Diseases Search
Close Button
 
 

Pregnancy में Sugar बढ़ी — बच्चे को क्या असर? आयुर्वेदिक देखभाल

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 16 May, 2026
  • category-iconUpdated on 10 Jun, 2026
  • category-iconWomen's Health
  • blog-view-icon5050

मां बनना, या गर्भावस्था का यह जो समय होता है, वो किसी भी महिला की जिंदगी का सबसे नाजुक दौर होता है। पर इस पूरे सफर में शरीर के अंदर इतने सारे हार्मोन्स ऊपर-नीचे होते हैं कि कई बार अचानक ऐसी मुश्किलें सामने आ खड़ी होती हैं, जिनकी किसी ने उम्मीद भी नहीं की होती। अब जैसे मान लीजिए, किसी गर्भवती महिला ने अपनी रूटीन जांच करवाई और मेडिकल रिपोर्ट में उसका ब्लड शुगर बढ़ा हुआ आ गया। तो ऐसे में जाहिर सी बात है कि मन में एक स्वाभाविक सा डर बैठ ही जाता है। हर मां यही सोचने लगती है कि कहीं इसका उसके होने वाले बच्चे की सेहत पर कोई आंच न आ जाए।

पर यहाँ एक बात गहराई से समझने वाली है। यह जो शुगर बढ़ने की दिक्कत है, यह सिर्फ ज्यादा मीठा खा लेने की वजह से नहीं होती है। बल्कि इसके पीछे की असली वजह यह है कि हमारे शरीर का जो अंदरूनी हाजमा है, और जो इंसुलिन के काम करने का पूरा तरीका है, उसमें कुछ बहुत बड़े बदलाव आ चुके हैं। यह स्थिति उसी अंदरूनी गड़बड़ी का एक साफ इशारा होती है।

इस नाज़ुक समय में घबराना समस्या का हल नहीं है, बल्कि यह समझना ज़रूरी है कि शरीर का आंतरिक संतुलन कहाँ बिगड़ रहा है। सही जीवनशैली, तनाव मुक्त दिनचर्या और प्राकृतिक दृष्टिकोण के माध्यम से इस बढ़ी हुई शुगर को बहुत ही सुरक्षित तरीके से प्रबंधित किया जा सकता है। माँ और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए यह जानना आवश्यक है कि शरीर के अंदर चल रही इस प्रक्रिया को कैसे शांत और संतुलित किया जाए।

प्रेगनेंसी में ब्लड शुगर बढ़ने पर शरीर के अंदर क्या चल रहा होता है?

गर्भावस्था के समय एक महिला का शरीर बहुत सारे अंदरूनी बदलावों से होकर गुज़रता है। आखिर उसके भीतर एक नन्ही सी जान जो पल रही होती है और शरीर को उसे बड़ा भी करना होता है। इस दौरान प्लेसेंटा, जिसे हम आम भाषा में गर्भनाल भी कहते हैं, शरीर के अंदर कुछ ऐसे खास हार्मोन छोड़ने लगता है। आइए समझते हैं कि इस दौरान शरीर में मुख्य रूप से क्या घटित होता है:

  • इंसुलिन का विरोध: प्लेसेंटा द्वारा बनाए गए हॉर्मोन्स के कारण शरीर की कोशिकाएँ इंसुलिन के प्रति प्रतिक्रिया देना कम कर देती हैं, जिससे रक्त में शुगर जमा होने लगती है और इंसुलिन रेजिस्टेंस की स्थिति पैदा हो जाती है।
  • पैंक्रियाज पर अतिरिक्त दबाव: जब शरीर इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता, तो पैंक्रियाज को शुगर को कंट्रोल करने के लिए अधिक इंसुलिन बनाने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है।
  • ग्लूकोज का असंतुलन: शरीर की एंडोक्राइन सिस्टम पर दबाव पड़ने के कारण सुबह उठने पर नॉर्मल फास्टिंग शुगर का स्तर भी सामान्य से अधिक रहने लगता है।
  • मेटाबॉलिज्म की सुस्ती: प्रेगनेंसी के दौरान शरीर का वजन बढ़ना तो एक बहुत ही आम और स्वाभाविक सी बात है। लेकिन असली दिक्कत तब शुरू होती है जब इंसुलिन के ऊपर-नीचे होने की वजह से हमारा हाजमा और हमारा पूरा मेटाबॉलिज़्म बहुत ज्यादा सुस्त पड़ जाता है।

गर्भावस्था में बढ़ने वाली शुगर किन प्रकारों की हो सकती है?

प्रेगनेंसी के दिनों में जब अचानक से ब्लड शुगर बढ़ जाता है, तो डॉक्टरी भाषा में इसे 'जेस्टेशनल डायबिटीज' का नाम दिया जाता है। लेकिन कई बार यह भी देखने में आता है कि यह कोई नई बीमारी नहीं होती। बल्कि महिला को पहले से ही थोड़ी बहुत शुगर की दिक्कत रही होती है, जो बस अब इस समय खुलकर सामने आ गई है। अगर हम इसे अच्छे से समझना चाहें, तो हम इसे मुख्य रूप से इस एक बड़ी श्रेणी में बांट कर देख सकते हैं:

  • विशुद्ध जेस्टेशनल डायबिटीज: यह आमतौर पर सिर्फ गर्भावस्था के दौरान ही शुरू होता है। ज़्यादातर मामलों में यह प्रेगनेंसी के 24वें हफ्ते से लेकर 28वें हफ्ते के बीच में जाकर अपना असर दिखाता है। और इसमें एक अच्छी बात यह होती है कि बच्चे की डिलीवरी हो जाने के बाद, ज्यादातर महिलाओं में यह अपने आप ही बिल्कुल ठीक भी हो जाता है।
  • अनडायग्नोस्ड टाइप 2 डायबिटीज: कई मामलों में महिला को पहले से ही टाइप 2 डायबिटीज होती है, लेकिन इसके लक्षण स्पष्ट नहीं होते। गर्भावस्था के दौरान होने वाले ब्लड टेस्ट में यह पहली बार पकड़ में आती है।
  • इम्पायर्ड ग्लूकोज टॉलरेंस: इसमें ब्लड शुगर का स्तर सामान्य से अधिक होता है, लेकिन इतना अधिक नहीं होता कि उसे पूर्ण रूप से डायबिटीज घोषित किया जा सके। यह एक चेतावनी का संकेत होता है।

प्रेगनेंसी में शुगर बढ़ने के क्या लक्षण महसूस हो सकते हैं?

अक्सर जेस्टेशनल डायबिटीज के कोई बहुत स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते और यह केवल रूटीन ब्लड टेस्ट में ही सामने आता है। फिर भी, अगर आप अपने शरीर में हो रहे बदलावों पर ध्यान दें, तो कुछ संकेत इस ओर इशारा कर सकते हैं:

  • बार-बार और अत्यधिक प्यास लगना: शरीर रक्त में मौजूद अतिरिक्त शुगर को पेशाब के ज़रिए बाहर निकालने की कोशिश करता है, जिससे डिहाइड्रेशन होता है और बहुत ज़्यादा प्यास लगती है।
  • सामान्य से अधिक बार पेशाब आना: हालांकि गर्भावस्था में बार-बार टॉयलेट जाना आम है, लेकिन शुगर बढ़ने पर यह फ्रीक्वेंसी अचानक और अधिक बढ़ जाती है।
  • अत्यधिक थकान और कमज़ोरी महसूस होना: शुगर कोशिकाओं तक ऊर्जा पहुँचाने के बजाय रक्त में ही तैरती रहती है, जिससे गर्भवती महिला को लगातार थकान और ऊर्जा की कमी लगती है।
  • बिना कारण की घबराहट और एंग्जायटी: ब्लड शुगर के लगातार ऊपर-नीचे होने से नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है, जिससे बैठे-बैठे मानसिक तनाव या बेचैनी होने लगती है।
  • आंखों के आगे धुंधलापन: ब्लड शुगर के उच्च स्तर के कारण आंखों के लेंस में तरल पदार्थ का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे कुछ समय के लिए दृष्टि धुंधली हो सकती है।

इस स्थिति में अक्सर क्या गलतियाँ होती हैं और इसके क्या भयंकर परिणाम हो सकते हैं?

जब किसी गर्भवती महिला को पहली बार यह पता चलता है कि उसे शुगर हो गई है, तो घबराहट होना बहुत ही लाजमी है। ऐसे में कई बार सही जानकारी न होने की वजह से महिलाएं हड़बड़ी में कुछ ऐसे कदम उठा लेती हैं, जिनसे हालात सुधरने के बजाय और ज्यादा बिगड़ जाते हैं:

  • खाना-पीना एकदम कम कर देना: शुगर कम करने के चक्कर में महिलाएँ आयुर्वेदिक आहार और पर्याप्त पोषण लेना छोड़ देती हैं, जिससे बच्चे के विकास में बाधा आती है और कमज़ोरी बढ़ती है।
  • तनाव में डूब जाना: रिपोर्ट देखकर भयंकर स्ट्रेस लेना सबसे बड़ी गलती है। स्ट्रेस हॉर्मोन्स शरीर में शुगर के स्तर को और अधिक बढ़ा देते हैं, जो एक गंभीर डिप्रेशन का रूप ले सकता है।
  • बच्चे पर असर: अगर समय रहते शुगर को कंट्रोल नहीं किया गया, तो माँ के खून में मौजूद वह बहुत सारी ग्लूकोज सीधे बच्चे तक पहुंचने लगती है। अब इसके नतीजे में होता यह है कि बच्चे का वजन और आकार उसकी जरूरत से कहीं ज्यादा बड़ा हो जाता है, और जब बच्चा आकार में बहुत बड़ा हो जाता है, तो नॉर्मल डिलीवरी के समय काफी सारी मुश्किलें और गंभीर खतरे पैदा हो जाते हैं।
  • जन्म के बाद बच्चे की शुगर लो होना: जन्म के तुरंत बाद बच्चे के शरीर में इंसुलिन का उत्पादन अधिक होता है, लेकिन माँ से ग्लूकोज मिलना बंद हो जाने पर बच्चे की शुगर अचानक खतरनाक स्तर तक गिर सकती है।
  • माँ को भविष्य का खतरा: प्रेगनेंसी में बढ़ी हुई शुगर को अगर सही जीवनशैली और वजन प्रबंधन के नियम अपनाकर ठीक न किया जाए, तो भविष्य में माँ को स्थायी डायबिटीज और हृदय संबंधी बीमारियाँ होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

प्रेगनेंसी में शुगर को लेकर आयुर्वेद का क्या नज़रिया है?

आयुर्वेद जेस्टेशनल डायबिटीज को केवल ब्लड शुगर के आंकड़े के रूप में नहीं देखता। आयुर्वेद के अनुसार, गर्भिणी गर्भवती महिला अवस्था में शरीर में तीनों दोषों में बड़े बदलाव होते हैं, और जब इनका संतुलन बिगड़ता है, तब यह व्याधि उत्पन्न होती है:

  • अग्निमांद्य: आयुर्वेद मानता है कि जब अग्नि और पाचन सुस्त पड़ जाते हैं, तो भोजन सही से पचकर ऊर्जा में बदलने के बजाय आम बनाता है, जो शुगर के मेटाबॉलिज़्म को रोकता है।
  • कफ और वात दोष का असंतुलन: गर्भावस्था में स्वाभाविक रूप से कफ बढ़ता है। लेकिन अनुचित आहार से जब यह विकृत होता है और वात दोष के साथ मिल जाता है, तो यह स्रोतसों को ब्लॉक कर देता है।
  • ओजस का क्षय: मधुमेह या उच्च शुगर शरीर के ओज को सोखने लगती है। ओजस का सही रहना माँ और बच्चे दोनों की रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए अत्यंत आवश्यक है।
  • पाचन तंत्र का धीमा होना: बढ़ता हुआ गर्भाशय आँतों पर दबाव डालता है, जिससे पाचन तंत्र सुस्त हो जाता है। सही चयापचय के बिना शुगर का संतुलन बनाए रखना असंभव हो जाता है।

गर्भावस्था में शुगर कंट्रोल करने के लिए आयुर्वेदिक डाइट चार्ट

प्रेगनेंसी में आप खाना नहीं छोड़ सकते, लेकिन आपको सही चीज़ों का चुनाव करना होगा। यह डाइट चार्ट आपकी मदद करेगा:

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - शुगर कंट्रोल करने वाले) क्या न खाएं (नुकसानदायक - शुगर तेज़ी से बढ़ाने वाले)
अनाज (Grains) जौ (Barley), पुराना चावल, ओट्स, ज्वार, रागी की रोटी, मूंग दाल की खिचड़ी। मैदा से बनी चीज़ें, वाइट ब्रेड, पैकेटबंद सीरियल्स, नूडल्स और पास्ता।
प्रोटीन और वसा देसी गाय का घी (सीमित मात्रा में), उबली हुई मूंग और मसूर दाल, मुट्ठी भर भीगे हुए बादाम। रिफाइंड तेल, डीप फ्राई की हुई चीज़ें, बहुत ज़्यादा गरिष्ठ या बासी भोजन।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) करेला, परवल, लौकी, पालक, मेथी, ब्रोकली, बीन्स (सभी अच्छी तरह पकी हुई)। आलू, शकरकंद, कच्चा और ठंडा सलाद (विशेषकर रात के समय)।
फल (Fruits) सेब, नाशपाती, पपीता, कीवी, जामुन (सीमित मात्रा में और दिन के समय)। बहुत अधिक पके हुए केले, आम, चीकू, तरबूज, और डिब्बाबंद फलों के जूस।
पेय पदार्थ (Beverages) गुनगुना पानी, धनिए का पानी, छाछ (जीरा पाउडर के साथ), हल्दी वाला दूध (रात में)। कोल्ड ड्रिंक्स, बहुत ज़्यादा चीनी वाली चाय/कॉफी, पैक्ड जूस।

ब्लड शुगर को नियंत्रित करने वाली सुरक्षित आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

गर्भावस्था में कोई भी जड़ी-बूटी बिना आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह के नहीं लेनी चाहिए। यहाँ बताई गई औषधियाँ आयुर्वेद में अत्यंत सुरक्षित और प्रभावी मानी गई हैं:

  • शतावरी: यह गर्भिणी के लिए सर्वोत्तम रसायन है। शतावरी माँ को ताकत देती है, स्ट्रेस कम करती है और ब्लड शुगर के स्तर को संतुलित रखने में अप्रत्यक्ष रूप से मदद करती है।
  • गिलोय: यह शरीर से टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में माहिर है। गिलोय इम्यूनिटी को फौलादी बनाता है और मेटाबॉलिज़्म को तेज़ करके अतिरिक्त ग्लूकोज को बर्न करता है।
  • मेथी: मेथी में प्राकृतिक घुलनशील फाइबर होता है। डॉक्टर की सलाह पर भिगोए हुए मेथी के बीज लेने से यह कार्बोहाइड्रेट के अवशोषण को धीमा कर देता है, जिससे शुगर स्पाइक नहीं होती।
  • अश्वगंधा: यद्यपि गर्भावस्था में इसका उपयोग बहुत सावधानी से कम मात्रा में किया जाता है, लेकिन अश्वगंधा नर्वस सिस्टम को रिलैक्स कर कॉर्टिसोल तनाव हॉर्मोन को घटाता है, जो शुगर को ट्रिगर करता है।

प्रेगनेंसी में शुगर के लिए आयुर्वेदिक थेरेपीज़

गर्भावस्था में पंचकर्म की भारी थेरेपीज़ जैसे वमन या विरेचन थेरेपी नहीं की जाती हैं, लेकिन कुछ सौम्य बाहरी थेरेपीज़ नसों को शांत कर शुगर मेटाबॉलिज़्म में सुधार लाती हैं:

  • अभ्यंग Abhyanga: औषधीय तेलों से हल्के हाथों से की जाने वाली अभ्यंग मालिश शरीर से वात के तनाव को कम करती है, ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाती है और शरीर में इंसुलिन के रिसेप्शन को बेहतर बनाती है।
  • शिरोधारा Shirodhara: माथे पर औषधीय तेल या काढ़े की लगातार धारा गिराने की यह प्रक्रिया दिमाग को गहरी शांति देती है। यह तनाव और अनिद्रा को दूर कर हॉर्मोन्स को संतुलित करती है।
  • पादभ्यंग Foot Massage: पैरों के तलवों पर रात को सोने से पहले काँसे की कटोरी या गुनगुने तेल से मालिश करने से शरीर की गर्मी शांत होती है और नर्वस सिस्टम रिलैक्स होता है।

ब्लड शुगर के प्राकृतिक रूप से संतुलित होने में कितना समय लगता है?

गर्भावस्था में शरीर बहुत तेज़ी से बदलता है, इसलिए शुगर को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने में एक अनुशासित दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है:

  • शुरुआती 1-2 हफ्ते: सही आयुर्वेदिक डाइट और तनाव मुक्त जीवनशैली अपनाने से आपको अपनी प्यास, बार-बार यूरिन आने और थकान में राहत महसूस होने लगेगी।
  • 1-2 महीने: सुरक्षित आयुर्वेदिक औषधियों रसायनों के प्रभाव से आपका मेटाबॉलिज़्म सुधरेगा और आपके ब्लड शुगर के स्पाइक्स अचानक बढ़ना काफी हद तक कम हो जाएंगे।
  • डिलीवरी तक का सफर: पूरे नौ महीने तक जठराग्नि को संतुलित रखकर और नियमित जाँच करते हुए शुगर को एक सेफ ज़ोन में बनाए रखा जाता है ताकि बच्चा पूरी तरह स्वस्थ पैदा हो।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

प्रेगनेंसी में जेस्टेशनल डायबिटीज के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बुनियादी अंतर है:

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य इंसुलिन के इंजेक्शन या ब्लड शुगर को ज़बरदस्ती कम करने वाली दवाइयाँ देना। जठराग्नि को बढ़ाना, दोषों को संतुलित करना और शरीर के मेटाबॉलिज़्म को प्राकृतिक रूप से सुधारना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल पैनक्रियाज और हॉर्मोन्स की एक स्थानीय (Local) समस्या मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए वात-कफ और अनुचित आहार का एक संपूर्ण सिंड्रोम (अग्निमांद्य) मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल अक्सर कैलोरी गिनने और कार्बोहाइड्रेट्स को पूरी तरह बंद करने की सलाह दी जाती है। खाने में सही 'अनाज', जठराग्नि के अनुसार आहार, और तनाव मुक्त जीवनशैली पर ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर दवाइयों पर निर्भरता बनी रहती है और भविष्य में टाइप 2 डायबिटीज का खतरा रहता है। शरीर की इम्युनिटी और पाचन तंत्र अंदर से मज़बूत हो जाता है जिससे शुगर प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रहती है।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद जीवनशैली में सुधार कर इस शुगर को बहुत अच्छे से प्रबंधित कर सकता है, लेकिन अगर आपको प्रेगनेंसी के दौरान अपने शरीर में ये गंभीर बदलाव दिखें, तो तुरंत नज़दीकी अस्पताल या मेडिकल इमरजेंसी में संपर्क करना ज़रूरी हो जाता है:

  • अचानक चक्कर खाकर गिरना: अगर आपको अचानक बहुत ज़्यादा पसीना आए, घबराहट हो और आप चक्कर खाकर बेहोश होने लगें।
  • बच्चे की मूवमेंट में अचानक कमी: अगर आपको पेट में बच्चे की हलचल अचानक बहुत कम या बिल्कुल महसूस होनी बंद हो जाए।
  • लगातार उल्टियाँ और कुछ भी न पचना: अगर उल्टियाँ रुकने का नाम न लें और आप पानी की एक घूंट भी पेट में न रख पा रही हों, जिससे भयंकर डिहाइड्रेशन हो जाए।
  • आंखों के आगे गहरा अंधेरा छाना: अगर सिर में भयंकर दर्द उठे और आंखों के आगे अचानक अंधेरा या तेज़ धुंधलापन छा जाए यह हाई ब्लड प्रेशर और हाई शुगर का कॉम्प्लिकेशन हो सकता है।

निष्कर्ष

गर्भावस्था में ब्लड शुगर का बढ़ना कोई ऐसी सज़ा नहीं है जिससे आप डरकर बैठ जाएँ। यह आपके शरीर का सिर्फ एक संकेत है कि उसे अब ज़्यादा ध्यान, सही पोषण और एक बेहतर दिनचर्या की ज़रूरत है। केमिकल बेस्ड दवाइयों के तनाव और जेस्टेशनल डायबिटीज के इस चक्रव्यूह से बाहर निकलें। अपने आहार में करेला, मूंग दाल और पुराने चावल को शामिल करें। मन को शांत रखने के लिए सही दिनचर्या अपनाएं और सुरक्षित आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों की मदद से अपनी और अपने बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाएं।

गर्भावस्था के इस पवित्र सफर को शुगर के डर से खराब न होने दें। अपने शरीर के मेटाबॉलिज़्म को प्राकृतिक रूप से ठीक करने और एक स्वस्थ, सुरक्षित मातृत्व का अनुभव करने के लिए इससे राहत पाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

मीठा पूरी तरह छोड़ना ज़रूरी नहीं है, लेकिन रिफाइंड चीनी (सफेद चीनी), मिठाइयाँ और पैकेटबंद जूस से बिल्कुल दूर रहना चाहिए। आप सीमित मात्रा में प्राकृतिक मिठास जैसे ताज़े फल (सेब, पपीता) खा सकती हैं, लेकिन वह भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार।

नहीं, ऐसा नहीं है कि बच्चे को जन्म से ही डायबिटीज होगा। लेकिन अगर गर्भावस्था के दौरान आपकी शुगर बहुत हाई रहती है, तो बच्चे का वज़न ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ सकता है और भविष्य में उसके लिए मोटापे या शुगर का जोखिम थोड़ा बढ़ जाता है।

हाँ, हल्की और सुरक्षित वॉक करना बहुत फायदेमंद है। रोज़ाना 20-30 मिनट की हल्की सैर करने से शरीर की इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ती है और शुगर ऊर्जा के रूप में खर्च हो जाती है। भारी व्यायाम से बचें।

नया और सफेद चावल खाने से बचें क्योंकि यह शुगर तेज़ी से बढ़ाता है। इसके बजाय आप सीमित मात्रा में पुराना चावल, ब्राउन राइस या जौ (Barley) का इस्तेमाल कर सकती हैं जो पचने में आसान होते हैं और शुगर को धीरे-धीरे रिलीज़ करते हैं।

बिस्कुट या नमकीन की जगह आप भुने हुए मखाने, मुट्ठी भर भीगे हुए बादाम-अखरोट, उबला हुआ चना या एक ताज़ा सेब खा सकती हैं। ये चीज़ें वात को भी शांत रखती हैं और शुगर को स्पाइक नहीं होने देतीं।

शत-प्रतिशत। जब आप प्रेगनेंसी या रिपोर्ट को लेकर बहुत ज़्यादा स्ट्रेस लेती हैं, तो शरीर कॉर्टिसोल नामक हॉर्मोन छोड़ता है। यह हॉर्मोन शरीर में इंसुलिन के काम को रोकता है, जिससे शुगर लेवल तुरंत बढ़ जाता है।

ज़्यादातर मामलों में जेस्टेशनल डायबिटीज डिलीवरी के बाद अपने आप ठीक हो जाती है क्योंकि प्लेसेंटा (जो इंसुलिन रेजिस्टेंस कर रहा था) शरीर से बाहर आ जाता है। हालांकि, प्रसव के 6-12 हफ्ते बाद एक बार शुगर टेस्ट कराना ज़रूरी होता है।

आयुर्वेद में गर्भिणी (गर्भवती) के लिए बहुत ही सौम्य और विशेष जड़ी-बूटियों (रसायनों) का विधान है। अगर आप एक योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक (जैसे जीवा आयुर्वेद के डॉक्टर) की निगरानी में दवा ले रही हैं, तो यह पूरी तरह सुरक्षित है।

बिल्कुल नहीं। बच्चे के दिमागी विकास और आपकी आंतों की चिकनाई के लिए स्वस्थ फैट बहुत ज़रूरी है। रिफाइंड ऑयल छोड़ें, लेकिन सीमित मात्रा में शुद्ध देसी गाय का घी अपने भोजन में ज़रूर शामिल करें।

गर्भावस्था के अंतिम महीनों में गर्भाशय के दबाव के कारण भी बार-बार यूरिन आता है। लेकिन अगर आपको इसके साथ बहुत प्यास भी लग रही है और थकान बनी रहती है, तो यह बढ़ी हुई शुगर का संकेत हो सकता है। सोने से ठीक पहले बहुत ज़्यादा लिक्विड न पिएं।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us