Diseases Search
Close Button
 
 

Plastic Bottle से पानी पीना बंद करो — Hormones बिगाड़ रहा है

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan

चाहे आप अपने ऑफिस की डेस्क पर बैठे हों, जिम में पसीना बहा रहे हों, या अपनी कार में सफर कर रहे हों, आपके हाथ में या आपके आस-पास एक प्लास्टिक की पानी की बोतल का होना आज हमारी दिनचर्या का सबसे सामान्य हिस्सा बन चुका है। हम सोचते हैं कि हम सीलबंद और साफ़ पानी पीकर अपनी सेहत बना रहे हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह पारदर्शी बोतल अंदर ही अंदर आपके पानी में क्या घोल रही है?

जब आप प्लास्टिक की बोतल से पानी पीते हैं, तो आप केवल पानी नहीं पी रहे होते; आप लाखों माइक्रोप्लास्टिक्स (Microplastics) और खतरनाक रसायनों को अपने शरीर में उतार रहे होते हैं। ये अदृश्य रसायन सीधे आपके खून में घुलकर आपके शरीर के प्राकृतिक संचार को हैक कर लेते हैं। यह एक ऐसा धीमा ज़हर है जो किसी बाहरी इन्फेक्शन की तरह तुरंत बुखार तो नहीं लाता, लेकिन खामोशी से आपके पूरे एंडोक्राइन सिस्टम को तबाह कर रहा है।

प्लास्टिक की बोतल का पानी शरीर के अंदर क्या बदलाव करता है?

प्लास्टिक कभी भी पूरी तरह से स्थिर (Stable) नहीं होता। जब पानी प्लास्टिक की बोतल में लंबे समय तक रखा रहता है, खासकर हल्के गर्म तापमान में, तो बोतल के खतरनाक रसायन पानी में रिसने (Leaching) लगते हैं। शरीर के अंदर जाने के बाद ये रसायन ये खौफनाक गतिविधियाँ करते हैं:

  • एंडोक्राइन डिसरप्टर्स (Endocrine Disruptors) का हमला: प्लास्टिक को लचीला बनाने के लिए बिस्फेनॉल-ए (BPA) और थैलेट्स (Phthalates) जैसे रसायनों का इस्तेमाल होता है। शरीर में जाकर ये रसायन बिल्कुल एस्ट्रोजन (Estrogen) हॉर्मोन की तरह बर्ताव करते हैं, जिससे शरीर का असली हॉर्मोनल असंतुलन भयंकर रूप से बिगड़ जाता है।
  • माइक्रोप्लास्टिक्स का खून में मिलना: हाल ही की रिसर्च बताती हैं कि बोतलबंद पानी में लाखों नैनोप्लास्टिक्स होते हैं। ये इतने छोटे होते हैं कि आंतों से सीधे खून में प्रवेश कर जाते हैं और अंगों की कोशिकाओं (Cells) में जाकर सूजन (Inflammation) पैदा करते हैं।
  • लिवर और किडनी पर भारी दबाव: आपका लिवर इन रसायनों को फिल्टर करने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया है। लगातार प्लास्टिक का पानी पीने से लिवर थक जाता है, जिससे शरीर का प्राकृतिक डिटॉक्सिफिकेशन (Detoxification) सिस्टम क्रैश होने लगता है।

प्लास्टिक के पानी से होने वाले हार्मोनल नुकसान किन प्रकारों में सामने आते हैं?

प्लास्टिक के इन रसायनों का असर हर इंसान पर एक जैसा नहीं होता। शरीर की कमज़ोरी और जेनेटिक्स के आधार पर, यह हार्मोनल तबाही आपको इन अलग-अलग और गंभीर रूपों में अपना शिकार बना सकती है:

  • रिप्रोडक्टिव और ओवेरियन सिंड्रोम: महिलाओं में BPA का अत्यधिक स्तर सीधे ओवरीज़ पर हमला करता है, जिससे एग क्वालिटी गिरती है और पीसीओडी (PCOD) जैसी बीमारियाँ भयंकर रूप ले लेती हैं।
  • थायराइड डिसफंक्शन (Thyroid Dysfunction): थैलेट्स और BPA सीधे थायराइड ग्रंथि (Thyroid gland) के रिसेप्टर्स को ब्लॉक कर देते हैं। इससे शरीर में थायराइड हॉर्मोन्स का बनना कम हो जाता है, जो मेटाबॉलिज़्म को पूरी तरह सुस्त कर देता है।
  • मेटाबॉलिक सिंड्रोम (Metabolic Syndrome): जब हॉर्मोन्स बिगड़ते हैं, तो शरीर इंसुलिन के प्रति काम करना बंद कर देता है। इसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहते हैं, जो आगे चलकर टाइप 2 डायबिटीज का सबसे बड़ा कारण बनता है।

शरीर के किन खामोश संकेतों से पहचानें कि हार्मोन्स बिगड़ रहे हैं?

हॉर्मोन्स का बिगड़ना कोई रातों-रात होने वाली घटना नहीं है। प्लास्टिक का यह ज़हर आपके शरीर में धीरे-धीरे असर करता है और शरीर ये खामोश अलार्म बजाने लगता है:

  • पेट के आस-पास ज़िद्दी चर्बी का जमना: आप चाहे जितनी डाइटिंग कर लें, लेकिन हॉर्मोन्स बिगड़ने पर पेट और कमर के आस-पास भयंकर वज़न का बढ़ना शुरू हो जाता है, जो किसी कसरत से कम नहीं होता।
  • दिन भर भयंकर थकावट रहना: 8 घंटे की नींद लेने के बाद भी अगर आपको सुबह उठने का मन नहीं करता और दिन भर क्रोनिक फटीग महसूस होता है, तो यह थके हुए एंडोक्राइन सिस्टम का संकेत है।
  • दिमाग पर हर वक्त धुंध छाना: रसायनों के न्यूरोटॉक्सिक असर के कारण इंसान फोकस नहीं कर पाता। चीज़ें भूलने लगना और ब्रेन फॉग की स्थिति पैदा होना इसके आम लक्षण हैं।
  • मूड स्विंग्स और अकारण एंग्जायटी: हॉर्मोन्स का सीधा कनेक्शन आपके दिमाग से होता है। एस्ट्रोजन इंबैलेंस के कारण बात-बात पर चिड़चिड़ापन, रोने का मन करना और पैनिक अटैक्स आने लगते हैं।

प्लास्टिक के पानी से बचने के चक्कर में लोग क्या भयंकर गलतियाँ करते हैं?

प्लास्टिक के नुकसान के बारे में आधा-अधूरा ज्ञान लोगों को ऐसे शॉर्टकट्स अपनाने पर मजबूर कर देता है, जो शरीर के लिए और भी ज़्यादा जानलेवा साबित होते हैं:

  • मिनरल वाटर की 'सिंगल यूज़' बोतल को हफ़्तों इस्तेमाल करना: लोग बाज़ार से खरीदी गई पानी की पतली बोतल (PET bottle) को फेंकने के बजाय, उसे महीनों तक धोकर फ्रिज में रखते हैं। हर इस्तेमाल के साथ उस बोतल से रसायन हज़ारों गुना ज़्यादा रिसने लगते हैं।
  • 'BPA-Free' प्लास्टिक का अंधाधुंध इस्तेमाल: कई लोग महंगी 'BPA-Free' बोतलें खरीदकर निश्चिंत हो जाते हैं। उन्हें नहीं पता कि कंपनियों ने BPA की जगह BPS या BPF जैसे अन्य रसायन डाल दिए हैं, जो हार्मोन्स के लिए उतने ही खतरनाक हैं।
  • प्लास्टिक की बोतल को धूप या कार में छोड़ना: गर्मी प्लास्टिक की सबसे बड़ी दुश्मन है। कार की गर्म सीट पर या तेज़ धूप में रखी बोतल से रसायन पानी में इतनी तेज़ी से पिघलते हैं कि वह पानी सीधे ज़हर बन जाता है।

आयुर्वेद इस 'टॉक्सिक प्रभाव' और हार्मोनल असंतुलन को कैसे समझता है?

आधुनिक चिकित्सा जिसे केवल 'एंडोक्राइन डिसरप्टर्स' मानती है, आयुर्वेद उसे शरीर में भयंकर 'आम' (Toxins), दूषित 'रस धातु' और जठराग्नि के पूरी तरह बुझ जाने के विज्ञान से समझता है:

  • आम (Toxins) का निर्माण और संचार: प्लास्टिक के सूक्ष्म कण (Microplastics) और रसायन आयुर्वेद के अनुसार बाहरी और कृत्रिम 'विष' (Garavisha) हैं। जब ये शरीर में जाते हैं, तो हमारा पाचन तंत्र इन्हें पचा नहीं पाता, जिससे ये भयंकर 'आम' बनाते हैं।
  • रस और आर्तव धातु का दूषित होना: यह 'आम' सीधे शरीर के पहले लिक्विड 'रस धातु' (Plasma) में मिल जाता है और वहां से पूरे शरीर में दौड़ता है। महिलाओं में यह 'आर्तव धातु' (Reproductive system) को दूषित कर देता है, जिससे हॉर्मोन्स पूरी तरह बिगड़ जाते हैं।
  • वात का प्रकोप और नसों की कमज़ोरी: जब प्राकृतिक हॉर्मोन्स का संचार रुक जाता है, तो शरीर में वात दोष भड़क जाता है। यही बढ़ा हुआ वात इंसान के नर्वस सिस्टम को डैमेज करता है और भयंकर थकावट लाता है।

हार्मोन्स को संतुलित और शरीर को डिटॉक्स करने वाली आयुर्वेदिक डाइट

अपने शरीर से इस कृत्रिम ज़हर को बाहर निकालने और हॉर्मोन्स को पटरी पर लाने के लिए आपको अपनी डाइट से 'आम' बढ़ाने वाले पदार्थों को हटाना होगा। इस आयुर्वेदिक डाइट को अपनी रूटीन का हिस्सा बनाएं:

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - डिटॉक्स और हॉर्मोन बैलेंस के लिए) क्या न खाएं (ट्रिगर फूड्स - हॉर्मोन्स और लिवर को थकाने वाले)
अनाज (Grains) पुराना चावल, जौ (Barley), जई (Oats), मूंग दाल, बाजरा। मैदा, वाइट ब्रेड, बासी और बहुत ज़्यादा फ़र्मेटेड अनाज।
पेय पदार्थ (Beverages) तांबे या मिट्टी के बर्तन का पानी, धनिए-जीरे का पानी, छाछ। प्लास्टिक की बोतल का पानी, डार्क कॉफी, डिब्बाबंद कोल्ड ड्रिंक्स।
वसा (Fats) देसी गाय का शुद्ध घी (हॉर्मोन्स का कच्चा माल है), तिल का तेल। रिफाइंड ऑयल, बहुत ज़्यादा बाज़ार का ट्रांस फैट, मार्जरीन।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) लौकी, करेला, परवल, कद्दू, लहसुन, मेथी (ये खून साफ़ करती हैं)। भारी कटहल, अरबी, और प्लास्टिक में पैक्ड फ्रोज़न (Frozen) सब्ज़ियाँ।
फल (Fruits) पपीता, उबला हुआ सेब, आँवला, मीठे अनार। प्लास्टिक में कटे हुए रखे बाज़ार के फल, डिब्बाबंद जूस।

हार्मोन्स सुधारने के लिए जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें ऐसे रसायन दिए हैं जो बिना किसी साइड-इफेक्ट के शरीर को प्राकृतिक ताक़त देते हैं और एंडोक्राइन सिस्टम को रेगुलेट करते हैं:

  • अश्वगंधा: यह एक बेहतरीन एडैप्टोजेन (Adaptogen) है। जब रसायनों के कारण शरीर स्ट्रेस में आ जाता है और कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ जाता है, तो अश्वगंधा नर्वस सिस्टम को शांत करता है और थायराइड फंक्शन को सपोर्ट करता है।
  • गिलोय: यह शरीर से भारी टॉक्सिन्स और रसायनों (Garavisha) को पिघलाने के लिए सबसे जादुई रसायन है। गिलोय लिवर के फंक्शन को सुधारता है और खून की डीप-क्लीनिंग करता है।
  • शतावरी: महिलाओं के लिए यह सबसे बड़ा आयुर्वेदिक वरदान है। यह एक बेहतरीन प्राकृतिक फाइटोएस्ट्रोजन है, जो प्लास्टिक रसायनों के कारण बिगड़े हुए एस्ट्रोजन बैलेंस को प्राकृतिक रूप से सुधारती है।
  • त्रिफला: यह केवल पेट साफ़ करने की दवा नहीं है। त्रिफला शरीर के सबसे सूक्ष्म स्रोतों में जाकर 'आम' को खुरच कर बाहर फेंकता है और मेटाबॉलिज़्म को तेज़ करके वज़न को कंट्रोल करता है।

शरीर को डिटॉक्स करने वाली बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब प्लास्टिक के रसायन और वात-पित्त दोष शरीर में बहुत गहराई तक जम चुके हों, तो पंचकर्म की ये क्लासिकल थेरेपीज़ शरीर को तुरंत रीबूट कर देती हैं:

  • विरेचन थेरेपी: शरीर से दूषित पित्त और एंडोक्राइन डिसरप्टर्स को मल के रास्ते बाहर निकालने के लिए लिवर और आंतों की डीप-क्लीनिंग की जाती है। यह हॉर्मोन्स को रीबूट करने का सबसे शक्तिशाली तरीका है।
  • अभ्यंग मालिश: वात दोष को शांत करने और खून के संचार (Blood circulation) को तेज़ करने के लिए औषधीय तेलों से पूरे शरीर की डीप-टिशू मालिश की जाती है। यह लिम्फैटिक सिस्टम को डिटॉक्स करती है।
  • शिरोधारा थेरेपी: हॉर्मोन्स का सीधा संबंध आपके दिमाग (Pituitary gland) से है। सिर पर गुनगुने औषधीय तेल की लगातार धार गिराने से भयंकर स्ट्रेस और मानसिक तनाव तुरंत शांत हो जाता है।
  • उद्वर्तन थेरेपी: जब हॉर्मोनल असंतुलन के कारण भारी वज़न बढ़ जाए, तो सूखे औषधीय पाउडर (त्रिफला आदि) से उल्टी दिशा में मालिश की जाती है, जो फैट को पिघलाकर बाहर निकालती है।

हार्मोन्स के प्राकृतिक रूप से संतुलित होने में कितना समय लगता है?

सालों से प्लास्टिक के रसायनों और गलत आदतों से डैमेज हुए एंडोक्राइन सिस्टम को दोबारा प्राकृतिक अवस्था में लाने में थोड़ा अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: औषधियों और 'आम-पाचक' डाइट से आपका लिवर डिटॉक्स होना शुरू होगा। दिन भर रहने वाली थकावट कम होगी और सुबह उठकर आपको एक नई ऊर्जा महसूस होगी।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म (विरेचन) और रसायनों के प्रभाव से खून साफ़ होने लगेगा। आपके थायराइड या पीसीओडी के लक्षणों में भारी कमी आएगी और अनियंत्रित वज़न का बढ़ना रुक जाएगा।
  • 5-6 महीने: आपका पूरा मेटाबॉलिज़्म और हॉर्मोनल सिस्टम पूरी तरह से रिपेयर और पोषित हो जाएगा। आप बिना किसी बाहरी हॉर्मोनल पिल्स के, एक प्राकृतिक, संतुलित और कॉन्फिडेंट जीवन जीना शुरू कर देंगे।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

हॉर्मोनल असंतुलन और शरीर में फैले रसायनों (Toxicity) के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है।

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य बाहर से सिंथेटिक हॉर्मोन्स (Thyroxine/Birth Control Pills) देकर कमी को ज़बरदस्ती पूरा करना। जठराग्नि को मज़बूत करना, टॉक्सिन्स को बाहर निकालना और शरीर को खुद हॉर्मोन बनाने के लिए प्रेरित करना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल एक याँत्रिक (Mechanical) ग्रंथि का फेल होना या जेनेटिक समस्या मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बाहरी कृत्रिम विष (Garavisha) और दूषित रस धातु का एक संपूर्ण सिंड्रोम मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल डाइट पर खास ज़ोर नहीं दिया जाता, केवल कैलोरी कम करने की आम सलाह दी जाती है। डाइट में सात्विक भोजन, प्लास्टिक से परहेज़, और लिवर को डिटॉक्स करने के लिए सही खानपान पर विशेष ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर गोलियाँ छोड़ने पर हॉर्मोन्स फिर से भयंकर रूप से क्रैश कर जाते हैं (Dependence)। शरीर का मेटाबॉलिज़्म और ग्रंथियाँ अंदर से इतनी मज़बूत हो जाती हैं कि वे प्राकृतिक रूप से हॉर्मोन्स को बैलेंस करना सीख जाती हैं।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

अगर आपको अपने शरीर में ये गंभीर और अचानक होने वाले बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • अचानक बहुत तेज़ी से वज़न गिरना या बढ़ना: अगर बिना किसी कोशिश के केवल एक महीने में आपका वज़न 5-10 किलो बदल जाए (यह गंभीर थायराइड या मेटाबॉलिक क्रैश का अलार्म है)।
  • पेल्विक हिस्से में असहनीय दर्द: अगर महिलाओं को पेट के निचले हिस्से (Pelvis) में इतना भयंकर दर्द उठे जो पेनकिलर से भी शांत न हो (यह ओवेरियन सिस्ट के फटने का संकेत हो सकता है)।
  • लगातार दिल की धड़कन बेकाबू रहना: अगर बैठे-बैठे अचानक आपका दिल पागलों की तरह धड़कने लगे (Palpitations) और पसीना आए, जो थायराइड स्टॉर्म (Thyroid storm) का संकेत हो सकता है।
  • दैनिक जीवन का ठप हो जाना: अगर भयंकर थकावट इतनी ज़्यादा है कि आप बिस्तर से उठ ही नहीं पा रहे हैं और आपका पूरा रूटीन अपाहिज हो चुका है।

निष्कर्ष

अपने शरीर के हॉर्मोनल सिस्टम को एक बेहद नाज़ुक और सटीक सिम्फनी (Symphony) की तरह समझें, जिसे सही से काम करने के लिए प्राकृतिक माहौल की ज़रूरत होती है। जब आप अपनी सुविधा के लिए रोज़ाना प्लास्टिक की बोतलों से पानी पीते हैं या प्लास्टिक के डिब्बों में खाना गर्म करते हैं, तो आप अनजाने में उस सिम्फनी में ज़हरीले रसायनों (BPA/Phthalates) का शोर मचा रहे होते हैं। बिना बात वज़न का बढ़ना, सुबह उठते ही थकावट से चूर रहना और बात-बात पर एंग्जायटी होना, ये कोई सामान्य थकान नहीं है; यह एक अलार्म है कि आपका 'रस धातु' पूरी तरह दूषित हो चुका है और आपका एंडोक्राइन सिस्टम उन नकली हॉर्मोन्स से धोखा खा रहा है। केवल सिंथेटिक हॉर्मोन की गोलियाँ खाकर इस भयंकर टॉक्सिसिटी को टालने की कोशिश न करें, क्योंकि यह आपके शरीर की प्राकृतिक हीलिंग क्षमता को हमेशा के लिए खत्म कर रहा है।

सुविधा के नाम पर मिले इस प्लास्टिक के ज़हर और हॉर्मोनल पिल्स के चक्रव्यूह से बाहर निकलें। प्लास्टिक की बोतलों को तांबे, स्टील या कांच की बोतलों से बदलें। अपनी डाइट में जौ, लौकी और धनिए का पानी शामिल करें। अश्वगंधा, गिलोय और शतावरी जैसी जादुई जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करें, और पंचकर्म की विरेचन व उद्वर्तन थेरेपी से अपने सूस्त लिवर को प्राकृतिक सफाई देकर नया जीवन दें। प्लास्टिक की इस खामोश बीमारी को अपनी लाइफस्टाइल का हिस्सा न बनने दें, आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

नहीं। जब कंपनियों ने BPA को हटाया, तो उन्होंने उसकी जगह प्लास्टिक को कड़क बनाने के लिए BPS या BPF जैसे रसायनों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। रिसर्च बताती हैं कि ये रसायन भी बिल्कुल BPA की तरह ही काम करते हैं और हार्मोन्स (विशेषकर एस्ट्रोजन) को भयंकर रूप से नुकसान पहुँचाते हैं।

ठंडे तापमान में रसायन पानी में कम रिसते हैं, लेकिन जब आप उस जमी हुई बोतल को बाहर निकालकर पिघलने के लिए छोड़ देते हैं या वह कमरे के तापमान (Room temperature) पर आती है, तो प्लास्टिक का स्ट्रक्चर कमज़ोर होने लगता है और माइक्रोप्लास्टिक्स पानी में तेज़ी से मिल जाते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार तांबे (Copper) के बर्तन का पानी सबसे उत्तम है, क्योंकि यह पानी को प्राकृतिक रूप से प्यूरीफाई करता है और वात-कफ-पित्त को संतुलित करता है। इसके अलावा, कांच (Glass) और हाई-क्वालिटी फूड-ग्रेड स्टेनलेस स्टील (Stainless Steel) की बोतलें पूरी तरह सुरक्षित और नॉन-टॉक्सिक विकल्प हैं।

बिल्कुल। खासकर जब आप प्लास्टिक के टिफिन में गर्म खाना रखते हैं या माइक्रोवेव में प्लास्टिक के कंटेनर में खाना गर्म करते हैं, तो उच्च तापमान के कारण थैलेट्स (Phthalates) और माइक्रोप्लास्टिक्स तेज़ी से पिघल कर सीधे आपके भोजन में मिल जाते हैं।

लिवर शरीर का मुख्य फिल्टर है। रोज़ सुबह खाली पेट तांबे के बर्तन में रखा पानी, या गुनगुने पानी में थोड़ा सा नींबू और कच्ची हल्दी का अर्क मिलाकर पीने से लिवर का प्राकृतिक डिटॉक्सिफिकेशन (Detoxification) तेज़ होता है, जो इन रसायनों को शरीर से फ्लश आउट (Flush out) करने में मदद करता है।

शत-प्रतिशत। BPA और थैलेट्स को एस्ट्रोजन मिमिकर्स (Estrogen Mimickers) कहा जाता है। जब पुरुष लगातार इनका सेवन करते हैं, तो उनके शरीर में एस्ट्रोजन का प्रभाव बढ़ जाता है, जिससे टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) का स्तर गिरता है। इसके कारण पुरुषों में सुस्ती, मांसपेशियों का कमज़ोर होना और फर्टिलिटी की समस्याएं पैदा होती हैं।

ये सबसे ज़्यादा खतरनाक होते हैं। ये बहुत ही निम्न गुणवत्ता (Low quality) वाले सिंगल-यूज़ प्लास्टिक से बने होते हैं। अक्सर ये धूप में ट्रकों या दुकानों के बाहर पड़े रहते हैं। गर्मी के कारण इनमें से रसायन भारी मात्रा में पानी में घुल चुके होते हैं, जो सीधे कैंसर और हार्मोनल बीमारियों का रिस्क बढ़ाते हैं।

ये नंबर प्लास्टिक के प्रकार को बताते हैं। नंबर 1 (PET/PETE) सिंगल यूज़ के लिए होता है, इसे दोबारा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। नंबर 3 (PVC), 6 (PS), और 7 (Other - जिसमें BPA होता है) सबसे ज़्यादा खतरनाक माने जाते हैं। नंबर 2, 4 और 5 अपेक्षाकृत कम टॉक्सिक होते हैं, लेकिन किसी भी प्लास्टिक में गर्म चीज़ें रखना असुरक्षित है।

बहुत ज़्यादा। पीसीओडी (PCOD) सीधे तौर पर एस्ट्रोजन डोमिनेंस और इंसुलिन रेजिस्टेंस से जुड़ा है। प्लास्टिक से आने वाले नकली एस्ट्रोजेन्स इस समस्या को बहुत भयंकर बना देते हैं। जैसे ही आप प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद करते हैं और आयुर्वेदिक डिटॉक्स अपनाते हैं, ओवरीज़ पर पड़ा रासायनिक दबाव हट जाता है और हॉर्मोन्स जल्दी रिकवर करते हैं।

यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। ज़्यादातर कागज़ के कपों के अंदर प्लास्टिक या वैक्स की एक बहुत बारीक कोटिंग (Polyethylene lining) होती है ताकि कप गले नहीं। जब आप इसमें खौलती हुई चाय डालते हैं, तो महज़ 15 मिनट के अंदर अरबों माइक्रोप्लास्टिक्स पिघल कर आपकी चाय में मिल जाते हैं। मिट्टी के कुल्हड़ या कांच के कप सबसे सुरक्षित हैं।

Top Ayurveda Doctors

Social Timeline

Our Happy Patients

  • Sunita Malik - Knee Pain
  • Abhishek Mal - Diabetes
  • Vidit Aggarwal - Psoriasis
  • Shanti - Sleeping Disorder
  • Ranjana - Arthritis
  • Jyoti - Migraine
  • Renu Lamba - Diabetes
  • Kamla Singh - Bulging Disc
  • Rajesh Kumar - Psoriasis
  • Dhruv Dutta - Diabetes
  • Atharva - Respiratory Disease
  • Amey - Skin Problem
  • Asha - Joint Problem
  • Sanjeeta - Joint Pain
  • A B Mukherjee - Acidity
  • Deepak Sharma - Lower Back Pain
  • Vyjayanti - Pcod
  • Sunil Singh - Thyroid
  • Sarla Gupta - Post Surgery Challenges
  • Syed Masood Ahmed - Osteoarthritis & Bp
Book Free Consultation Call Us