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प्लास्टिक की बोतल में पानी पीना कितना खतरनाक? Microplastics का सच जो आपको जानना चाहिए

Information By Dr. Keshav Chauhan

आज सुविधा के लिए प्लास्टिक की बोतल में पानी पीना हमारी रोज़मर्रा की आदत बन गया है। लेकिन यह आदत आपको अंदर ही अंदर भयंकर बीमारियों का शिकार बना रही है। आधुनिक रिसर्च के अनुसार, प्लास्टिक की बोतलों से रोज़ाना लाखों 'Microplastics' (Microplastics) और खतरनाक रसायन (जैसे BPA) पानी में घुलकर हमारे शरीर में जा रहे हैं। ये रसायन शरीर के प्राकृतिक हार्मोन्स को खराब कर रहे हैं और इम्युनिटी को तेज़ी से कमज़ोर कर रहे हैं। आयुर्वेद में ऐसे दूषित जल को 'गरविष' (Slow Poison) कहा गया है, जो शरीर में 'आम' (टॉक्सिन्स) बनाकर रक्त और आँतों को दूषित करता है। जीवा आयुर्वेद प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से इन्हीं खतरनाक टॉक्सिन्स की गहरी सफाई कर शरीर को अंदर से साफ और मज़बूत बनाता है, ताकि आपकी सेहत सुरक्षित रहे।

प्लास्टिक की बोतलों की ज़रूरत और Microplastics का असली रूप

आधुनिक जीवनशैली में सफर करते समय या ऑफिस में प्यास बुझाने के लिए पैकेटबंद पानी (Packaged Drinking Water) और प्लास्टिक की बोतलें सबसे आसान विकल्प बन गई हैं। हमें लगता है कि हम साफ पानी पी रहे हैं, लेकिन वास्तविकता बहुत डरावनी है। प्लास्टिक कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता, बल्कि वह टूटकर बहुत छोटे अदृश्य कणों में बदल जाता है जिन्हें 'Microplastics' और 'नैनोप्लास्टिक्स' कहते हैं। जब पानी प्लास्टिक की बोतल में हफ्तों तक बंद रहता है या धूप और गर्मी के संपर्क में आता है, तो ये अदृश्य कण और केमिकल पानी में घुल जाते हैं। यह दूषित पानी जब हमारे शरीर में जाता है, तो यह कोशिकाओं (Cells) और खून में जमा होने लगता है, जिसे हमारा लिवर और किडनी आसानी से साफ नहीं कर पाते।

प्लास्टिक की बोतलों से पानी में घुलने वाले खतरनाक तत्व कौन से हैं?

प्लास्टिक की बोतल से पानी पीने पर मुख्य रूप से ये खतरनाक रसायन हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं:

  • 'माइक्रोप्लास्टिक्स' (Microplastics): ये प्लास्टिक के बेहद छोटे कण होते हैं जो सीधे हमारे रक्त प्रवाह (Bloodstream) में प्रवेश कर जाते हैं और अंगों में सूजन पैदा करते हैं।
  • बीपीए (BPA - Bisphenol A): यह केमिकल प्लास्टिक को कड़ा बनाने के लिए इस्तेमाल होता है। यह शरीर में जाकर एस्ट्रोजन हार्मोन की नकल करता है, जिससे हार्मोनल संतुलन बुरी तरह बिगड़ जाता है।
  • थैलेट्स (Phthalates): प्लास्टिक को लचीला बनाने वाले ये रसायन कैंसर का कारण बन सकते हैं और प्रजनन क्षमता (Fertility) को कमज़ोर करते हैं।
  • एंटीमनी (Antimony): PET बोतलों (Single-use bottles) से निकलने वाला यह तत्व पेट खराब करने और फेफड़ों को नुकसान पहुँचाने के लिए ज़िम्मेदार है।

Microplastics के कारण शरीर द्वारा दिए जाने वाले भयंकर लक्षण

जब आप रोज़ाना प्लास्टिक की बोतलों से दूषित पानी पीते हैं, तो शरीर अंदर से कमज़ोर होने लगता है। इसके मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:

  • अचानक वज़न बढ़ना: हार्मोन्स खराब होने के कारण मेटाबॉलिज़्म धीमा हो जाता है और पेट के आस-पास तेज़ी से फैट जमने लगता है।
  • भयंकर थकान और सुस्ती: रक्त दूषित होने से शरीर की प्राकृतिक ऊर्जा (Ojas) खत्म हो जाती है और बिना काम किए ही थकावट रहती है।
  • पाचन तंत्र का बिगड़ना: आँतों में सूजन के कारण लगातार कब्ज़, गैस और ब्लोटिंग (पेट फूलना) की समस्या बनी रहती है।
  • त्वचा और बालों का खराब होना: शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ने से मुहांसे (Acne), पिगमेंटेशन और बाल झड़ने की समस्या शुरू हो जाती है।

ये संकेत अगर लगातार दिखें तो तुरंत अपनी पानी पीने की आदतों को बदलें और चिकित्सक से परामर्श लें।

प्लास्टिक से शरीर कमज़ोर होने और टॉक्सिन्स बढ़ने के असली कारण

Microplastics और रसायन शरीर में ज़हर क्यों और कैसे बनाते हैं? इसके मुख्य अंदरूनी कारण इस प्रकार हैं:

  • बोतलों का बार-बार इस्तेमाल (Reuse): बाज़ार से खरीदी गई पानी की बोतल (Single-use PET) को हम घर में महीनों तक इस्तेमाल करते हैं। जितनी पुरानी बोतल होती है, उसमें से उतने ही ज़्यादा केमिकल पानी में घुलते हैं।
  • गर्मी और धूप का प्रभाव: जब प्लास्टिक की बोतलें गर्म कार में या धूप में रखी जाती हैं, तो गर्मी के कारण प्लास्टिक पिघलकर (Leaching) तेज़ी से पानी में ज़हर घोल देता है।
  • शरीर में 'गरविष' (Slow Poison) का बनना: आयुर्वेद के अनुसार, ये रसायन पचते नहीं हैं, बल्कि शरीर में 'गरविष' के रूप में जमा हो जाते हैं, जो लिवर की कार्यक्षमता को धीमा कर देते हैं।
  • दोषों का असंतुलन: प्लास्टिक के रसायनों की तासीर गर्म और विषैली होती है, जो शरीर में 'पित्त' और 'वात' को भड़काकर रक्त (Blood) को दूषित कर देती है।

Microplastics और दूषित जल को अनदेखा करने के गंभीर जोखिम

प्लास्टिक के रसायनों और Microplastics के साइड इफेक्ट्स को अगर अनदेखा किया जाए, तो यह कई गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है:

  • हार्मोनल बीमारियाँ (PCOD/Thyroid): BPA के कारण महिलाओं में PCOD और पुरुषों व महिलाओं दोनों में थायरॉइड की समस्या बहुत आम हो गई है।
  • प्रजनन क्षमता (Infertility) का कमज़ोर होना: प्लास्टिक के रसायन पुरुषों में स्पर्म काउंट कम करते हैं और महिलाओं में गर्भधारण में भयंकर रुकावट डालते हैं।
  • कैंसर का खतरा: लंबे समय तक शरीर में थैलेट्स और रसायनों के जमा होने से ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है।
  • बच्चों के विकास में रुकावट: गर्भवती महिलाओं के ज़रिए ये Microplastics भ्रूण (Fetus) तक पहुँचकर बच्चे के दिमागी विकास को रोक सकते हैं।

Microplastics (गरविष) पर आयुर्वेद का क्या नज़रिया है?

आयुर्वेद में प्लास्टिक या Microplastics का सीधा ज़िक्र नहीं है, लेकिन इस तरह के अदृश्य और धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुँचाने वाले रसायनों को 'गरविष' (कृत्रिम विष / Artificial Poison) कहा गया है। आयुर्वेद मानता है कि जब हम दूषित जल (प्लास्टिक वाला पानी) पीते हैं, तो यह हमारी 'रस' और 'रक्त' धातु को दूषित कर देता है। लिवर (यकृत) इन अप्राकृतिक रसायनों को पचा नहीं पाता, जिससे 'आम' (Toxins) पैदा होता है। डॉक्टर नाड़ी देखकर मर्ज़ को पकड़ते हैं कि विष के कारण कौन सा दोष कुपित हुआ है। आयुर्वेद में बस लक्षणों को दबाने वाली गोलियाँ देना मकसद नहीं है, बल्कि वो चाहते हैं कि शरीर का 'शोधन' (Detox) हो, यकृत (Liver) मज़बूत बने, और शरीर इन खतरनाक टॉक्सिन्स को मल-मूत्र के ज़रिए पूरी तरह साफ कर दे।

जीवा आयुर्वेद शरीर की ताकत और शुद्धि के लिए कैसे काम करता है?

जीवा आयुर्वेद का उपचार दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यक्तिगत है। इलाज शुरू करने से पहले आयुर्वेद एक्सपर्ट इन मुख्य बातों पर बारीकी से ध्यान देते हैं:

  • कस्टमाइज़्ड इलाज: हर व्यक्ति का शरीर और स्वास्थ्य (प्रकृति) अलग होता है, इसलिए इलाज पूरी तरह से उनके अनुकूल ही तय किया जाता है।
  • लक्षणों की पहचान: मरीज़ को दिख रहे सभी लक्षणों, हार्मोनल असंतुलन और थकान की बारीकी से जाँच की जाती है।
  • जीवनशैली का विश्लेषण: मरीज़ के पानी पीने के बर्तन (प्लास्टिक, स्टील, या तांबा) और रोज़ाना के आहार को गहराई से परखा जाता है।
  • सटीक इलाज की रूपरेखा: इन सभी बातों का अच्छे से विश्लेषण करने और 'आम' की मात्रा को पकड़ने के बाद ही शरीर को डिटॉक्स (Detoxify) करने का सबसे सटीक आयुर्वेदिक इलाज शुरू किया जाता है।

प्लास्टिक के ज़हर को साफ करने वाली अचूक आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ

आयुर्वेद में रक्त को साफ करने, 'गरविष' को काटने और लिवर को ताकत देने के लिए ये 4 जड़ी-बूटियाँ बेहद असरदार हैं:

  • मंजिष्ठा (Manjistha): यह रक्त (Blood) को साफ करने वाली सबसे बेहतरीन औषधि है। यह खून में घुले Microplastics के विषैले असर को कम करती है।
  • नीम (Neem): यह शरीर के अंदर मौजूद 'आम' और सूजन को खत्म करता है और एक बेहतरीन प्राकृतिक डिटॉक्सिफायर का काम करता है।
  • गुडूची/गिलोय (Giloy): यह खराब हुई इम्युनिटी को तेज़ी से वापस लाती है और लिवर की कोशिकाओं को रसायनों के नुकसान से बचाती है।
  • त्रिफला (Triphala): यह आँतों में चिपके हुए पुराने मल और टॉक्सिन्स को साफ कर शरीर की पाचन प्रणाली को पूरी तरह साफ करता है।

जमे हुए टॉक्सिन्स (Microplastics) को बाहर निकालने की पंचकर्म चिकित्सा

प्राकृतिक तरीके से शरीर को अंदर से शुद्ध कर, 'गरविष' और दोषों को बाहर निकालकर संपूर्ण स्वास्थ्य पाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया:

  • विरेचन (Virechana): शरीर से पुराने रसायनों और टॉक्सिन्स को निकालने के लिए यह एक अचूक चिकित्सा है। इसमें औषधीय जड़ी-बूटियाँ देकर पेट साफ कराया जाता है, जिससे लिवर और आँतों में जमा ज़हर बाहर निकल जाता है।
  • बस्ती कर्म (Basti): यह आँतों की गहराई से सफाई करती है और वात-पित्त को शांत कर शरीर की प्राकृतिक शुद्धि प्रणाली को मज़बूत बनाती है।

पानी को साफ रखने और टॉक्सिन्स से बचने वाला शुद्ध आहार

आयुर्वेदिक वेलनेस में यह समझना बहुत ज़रूरी है कि पानी को सही बर्तन में रखना उसे 'अमृत' या 'विष' बना सकता है:

क्या अपनाएँ? (पानी रखने के सही बर्तन)

  • तांबे का बर्तन (Copper Vessel): आयुर्वेद के अनुसार रात भर तांबे के बर्तन में रखा पानी ('ताम्र जल') लिवर को साफ करता है, बैक्टीरिया मारता है और वज़न घटाने में मदद करता है।
  • मिट्टी का घड़ा (Clay Pot): गर्मियों में मिट्टी के घड़े का पानी शरीर को प्राकृतिक शीतलता देता है और पानी के pH लेवल को संतुलित (Alkaline) रखता है।
  • कांच या स्टील (Glass/Stainless Steel): सफर में या घर पर प्लास्टिक की जगह हमेशा कांच या अच्छी क्वालिटी के स्टेनलेस स्टील की बोतलों का ही इस्तेमाल करें।

क्या न अपनाएँ? (किन चीज़ों से बचें)

  • प्लास्टिक की बोतलें और टिफिन: गर्म खाना या गर्म पानी कभी भी प्लास्टिक के बर्तनों में न रखें, क्योंकि गर्मी से Microplastics तेज़ी से खाने में घुल जाते हैं।
  • डिब्बाबंद (Packaged) ड्रिंक्स: प्लास्टिक की बोतलों में बंद जूस या कोल्ड ड्रिंक्स एसिडिक होते हैं जो प्लास्टिक के रसायनों को और ज़्यादा सोख लेते हैं।

जीवा आयुर्वेद में रोगी की गहराई से जाँच कैसे होती है?

जीवा आयुर्वेद में मरीज़ की जाँच सिर्फ ऊपर-ऊपर से पूछकर नहीं, बल्कि पूरी समझ के साथ की जाती है।

  • सबसे पहले आपकी परेशानी, हार्मोनल समस्याओं और लगातार रहने वाली थकावट को आराम से सुना जाता है।
  • आपके पानी पीने के तरीके, बोतलों के प्रकार और आहार को गहराई से समझा जाता है।
  • आपकी नींद, मानसिक तनाव और पेट साफ (कब्ज़) होने की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  • नाड़ी जाँच और शरीर की प्रकृति (विशेषकर वात-पित्त प्रकृति) को जाना जाता है।

हमारे यहाँ आपके इलाज का सफर कैसे होता है?

जीवा आयुर्वेद में हम इलाज की पूरी प्रक्रिया को बहुत ही व्यवस्थित और सही क्रम में रखते हैं, ताकि आपको अपनी बीमारी के लिए सबसे सटीक समाधान मिल सके।

  • अपनी जानकारी साझा करें: इलाज की शुरुआत के लिए अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी जानकारी दें। इसके लिए आप सीधे 0129 4264323 पर कॉल करके अपनी समस्या बता सकते हैं।
  • डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तय करें: आपकी सुविधा के अनुसार डॉक्टर से बात करने का समय तय किया जाता है, आप क्लिनिक विजिट या ₹49 में वीडियो कंसल्टेशन के जरिए घर बैठे भी जुड़ सकते हैं।
  • बीमारी को समझना: डॉक्टर आपसे विस्तार से बात करके आपकी तकलीफ, लाइफस्टाइल और शरीर की प्रकृति (Prakriti) को समझते हैं, ताकि बीमारी की असली वजह तक पहुँचा जा सके।
  • कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान: पूरी जांच के बाद आपके लिए एक पर्सनलाइज्ड इलाज योजना बनाई जाती है, जिसमें आयुर्वेदिक दवाइयाँ, डाइट और लाइफस्टाइल सुधार शामिल होते हैं, ताकि आपको अंदर से स्थायी राहत मिल सके।

पूरी तरह ठीक होने (डिटॉक्स) में कितना समय लगता है?

जीवा आयुर्वेद में टॉक्सिन्स (आम/गरविष) की सफाई का इलाज पूरी तरह से हर मरीज़ के हिसाब से किया जाता है:

  • हल्की समस्या में सुधार: अगर महज़ थकान या हल्का हार्मोनल असंतुलन है, तो बर्तन बदलने और दवाइयों से 4 से 6 हफ्तों में ही शरीर में हल्कापन महसूस होने लगता है।
  • पुरानी बीमारी का समय: अगर सालों से प्लास्टिक इस्तेमाल करने के कारण PCOD, थायरॉइड या फैटी लिवर की समस्या हो गई है, तो शरीर को पूरी तरह साफ (Regenerate) होने में 4 से 8 महीने लग सकते हैं।
  • स्थायी परिणाम: मरीज़ अगर जड़ी-बूटियों (मंजिष्ठा/नीम) का कड़ाई से पालन करता है और प्लास्टिक का त्याग करता है, तो भविष्य में हार्मोनल बीमारियों की संभावना खत्म हो जाती है।

जीवा आयुर्वेद में इलाज का अनुमानित खर्च

आपके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आर्थिक निवेश को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। जीवा आयुर्वेद में, हम अपनी सेवाओं के खर्च में पूरी पारदर्शिता रखते हैं, जिससे आप अपनी चिकित्सीय ज़रूरतों के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प चुन सकें।

इलाज का खर्च

जो मरीज़ मानक और निरंतर देखभाल चाहते हैं, उनके लिए दवा और परामर्श का मासिक खर्च आमतौर पर Rs.3,000 से Rs.3,500 के बीच होता है। कृपया ध्यान दें कि यह एक अनुमानित आधार है। अंतिम खर्च मरीज़ की स्थिति की सटीक प्रकृति और गंभीरता पर गहराई से निर्भर करता है।

प्रोटोकॉल

अधिक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण के लिए, हम विशेष पैकेज प्रोटोकॉल प्रदान करते हैं। ये योजनाएँ शारीरिक लक्षणों और समग्र जीवनशैली सुधार दोनों को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

पैकेज में शामिल हैं:

इस प्रोटोकॉल के खर्च में Rs.15,000 से Rs.40,000 तक का एकमुश्त भुगतान शामिल है, जो इलाज की पूरी 3 से 4 महीने की अवधि को कवर करता है।

जीवाग्राम

गहन और पूरी तरह से समर्पित देखभाल की आवश्यकता वाले मरीज़ों के लिए, हमारे जीवाग्राम केंद्र उपचार का बेहतरीन अनुभव प्रदान करते हैं। जीवाग्राम एक शांत, पर्यावरण के अनुकूल माहौल में स्थित एक समग्र स्वास्थ्य केंद्र है।

कार्यक्रम में आमतौर पर शामिल हैं:

जीवाग्राम में 7-दिनों के स्वास्थ्य प्रवास का खर्च लगभग ₹1 लाख है, जो आपके शरीर और दिमाग को फिर से तरोताज़ा करने में मदद करने के लिए निरंतर व्यक्तिगत देखभाल सुनिश्चित करता है।

लोग जीवा आयुर्वेद पर क्यों भरोसा करते हैं?

जीवा आयुर्वेद में हमारा मकसद सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबाना नहीं, बल्कि बीमारी की असली वजह को जड़ से खत्म करना है। यही वह खास बात है जिसकी वजह से लाखों मरीज़ हम पर दिल से भरोसा करते हैं।

  • जड़ कारण पर ध्यान: सिर्फ लक्षण नहीं, बीमारी की असली वजह को समझकर इलाज किया जाता है।
  • व्यक्तिगत उपचार: हर मरीज के शरीर, प्रकृति और लाइफस्टाइल के अनुसार अलग प्लान बनाया जाता है।
  • सिस्टेमैटिक जांच: वात असंतुलन और मेटाबॉलिज्म को गहराई से समझकर इलाज तय किया जाता है।
  • प्राकृतिक दवाइयाँ: शुद्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित दवाइयाँ, बिना शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाले।
  • अनुभवी डॉक्टर: आयुर्वेद विशेषज्ञों की टीम द्वारा लगातार मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • बेहतर परिणाम: 90%+ मरीजों में धीरे-धीरे स्पष्ट और सकारात्मक सुधार देखा गया है।

आधुनिक फिल्टर पानी और आयुर्वेदिक जल संचयन में क्या अंतर है?

पहलू आधुनिक तरीका (Plastic Storage) आयुर्वेदिक दृष्टिकोण (Natural Storage)
इलाज का मुख्य लक्ष्य पानी को स्टोर करना, भले ही प्लास्टिक में रखा जाए पानी को सुरक्षित रखते हुए उसके प्राकृतिक गुणों को बनाए रखना
नज़रिया स्टोरेज को केवल सुविधा और पोर्टेबिलिटी के रूप में देखना पानी को ‘जीवंत’ तत्व मानकर उसके प्रभाव को शरीर पर समझना
उपचार तरीका प्लास्टिक बोतलों में स्टोर करना, फ्रिज में ठंडा रखना उबालकर/शुद्ध करके मिट्टी, कांच या तांबे के बर्तनों में संग्रह करना
डाइट और लाइफस्टाइल ठंडा पानी पीने और प्लास्टिक उपयोग की आदत प्राकृतिक, सामान्य तापमान का पानी और पारंपरिक बर्तनों का उपयोग
लंबा असर माइक्रोप्लास्टिक्स के संपर्क से स्वास्थ्य जोखिम की संभावना शुद्ध, संतुलित और रसायन-मुक्त पानी से दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ

Microplastics के भारी साइड इफेक्ट्स होने पर डॉक्टर की सलाह कब लें?

लगातार प्लास्टिक की बोतलों के इस्तेमाल के दौरान अगर ये लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए:

  • बिना कारण वज़न का तेज़ी से बढ़ना और थकावट का दूर न होना।
  • महिलाओं में पीरियड्स का अत्यधिक अनियमित होना (Hormonal imbalance)।
  • पाचन तंत्र का पूरी तरह खराब रहना और लगातार एसिडिटी या गैस बनना।
  • पुरुषों में कमज़ोरी और प्रजनन क्षमता (Fertility) में कमी महसूस होना।

निष्कर्ष: 

आयुर्वेद के हिसाब से शरीर में हार्मोनल असंतुलन और इम्युनिटी का कमज़ोर होना मुख्य रूप से अप्राकृतिक रसायनों (गरविष/Microplastics) के शरीर में जमा होने से जुड़ी समस्या है। सुविधा के लिए इस्तेमाल की जाने वाली प्लास्टिक की बोतलें शरीर में वात-पित्त दोष बढ़ाती हैं और रक्त को दूषित करती हैं। सिर्फ बाहर से साफ पानी पीना काफी नहीं है, उसे सही बर्तन में रखना ज़्यादा ज़रूरी है। इलाज में शरीर की शुद्धि (Detox), मंजिष्ठा जैसी जड़ी-बूटियाँ और तांबे या कांच के बर्तनों का इस्तेमाल सबसे ज़्यादा आवश्यक है, जिससे आपका शरीर बिना किसी खतरनाक रसायन के जीवन भर सेहतमंद बना रहे।

FAQs

बिल्कुल! इन बोतलों को सिर्फ एक बार इस्तेमाल के लिए बनाया जाता है। इन्हें दोबारा धोने और इस्तेमाल करने से प्लास्टिक की परत टूटती है और Microplastics सीधे पानी में तेज़ी से घुल जाते हैं।

ये प्लास्टिक के वो अदृश्य कण हैं जो 5 मिलीमीटर से भी छोटे होते हैं। ये इतने छोटे होते हैं कि आँतों के ज़रिए सीधे हमारे खून (Bloodstream) में प्रवेश कर जाते हैं।

यह सबसे ज़्यादा खतरनाक है। गर्मी से प्लास्टिक पिघलता है (Leaching) और BPA जैसे रसायन हज़ारों गुना ज़्यादा तेज़ी से पानी में मिल जाते हैं।

आयुर्वेद में पानी रखने के लिए तांबे (Copper) का बर्तन, मिट्टी का घड़ा (Earthen pot), कांसे या चांदी के बर्तनों को सबसे सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक माना गया है।

BPA एक केमिकल है जो प्लास्टिक को सख्त बनाने के लिए इस्तेमाल होता है। शरीर में जाकर यह एस्ट्रोजन हार्मोन जैसा व्यवहार करता है, जिससे महिलाओं और पुरुषों दोनों में हार्मोनल बीमारियाँ पैदा होती हैं।

आयुर्वेद के अनुसार, तांबे के बर्तन में रखा पानी सुबह खाली पेट 1-2 गिलास पीना सबसे ज़्यादा फायदेमंद है। पूरे दिन पीने के लिए मिट्टी का घड़ा या कांच की बोतल सबसे बेहतर है।

हाँ, आधुनिक शोध साबित कर चुके हैं कि प्लास्टिक में मौजूद 'थैलेट्स' (Phthalates) पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन और स्पर्म काउंट को तेज़ी से कमज़ोर करते हैं।

शरीर को डिटॉक्स करने के लिए आयुर्वेद में त्रिफला, नीम और गिलोय का इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही पंचकर्म (विरेचन) के ज़रिए आँतों और लिवर की गहरी सफाई की जाती है।

BPA-Free बोतलों में BPA की जगह BPS या BPF जैसे अन्य रसायन इस्तेमाल होते हैं, जो उतने ही खराब हो सकते हैं। इसलिए प्लास्टिक का पूरी तरह से त्याग कर कांच या स्टील अपनाना ही समझदारी है।

कुछ हद तक पानी उबालने से पानी में मौजूद कैल्शियम कार्बोनेट के साथ मिलकर कुछ Microplastics नीचे बैठ सकते हैं, जिन्हें छाना जा सकता है। लेकिन प्लास्टिक की बोतल में उबला पानी डालना ज़हर बनाने के बराबर है।

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