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Knee में Crepitus (आवाज़) पर दर्द नहीं - क्या इलाज ज़रूरी है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 25 May, 2026
  • category-iconUpdated on 13 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
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आपने अक्सर गौर किया होगा कि चलते, सीढ़ियां चढ़ते या कुर्सी से उठते वक्त घुटनों से अचानक आवाज़ आने लगती है। कभी 'कट-कट', तो कभी 'टक-टक' या फिर हल्की सी 'चर्र-चर्र' जैसी आवाज़। मजे की बात ये है कि कई बार इसमें जरा भी दर्द नहीं होता, बस यही बात लोगों को सबसे ज्यादा उलझन में डाल देती है।

लोग तुरंत सोचने लगते हैं कि शायद उम्र ढल रही है या घुटने घिसने लगे हैं। कुछ को तो सीधा गठिया का डर सताने लगता है। लेकिन सच बताऊं तो हर आवाज़ किसी बड़ी बीमारी का अलार्म नहीं होती। कई बार तो घंटों एक ही जगह बैठे रहने, नसों की जकड़न या जोड़ों की आम हलचल की वजह से भी ऐसी आवाज़ें आ जाती हैं।

हां, लेकिन एक बात जरूर ध्यान रखें। अगर इन आवाज़ों के साथ घुटनों में सूजन आ जाए, अकड़न लगे या चलने-फिरने में तकलीफ होने लगे, तो फिर इसे हल्के में न लें। हमारा शरीर ऐसे ही छोटे-छोटे इशारों से अंदर की गड़बड़ी बताता है।

Crepitus (क्रेपिटस) क्या होता है?

जोड़ों से आने वाली इसी 'कट-कट' या 'चर्र-चर्र' की आवाज़ को क्रेपिटस (Crepitus) कहा जाता है। यह ऐसा लगता है जैसे अंदर कोई चीज़ आपस में रगड़ खा रही हो। वैसे तो यह परेशानी सबसे ज्यादा घुटनों में महसूस होती है, लेकिन कई लोगों को गर्दन घुमाते, कंधे हिलाते या उंगलियां मोड़ते वक्त भी ऐसी ही आवाज़ आती है। खासकर सीढ़ियां चढ़ते या घुटना मोड़कर बैठते वक्त इसका ज्यादा पता चलता है।

घुटनों से “कट-कट” या “चर्र-चर्र” की आवाज़ क्यों आती है? 

घुटनों से आवाज़ आना कई लोगों में सामान्य रूप से देखा जाता है। यह हमेशा किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होता, लेकिन इसके पीछे के कारणों को समझना ज़रूरी माना जाता है।

  • जोड़ों के भीतर गैस के बुलबुले: घुटनों के द्रव में छोटे गैस बुलबुले बन सकते हैं। इनके फूटने पर “टक” जैसी आवाज़ सुनाई दे सकती है।
  • मांसपेशियों की हलचल: घुटना मोड़ते समय आसपास की स्नायु अपनी जगह हल्की खिसक सकती हैं। इससे कट-कट जैसी ध्वनि महसूस हो सकती है।
  • जोड़ों की सतह में हल्का घर्षण: अगर घुटने की सतह पूरी तरह चिकनी न रहे, तो चलने या बैठने पर रगड़ जैसी आवाज़ आ सकती है।
  • लंबे समय तक बैठे रहना: देर तक एक ही स्थिति में रहने से घुटनों में जकड़न बढ़ सकती है। अचानक उठने पर आवाज़ ज़्यादा महसूस हो सकती है।
  • मांसपेशियों की कमज़ोरी: घुटनों के आसपास की मांसपेशियाँ कमज़ोर होने पर जोड़ पर दबाव बदल सकता है। इससे हल्की आवाज़ें आने लग सकती हैं।

क्या बिना दर्द के घुटनों से आवाज़ आना सामान्य हो सकता है?

हाँ, बिल्कुल! अगर आपके घुटनों से सिर्फ आवाज़ आ रही है और आपको कोई दर्द, सूजन या चलने-फिरने में जकड़न नहीं है, तो यह एकदम नॉर्मल बात है। सिर्फ 'कट-कट' या 'चर्र-चर्र' की आवाज़ सुनकर यह डरने की बिल्कुल जरूरत नहीं है कि आपके घुटने खराब हो गए हैं या कोई बड़ी बीमारी लग गई है।

अक्सर जवान लोगों में, रोज़ कसरत करने वालों में या फिर घंटों कुर्सी पर बैठकर अचानक उठने पर ऐसी आवाज़ें आना बहुत आम है। दरअसल, होता यह है कि जोड़ों के बीच जो तरलता  होता है, उसमें कभी-कभी गैस के छोटे बुलबुले बन जाते हैं। जब हम उठते-बैठते हैं तो वे बुलबुले फूटते हैं या फिर हमारी मांसपेशियां हल्की सी खिसकती हैं, बस उसी वजह से यह आवाज़ आती है। अगर दर्द नहीं है, तो इसमें घबराने वाली कोई बात नहीं है।

किन लोगों में घुटनों से आवाज़ आने की समस्या ज्यादा देखी जाती है?

घुटनों से “कट-कट” या “चर्र-चर्र” की आवाज़ किसी भी उम्र में महसूस हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों में यह अधिक सामान्य रूप से देखी जाती है। उम्र, जीवनशैली और जोड़ों पर पड़ने वाला लगातार दबाव इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  • बढ़ती उम्र के लोगों में: उम्र बढ़ने के साथ जोड़ों की प्राकृतिक चिकनाहट धीरे-धीरे कम होने लगती है। इससे घुटनों की हलचल के दौरान आवाज़ महसूस हो सकती है।
  • महिलाओं में रजोनिवृत्ति (menopause) के बाद: इस समय शरीर में हार्मोन संबंधी बदलाव होते हैं, जो हड्डियों और जोड़ों की मज़बूती को प्रभावित कर सकते हैं।
  • ज्यादा वज़न उठाने वाले लोगों में: लगातार भारी वज़न उठाने या घुटनों पर अधिक दबाव पड़ने से जोड़ों में घर्षण बढ़ सकता है।
  • लंबे समय तक बैठे रहने वालों में: कम शारीरिक गतिविधि और लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहने से घुटनों में जकड़न बढ़ सकती है।
  • युवाओं में खराब जीवनशैली के कारण: आजकल कम शारीरिक मेहनत, लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठना और व्यायाम की कमी के कारण यह समस्या कम उम्र में भी देखने को मिल रही है।

कब घुटनों की आवाज़ सामान्य है और कब चिंता की बात? 

घुटनों से आवाज़ आना हर बार किसी बीमारी का इशारा नहीं है। अगर आपको इसके साथ कोई तकलीफ नहीं हो रही है, तो यह बस जोड़ों की आम हलचल है।

कब घबराने की बात नहीं है?

  • जब आवाज़ कभी-कभार ही आए।
  • घुटनों में कोई दर्द न हो।
  • किसी तरह की सूजन या भारीपन न लगे।
  • चलने, उठने-बैठने या सीढ़ियाँ चढ़ने में कोई दिक्कत न हो।

कब डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी है?

  • जब घुटनों में सूजन दिखने लगे।
  • चलने या घुटना मोड़ने पर दर्द होने लगे।
  • चलते-चलते घुटना अचानक अटक (लॉक हो) जाए।
  • घुटनों के अंदर तेज रगड़ महसूस होने लगे।
  • सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त पैर कमज़ोर या लड़खड़ाते हुए महसूस हों।

अगर इनमें से कोई भी लक्षण दिखे, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए ताकि सही समय पर बीमारी पकड़ी जा सके।

दर्द नहीं है, लेकिन आवाज़ लगातार बढ़ रही है: क्या करें? 

अगर घुटनों में दर्द तो नहीं है, लेकिन ये 'कट-कट' की आवाज़ें पहले से ज़्यादा आने लगी हैं, तो इसे बिल्कुल अनदेखा न करें। यह इशारा हो सकता है कि आपकी कुछ आदतें घुटनों पर भारी पड़ रही हैं। ऐसे में अपने डेली रूटीन पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है:

  • बढ़ता वज़न: शरीर का एक्स्ट्रा वज़न घुटनों पर सीधा दबाव डालता है, जिससे ये आवाज़ें बढ़ जाती हैं।
  • फिजिकल एक्टिविटी की कमी: शरीर से काम न लेने या सुस्त पड़े रहने पर जोड़ों की लचक धीरे-धीरे खत्म होने लगती है।
  • घंटों बैठे रहना: एक ही कुर्सी पर लगातार जमे रहने से घुटने जाम हो जाते हैं और अकड़न बढ़ जाती है।
  • कमज़ोर जांघें (Thighs): घुटनों का सारा बैलेंस हमारी जांघों की मसल्स पर टिका होता है। अगर ये कमज़ोर पड़ जाएं, तो घुटनों पर दबाव बिगड़ जाता है।
  • स्ट्रेचिंग न करना: रोज़ हल्की-फुल्की कसरत या स्ट्रेचिंग न करने से जोड़ों का मूवमेंट खराब होने लगता है।

वज़न कंट्रोल करके, थोड़ा एक्टिव रहकर और रोज़ हल्की कसरत करने से आप इस परेशानी को आसानी से रोक सकते हैं।

आयुर्वेद और घुटनों की आवाज़: वात का कनेक्शन 

घुटनों से जो ये 'कट-कट' की आवाज आती है न, आयुर्वेद की भाषा में इसे सीधा 'वात' बिगड़ने का इशारा माना जाता है। वात का काम ही चीजों को सुखाना है। तो जब भी शरीर में वात भड़केगा, सबसे पहले जोड़ों के बीच की कुदरती ग्रीस (चिकनाहट) कम होने लगेगी। अब ग्रीस घटेगी तो जाहिर है हड्डियां आपस में रगड़ खाएंगी और मुड़ने पर आवाज करेंगी। इसे सिर्फ घुटने की दिक्कत मत मानिए। असल में ये आपके खराब रूटीन, पेट की गड़बड़ी और बिगड़े हुए बॉडी बैलेंस का ही नतीजा है।

वात बढ़ने के इशारे:

  • घुटने अंदर से एकदम रूखे और जाम लगने लगते हैं।
  • बैठ कर उठने पर या पैर सीधा करने पर 'कटक' सी आवाज आती है।
  • खासकर सुबह सोकर उठने पर या देर तक एक जगह बैठने के बाद पैरों में भारी अकड़न आ जाती है।
  • शरीर में बेवजह थकान और खुश्की सी महसूस होना।

आयुर्वेद में इलाज का तरीका 

आयुर्वेद का काम सिर्फ घुटने पर बाम या तेल लगाकर दर्द दबाना नहीं है। असली फोकस इस बात पर रहता है कि वो सूखी हुई ग्रीस वापस कैसे आए और वात हमेशा के लिए शांत कैसे हो।

  • जड़ पकड़ना: सिर्फ दर्द की गोली खाना हल नहीं है। आपकी डाइट कैसी है, आप कुर्सी पर कितनी देर बैठते हैं इन गलतियों को सुधारे बिना बात नहीं बनेगी।
  • वात कंट्रोल: घुटने सूखे ही इसलिए हैं क्योंकि वात बढ़ा हुआ है। शरीर में वापस से चिकनाहट लाने वाले तरीके सबसे पहले अपनाए जाते हैं।
  • लचक वापस लाना: घुटने के आसपास की नसों को सही खुराक दी जाती है ताकि मूवमेंट फिर से आसान हो सके।
  • मसल्स की मजबूती: अगर आपकी जांघें कमजोर होंगी, तो शरीर का सारा वजन घुटनों पर पड़ेगा। इसलिए पैरों को अंदर से मजबूत करना बहुत जरूरी है।
  • लाइफस्टाइल: एक ही जगह बैठे रहना, रात में जागना और रूखा खाना वात को भड़काते हैं। इसे बदलना ही सबसे बड़ा इलाज है।

असरदार आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां 

कुछ देसी जड़ी-बूटियां इसमें बहुत अच्छा असर दिखाती हैं। जैसे:

  • अश्वगंधा: ये सिर्फ ताकत नहीं बढ़ाती, बल्कि ढीली पड़ चुकी मांसपेशियों में नई जान डाल देती है।
  • गुग्गुलु: घुटनों की पुरानी जकड़न और अकड़न खोलने के लिए इसका इस्तेमाल काफी पुराना और आजमाया हुआ है।
  • दशमूल: अगर वात बहुत ज्यादा भड़का हुआ है, तो उसे शांत करने में दशमूल से बेहतर कुछ नहीं।
  • शल्लकी: इसके इस्तेमाल से हड्डियों का मूवमेंट एकदम स्मूथ हो जाता है और उठने-बैठने की दिक्कत दूर होती है।
  • त्रिफला: ये पेट साफ रखता है, जिससे गैस नहीं बनती और वात भी कंट्रोल में रहता है।

घुटनों की ग्रीस लौटाने वाली खास थेरेपी 

दवाओं के अलावा कुछ पुरानी आयुर्वेदिक थेरेपी भी हैं जो सीधे घुटनों पर काम करती हैं:

  • अभ्यंग (तेल मालिश): जड़ी-बूटियों वाले गुनगुने तेल से अच्छे से मालिश की जाती है, जिससे सूखापन और खिंचाव खत्म होता है।
  • जानु बस्ती: इसमें घुटनों के ऊपर उड़द की दाल का एक गोल घेरा बनाकर उसमें कुछ देर के लिए खास औषधीय तेल भर देते हैं। ये घुटनों को डीप-पोषण देता है।
  • स्वेदन (भाप देना): मालिश के तुरंत बाद भाप दी जाती है। इससे नसों में फंसी जकड़न बर्फ की तरह पिघलने लगती है।
  • पोटली सेक: गरम जड़ी-बूटियों की पोटली से सिकाई करने पर भारीपन और दर्द तुरंत दूर होता है।

आहार (Diet) में क्या बदलाव करें? 

क्या खाएं

  • गर्म और ताजा भोजन
  • मूंग दाल और हल्का सुपाच्य आहार
  • घी की संतुलित मात्रा
  • तिल, बादाम और अखरोट
  • हल्दी, सोंठ और जीरा
  • गुनगुना पानी

क्या न खाएं

  • बहुत ज्यादा ठंडी चीजें
  • लंबे समय तक खाली पेट रहना
  • अत्यधिक सूखा और पैकेट बंद भोजन
  • बहुत ज्यादा तला हुआ भोजन
  • देर रात का खाना
  • अनियमित खानपान

मरीज़ों का भरोसा – उनके जीवन बदलने वाले अनुभव

मेरा नाम सुखविंदर कौर है और मेरी उम्र 61 वर्ष है, मैं दिल्ली से हूँ। लगभग 6 महीने पहले मुझे घुटने में चोट लग गई थी, जिसके बाद मैंने एलोपैथिक इलाज करवाया। वहाँ मुझे सर्जरी की सलाह दी गई, जिससे मैं बहुत चिंतित हो गई। चूँकि मेरा पहले से आयुर्वेद पर विश्वास था और मेरे पिता मुझे 2018 में जीवा आयुर्वेद ले गए थे, इसलिए मैंने दोबारा आयुर्वेदिक इलाज की ओर रुख किया। मैंने ऑनलाइन जीवाग्राम के बारे में देखा और वहाँ संपर्क किया। इसके बाद मैंने डॉक्टरों से बात की और इलाज शुरू कराया। मुझे सही मार्गदर्शन, दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल की सलाह दी गई। धीरे-धीरे मेरी स्थिति में सुधार आने लगा। आज मैं पहले से काफी बेहतर महसूस करती हूँ और जीवा आयुर्वेद के इलाज से मुझे बहुत राहत मिली है। 

कब डॉक्टर से सलाह लें?

घुटनों से आवाज़ आना हमेशा गंभीर समस्या नहीं होता, लेकिन कुछ संकेतों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।

  • यदि आवाज़ के साथ दर्द भी होने लगे
  • यदि घुटनों में सूजन दिखाई दे
  • यदि चलने या बैठने में परेशानी हो
  • यदि घुटना बार बार अटकने लगे
  • यदि जकड़न लगातार बढ़ रही हो
  • यदि सीढ़ियां चढ़ते समय कमज़ोरी महसूस हो
  • यदि घुटनों में अस्थिरता लगे
  • यदि रोज़मर्रा के काम प्रभावित होने लगें

ऐसी स्थिति में सही जांच और सलाह लेना बेहतर माना जाता है।

निष्कर्ष

घुटनों से आने वाली “कट-कट” या “चर्र-चर्र” जैसी आवाज़ हमेशा बीमारी का संकेत नहीं होती, लेकिन इसे पूरी तरह अनदेखा करना भी सही नहीं माना जाता। आधुनिक चिकित्सा इसे मुख्य रूप से घुटनों के घिसाव और दबाव से जोड़कर देखती है, जबकि आयुर्वेद इसे वात वृद्धि, शरीर में सूखापन और जोड़ों की चिकनाहट कम होने से जुड़ी स्थिति मानता है।

समय रहते सही आहार, संतुलित दिनचर्या, हल्का व्यायाम और जोड़ों की नियमित देखभाल अपनाने से घुटनों की सहजता और कार्यक्षमता लंबे समय तक बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं, हर बार घुटनों से आने वाली आवाज़ घिसाव का संकेत नहीं होती। कई लोगों में यह सामान्य शारीरिक प्रक्रिया का हिस्सा भी हो सकती है। कभी-कभी जोड़ों की हलचल या मांसपेशियों के खिंचाव से भी ऐसी ध्वनि सुनाई देती है। यदि दर्द, सूजन या चलने में परेशानी नहीं है, तो कई मामलों में यह गंभीर स्थिति नहीं मानी जाती। फिर भी लंबे समय तक लगातार बढ़ती आवाज़ पर ध्यान देना ज़रूरी होता है।

हाँ, शरीर का बढ़ा हुआ वज़न घुटनों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। इससे जोड़ों की सहज गति प्रभावित हो सकती है और चलने या उठने बैठने पर आवाज़ अधिक महसूस हो सकती है। लंबे समय तक अधिक वजन रहने से घुटनों की मांसपेशियां भी कमज़ोर होने लगती हैं। इसलिए संतुलित वज़न बनाए रखना घुटनों के लिए उपयोगी माना जाता है।

लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहने से घुटनों में जकड़न और अकड़न बढ़ सकती है। इससे उठते समय या चलना शुरू करते समय “कट-कट” जैसी आवाज़ ज्यादा महसूस हो सकती है। लगातार निष्क्रिय रहने से जोड़ों की लचक भी कम हो सकती है। बीच-बीच में हल्की गतिविधि और स्ट्रेचिंग करना उपयोगी माना जाता है।

कुछ लोगों में सीढ़ियां चढ़ते समय घुटनों पर दबाव अधिक महसूस होता है, जिससे आवाज़ सुनाई दे सकती है। यदि मांसपेशियाँ कमज़ोर हों या घुटनों में stiffness हो, तो यह और स्पष्ट महसूस हो सकता है। हालांकि केवल आवाज़ आना हमेशा नुकसान का संकेत नहीं होता। सही तरीके से चलना और मांसपेशियों को मज़बूत रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।

शरीर में पानी की कमी होने पर रूखापन बढ़ सकता है, जिसका असर जोड़ों पर भी पड़ सकता है। इससे शरीर में अकड़न और असहजता अधिक महसूस हो सकती है। पर्याप्त पानी पीना शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली के लिए ज़रूरी माना जाता है। साथ ही संतुलित आहार भी जोड़ों की सहजता बनाए रखने में मदद कर सकता है।

हर स्थिति में व्यायाम बंद करना सही नहीं माना जाता। कई बार हल्का और सही प्रकार का व्यायाम घुटनों की मज़बूती और लचीलापन बेहतर करने में मदद कर सकता है। पूरी तरह निष्क्रिय रहने से मांसपेशियां और कमज़ोर हो सकती हैं। हालांकि दर्द या सूजन होने पर विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर माना जाता है।

हाँ, आजकल कम उम्र के लोगों में भी घुटनों की आवाज़ देखी जा रही है। लंबे समय तक बैठे रहना, कम शारीरिक गतिविधि और गलत जीवनशैली इसके पीछे कारण हो सकते हैं। कई युवा लोगों में मांसपेशियों की कमज़ोरी और शरीर की अकड़न भी इसका कारण बनती हैं। इसलिए यह केवल बढ़ती उम्र से जुड़ी समस्या नहीं मानी जाती।

कुछ लोगों में ठंड के मौसम में जोड़ों की जकड़न अधिक महसूस होती है। इससे चलने या उठने बैठने पर आवाज़ भी ज्यादा सुनाई दे सकती है। ठंड में शरीर की लचक कम महसूस हो सकती है, खासकर यदि गतिविधि कम हो। ऐसे समय में शरीर को गर्म रखना और हल्की गतिविधि बनाए रखना उपयोगी माना जाता है।

हाँ, लंबे समय तक गलत मुद्रा में बैठना घुटनों और आसपास की मांसपेशियों पर असर डाल सकता है। लगातार दबाव पड़ने से जोड़ों की सहज गति प्रभावित हो सकती है। जमीन पर लंबे समय तक बैठना या घुटनों को मोड़कर बैठना कुछ लोगों में असहजता बढ़ा सकता है। सही बैठने की आदतें घुटनों की सुरक्षा में मदद कर सकती हैं।

हल्की और सही तरीके से की गई मालिश कई लोगों में आराम महसूस कराने में मदद कर सकती है। इससे जकड़न कम महसूस हो सकती है और मांसपेशियों को आराम मिल सकता है। गर्म तेल से हल्की मालिश शरीर में सहजता बढ़ाने में सहायक मानी जाती है। हालांकि तेज़ दर्द, सूजन या गंभीर समस्या होने पर बिना सलाह के मालिश नहीं करनी चाहिए।

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