गया
  • नींद की गुणवत्ता, थकान और मानसिक तनाव का शरीर पर क्या असर पड़ रहा है, यह भी समझा गया
  • उम्र से जुड़े बदलाव और उनका रीढ़ की हड्डी व नसों पर असर भी ध्यान में रखा गया

इन सभी पहलुओं को जोड़कर कमला जी के लिए एक अलग और व्यक्तिगत उपचार योजना तैयार की गई। इसका मकसद सिर्फ दर्द कम करना नहीं था बल्कि रीढ़, नसों और पूरे शरीर को अंदर से संतुलित करके उन्हें दोबारा सामान्य ज़िंदगी की तरफ लाना था।

जीवा आयुर्वेद में कमला जी की व्यक्तिगत उपचार योजना

कमला जी के मामले में दर्द को सिर्फ कमर या पैरों की समस्या नहीं माना गया, बल्कि इसे पूरे शरीर के असंतुलन का नतीजा समझा गया। इलाज का मकसद सिर्फ दर्द दबाना नहीं था, बल्कि उन असली वजहों को ठीक करना था जो डिस्क बल्ज और नसों के दबाव की जड़ में थीं।

  • वात संतुलन और नसों की देखभाल: कमर से पैरों तक फैलता दर्द और सुन्नपन वात के बिगड़ने की निशानी था। वात को संतुलित करके नसों पर दबाव कम करने और दर्द को धीरे-धीरे घटाने पर काम किया गया।
  • रीढ़ और डिस्क को पोषण देना: डिस्क के कमज़ोर होने की एक बड़ी वजह शरीर में धातुओं का कमज़ोर होना था। इसलिए हड्डियों, डिस्क और आसपास की मांसपेशियों को अंदर से मज़बूत बनाने पर ध्यान दिया गया।
  • पाचन सुधार और आम का निष्कासन: कमज़ोर पाचन से शरीर में आम यानी विषाक्त पदार्थ जमा हो रहे थे जो नसों और जोड़ों की तकलीफ को और बढ़ा रहे थे। इसलिए पाचन को दुरुस्त करना और आम को बाहर निकालना इलाज का अहम हिस्सा रहा।
  • नसों और मांसपेशियों को मज़बूती: पैरों में कमज़ोरी और सुन्नपन नसों के कमज़ोर होने से जुड़ा था। इन्हें पोषण और ताकत देने के लिए खास जड़ी-बूटियाँ और थेरेपी अपनाई गई ताकि चलने-फिरने की क्षमता धीरे-धीरे वापस आए।
  • जीवनशैली और आहार में सुधार: गलत खानपान और दिनचर्या भी दर्द को बढ़ावा दे रहे थे। इसलिए सही आहार, हल्की गतिविधियाँ और नियमित दिनचर्या को इलाज का हिस्सा बनाया गया ताकि रिकवरी तेज़ हो और फायदा लंबे समय तक बना रहे।

यह सिर्फ कमला जी की कहानी नहीं है। पुराने कमर दर्द और डिस्क की समस्या से जूझ रहे कई लोग आयुर्वेदिक देखभाल से अच्छे नतीजे पाते हैं। 

क्या आयुर्वेदिक दवाइयाँ वाकई सुरक्षित हैं?

कमला जी के मन में भी यही सवाल था। इतने लंबे समय से दर्द झेलने के बाद और एलोपैथी से राहत न मिलने के बाद स्वाभाविक था कि आयुर्वेदिक दवाइयों को लेकर भी थोड़ा संदेह हो। कहीं इनसे दर्द और न बढ़ जाए, कहीं कोई और तकलीफ न हो जाए।

लेकिन जीवा के डॉक्टरों ने उन्हें समझाया कि आयुर्वेदिक दवाइयाँ प्राकृतिक जड़ी-बूटियों पर आधारित होती हैं और यह शरीर पर ज़बरदस्ती असर नहीं करतीं, बल्कि धीरे-धीरे शरीर के अपने संतुलन को वापस लाती हैं। सही जाँच के बाद दी गई दवाइयाँ वात को संतुलित करने, नसों को पोषण देने और डिस्क के आसपास की मांसपेशियों को मज़बूत करने पर मूल स्तर से काम करती हैं, बिना किसी अतिरिक्त नुकसान के।

कमला जी के उपचार में अपनाई गई आयुर्वेदिक थेरेपीज़

कमला जी के मामले में उपचार का मकसद सिर्फ दर्द कम करना नहीं था, बल्कि रीढ़, नसों और मांसपेशियों तीनों को एक साथ ठीक करना था। इसके लिए दवाइयों के साथ कुछ असरदार आयुर्वेदिक थेरेपीज़ भी शामिल की गईं।

  • अभ्यंग (औषधीय तेल मालिश): विशेष जड़ी-बूटियों से बने तेलों से कमर, पैरों और रीढ़ के आसपास मालिश की गई जिससे नसों को आराम मिला, मांसपेशियों की जकड़न कम हुई और दर्द धीरे-धीरे घटने लगा।
  • कटि बस्ती (कमर के लिए विशेष उपचार): कमर के प्रभावित हिस्से पर गर्म औषधीय तेल को एक निश्चित समय तक रखा गया जिससे रीढ़ की हड्डी और डिस्क को गहराई से पोषण मिला और दर्द व जकड़न में राहत आई।
  • पिचु (स्थानीय तेल उपचार): कमर और पैरों के प्रभावित हिस्सों पर औषधीय तेल में भिगोकर कपड़ा रखा गया जिससे उस जगह गर्माहट पहुँची और नसों की जकड़न धीरे-धीरे कम हुई।
  • स्वेदन (भाप चिकित्सा): हल्की हर्बल भाप दी गई जिससे शरीर की अकड़न कम हुई, रक्त संचार बेहतर हुआ और चलने-फिरने में पहले से ज़्यादा आसानी होने लगी।

कमला जी की दिनचर्या और आहार में किए गए बदलाव

डिस्क बल्ज के इलाज में दवाइयों और थेरेपी के साथ-साथ खानपान और दिनचर्या में बदलाव भी उतना ही ज़रूरी था। जीवा के डॉक्टरों ने कमला जी को कुछ सरल लेकिन असरदार बदलाव बताए जिन्हें उन्होंने धीरे-धीरे अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शामिल किया।

  • हल्का और सुपाच्य भोजन: ऐसा आहार दिया गया जो पाचन को मज़बूत करे और शरीर में वात न बढ़ाए। दाल, हरी सब्ज़ियाँ और हल्के मसाले खाने में शामिल किए गए।
  • तैलीय और भारी खाने में कमी: ऐसी चीज़ों से बचने की सलाह दी गई जो वात और आम को बढ़ाती हैं और नसों व जोड़ों की तकलीफ को और बढ़ा देती हैं।
  • ठंडी चीज़ों से परहेज़: ठंडा पानी, ठंडे पेय और ठंडी तासीर वाली चीज़ें वात को बढ़ाती हैं इसलिए इनसे दूरी बनाने की सलाह दी गई।
  • हल्की गतिविधि और योग: ज़्यादा देर एक जगह बैठे रहने की बजाय हल्की सैर और आसान योगासन को दिनचर्या में शामिल किया गया जिससे रीढ़ के आसपास की मांसपेशियाँ मज़बूत हुईं और लचीलापन बढ़ा।
  • सही तरीके से बैठना और उठना: गलत तरीके से बैठने और झुकने की आदत डिस्क पर दबाव बढ़ाती है। इसलिए सही तरीके से बैठने, उठने और सोने की सलाह दी गई।
  • गर्म पानी और हर्बल काढ़ा: दिनभर गर्म पानी पीने और हल्के हर्बल काढ़े को दिनचर्या में शामिल करने की सलाह दी गई जिससे वात संतुलित रहे और शरीर में गर्माहट बनी रहे।

कमला जी को उपचार से क्या लाभ मिला?

कमला जी के मामले में उपचार का मकसद सिर्फ दर्द को दबाना नहीं था, बल्कि रीढ़, नसों और पूरे शरीर को अंदर से ठीक करके स्थायी सुधार लाना था। जीवा आयुर्वेद के इलाज, थेरेपी और जीवनशैली में बदलाव के बाद उन्हें कई स्तरों पर अच्छे बदलाव महसूस हुए।

  • कमर और पैरों के दर्द में राहत: लगातार बना रहने वाला दर्द धीरे-धीरे कम होने लगा। कमर से पैरों तक फैलने वाला दर्द पहले से काफी हल्का हो गया।
  • चलने-फिरने की क्षमता वापस आई: जो कदम पहले मुश्किल से उठते थे, अब वो आसान होने लगे। सीढ़ियाँ चढ़ना और खड़े रहना पहले से कहीं ज़्यादा आसान हो गया।
  • पैरों का सुन्नपन और झनझनाहट कम हुई: नसों पर दबाव कम होने से पैरों में महसूस होने वाला सुन्नपन और झनझनाहट धीरे-धीरे कम होने लगी।
  • नींद बेहतर हुई: रात को दर्द की वजह से नींद नहीं आती थी, अब करवट बदलना आसान हुआ और नींद पहले से बेहतर होने लगी।
  • रोज़मर्रा के काम खुद करने लगीं: घर के छोटे-छोटे काम जो पहले दूसरों की मदद से होते थे अब वो खुद करने लगीं। इससे उनका आत्मविश्वास काफी बढ़ा।
  • ऊर्जा और सक्रियता में सुधार: शरीर में हल्कापन महसूस होने लगा और वो पहले से ज़्यादा सक्रिय और खुश रहने लगीं।

रिकवरी का सफर: कैसे जीवा ने कमला जी को धीरे-धीरे राहत दी

शुरुआती कुछ हफ्तों में: थेरेपी और दवाइयाँ शुरू होते ही कमर के दर्द में हल्की कमी महसूस होने लगी। पैरों की झनझनाहट थोड़ी कम हुई और शरीर पहले से थोड़ा हल्का लगने लगा। नींद भी पहले से बेहतर होने लगी।

1 से 3 महीनों के दौरान: चलने-फिरने में पहले से ज़्यादा आसानी आने लगी। खड़े रहना कम तकलीफदेह हो गया और पैरों का सुन्नपन धीरे-धीरे कम होने लगा। रोज़मर्रा के छोटे-छोटे काम जो पहले मुश्किल लगते थे अब खुद करने लगीं।

3 से 6 महीनों में: दर्द की तीव्रता काफी कम हो गई और कमर से पैरों तक फैलने वाला दर्द लगभग ठीक हो गया। सीढ़ियाँ चढ़ना, जो कभी बहुत मुश्किल था, अब संभव होने लगा। शरीर में ताकत और संतुलन वापस आया और कमला जी पहले से कहीं ज़्यादा सक्रिय और आत्मनिर्भर महसूस करने लगीं।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च और पारदर्शिता 

कई लोग सोचते हैं कि ऐसा कस्टमाइज्ड आयुर्वेद बहुत महंगा होगा। लेकिन आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है । जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें ।

  • जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है । (यह एक अनुमानित आधार है और अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।)
  • अधिक व्यापक दृष्टिकोण के लिए विशेष पैकेज प्रोटोकॉल भी हैं, जिन्हें शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है ।
  • इन पैकेज में दवा, परामर्श, मानसिक स्वास्थ्य सत्र, योग और ध्यान मार्गदर्शन, आहार योजना और थेरेपी शामिल हैं । इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है ।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।
  • दवाइयों पर निर्भरता कम: 88% मरीजों ने धीरे-धीरे एलोपैथिक दवाओं और हार्मोनल सपोर्ट पर निर्भरता कम की है।

निष्कर्ष

कमला जी की यह कहानी सिर्फ एक दर्द से राहत पाने की कहानी नहीं है। यह उस हिम्मत की कहानी है जो उन्होंने 58 साल की उम्र में दिखाई और एक नया रास्ता चुना।

डिस्क बल्ज कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे सिर्फ दर्द निवारक दवाइयों से दबाया जाए। इसकी जड़ शरीर के अंदर के असंतुलन में होती है और आयुर्वेद उसी जड़ पर काम करता है। जीवा आयुर्वेद ने कमला जी को सिर्फ दवाइयाँ नहीं दीं, बल्कि एक पूरी देखभाल दी जिसने उनकी रीढ़, नसों और जीवनशैली तीनों को बेहतर बनाया।

अगर आप भी कमर दर्द, डिस्क बल्ज या पैरों में सुन्नपन जैसी तकलीफ से परेशान हैं और बार-बार दवाइयों से थक चुके हैं तो एक बार आयुर्वेद को मौका दीजिए। +91 9266714040 पर कॉल करें और जीवा के डॉक्टरों से घर बैठे परामर्श लें।

डॉक्टर की सलाह सीधे अपने फोन पर — WhatsApp Channel से जुड़ें।

FAQs

 हाँ, आयुर्वेद डिस्क बल्ज को सिर्फ दबाता नहीं बल्कि वात संतुलन, नसों को पोषण और मांसपेशियों को मज़बूत करके समस्या की जड़ पर काम करता है। कमला जी का अनुभव इसका एक जीता-जागता उदाहरण है।

बिल्कुल। सही आयुर्वेदिक इलाज, थेरेपी और जीवनशैली में बदलाव से बिना किसी ऑपरेशन के भी अच्छे नतीजे मिल सकते हैं। हालाँकि हर मरीज़ की स्थिति अलग होती है इसलिए डॉक्टर से परामर्श ज़रूरी है।

 यह मरीज़ की स्थिति और समस्या की गंभीरता पर निर्भर करता है। आमतौर पर शुरुआती बदलाव कुछ हफ्तों में महसूस होने लगते हैं और 3 से 6 महीनों में अच्छे नतीजे सामने आते हैं।

कटि बस्ती एक खास आयुर्वेदिक थेरेपी है जिसमें कमर के प्रभावित हिस्से पर गर्म औषधीय तेल को एक निश्चित समय तक रखा जाता है। इससे रीढ़ की हड्डी और डिस्क को गहराई से पोषण मिलता है और दर्द व जकड़न में राहत आती है।

हाँ, आयुर्वेद में हर उम्र के मरीज़ के लिए अलग और व्यक्तिगत इलाज तैयार किया जाता है। उम्र और शरीर की स्थिति के हिसाब से थेरेपी और दवाइयाँ तय की जाती

खानपान बहुत अहम भूमिका निभाता है। तैलीय और भारी खाना वात को बढ़ाता है, जिससे दर्द और बढ़ सकता है। हल्का और सुपाच्य भोजन, गर्म पानी और हर्बल काढ़ा शरीर में वात को संतुलित रखने में मदद करते हैं।

हाँ, लेकिन सही आसन और सही तरीके से करना ज़रूरी है। गलत तरीके से योग करने से दर्द और बढ़ सकता है। इसलिए डॉक्टर की सलाह से ही योग शुरू करें।

आयुर्वेद इन जोड़ों के आसपास की नसों और मांसपेशियों को पोषण देता है, वात को संतुलित करता है और डिस्क पर दबाव कम करने में मदद करता है जिससे दर्द और सुन्नपन धीरे-धीरे कम होता है।

जीवा के डॉक्टर पहले आपकी पूरी स्थिति और चल रही दवाइयों को समझते हैं और उसी के हिसाब से इलाज तय करते हैं। दवाइयों में कोई भी बदलाव हमेशा डॉक्टर की सलाह से ही किया जाता है।

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