Diseases Search
Close Button
 
 

Arthritis से जूझ रहीं 53 वर्ष की रंजना को आयुर्वेद से मिली राहत और सुधार

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 27 May, 2026
  • category-iconUpdated on 27 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5052

गठिया को सिर्फ एक बीमारी कहना गलत होगा; सच तो यह है कि यह इंसान की पूरी ज़िंदगी को धीरे-धीरे एक सजा बना देता है। किचन में थोड़ी देर खड़े रहना हो, दो कदम चलना हो या रात को सोते हुए करवट ही क्यों न बदलनी हो शरीर की अकड़न और वो चुभने वाला दर्द हर छोटे काम को पहाड़ बना देता है।

53 साल की रंजना जी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जब उन्हें रात के वक्त हाथों में सुन्नपन, कंधों में मीठा-मीठा दर्द और चलने में हल्की सी दिक्कत शुरू हुई, तो उन्होंने सोचा कि "शायद घर के काम की थकान है या बढ़ती उम्र का असर होगा।" लेकिन धीरे-धीरे यह दर्द शरीर को जकड़ने लगा और घर के छोटे-मोटे काम करना भी उनके लिए भारी पड़ने लगा।

हमारे घरों में अक्सर यही होता है। हम दर्द को सहते रहते हैं और जब तक डॉक्टर के पास जाते हैं, तब तक बीमारी जड़ें जमा चुकी होती है। रंजना जी का सफर हमें यही सिखाता है कि अगर गठिया (Arthritis) को सही वक्त पर पकड़ लिया जाए और सही इलाज मिले, तो इस दर्दभरी ज़िंदगी को फिर से आसान बनाया जा सकता है।

हाथ सुन्न होना और खड़े रहने में दिक्कत: रंजना जी की समस्या कैसे शुरू हुई?

रंजना जी को यह तकलीफ कोई एक दिन में नहीं हुई। यह दर्द बहुत खामोशी से उनकी ज़िंदगी में घुसा था। शुरू-शुरू में उन्हें यही लगता रहा कि मौसम या कामकाज की वजह से बदन टूट रहा है। पर वक्त के साथ दर्द ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया।

गहरी नींद में अचानक हाथों का सुन्न हो जाना उनकी रातों की नींद खराब करने लगा था। दिन के वक्त अगर वो थोड़ी देर खड़ी भी हो जाएं, तो कंधों में ऐसा भारीपन आता जैसे किसी ने वज़न रख दिया हो। किचन में रोटी बनाना, मंदिर में खड़े होकर पूजा करना या बाहर किसी लाइन में लगना सब कुछ उनके लिए एक टास्क बन गया था। हाथों की ग्रिप (पकड़) इतनी कमज़ोर हो गई कि उनके हाथ से चीजें छूटने लगीं, और इसी वजह से उनका कॉन्फिडेंस पूरी तरह डगमगा गया।

जो दर्द महीने में एक-दो बार होता था, वो अब उनका रोज़ का साथी बन गया। शरीर चीख-चीख कर बता रहा था कि अंदर कुछ गड़बड़ है, लेकिन रंजना जी आम भारतीय महिलाओं की तरह अपनी तकलीफों को टालती रहीं। और सच कहें तो, इसी लापरवाही ने उनकी बीमारी को इतना बढ़ा दिया।

जब सुबह उठना भी दर्द से शुरू होने लगा: रंजना जी के लक्षण 

गठिया का दर्द सिर्फ जोड़ों तक सीमित नहीं रहा। धीरे-धीरे यह रंजना जी की पूरी दिनचर्या को प्रभावित करने लगा। हर सुबह उठना एक चुनौती बन गई थी और दिन का हर काम दर्द के साए में होता था।

  • हाथों का सुन्न होना: रात को सोते समय हाथ सुन्न हो जाते थे जिससे नींद बार-बार टूटती थी। सुबह उठने पर भी हाथों में जकड़न रहती थी और उंगलियाँ ठीक से मुड़ती नहीं थीं।
  • कंधों में लगातार दर्द और भारीपन: कंधों में इतना दर्द रहता था कि हाथ ऊपर उठाना मुश्किल हो गया था। कपड़े पहनना, बाल बनाना जैसे रोज़ के काम भी तकलीफदेह हो गए थे।
  • खड़े रहने में तकलीफ: कुछ देर खड़े रहने पर ही शरीर थकने लगता था। रसोई में काम करना, पूजा में खड़े रहना या बाहर लाइन में लगना,  यह सब मुश्किल हो गया था।
  • चाल में बदलाव: चलते वक्त असंतुलन महसूस होने लगा था। पैर ठीक से नहीं उठते थे और थोड़ी दूर चलने पर ही थकान आ जाती थी।
  • नींद पूरी नहीं होती थी: रात को दर्द की वजह से करवट बदलना भी मुश्किल था। नींद टूटती रहती थी जिससे अगला दिन और भी थकान भरा हो जाता था।
  • रोज़मर्रा के कामों में परेशानी: घर के छोटे-छोटे काम जैसे बर्तन उठाना, झाड़ू लगाना या कोई चीज़ पकड़ना, यह सब धीरे-धीरे मुश्किल होता जा रहा था।

जब एलोपैथी से आराम अधूरा लगे तो आयुर्वेद कैसे मदद कर सकता है?

दर्द जब बर्दाश्त से बाहर होता है, तो सबसे पहला ख्याल पेनकिलर्स (अंग्रेज़ी दवाइयों) का ही आता है। रंजना जी ने भी शुरुआत में यही किया। दवा खाने पर कुछ घंटों के लिए आराम तो मिल जाता है, लेकिन जैसे ही असर खत्म होता है, दर्द फिर लौट आता है। शरीर की वो जकड़न और हाथों का सुन्न पड़ना किसी भी गोली से पूरी तरह ठीक नहीं हो रहा था।

अब उनके मन में डर बैठने लगा था "क्या मेरी बाकी की ज़िंदगी इन पेनकिलर्स के सहारे ही कटेगी?" वो एक ऐसा रास्ता ढूंढ रही थीं जो दर्द को ऊपर से सुन्न करने के बजाय, इस बीमारी की जड़ को पकड़े और शरीर को अंदर से ठीक करे। दवाइयों के इसी गोल-गोल चक्कर से परेशान होकर आखिरकार उन्होंने आयुर्वेद का रुख किया। यह कोई जल्दबाज़ी में लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि अपनी बीमारी को समझकर उठाया गया एक सही कदम था।

जीवा आयुर्वेद के साथ रंजना जी का पहला संपर्क

हाथों का बार-बार सुन्न पड़ जाना, कंधों का दर्द और चलने में आ रही रुकावट रंजना जी इन सब से बुरी तरह टूट चुकी थीं। जब एलोपैथी से बात नहीं बनी और दर्द हर बार पलटकर वापस आने लगा, तो उन्होंने आयुर्वेदिक इलाज आज़माने की सोची। हालांकि, शुरू में उन्हें भी यही शक था कि "क्या जड़ी-बूटियों या आयुर्वेद से गठिया जैसा ज़िद्दी दर्द सच में ठीक हो सकता है?" लेकिन जब घर के छोटे-छोटे काम करने में भी आंसू आने लगे, तो उन्होंने हार मानने के बजाय एक आखिरी कोशिश करने की ठानी।

उन्होंने +91 9266714040 पर कॉल किया और जीवा आयुर्वेद के डॉक्टरों से घर बैठे ही सलाह ली। जीवा के डॉक्टरों ने उनकी परेशानी को बहुत इत्मीनान से सुना। उन्होंने सिर्फ यह नहीं पूछा कि "दर्द कहाँ हो रहा है?", बल्कि यह जानने की कोशिश की कि उनका खान-पान कैसा है, नींद कितनी आती है और दर्द किस वक्त सबसे ज्यादा सताता है। इसी लंबी और गहरी बातचीत के बाद रंजना जी के लिए एक सही इलाज का रास्ता तैयार किया गया।

जीवा आयुर्वेद ने गठिया की समस्या को कैसे समझाया?

इलाज शुरू करने से पहले रंजना जी को यह समझना बहुत ज़रूरी था कि आखिर उनके शरीर में ये बीमारी फैल कैसे रही है। जीवा के डॉक्टरों ने उन्हें बिल्कुल आम बोलचाल की भाषा में समझाया कि आयुर्वेद में इस गठिया को 'आमवात' कहा जाता है।

ज़्यादातर लोगों को लगता है कि गठिया सिर्फ हड्डियों या जोड़ों की बीमारी है, लेकिन सच तो ये है कि आयुर्वेद इसे आपके पेट और 'वात दोष' (शरीर की हवा) के बिगड़ने से जोड़कर देखता है। जब आपका पाचन कमज़ोर पड़ जाता है और खाया हुआ खाना ठीक से नहीं पचता, तो वो पेट में सड़कर ज़हरीला तत्व बन जाता है जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं। जब यह शरीर में बढ़ी हुई हवा (वात) के साथ मिलकर आपके जोड़ों के बीच जाकर बैठ जाता है, तब वहां दर्द, सूजन और वो जकड़न शुरू होती है जिसने रंजना जी का जीना मुश्किल किया हुआ था।

जीवा आयुर्वेद में रंजना जी की व्यक्तिगत उपचार योजना

रंजना जी के केस में सबसे अच्छी बात यह रही कि उनके गठिया को सिर्फ 'हड्डियों का दर्द' मानकर दर्द की गोलियां नहीं दी गईं। आयुर्वेद इसे पूरे शरीर के बिगड़े हुए सिस्टम का नतीजा मानता है। इलाज का असली मकसद दर्द को कुछ घंटों के लिए सुन्न करना नहीं था, बल्कि उन कमियों को दूर करना था जिनकी वजह से गठिया शरीर में तेज़ी से फैल रहा था।

  • पाचन सुधारना और 'आम' की सफाई: रंजना जी का पाचन बहुत कमज़ोर हो चुका था। जो खाना पचता नहीं, वो पेट में ही सड़कर एक ज़हरीला तत्व बन जाता है (जिसे आयुर्वेद में 'आम' कहते हैं)। यही वात (हवा) के साथ मिलकर जोड़ों में बैठ जाता है और वहां भयंकर सूजन पैदा करता है। इसलिए सबसे पहला काम इसी गंदगी को शरीर से बाहर फेंकना था।
  • वात को कंट्रोल करना और जोड़ों की देखभाल: हाथों और कंधों में सुन्नपन या जो जकड़न थी, वो सीधे तौर पर भड़के हुए 'वात' की निशानी थी। कुछ खास देसी औषधियों से इस वात को शांत किया गया, ताकि जोड़ों की ग्रीस (लचीलापन) वापस लौटे और दर्द नेचुरली कम हो।
  • नसों और मांसपेशियों कि मज़बूती: हाथों का सुन्न पड़ना और पकड़ का कमज़ोर होना बता रहा था कि नसें अंदर से सूख रही हैं। उन्हें दोबारा ज़िंदा और ताकतवर बनाने के लिए खास जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया गया। इससे उनके हाथों की मूवमेंट वापस आई और वे घर के काम खुद करने लगीं।
  • रूटीन और खान-पान की मरम्मत: सिर्फ दवा से बात नहीं बनती। गलत समय पर खाना और उल्टा-सीधा रूटीन भी इस दर्द को हवा दे रहे थे। इसलिए उन्हें एक बहुत ही आसान सा डाइट प्लान और रोज़ का रूटीन सेट करके दिया गया, ताकि रिकवरी जल्दी हो और बीमारी पलट कर वापस न आए।

यह सिर्फ रंजना जी की कहानी नहीं है। जोड़ों के दर्द से हार मान चुके कई लोग आयुर्वेदिक इलाज से दोबारा अपने पैरों पर खड़े होते हैं। जब शरीर को सही पोषण और सही रास्ता मिलता है, तो वो अपनी खोई हुई ताकत खुद वापस खींच लाता है।

क्या आयुर्वेदिक दवाइयाँ वाकई सुरक्षित हैं?

रंजना जी के मन में भी यही सवाल था। इतने लंबे समय से दर्द झेलने के बाद और एलोपैथी से पूरी राहत न मिलने के बाद स्वाभाविक था कि आयुर्वेदिक दवाइयों को लेकर भी मन में थोड़ा संदेह हो। कहीं इनसे जोड़ों का दर्द और न बढ़ जाए, कहीं कोई और तकलीफ न हो जाए।

लेकिन जीवा के डॉक्टरों ने उन्हें समझाया कि आयुर्वेदिक दवाइयाँ प्राकृतिक जड़ी-बूटियों पर आधारित होती हैं और यह शरीर पर ज़बरदस्ती असर नहीं करतीं, बल्कि धीरे-धीरे शरीर के अपने संतुलन को वापस लाती हैं। सही जाँच के बाद दी गई दवाइयाँ पाचन को दुरुस्त करने, वात को संतुलित करने और जोड़ों की सूजन व दर्द पर मूल स्तर से काम करती हैं, बिना किसी अतिरिक्त नुकसान के।

रंजना जी के उपचार में अपनाई गई आयुर्वेदिक थेरेपीज़

रंजना जी का दर्द इतना पुराना था कि सिर्फ दवाइयों से काम नहीं चलना था। जोड़ों, नसों और जकड़ी हुई मांसपेशियों को एक साथ खोलने के लिए कुछ बेहद खास आयुर्वेदिक थेरेपीज़ का भी सहारा लिया गया:

  • अभ्यंग (मेडिकेटेड ऑयल मसाज): कुछ चुनिंदा जड़ी-बूटियों को पकाकर तैयार किए गए गुनगुने तेलों से उनके हाथों, कंधों और दर्द वाले जोड़ों की मालिश की गई। इससे नसों का तनाव खुला और अकड़न तेज़ी से पिघलने लगी।
  • जानु बस्ती (जोड़ों का खास इलाज): दर्द वाले जोड़ों के चारों तरफ आटे का एक घेरा बनाकर उसमें हल्का गर्म और औषधीय तेल काफी देर तक रोक कर रखा गया। यह तेल अंदर तक जाकर सूखी हुई हड्डियों को गहराई से पोषण देता है, जिससे सूजन और दर्द में गज़ब का आराम मिलता है।
  • स्वेदन (हर्बल स्टीम): तेल की मालिश के बाद जड़ी-बूटियों वाले पानी की हल्की भाप (स्टीम) दी गई। स्टीम लगते ही शरीर का रुका हुआ ब्लड सर्कुलेशन फिर से चालू हो गया और हाथ उठाने या मोड़ने में आ रही दिक्कत दूर होने लगी।

रंजना जी की दिनचर्या और आहार में किए गए बदलाव

गठिया जैसी ज़िद्दी बीमारी को हराने के लिए आपको अपना रोज़मर्रा का रूटीन भी बदलना पड़ता है। जीवा के डॉक्टरों ने रंजना जी को कुछ बहुत ही आसान लेकिन ज़रूरी बदलाव सुझाए, जिन्हें उन्होंने खुशी-खुशी अपनी आदत बना लिया:

  • हल्का और सादा खाना: उन्हें साफ तौर पर कहा गया कि ऐसा खाना खाएं जो पेट पर भारी न पड़े और आसानी से पच जाए। इससे शरीर में बेवजह की सूजन और भारीपन आना कम हो गया।
  • तली-भुनी चीज़ों से तौबा: तेल वाला और पचने में भारी खाना जोड़ों के दर्द को और भड़काता है, इसलिए इन चीज़ों को उनकी थाली से पूरी तरह हटा दिया गया।
  • हल्की स्ट्रेचिंग और योग: दर्द के मारे दिनभर एक जगह बैठे रहने के बजाय, उन्हें हल्की सैर और कुछ बहुत ही आसान योगासन करने को कहा गया। इससे उनके जोड़ों का लचीलापन दोबारा वापस आने लगा।
  • ताज़ा और गर्म खाने पर ज़ोर: फ्रिज में रखा बासी या ठंडा खाना नसों को सिकोड़ता है। इसलिए उन्हें हमेशा ताज़ा और हल्का गुनगुना खाना खाने की आदत डलवाई गई, जिससे जकड़न में बहुत राहत मिली।
  • एक फिक्स रूटीन: सोने और खाने का एक पक्का समय तय किया गया। जब शरीर की घड़ी सेट हुई, तो शरीर का अपना बैलेंस सुधरा और दर्द का ग्राफ तेज़ी से नीचे आ गया।
  • टेंशन फ्री रहना और भरपूर नींद: दर्द की वजह से जो दिमागी तनाव पैदा हो गया था, उसे कम करने पर ध्यान दिया गया। अच्छी नींद और शांत दिमाग ने उनकी रिकवरी की स्पीड को दोगुना कर दिया।

रंजना जी को इस इलाज से क्या फायदा हुआ?

रंजना जी के केस में हमारा मकसद सिर्फ दर्द की गोली देकर उन्हें कुछ घंटों की राहत देना नहीं था। असली कोशिश शरीर में भड़के हुए 'वात' और अंदरूनी सूजन को शांत करने की थी, ताकि बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सके। इस पूरे आयुर्वेदिक इलाज के बाद उनकी ज़िंदगी में कई शानदार बदलाव आए:

  • घुटनों के दर्द और सूजन से आज़ादी: वो दर्द और सूजन जो 24 घंटे सताती थी, अब धीरे-धीरे कम होने लगी थी। अब उनके लिए दो कदम चलना भी पहले से बहुत आसान हो गया था।
  • सुबह की जकड़न खत्म: पहले सुबह सोकर उठने पर शरीर लकड़ी की तरह अकड़ा रहता था। अब वो जकड़न टूटने लगी थी और शरीर में वापस पुराना लचीलापन आ गया था।
  • खुलकर चलने-फिरने की आज़ादी: ज़मीन पर बैठना, सोफे से उठना या सीढ़ियां चढ़ना जो काम पहले पहाड़ जैसे भारी लगते थे, अब वे बिना किसी के सहारे के आराम से कर पा रही थीं।
  • लौट आया खोया हुआ कॉन्फिडेंस: दर्द कम हुआ तो उनके अंदर एक नई एनर्जी आ गई। वे दूसरों का मुंह ताकने या निर्भर रहने के बजाय अपना काम खुद खुशी-खुशी करने लगीं।
  • पाचन सुधरा, शरीर हुआ हल्का: पेट का सिस्टम ठीक होते ही शरीर का वो पुराना भारीपन एकदम गायब हो गया और वे खुद को काफी हल्का व फुर्तीला महसूस करने लगीं।

रिकवरी का सफर: कैसे रंजना जी धीरे-धीरे दर्द से बाहर आईं

आयुर्वेद कोई जादू की छड़ी नहीं है कि घुमाई और रातों-रात दर्द गायब हो जाए। यह शरीर की बिगड़ी हुई मशीनरी और घुटनों की सूखी हुई ग्रीस को अंदर से ठीक करता है, और इस काम में थोड़ा वक्त तो लगता है। रंजना जी का ठीक होना भी कोई चमत्कार नहीं था, बल्कि एक-एक सीढ़ी चढ़ने जैसा था। लेकिन सबसे अच्छी बात यह रही कि उन्हें जो आराम मिला, वो एकदम पक्का था:

  • शुरुआती कुछ हफ्ते: देसी दवाइयां और थेरेपी शुरू होते ही सबसे पहले तो घुटनों की वो सूजन और जकड़न टूटने लगी। शरीर की जो अकड़न थी, वो कम हुई और उन्हें खुद में एक सुकून भरा हल्कापन महसूस होने लगा।
  • 1 से 3 महीने के बीच: अब तक इलाज का असर साफ दिखने लगा था। जो रंजना जी पहले बिना सहारे के चल नहीं पाती थीं, अब उनका चलना-फिरना काफी आसान हो गया था। घर के जिन छोटे-मोटे कामों को करने में पहले उनकी जान निकलती थी, अब वे उन्हें बिना किसी तकलीफ के आराम से निपटाने लगी थीं।
  • 3 से 6 महीने का वक्त: अब दर्द ने पूरी तरह से घुटने टेक दिए थे। वो जो एक डर रहता था कि 'कहीं दर्द फिर से न लौट आए', वो टेंशन एकदम खत्म हो गई। उनके शरीर का बैलेंस और वो पुरानी ताकत वापस आ चुकी थी। दर्द के मारे हमेशा उदास रहने वाली रंजना जी, अब एकदम एक्टिव और खुशहाल ज़िंदगी जी रही थीं।

निष्कर्ष

रंजना जी के इस पूरे सफर से एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि गठिया सिर्फ घुटनों या जोड़ों का दर्द नहीं है। असल में, यह हमारे खराब हाज़मे और शरीर में भड़की हुई 'वात' (हवा) का नतीजा है। जब तक हम इसे सिर्फ एक 'दर्द' समझकर पेनकिलर खाते रहते हैं, तब तक आराम सिर्फ कुछ घंटों का ही मिलता है। लेकिन जब हम बीमारी की जड़ को पकड़कर शरीर को अंदर से ठीक करते हैं, तो बीमारी पक्के तौर पर दूर भाग जाती है।

आयुर्वेद का काम आपकी तकलीफ को कुछ दिन के लिए दबाना नहीं है। इसका असली मकसद शरीर को वापस उसकी सही पटरी पर लाना है। अगर आप सही डाइट लेते हैं, थोड़ा परहेज करते हैं और अपने लाइफस्टाइल को सुधार लेते हैं, तो आपका शरीर अपनी खोई हुई ताकत अपने आप वापस पा लेता है।

रंजना जी की कहानी हम सबको बस यही समझाती है कि अगर सही वक्त पर बीमारी को समझकर सही इलाज शुरू कर दिया जाए, तो इंसान वापस अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है। दर्द के साथ समझौता करने की कोई ज़रूरत नहीं है, सही इलाज और थोड़े से धीरज से आप फिर से अपनी ज़िंदगी खुलकर और किसी के मोहताज हुए बिना जी सकते हैं।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

गठिया एक पुरानी स्थिति है जिसमें सुधार संभव है। सही जीवनशैली, संतुलित आहार और नियमित देखभाल से दर्द और जकड़न में काफी राहत मिल सकती है। लेकिन परिणाम व्यक्ति की उम्र, स्थिति और आदतों पर निर्भर करते हैं।

नहीं, यह अब कम उम्र में भी देखा जा रहा है। गलत खानपान, तनाव और कम शारीरिक गतिविधि भी इसके कारण बन सकते हैं। इसलिए यह केवल उम्र की समस्या नहीं है।

 शुरुआत में हल्की जकड़न, सुबह दर्द, और थकान जैसे संकेत दिख सकते हैं। धीरे-धीरे यह दर्द और सूजन में बदल सकता है। इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

नहीं, यह हाथों, कंधों, गर्दन और कमर को भी प्रभावित कर सकता है। कई लोगों में पूरी शरीर की गतिशीलता प्रभावित हो जाती है। इसलिए इसे समग्र रूप से समझना जरूरी होता है।

 हाँ, ठंड और नमी के मौसम में जकड़न और दर्द बढ़ सकते हैं। इस समय शरीर में सूखापन और अकड़न अधिक महसूस होती हैं। इसलिए देखभाल और भी जरूरी हो जाती है।

हाँ, हल्की गतिविधियाँ और योग लाभकारी हो सकते हैं। लेकिन अधिक जोरदार व्यायाम से बचना चाहिए। डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही व्यायाम करना बेहतर होता है।

दवाइयाँ दर्द और सूजन को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। लेकिन जीवनशैली और खानपान का सुधार भी जरूरी होता है। दोनों का संतुलन बेहतर परिणाम देता है।

हाँ, दर्द और जकड़न के कारण नींद टूट सकती है। अधूरी नींद से थकान और बढ़ जाती है। यह एक चक्र बन सकता है जिसे तोड़ना जरूरी होता है।

हाँ, अधिक वजन जोड़ों पर दबाव बढ़ा सकता है। इससे दर्द और जकड़न बढ़ सकती है। संतुलित वजन बनाए रखना मददगार होता है।

यह व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करता है। कुछ लोगों में कुछ हफ्तों में राहत दिख सकती है, जबकि कुछ में अधिक समय लगता है। नियमित देखभाल से सुधार धीरे-धीरे स्थायी हो सकता है।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us