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Calcium Tablet 5 साल से ले रहे हैं फिर भी Bone Density कम - कमी कहाँ है?

Information By Dr. Keshav Chauhan     Medically Reviewed by Dr.Partap Chauhan
  • category-iconPublished on 19 May, 2026
  • category-iconUpdated on 11 Jun, 2026
  • category-iconJoint Health
  • blog-view-icon5063

उम्र के साथ हड्डियों का कमज़ोर होना एक आम चिंता है, जिसके लिए बाज़ार में मौजूद ढेरों कैल्शियम सप्लीमेंट्स को एक जादुई उपाय मान लिया जाता है। कई लोग सालों तक रोज़ाना इन कैल्शियम की गोलियों का सेवन करते हैं, इस उम्मीद में कि उनकी हड्डियाँ फौलादी हो जाएंगी और जोड़ों का दर्द गायब हो जाएगा। लेकिन असली झटका तब लगता है जब 5 साल लगातार गोलियाँ खाने के बाद भी बोन डेंसिटी (Bone Density) का टेस्ट करवाने पर रिपोर्ट में हड्डियाँ अंदर से खोखली और कमज़ोर नज़र आती हैं।

यह स्थिति सोचने पर मजबूर कर देती है कि आखिर वह सारा कैल्शियम गया कहाँ? सच्चाई यह है कि हड्डियों का स्वास्थ्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आप मुँह से कितना कैल्शियम खा रहे हैं, बल्कि इस पर निर्भर करता है कि आपका शरीर उसे कितना सोख पा रहा है। अगर शरीर की आंतरिक प्रणाली और जठराग्नि कमज़ोर है, तो ये गोलियाँ आपकी हड्डियों तक पहुँचने के बजाय केवल किडनी और नसों में पत्थर की तरह जमा हो रही हैं, जिसे प्राकृतिक रूप से ठीक करना अत्यंत आवश्यक है।

शरीर में लगातार कैल्शियम सप्लीमेंट्स खाने के बावजूद हड्डियों तक पोषण क्यों नहीं पहुँच रहा?

जब हम कृत्रिम रूप से कैल्शियम की गोलियाँ खाते हैं, तो शरीर उसे सीधे हड्डियों में नहीं डाल देता। इस प्रक्रिया में कई जैविक बाधाएं आती हैं:

  • विटामिन डी3 और के2 की कमी: कैल्शियम को हड्डियों तक पहुँचाने के लिए विटामिन डी3 एक टैक्सी की तरह काम करता है, और विटामिन के2 उसे सही जगह पर लॉक करता है। इनके बिना सारा सप्लीमेंट व्यर्थ हो जाता है।
  • खराब अवशोषण (Poor Absorption): यदि पेट का एसिड और आंतों का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, तो गोलियाँ पच ही नहीं पातीं और कमज़ोर पाचन के कारण मल-मूत्र के रास्ते बाहर निकल जाती हैं।
  • हड्डियों के निर्माण की प्रक्रिया का रुकना: उम्र या हॉर्मोनल बदलाव के कारण पुरानी हड्डी को हटाने (Resorption) और नई हड्डी बनाने (Formation) का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है।
  • रक्त वाहिकाओं में कैल्सीफिकेशन: जो कृत्रिम कैल्शियम हड्डियों तक नहीं पहुँच पाता, वह धमनियों (Arteries) और किडनी में जमा होने लगता है, जिससे पथरी और नसों के सख्त होने का खतरा बढ़ जाता है।

कमज़ोर हड्डियों और मिनरल लॉस की यह समस्या किन प्रकारों की हो सकती है?

जब कैल्शियम हड्डियों से बाहर निकलने लगता है, तो शरीर एक झटके में बीमार नहीं पड़ता। हड्डियों की यह कमज़ोरी मुख्य रूप से इन चरणों या प्रकारों में देखी जाती है:

  • ऑस्टियोपीनिया (Osteopenia): यह हड्डी कमज़ोर होने की पहली स्टेज है। इसमें बोन डेंसिटी सामान्य से कम हो जाती है, लेकिन इतनी नहीं कि उसे कोई गंभीर बीमारी माना जाए। यह शरीर का पहला अलार्म है।
  • ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis): यह एक गंभीर प्रकार है जहाँ हड्डियाँ अंदर से स्पंज जैसी खोखली और भुरभुरी हो जाती हैं। ऐसे में हल्का सा झटका लगने पर भी ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) के कारण फ्रैक्चर हो सकता है।
  • ऑस्टियोमलेशिया (Osteomalacia): इसमें हड्डियाँ खोखली होने के बजाय बहुत नरम (Soft) हो जाती हैं, जो मुख्य रूप से विटामिन डी की भयंकर कमी के कारण होता है। इससे पैरों का आकार मुड़ने लगता है।

कैल्शियम की कमी और अस्थि क्षय के क्या लक्षण (Symptoms) महसूस होते हैं?

हड्डियों का खोखलापन एक 'साइलेंट किलर' है, लेकिन अगर आप शरीर की छोटी-छोटी तकलीफों पर ध्यान दें, तो ये लक्षण साफ दिखाई देते हैं:

  • हर समय थकान और सुस्ती: रात भर सोने के बाद भी अत्यधिक थकान और कमज़ोरी बनी रहना और दिन भर शरीर में भारीपन महसूस होना।
  • लगातार पीठ और कमर में दर्द: रीढ़ की हड्डी में कैल्शियम कम होने से सुबह कमर में जकड़न और झुकने पर असहनीय दर्द होने लगता है।
  • नाखूनों का टूटना और बालों का झड़ना: कैल्शियम केवल हड्डियों में नहीं होता। शरीर में इसकी कमी से नाखून बहुत जल्दी टूटने लगते हैं और बाल अपनी चमक खो देते हैं।
  • मांसपेशियों में ऐंठन (Muscle Cramps): रात को सोते समय पिंडलियों (Calves) और जांघों में अचानक भयंकर ऐंठन उठना और हाथों में सुन्नपन और सर्वाइकल दर्द महसूस होना।
  • कद का कम होना (Loss of height): उम्र के साथ रीढ़ की हड्डियाँ आपस में दबने लगती हैं, जिससे व्यक्ति का पॉश्चर (Posture) आगे की ओर झुक जाता है।

सप्लीमेंट्स लेने में लोग क्या गलतियाँ करते हैं और इसके क्या भयंकर दुष्परिणाम होते हैं?

कैल्शियम की गोलियों को लेकर आधी-अधूरी जानकारी अक्सर लोगों को फायदे की जगह भारी नुकसान पहुँचाती है:

  • बिना चेकअप के हाई डोज़ लेना: दर्द होने पर खुद से ही कैल्शियम की गोलियाँ शुरू कर देना और सालों तक खाते रहना किडनी स्टोन (Pathri) का सबसे बड़ा कारण बनता है।
  • एंटासिड्स (गैस की गोलियाँ) के साथ खाना: जो लोग गैस की गोलियाँ खाते हैं, उनके पेट में एसिड कम होता है। बिना एसिड के कैल्शियम कार्बोनेट की गोलियाँ कभी पचती ही नहीं हैं।
  • व्यायाम को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना: केवल गोलियाँ खाकर बैठे रहने से कैल्शियम हड्डियों में नहीं जाता। वज़न उठाने वाले व्यायाम (Weight-bearing exercises) के बिना बोन डेंसिटी कभी नहीं बढ़ती।
  • आंतों का डैमेज होना: बाज़ार के सिंथेटिक कैल्शियम से कब्ज़ होती है। इसके कारण पेट में भारी गैस बनती है और कमर दर्द की पुरानी समस्याएँ वापस उभर आती हैं।

अस्थि धातु के क्षय और कमज़ोर हड्डियों पर आयुर्वेद का क्या गहरा नज़रिया है?

आधुनिक चिकित्सा जिसे केवल कैल्शियम और बोन डेंसिटी का नंबर मानती है, आयुर्वेद उसे शरीर की 'अस्थि धातु' और 'वात दोष' के गहरे असंतुलन के रूप में समझता है:

  • अस्थि धातु का क्षय: आयुर्वेद के अनुसार शरीर 7 धातुओं से बना है। जब जठराग्नि और पाचन सुस्त पड़ जाते हैं, तो आहार का रस मज्जा और अस्थि (Bones) तक पहुँच ही नहीं पाता, जिससे हड्डियाँ कमज़ोर होने लगती हैं।
  • वात दोष का भयंकर प्रकोप: शरीर में वात (रूखापन) का मुख्य स्थान हड्डियाँ ही हैं। जब वात दोष को कम करने के उपाय नहीं किए जाते, तो यह बढ़ा हुआ वात हड्डियों को अंदर से सुखाकर खोखला कर देता है।
  • मज्जा (Bone Marrow) का सूखना: वात के रूखेपन के कारण हड्डियों के बीच की मज्जा और चिकनाई खत्म होने लगती है, जिससे जोड़ों में गर्दन और कंधे की जकड़न जैसी तकलीफें पैदा होती हैं।
  • आम (Toxins) का जमाव: खराब पाचन से बना ज़हरीला 'आम' जब जोड़ों में जाकर बैठता है, तो यह जोड़ों की बीमारियों और अर्थराइटिस (Arthritis) का रूप ले लेता है।

हड्डियों को फौलादी बनाने वाला आयुर्वेदिक डाइट चार्ट

गोलियों के बजाय आपको ऐसा प्राकृतिक आयुर्वेदिक आहार चाहिए जो शरीर को आसानी से पचने वाला कैल्शियम दे। इस डाइट चार्ट का पालन करें:

आहार की श्रेणी क्या खाएं (फायदेमंद - अस्थि धातु बढ़ाने वाले) क्या न खाएं (नुकसानदायक - कैल्शियम सोखने वाले)
अनाज (Grains) रागी (कैल्शियम का बेहतरीन प्राकृतिक स्रोत), पुराना चावल, जौ, ओट्स। मैदा से बनी चीज़ें, वाइट ब्रेड, पैकेटबंद सफेद नूडल्स।
मेवे और बीज (Nuts & Seeds) रात भर भीगे हुए सफेद तिल (White Sesame), बादाम, अखरोट, चिया सीड्स। बिना भिगोए और ज़्यादा नमक वाले सूखे मेवे, मूंगफली।
सब्ज़ियाँ (Vegetables) सहजन (Drumsticks/Moringa), लौकी, पालक (संतुलित मात्रा में), ब्रोकली। कच्ची पत्ता गोभी, बहुत ज़्यादा भारी और बासी सब्ज़ियाँ।
डेयरी और पेय गुनगुना दूध (हल्दी या अश्वगंधा के साथ), ताज़ा नारियल पानी। कैफीनयुक्त कड़क चाय/कॉफी, बर्फ वाला पानी, कोल्ड ड्रिंक्स।
वसा (Fats) शुद्ध देसी गाय का घी (हड्डियों की ग्रीस बढ़ाने के लिए सबसे उत्तम)। रिफाइंड ऑयल, डीप फ्राई की हुई गरिष्ठ चीज़ें।

अस्थि धातु का पोषण करने वाली सुरक्षित आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

प्रकृति ने हमें ऐसे कई रसायन दिए हैं जो बिना किसी साइड-इफेक्ट के 35 की उम्र के बाद नसों की कमज़ोरी और हड्डियों के खोखलेपन को दूर करते हैं:

  • हड़जोड़: आयुर्वेद में इसे हड्डियों को जोड़ने वाला कहा गया है। यह कमज़ोर और खोखली हो चुकी हड्डियों में खनिज भरकर उन्हें फिर से फौलादी बनाता है और फ्रैक्चर को तेज़ी से जोड़ता है।
  • अश्वगंधा: यह हड्डियों और नसों के लिए सबसे जादुई टॉनिक है। अश्वगंधा मांसपेशियों को ताक़त देता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
  • शतावरी: शरीर की अंदरूनी कमज़ोरी को दूर करने और जोड़ों को पोषण देने के लिए शतावरी एक बेहतरीन रसायन है, जो विशेषकर महिलाओं में मेनोपॉज़ के बाद बहुत लाभदायक है।
  • गुग्गुल: हड्डियों के जोड़ों में आई किसी भी तरह की पुरानी सूजन और दर्द को प्राकृतिक रूप से खींच लेने में यह एक अत्यंत शक्तिशाली और सुरक्षित जड़ी-बूटी है।

कमज़ोर हड्डियों और जोड़ों के दर्द के लिए बेहतरीन आयुर्वेदिक थेरेपीज़

जब वात दोष हड्डियों में बहुत गहरा बैठ जाता है, तो औषधियों के साथ पंचकर्म की ये बाहरी थेरेपीज़ शरीर को तुरंत नई ऊर्जा देती हैं:

  • अभ्यंग मालिश: महानारायण या तिल जैसे औषधीय तेलों से की जाने वाली अभ्यंग मालिश शरीर की नसों को रिलैक्स करती है और सूख चुकी हड्डियों को प्राकृतिक चिकनाई (Lubrication) देती है।
  • स्वेदन थेरेपी: औषधीय भाप के ज़रिए शरीर की जकड़न को दूर किया जाता है। स्वेदन थेरेपी मांसपेशियों की ऐंठन को खोलती है और दर्द को तुरंत खींच लेती है।
  • कटी बस्ती: अगर बोन डेंसिटी कम होने के कारण कमर में भयंकर दर्द है, तो कटी बस्ती के ज़रिए उड़द दाल का घेरा बनाकर उसमें गुनगुना तेल भरा जाता है, जो रीढ़ की हड्डी को गहरा पोषण देता है।
  • जानु बस्ती: घुटनों की कमज़ोरी के लिए यह घुटनों पर की जाने वाली विशेष तेल की बस्ती है, जो घिस चुकी कार्टिलेज को दोबारा चिकनाई प्रदान करती है।

हड्डियों के प्राकृतिक रूप से मज़बूत होने में कितना समय लगता है?

बरसों से खाली हो रही अस्थि धातु को दोबारा मिनरल्स से भरने और नसों को ताक़त देने में एक अनुशासित समय लगता है:

  • शुरुआती 1-2 महीने: सही जठराग्नि और प्राकृतिक औषधियों के सेवन से शरीर में कब्ज़ और पाचन की समस्या दूर होगी। मांसपेशियों की ऐंठन और सुबह की जकड़न काफी हद तक कम हो जाएगी।
  • 3-4 महीने: पंचकर्म और रसायनों के प्रभाव से जोड़ों का रूखापन खत्म होने लगेगा और नसों से जुड़ी बीमारियों का खतरा टल जाएगा।
  • 5-6 महीने और आगे: आपकी अस्थि धातु पूरी तरह पोषित हो जाएगी। आप बिना किसी भारी सप्लीमेंट या दर्द की गोली के एक लचीले और ताक़तवर शरीर का अनुभव करेंगे।

मरीज़ों का अनुभव

मेरा नाम कुसुमलता है, मेरी उम्र 74 वर्ष है और मैं दिल्ली में एक शिक्षक रही हूँ। मैं लंबे समय से शरीर में दर्द से परेशान थी और मुझे ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या भी थी। मैंने एलोपैथिक इलाज करवाया, लेकिन मुझे कोई खास राहत नहीं मिली। फिर मैंने टीवी पर डॉ. प्रताप चौहान को देखा और उनसे परामर्श लिया, जिसके बाद मैं जीवाग्राम आई। यहाँ मुझे डाइट, लाइफस्टाइल, थेरेपी और आयुर्वेदिक दवाइयों के साथ उपचार दिया गया। नियमित देखभाल से अब मुझे पहले से काफी राहत है और मैं बेहतर महसूस करती हूँ।

आधुनिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में अंतर

हड्डियों के दर्द और बोन डेंसिटी के इलाज को लेकर आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नज़रिए में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है:

श्रेणी आधुनिक चिकित्सा (Symptomatic care) आयुर्वेद (Holistic care)
इलाज का मुख्य लक्ष्य दर्द कम करने के लिए पेनकिलर्स देना और सालों तक सिंथेटिक कैल्शियम या विटामिन डी की गोलियाँ खिलाना। बढ़ा हुआ वात शांत करना, जठराग्नि को प्रबल करना और शरीर की 'अस्थि धातु' (Bones) को प्राकृतिक रूप से पोषण देना।
बीमारी को देखने का नज़रिया इसे केवल एक विशिष्ट मिनरल (कैल्शियम) की कमी और उम्र बढ़ने की स्थानीय समस्या मानना। इसे कमज़ोर पाचन, बिगड़े हुए वात और रूखे आहार का एक संपूर्ण सिंड्रोम (अस्थि धातु क्षय) मानना।
डाइट और लाइफस्टाइल अक्सर केवल सप्लीमेंट्स खाने पर निर्भर रहने की आम सलाह दी जाती है, पाचन पर ध्यान नहीं दिया जाता। खाने में 'स्नेहन' (घी), रागी, तिल, और सही शारीरिक व्यायाम पर बहुत गहरा ज़ोर दिया जाता है।
लंबा असर शरीर प्राकृतिक कैल्शियम बनाना भूल जाता है और गोलियों से किडनी स्टोन व नसों में कैल्सीफिकेशन (Calcification) होने लगता है। शरीर की जठराग्नि और हड्डियाँ अंदर से इतनी मज़बूत हो जाती हैं कि वे प्राकृतिक रूप से मिनरल्स को रोकना सीख जाती हैं।

डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना कब ज़रूरी हो जाता है?

हालांकि आयुर्वेद इस वात और हड्डियों की कमज़ोरी को पूरी तरह रिवर्स कर सकता है, लेकिन अगर आपको अपने शरीर में ये कुछ गंभीर बदलाव दिखें, तो तुरंत मेडिकल जाँच ज़रूरी हो जाती है:

  • मामूली चोट से फ्रैक्चर (Fragility Fracture): अगर केवल थोड़ा सा मुड़ने, खांसने या हल्की सी चोट लगने से ही हड्डी टूट जाए (यह गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस का संकेत है)।
  • जोड़ों का अचानक लॉक हो जाना: अगर आपका घुटना या कोई जोड़ अचानक एक ही स्थिति में जाम हो जाए और उसे हिलाने में असहनीय दर्द हो।
  • कमर दर्द के साथ पैरों में सुन्नपन: अगर रीढ़ की हड्डी के दर्द के साथ-साथ आपके पैरों में कोई भी सेंसेशन (Sensation) महसूस न हो और यूरिन पर नियंत्रण खत्म हो जाए।
  • लगातार बढ़ता हुआ भयंकर दर्द: ऐसा दर्द जो रात के समय बहुत ज़्यादा बढ़ जाए और किसी भी आराम या सामान्य दवा से कम न हो।

निष्कर्ष

अपनी हड्डियों को केवल कैल्शियम का एक डिब्बा समझने की भूल न करें। यह एक जीवित ऊतक (Living Tissue) है जिसे सही मात्रा में रक्त, चिकनाई और ऊर्जा की आवश्यकता होती है। जब आप अपनी कमज़ोर पाचन शक्ति और खराब लाइफस्टाइल को नज़रअंदाज़ करके 5 सालों तक लगातार कैल्शियम की गोलियाँ निगलते रहते हैं, तो आप अपनी हड्डियों को नहीं, बल्कि अपनी किडनी को भारी कर रहे होते हैं। बिना सही 'अग्नि' और बिना विटामिन डी व के2 (D3/K2) के, यह सारा कैल्शियम शरीर के लिए महज़ एक कचरा है।

इन सिंथेटिक सप्लीमेंट्स के जाल से बाहर निकलें। अपने आहार में प्राकृतिक कैल्शियम के भंडार जैसे रागी, मोरिंगा (सहजन) और सफेद तिल को शामिल करें। हड़जोड़ और अश्वगंधा जैसी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों पर भरोसा करें जो आपके शरीर की कैल्शियम सोखने की क्षमता को प्राकृतिक रूप से बढ़ाती हैं। इन गोलियों की आजीवन निर्भरता को अपनी आदत न बनने दें, और अपनी हड्डियों को प्राकृतिक रूप से फौलादी बनाने व इससे राहत पाने के लिए आज ही जीवा आयुर्वेद से संपर्क करें।

Disclaimer: This blog is for informational purposes only and should not be considered medical advice. The content is not intended to replace professional diagnosis, treatment, or medical guidance. For personalised healthcare advice and appropriate treatment, please consult a qualified and experienced Jiva Ayurveda doctor.

FAQs

कैल्शियम खाना और उसे हड्डियों तक पहुँचाना दो अलग-अलग बातें हैं। अगर आपके शरीर में विटामिन डी3, विटामिन के2 की कमी है या आपका पाचन (जठराग्नि) कमज़ोर है, तो गोलियों का सारा कैल्शियम बिना हड्डियों में जाए शरीर से बाहर निकल जाता है या नसों में जम जाता है।

जी हाँ। शरीर एक सीमा तक ही कृत्रिम कैल्शियम को पचा सकता है। जो कैल्शियम पचता नहीं है, वह खून में घूमता रहता है और अंततः किडनी उसे फिल्टर करते समय पत्थरों (Calcium oxalate stones) के रूप में जमा कर लेती है।

दूध कैल्शियम का अच्छा स्रोत है, लेकिन अगर आपका पेट (लैक्टोज़) इसे पचा नहीं पाता या आप इसे गलत समय पर (जैसे नमकीन चीज़ों के साथ) पीते हैं, तो यह कफ और गैस बनाएगा। आयुर्वेद में दूध को हल्दी या अश्वगंधा के साथ उबालकर पीना हड्डियों के लिए ज़्यादा फायदेमंद बताया गया है।

हाँ, बाज़ार में मिलने वाले ज़्यादातर कैल्शियम कार्बोनेट सप्लीमेंट्स को पचाने के लिए पेट में बहुत ज़्यादा एसिड की ज़रूरत होती है। अगर आपका पाचन सुस्त है, तो ये गोलियाँ आंतों में पड़ी रहती हैं, जिससे भयंकर गैस, भारीपन और कब्ज़ की समस्या होती है।

हड्डियों की मज़बूती केवल कैल्शियम से नहीं होती। इसके लिए मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, ज़िंक और सिलिका की भी आवश्यकता होती है। इसलिए केवल एक गोली पर निर्भर रहने के बजाय रागी, तिल और हरी सब्ज़ियों जैसी संपूर्ण प्राकृतिक डाइट लेना ज़रूरी है।

शत-प्रतिशत। चाय और कॉफी में कैफीन (Caffeine) होता है। बहुत ज़्यादा कैफीन का सेवन करने से शरीर कैल्शियम को सोखने के बजाय उसे यूरिन (पेशाब) के रास्ते तेज़ी से बाहर निकाल देता है, जिससे हड्डियाँ खोखली होने लगती हैं।

हड़जोड़ एक जादुई आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है जिसका नाम ही हड्डियों को जोड़ने वाला है। यह शरीर की ऑस्टियोब्लास्ट (हड्डी बनाने वाली) कोशिकाओं को उत्तेजित करता है और प्राकृतिक रूप से बोन डेंसिटी बढ़ाता है।

बिल्कुल नहीं। गैस की गोलियाँ पेट के एसिड को खत्म कर देती हैं। कैल्शियम कार्बोनेट को पचने के लिए उसी एसिड की ज़रूरत होती है। इसलिए एंटासिड्स के साथ कैल्शियम खाना पूरी तरह से व्यर्थ हो जाता है।

नहीं। जब तक हड्डियों पर थोड़ा वज़न या दबाव (Weight-bearing load) नहीं पड़ता, तब तक शरीर नई हड्डी का निर्माण नहीं करता। रोज़ाना सैर करना, योग या हल्के वज़न उठाना कैल्शियम को हड्डियों के अंदर लॉक करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

सफेद तिल कैल्शियम का पावरहाउस हैं। इन्हें कच्चा खाने के बजाय, रात भर पानी में भिगोकर या हल्का सा सूखा भूनकर (Dry roast) चबाना चाहिए। इससे इनके अंदर मौजूद पोषक तत्व शरीर में आसानी से पच जाते हैं और हड्डियों को ताक़त देते हैं।

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